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411 समाचार
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पांडुरंग सदाशिव खानखोजे

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पाण्डुरंग सदाशिव खानखोजे 7 नवम्बर 1883 1967 1 22 1883 11 7 PandurangKhankhoje.jpg पी एस खंखोजे वर्धा, महाराष्ट्र नागपुर, महाराष्ट्र हिंदू-जर्मन षड्यंत्र, भारतीय साम्यवाद ग़दर पार्टी, बर्लिन समिति, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पाण्डुरंग सदाशिव खानखोजे (7 नवम्बर 1883 – 22 जनवरी 1967) भारत के एक स्वतन्त्रता सेनानी, क्रान्तिकारी, विद्वान, इतिहासकार तथा कृषि वैज्ञानिक थे। वे गदर पार्टी के संस्थापकों में से एक थे। भारतीय हरित क्रांति में भी खानखोजे की महत्वपूर्ण भूमिका है। जीवनी पाण्डूरंग खानखोजे का जन्म नवम्बर १८८३ में वर्धा में हुआ था। उनके पिता वर्धा में याचिका लिखने का कार्य करते थे। उनका बचपन वर्धा में ही बीता और वहीं उनकी प्राथमिक एवं मिडिल स्कूल की शिक्षा पूरी हुई। उसके पश्चात उच्च शिक्षा के लिए वे नागपुर आ गए। उस समय वे महान स्वतन्त्रा सेनानी बालगंगाधर तिलक के राष्ट्रवादी कार्यों से बहुत प्रभावित थे। १९०० के प्रथम दशक में किसी समय वे भारत से बाहर जाने के लिए एक समुद्री यात्रा पर निकल पड़े और अन्ततः संयुक्त राष्ट्र अमेरिका जा पहुँचे। यहाँ उन्होने वाशिंगटन स्टेट कॉलेज में प्रवेश लिया जिसका नाम अब वाशिंगटन स्टेट विश्वविद्यालय है। वहाँ से उन्होने १९१३ में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। छात्र जीवन में खानखोजे फ्रांसीसी क्रांति और अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने क्रांतिकारी तरीकों और सैन्य रणनीति में आगे का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए विदेश जाने का फैसला लिया। तब तक ब्रिटिश सरकार के खिलाफ गतिविधियों की वजह से वह अंग्रेजों के संदेह में आ चुके थे। आगे की योजना को लेकर वह बालगंगाधर तिलक से मिले। उन्होंने खानखोजे को सलाह दी कि वह जापान चले जाएं। जापान उस समय एक सबल देश था और पश्चिम एशियाई साम्राज्यवाद का विरोधी था। यहां उन्होंने जापान और चीन के राष्ट्रवादियों के साथ समय बिताया। फिर वह समुद्र मार्ग से किसी तरह अमेरिका पहुंचे और कृषि की पढ़ाई के लिए कॉलेज में दाखिला लिया। एक साल बाद ही सैन्य रणनीति के प्रशिक्षण के लिए वह कैलिफोर्निया की माउंट तमालपाइस सैन्य अकादमी (Mount Tamalpais Military Academy) में शामिल हो गए, जो भारत छोड़ने का उनका मूल उद्देश्य था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए गठित गदर पार्टी के संस्थापकों में एक नाम पाण्डुरंग खानखोजे का भी था। इसकी स्थापना 1914 में अप्रवासी भारतीयों ने की थी, जिसमें ज्यादातर पंजाब के लोग थे। इसका उद्देश्य भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व करना था। अमेरिका प्रवास के दौरान खानखोजे की भेंट भारतीय बुद्धजीवी लाला हरदयाल से हुई, जो स्टैंडफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे। हरदयाल अंग्रेजों के खिलाफ प्रचार के लिए भारतीय भाषा में समाचार पत्र का प्रकाशन करते थे, जिसमें देशभक्ति गीत और लेख हुआ करते थे। कैलिफोर्निया की माउंट तमालपाइस सैन्य अकादमी में प्रशिक्षण के दौरान खानखोजे की भेंट मेक्सिको के कई लोगों से हुई। मेक्सिको नागरिकों ने 1910 की क्रांति में तानाशाही शासन को उखाड़ फेंका था, जिससे खानखोजे बहुत प्रभावित थे। अमेरिका में प्रवास के दौरान उन्होंने वहां के खेतों में काम करने वाले भारतीयों से जाकर अलग-अलग मुलाकात की। इस मुलाकात में वह स्वतंत्रता संग्राम के अपने विचार पर उनसे बातचीत करते थे। इस दौरान मेक्सिकन नागरिकों से भी उनका मुलाकात होती थी। इसी दौरान खानखोजे ने अप्रवासी भारतीयों के जरिए भारत में अंग्रेजी हुकूमत पर हमले की रणनीति तैयार की थी, जो प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हो जाने की वजह से मूर्त रूप नहीं ले सकी। इसके बाद खानखोजे ने पेरिस में भीकाजी कामा और रूस में ब्लादिमीर लेनिन समेत कई नेताओं से मुलाकात कर भारत की आजादी के लिए समर्थन मांगा। इस कारण उन पर यूरोप में निर्वासन का खतरा मंडराने लगा। वह भारत वापस नहीं लौट सकते थे। लिहाजा उन्होंने मेक्सिको में शरण ली। मेक्सिको के क्रांतिकारियों से मैत्री के कारण उन्हें वहां के राष्ट्रीय कृषि विद्यालय में प्रोफेसर की नौकरी मिल गई। यहां उन्होंने मक्का, गेहूं, दाल और रबड़ पर कई शोध किए। साथ ही उन्होंने ठंड और सूखा प्रतिरोधी प्रजातियों का विकास किया। मेक्सिको में उन्होंने किसानों के लिए मुफ्त कृषि विद्यालय की शुरूआत की थी। उनके ये प्रयास मेक्सिकों में हरित क्रांति के कारण बने। अमेरिकी कृषि विज्ञानी डॉ नॉर्मन बोरलॉग खारखोजे द्वारा तैयार की गई मेक्सिकन गेहूं की किस्म पंजाब लेकर आए। (बाद में वे भारत में हरित क्रांति के जनक के रूप में प्रसिद्ध हुए)। खानखोजे मेक्सिको में एक कृषि वैज्ञानिक के रूप में प्रतिष्ठित थे। प्रसिद्ध मेक्सिकन कलाकार डिएगो रिवेरा ने अपने भित्ति चित्रों में खानखोजे को चित्रित किया था। इसमें खानखोजे एक मेज के चारों ओर बैठे लोगों के साथ रोटी तोड़ते हुए दिखाए गए थे। इसका शीर्षक "हमारी प्रतिदिन की रोटी" था। भारत की स्वतन्त्रता के बाद, जीवन के अंतिम पड़ाव में खानखोजे भारत वापस लौटे। 22 जनवरी 1967 को नागपुर में उनका निधन हुआ था। श्रेणी:भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम