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मत्तगयन्द सवैया
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मत्तगयन्द सवैया, सम वर्ण वृत्त या वार्णिक छन्द है।
परिभाषा
इसके प्रत्येक चरण में ७ भगण(२११) और दो गुरु के क्रम से २३ वर्ण होते हैं।http://bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%AE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%97%E0%A4%AF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6_%E0%A4%B8%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%AF%E0%A4%BE संग्रहीत प्रति 15 जून 2020 https://web.archive.org/web/20190328195226/http://bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%AE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%97%E0%A4%AF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6_%E0%A4%B8%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%AF%E0%A4%BE 28 मार्च 2019 dead
उदाहरण
सीस जटा,उर -बाहु बिसाल बिलोचन लाल तिरीछी सी भौहें।
तून सरासन -बान धरें तुलसी बन मारग में सुठि सोहैं।
सादर बारहिं बार सुभाय चितै तुम्ह त्यों हमरो मनु मोहैं।
पूँछति ग्राम बधू सिय सों,कहौ साँवरे से सखि रावरे को हैं।
इन्हें भी देखें
कवितावली
तुलसीदास
सन्दर्भ
श्रेणी : छंद
श्रेणी :पिंगल शास्त्र