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स्वामी रामेश्वरानन्द
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स्वामी रामेश्वरानन्द (१८९० - ८ मई १९९० ) आर्य समाज के अनुयायी एवं राजनेता थे। वे जनसंघ के सांसद रहे। वे ओजस्वी सन्यासी, विद्वान एवं एक निडर वक्ता थे।स्वामी रामेश्वरानंद सरस्वती: हरियाणा के वो सांसद जो वेद मंत्र बोल पूछते थे सवाल, प्रसिद्ध थे सादगी के किस्से
स्वामी रामेश्वरानन्द का जन्म १८९० में उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर जिले के कुबेर गांव में एक सामान्य कृषक परिवार में हुआ था।वज्र से कठोर तथा फूलों से कोमल थे स्वामी रामेश्वरानन्द जी महाराज छः वर्ष की आयु में वे माता व दस-बारह वर्ष की आयु में पितृ स्नेह से वियुक्त हो गए। इस कारण अपनी दादी के पास ग्रामीण पाठशाला में आपने कक्षा चार उत्तीर्ण की। माता पिता का स्नेह न मिलने के कारण बचपन में ही इनके मन में वैराग्य भाव उत्पन्न हो गए और १४-१५ वर्ष की आयु में ही गुरु की खोज में निकल पड़े। आप हापुड़ होते हुए काशी पहुँचे। वहां आपका परिचय दशनामी स्वामी कृष्णानंद जी गुजराती से हुआ और आपने उनसे संन्यास दीक्षा ली तथा स्वामी रामेश्वरानन्द कहलाए।
प्रांरभ में स्वामी जी पौराणिक विचारधारा के अनुयायी थे। किंतु जब वो मथुरा से दिल्ली आए तो आर्य समाज के प्रसिद्ध क्रांतिकारी सन्यासी स्वामी भीष्म जी के सम्पर्क में आकर उनके विचारों से प्रभावित होकर आर्य समाजी बन गए। स्वामी भीष्म जी के पास चार वर्ष रहने के बाद पुनः अध्ययन करने के लिए साधु आश्रम अलीगढ़, गुरुकुल सिकंदराबाद, गुरुकुल ज्वालापुर, खुर्जा, लाहौर आदि में पढ़ते रहे। काशी में रामेश्वरदास जी निरंकारी, स्वामी शुद्धबौद्ध तीर्थ ज्वालापुर वालों से संस्कृत व्याकरण पढ़ा तथा पं0 तिवारी, पं0 दृढ़राज शास्त्री से व्याकरणादि व अन्य विद्वानों से पढ़कर पूर्ण विद्वान बने।
उस समय आजादी के लिए लड़ाई चरम सीमा पर थी और इसमे आर्य समाज की मुख्य भूमिका थी। स्वामी जी ने महात्मा गांधी द्वारा संचालित सभी आंदोलनों में भाग लिया। असहयोग आंदोलन करने के बाद स्वामी जी को देहरादून जेल में डाल दिया। जेल में अंग्रेज अधिकारियों ने उन पर अमानवीय व पाशविक अत्याचार किये। 1935 में गांधी जी द्वारा चलाए नमक सत्याग्रह में स्वामी ने बढ़ चढ़कर भाग लिया। ""नमक कानून तोड़ दिया"" ""अंग्रेज का सिर फोड़ दिया"" नारे का गांव गांव में प्रचार किया। 1942 के "भारत छोड़ो आंदोलन में भी स्वामी जी ने बढ़ चढ़कर भाग लिया ओर अंग्रेजी सरकार का विरोध किया।
पूज्य गुरु स्वामी भीष्म जी की प्रेरणा से स्वामी जी ने धर्मवीर शास्त्री के सहयोग से 17 अप्रैल 1939 को गुरुकुल घरौंडा की स्थापना की। आज यह गुरुकुल भव्य ढंग से चल रहा है।
1939 में हैदराबाद के निजाम द्वारा हिंदुवों पर किये अत्याचार के विरुद्ध स्वामी जी ने सत्याग्रहियों के साथ कूच किया। नवाब ने उन्हें विभिन्न जेलो में बंदी बनाकर रखा। 1947 भारत विभाजन के समय भी स्वामी जी ने अपनी बंदूक के दम पर हजारों हिंदू अबलाओं की जान बचाई।
सन् 1957 पंजाब में हिंदी भाषा पर हुए सत्याग्रह में स्वामी जी ने अकालियों व पंजाब सरकार के विरोध में सफलता पूर्वक सत्याग्रह का संचालन किया। सारे संयुक्त पंजाब में भ्रमण करने के बाद जत्थों का चंडीगढ़ में नायकत्व किया। पुलिस एक बार स्वामी जी को पशु के समान जीप के पीछे बांधकर घसीटते हूए ले गई। इसी प्रकार मास्टर तारासिंह की पंजाबी सूबा की मांग का विरोध किया ओर उनकी मांग को असफल करवाया। इसके बाद 1962 के लोकसभा के चुनावों में करनाल लोकसभा से सांसद चुनकर संसद पहुँचे और सर्वप्रथम अपने साथ 33 अन्य सांसदों को संस्कृत भाषा में शपथ दिलवाई।
1966 में गोरक्षा सत्याग्रह चला ओर स्वामी जी ने लाखों सत्याग्रहियों को ललकारते हुए कहा "जाओ घेर लो पार्लियामेंट मत चलने दो कार्यवाही" बहुत से व्यक्ति शहीद हुए ओर पुलिस की गोली से स्वामी जी बाल बाल बचे।
स्वामी जी ने अन्य मतावलंबियों से भारत के बहुत से नगरों में अनेक शास्त्रार्थ किये ओर अपने ज्ञान गंभीरता का लोहा जमाया। स्वामी जी यौगिक क्रियाओं के सिद्धहस्त थे। योग बल के द्वारा ही उन्होने आजादी के पहले व बाद में पुलिस के अत्याचार से अपने जीवन की रक्षा की।
स्वामी जी के उत्तम श्रेणी के ग्रंथो की रचना की। " महर्षि दयानन्द और राजनीति" , संध्या भाष्यम् , नमस्ते प्रदीप आदि उनके द्वारा रचित प्रमौख ग्रन्थ हैं।
8 मई 1990 को स्वामी जी सौ वर्ष की आयु में दिवंगत हुए।
सन्दर्भ
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