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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

पण्डित लेखराम आर्य

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230px|thumb| पण्डित लेखराम आर्य पण्डित लेखराम आर्य (१८५८ - १८९७), आर्य समाज के प्रमुख कार्यकर्ता एवं प्रचारक थे। उन्होंने अपना सारा जीवन आर्य समाज के प्रचार प्रसार में लगा दिया। वे अहमदिया समुदाय के नेता मिर्जा गुलाम अहमद से शास्त्रार्थ एवं उस के दुष्प्रचारों के खण्डन के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। पण्डित लेखराम ने अपने प्राणों की परवाह न करते हुवे हिंदुओं को धर्म के परिवर्तन से रोका व शुद्धि अभियान के प्रणेता बने।[ Kenneth W. Jones (1976). Arya Dharm: Hindu Consciousness in 19th-century Punjab. University of California Press. p. 148. ISBN 0-520-02920-8.] स्वामी दयानन्द का जीवनचरित् लिखने के उद्देश्य से उन के जीवन सम्बन्धी घटनाएँ इकट्ठी करने के सिलसिले में उन्हें भारत के अनेकानेक स्थानों के यात्रायें करना हुवा। इस कारण उन का नाम 'आर्य मुसाफिर' पड़ गया। पं॰ लेखराम हिंदुओं को मुसलमान होने से बचाते थे। एक कट्टर मुसलमान ने ३ मार्च सन् १८९७ को ईद के दिन, 'शुद्धि' कराने के बहाने, धोखे से लाहौर में उन की हत्या कर दी। जीवनी पण्डित लेखराम का जन्म ८ चैत्र, संवत् १९१५ (१८५८ ई.) को झेलम ज़िला के तहसील चकवाल के सैदपुर गाँव (अब पाकिस्तान में) में हुवा था। उन के पूर्वज महाराजा रणजीत सिंह सेना में थे। उन के पिता का नाम तारा सिंह एवं माता का नाम भाग भरी था। उन्होंने आरम्भ में उर्दू फारसी भाषा पढ़ी। बचपन से ही स्वाभिमानी और दृढ़ विचारों के थे। एक बार उन को पाठशाला में प्यास लगी, मौलवी से घर जा कर पानी पीने की अनुमति मांगी। मौलवी ने जूठे मटके से पानी पीने को कहा। उन्होंने न दोबारा मौलवी से घर जाने की इजाजत मांगी और न ही जूठा पानी पिया। सारा दिन प्यासा ही बिता दिया। पढ़ने का उन को बहुत शौक था। मुंशी कन्हयालाल अलख्धारी की पुस्तकों से उन को स्वामी दयानंद सरस्वती का पता चला। पण्डित लेखराम ने ऋषि दयानन्द के सभी ग्रंथों का स्वाध्याय या अध्ययन करना आरम्भ कर दिया। सत्रह वर्ष की उम्र में वे सन् १८७५ ईसवी में पेशावर पुलिस में भरती हुवे और उन्नति कर के सारजेंट बन गए। इन दिनों इन पर 'गीता' का बड़ा प्रभाव था। दयानंद सरस्वती से प्रभावित होकर उन्होंने संवत् १९३७ विक्रमी में पेशावर में आर्यसमाज की स्थापना की। १७ मई सन् १८८० को उन्होंने अजमेर में स्वामी जी से भेंट की। शंकासमाधान के परिणामस्वरूप वे उन के अनन्य भक्त बन गए। लेखराम जी ने सन् १८८४ में पुलिस की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। अब उन का सारा समय वैदिक धर्मप्रचार में लगने लगा। कादियाँ के अहमदियों ने हिंदू धर्म के विरुद्ध कई पुस्तकें लिखी थीं। लेखराम जी ने उन का जोरदार खण्डन किया। शुद्धि के रण में शुद्धि कोट छुट्टा डेरा गाज़ी ख़ान (अब पाकिस्तान) में कुछ हिन्दू युवकों को बहकाकर मुस्लिम बनाया जा रहा था। पण्डित जी के व्याखान सुनने पर ऐसा रंग चढ़ा की वे वैदिकधर्मी बन गए। इन के नाम महाशय चोख्खानंद, श्री छबीलदास व महाशय खूबचंद थे। जम्मू के श्री ठाकुरदास मुस्लमान होने जा रहे थे। पण्डित जी उन से जम्मू जा कर मिले और उन्हें मुसलमान होने से बचा लिया। १८९१ में सिंध के हैदराबाद के श्रीमन्त सूर्यमल की संतान ने इस्लाम मत स्वीकार करने का मन बना लिया। पण्डित लेखराम पण्डित पूर्णानन्द जी को लेकर हैदराबाद पहुंचे। उस धनी परिवार के लड़के पण्डित जी से मिलने के लिए तैयार नहीं थे परंतु आप कहाँ मानने वाले थे। चार बार सेठ जी के पुत्र मेवाराम जी से मिलकर यह आग्रह किया की मौलवियों से उन का शास्त्राथ करवा दें। मौलवी सय्यद मुहम्मद अली शाह को तो प्रथम बार में ही निरुत्तर कर दिया। उस के बाद चार और मौलवियों से पत्रों से विचार किया। आप ने उन के सम्मुख मुसलमान मौलवियों को हराकर उन की धर्म रक्षा करी। वही सिंध में पंडित जी को पता चला की कुछ युवक ईसाई बनने वाले हैं। आप वहां पहुुँच गए और अपने भाषण से वैदिक धर्म के विषय में प्रकाश डाला। आदम और इव पर एक पुस्तक लिख कर बांटी जिस से कई युवक ईसाई होने से बच गए। पंडित जी से दीक्षा लेकर कुछ आर्यों ने १८८५ में गंगोह जिला सहारनपुर की आर्यसमाज की स्थापना की थी। कुछ वर्ष पहले तीन अग्रवाल भाई पतित होकर मुसलमान बन गए थे। आर्य समाज ने १८९४ में उन्हें शुद्ध कर के वापिस वैदिक धर्मी बना दिया। आर्य समाज के विरुद्ध गंगोह में तूफ़ान ही आ गया। श्री रेह्तुलाल जी भी आर्यसमाज के सदस्य थे। उन के पिता ने उन के शुद्धि में शामिल होने से मना किया किंतु वे नहीं माने। पिता ने बिरादरी का साथ दिया। उन की पुत्र से बातचीत बंद हो गयी परंतु रेह्तुलाल जी कहां मानने वाले थे ? उन का कहना था गृह त्याग कर सकता हूँ, पर आर्यसमाज नहीं छोड़ सकता । इस प्रकार पण्डित लेखराम के तप का प्रभाव था की उन के शिष्यों में भी वैदिक सिद्धांत की रक्षा करने की भावना कूट कूट कर भरी थी। घासीपुर जिला मुज्जफरनगर में कुछ चौधरी मुसलमान बनने जा रहे थे। पण्डित जी वह एक तय की गयी तिथि को पहुँच गए। उन की दाड़ी बढ़ी हुवी थी और साथ में मूँछें भी थी। एक मौलाना ने उन्हें मुस्लमान समझा और पूछा क्यों जी यह दाढ़ी तो ठीक हैं पर इन मूँछों का क्या राज़ है ? पण्डित जी बोले दाढ़ी तो बकरे की होती हैं मूँछेें तो शेर की होती हैं। मौलाना समझ गया की यह व्यक्ति मुस्लमान नहीं है तब पण्डित जी ने अपना परिचय देकर शास्त्रार्थ के लिए ललकारा। सभी मौलानाओं को परास्त करने के बाद पण्डित जी ने वैदिक धर्म पर भाषण देकर सभी चौधरियों को मुसलमान बनने से बचा लिया। १८९६ की एक घटना पण्डित लेखराम के जीवन से हमें सर्वदा प्रेरणा देने वाली बनी रहेगी। पंडित जी प्रचार से वापिस आये तो उन्हें पता चला की उन का पुत्र बीमार है। तभी उन्हें पता चला की मुस्तफाबाद में पांच हिन्दू मुस्लमान होने वाले हैं। आप घर जाकर दो घंटे में वापिस आ गए और मुस्तफाबाद के लिए निकल गए। अपने कहा की मुझे अपने एक पुत्र से जाति के पाँच पुत्र अधिक प्यारे हैं। पीछे से आप का सवा साल का एकमात्र पुत्र चल बसा। पंडित जी के पास शोक करने का समय कहां था। आप वापिस आकर वेद प्रचार के लिए वजीराबाद चले गए। हिन्दू इतनी बड़ी संख्या में मुसलमान कैसे हो गए पण्डित जी की तर्क शक्ति अद्भत थी। आप से एक बार किसी ने प्रश्न किया कि हिन्दू इतनी बड़ी संख्या में मुसलमान कैसे हो गए। अपने सात कारण बताये- १. मुसलमान आक्रमण में बलात्पूर्वक मुसलमान बनाया गया। २. मुसलमानी राज में जर, जोरू व जमीन देकर कई प्रतिष्ठित हिन्दुओं को मुस्लमान बनाया गया ३. इस्लामी काल में उर्दू, फारसी की शिक्षा एवं संस्कृत की दुर्गति के कारण बने। ४. हिन्दुओं में पुनर्विवाह न होने के कारण व सती प्रथा पर रोक लगने के बाद हिन्दू औरतो ने मुस्लमान के घर की शोभा बढाई तथा अगर किसी हिन्दू युवक का मुस्लमान स्त्री से सम्बन्ध हुआ तो उसे जाति से निकल कर मुस्लमान बना दिया गया। ५. मूर्तिपूजा की कुरीति के कारण कई हिन्दू विधर्मी बने। ६. मुसलमानी वेश्यायों ने कई हिन्दुओं को फंसा कर मुस्लमान बना दिया। ७. वैदिक धर्म का प्रचार न होने के कारण मुसलमान बने। पंडित जी और गुलाम मिर्जा अहमद पण्डित जी के काल में क़ादियान, जिला गुरुदासपुर पंजाब में इस्लाम के एक नवीन मत की वृद्धि हुवी जिस की स्थापना मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने करी थी। इस्लाम के मानने वाले मुहम्मद साहिब को अन्तिम पैगम्बर मानते हैं, मिर्जा ने अपने आप को कभी कृष्ण, कभी नानक, कभी ईसा मसीह कभी इस्लाम का अन्तिम पैगम्बर घोषित कर दिया तथा अपने नवीन मत को चलने के लिए नई नई भविष्यवाणियां और इल्हामो का ढोल पीटने लगा। एक उदहारण मिर्जा द्वारा लिखित पुस्तक “वही हमारा कृष्ण” से लेते हैं। इस पुस्तक में लिखा हैं – "उस ने (ईश्वर ने) हिन्दुओं की उन्नति और सुधार के लिए निश्कलंकी अवतार को भेज दिया है जो ठीक उस युग में आया है जिस युग की कृष्ण जी ने पहिले से सूचना दे रखी है। उस निष्कलंक अवतार का नाम मिर्जा गुलाम अहमद हैं जो कादियान जिला गुरुदासपुर में प्रकट हुए हैं। खुदा ने उन के हाथ पर सहस्त्रों निशान दिखाये हैं। जो लोग उन पर इमान लेते हैं उन को खुदा ताला बड़ा नूर बख्शता हैं। उन की प्रार्थनाएँ सुनता है और उन की सिफारिश पर लोगों के कष्ट दूर करता है, प्रतिष्ठा देता है। आप को चाहिए की उन की शिक्षाओं को पढ़ कर नूर प्राप्त करें। यदि कोई संदेह हो तो परमात्मा से प्रार्थना करें कि हे परमेश्वर! यदि यह व्यक्ति जो तेरी और से होने की घोषणा करता है और अपने आप को निष्कलंक अवतार कहता हैं, अपनी घोषणा में सच्चा हैं तो उस के मानने की हमें शक्ति प्रदान कर और हमारे मन को इस पर इमान लेने को खोल दे। पुनः आप देखेंगे कि परमात्मा अवश्य आप को परोक्ष निशानों से उस की सत्यता पर निश्चय दिलवायेगा तो आप सत्य हृदय से मेरी और प्रेरित हों और अपनी कठिनाइयों के लिए प्रार्थना करावें। अल्लाह ताला आप की कठिनाइयों को दूर करेगा और मुराद पूरी करेगा। अल्लाह आप के साथ हो। पृष्ठ ६,७.८ वही हमारा कृष्ण।" पाठकगण स्वयं समझ गए होंगे की किस प्रकार मिर्जा अपनी कुटिल नीतिओं से मासूम हिंदुओं को बेवकूफ़ बनाने की चेष्टा कर रहा था किंतु पंडित लेखराम जैसे रणवीर के रहते उस की दाल नहीं गली। पंडित जी ने सत्य असत्य का निर्णय करने के लिए मिर्जा के आगे तीन प्रश्न रखे। १. पहले मिर्जा जी अपने इल्हामी खुदा से धारावाही संस्कृत बोलना सीख कर आर्यसमाज के दो सुयोग्य विद्वानों पंडित देवदत शास्त्री व पंडित श्याम जी कृष्ण वर्मा का संस्कृत वार्तालाप में नाक में दम कर दे। २. छः दर्शनों में से केवल तीन के आर्ष भाष्य मिलते हैं। शेष तीन के अनुवाद मिर्जा जी अपने खुदा से मंगवा लें तो मैं मिर्जा के मत को स्वीकार कर लूँगा। ३. मुझे २० वर्ष से बवासीर का रोग है। यदि तीन मास में मिर्जा अपनी प्रार्थना शक्ति से उन्हें ठीक कर दे तो में मिर्जा के पक्ष को स्वीकार कर लूँगा। पंडित जी ने उस से पत्र लिखना जारी रखा। तंग आकर मिर्जा ने लिखा कि यहीं क़ादियान आकर क्यों नहीं चमत्कार देख लेते। मिर्जा ने सोचा था कि न पंडित जी का कादियान आना होगा और बला भी टल जाएगी किंतु पंडित जी अपनी धुन के पक्के थे। मिर्जा गुलाम अहमद की कोठी पर कादियान पहुँच गए। दो मास तक पंडित जी कादियान में रहे परंतु मिर्जा गुलाम अहमद कोई चमत्कार दिखा न सका। इस खीज से आर्यसमाज और पंडित लेखराम को अपना कट्टर दुश्मन मानकर मिर्जा ने आर्यसमाज के विरुद्ध दुष्प्रचार आरम्भ कर दिया। मिर्जा ने ब्राहिने अहमदिया नामक पुस्तक चंदा मांग कर छपवाई। पंडित जी ने उस का उत्तर तकज़ीब ब्राहिने अहमदिया लिखकर दिया। मिर्जा ने सुरमाये चश्मे आर्या (आर्यों की आंख का सुरमा) लिखा जिस का पंडित जी ने उत्तर नुस्खाये खब्ते अहमदिया (अहमदी खब्त का इलाज) लिख कर दिया। मिर्जा ने सुरमाये चश्मे आर्या में यह भविष्यवाणी करी कि एक वर्ष के भीतर पंडित जी की मौत हो जाएगी। मिर्जा की यह भविष्यवाणी गलत निकली और पंडित इस बात के ११ वर्ष बाद तक जीवित रहे। पंडित जी की तपस्या से लाखों हिन्दू युवक मुस्लमान होने से बच गये। रचनाएँ पण्डित लेखराम ने ३३ पुस्तकों की रचना की। उन की सभी कृतियों को एकीकृत रूप से कुल्लियात ए आर्य मुसाफिर नाम से प्रकाशित किया गया है। तारीखे दुनिया (विश्व इतिहास) श्रीकृष्ण का जीवन चरित्र नमस्ते की तहकीकात देवी भगत परीक्षा पुराण किसने बनायी धरम परचार मुर्दा जरूर जलना चाहिए मूर्ति प्रकाश साँच को आँच नहीं राम चन्दर जी का सच्चा दर्शन क्रिस्चियन मत दर्पण सदाकत ए ऋग्वेद (ऋग्वेद का खरापन) निजात की असली तारीफ (मोक्ष का वास्तविक लक्षण) सच्चे धरम की शहादत (सच्चे धर्म का प्रमाण) सदाकत ए इल्हाम (इल्हाम (ईश्वर की प्रेरणा) की सच्चाई) सदाकत ए उसूल व तालीम आर्य समाज (आर्यसमाज के सिद्धान्तों एवं शिक्षा का खरापन) तकजीब ए बराहीन अहमदिया, भाग-१ ('बराहीन अहमदिया' नामक पुस्तक के प्रति-उत्तर के रूप में ; अर्थ- 'अहमदिया प्रमाणों का असिद्धीकरण') तकजीब ए बराहीन अहमदिया, भाग-२ रिसाला जिहाद (जिहाद पुस्तिका) इजहार ए हक (अधिकार का प्रकटीकरण) हुज्जत उल इस्लाम (इस्लाम में कुतर्क) राह ए निजात (मुक्ति मार्ग) सदाकत धरम आर्य (आर्य धर्म का खरापन) सबूत-ए-तनसुख स्त्री शिक्षा स्त्री शिक्षा के वसाइल पतप उद्धरण इतरे रुहानी (आध्यात्मिक इत्र) मसल नियोग (नियोग के विषय में) नुस्खा खाब्ते अहमदिया (अहमदिया पागलपन का नुस्खा) इबताल बशरात ए अहमदिया रद्द ए खिल'अत इस्लाम ('खिल'अत इस्लाम' का खण्डन) आइना ए शफाअत लेखराम जी एक श्रेष्ठ लेखक थे। आर्य प्रतिनिधि सभा ने स्वामी दयानन्द के जीवन पर एक विस्तृत एवं प्रामाणिक ग्रन्थ तैयार करने की योजना बनायी। यह दायित्व उन्हें ही दिया गया। उन्होंने देश भर में भ्रमण कर अनेक भाषाओं में प्रकाशित सामग्री एकत्रित की। इस के बाद वे लाहौर में बैठकर इस ग्रन्थ को लिखना चाहते थे। दुर्भाग्यवश यह कार्य पूरा नहीं हो सका।http://www.sudarshannews.in/religion/balidan-diwas-of-pandit-lekhram-arya-ji/ धर्मरक्षकों की हत्याओं का इतिहास बहुत पुराना है 4 अप्रैल 2020 https://web.archive.org/web/20190913194109/http://sudarshannews.in/religion/balidan-diwas-of-pandit-lekhram-arya-ji/ 13 सितंबर 2019 dead पंडित जी का अमर बलिदान मार्च १८९७ में एक व्यक्ति लाहौर में पंडित लेखराम के पास आया। उस का कहना था कि वह पहले हिन्दू था बाद में मुसलमान हो गया, अब फिर से शुद्ध होकर हिन्दू बनना चाहता है। वह पंडित जी के घर में ही रहने लगा और वही भोजन करने लगा। ६ मार्च १८९७ को पंडित जी घर में स्वामी दयानन्द के जीवन चरित्र पर कार्य कर रहे थे तभी उन्होंने एक अंगड़ाई ली कि उस दुष्ट ने पंडित जी को छुरा घोंप दिया और भाग गया। पंडित जी को हस्पताल में ले जाया गया जहां रात को दो बजे उन्होंने प्राण त्याग दिए। पंडित जी को अपने प्राणों की चिंता नहीं थी उन्हें चिंता तो वैदिक धर्म की थी। सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ श्री पण्डित लेखराम जी आर्य मुसाफिर का संक्षिप्त जीवन वृतान्त - स्व. स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज की लेखनी से 'धर्म प्रचार' - पण्डित लेखराम जी आर्य पथिक कृत 'कुलियात आर्य मुसाफिर' से (1) पं० लेखराम पं. लेखराम की ऋषि दयानन्द से भेंट का देश व समाज पर प्रभाव श्रेणी:आर्य समाज श्रेणी:हिन्दू धर्म श्रेणी:धर्म प्रचारक