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व्याख्यान शास्त्र
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thumb|180px|पश्चिमी व्याख्यान परम्परा में अरस्तू का विशेष योगदान रहा था
व्याख्यान शास्त्र या वाग्मिता-शास्त्र
( Rhetoric ) उस कला को कहते हैं जिसमें लेखकों और वक्ताओं की जानकारी प्रदान करने, भावनाएँ व्यक्त करने और श्रोताओं को भिन्न उद्देश्यों के लिए प्रेरित करने की क्षमता और उसे सुधारने की विधियों का अध्ययन किया जाता है।Corbett, E. P. J. (1990). Classical rhetoric for the modern student. New York: Oxford University Press., p. 1.; Young, R. E., Becker, A. L., & Pike, K. L. (1970). Rhetoric: discovery and change. New York,: Harcourt Brace & World. p. 1; For more information see Dr. Greg Dickinson of Colorado State University.
पश्चिमी संस्कृति में महत्व
इस शास्त्र का प्राचीन यूनान और प्राचीन रोम में बहुत महत्व रहा था और इसका पश्चिमी परम्परा पर गहरा प्रभाव पड़ा है।See, e..g., Thomas Conley, Rhetoric in the European Tradition (University of Chicago, 1991). प्राचीन यूनानी दार्शनिक अरस्तु ने व्याख्यान में श्रोताओं को प्रभावित करने के तीन तत्व बताएँ थे, जिन्हें यूनानी भाषा में 'लोगोस' (λόγος, logos, तर्क), 'पेथोस' (πάθος, pathos, भावनाएँ) और 'ईथोस' (ἦθος, ethos, मूल्य व विश्वास) कहा जाता है। प्राचीन यूनान से लेकर १९वीं शताब्दी के अंत तक पश्चिमी लेखकों और अन्य विद्वानों को विश्वविद्यालयों और अन्य शिक्षा संस्थानों में व्याख्यान शास्त्र की औपचारिक शिक्षा दी जाती थी।
इन्हें भी देखें
तर्क शास्त्र
सन्दर्भ
बाहरी कडियाँ
बोलने की कला (आप की सहायता)
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