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411 समाचार
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योगिनी एकादशी

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योगिनी एकादशी योगिनी एकादशी व्रत योगिनी एकादशी व्रत हिन्दू, भारतीय, भारतीय प्रवासी सर्वकामना पूर्ति hinduयोगिनी एकादशी व्रतकथा पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में प्राप्त होती है। आषाढ़ मास की कृष्ण एकादशी को "योगनी" अथवा "शयनी" एकादशी कहते है। इस व्रतकथा के वक्ता श्रीकृष्ण एवं मार्कण्डेय हैं। श्रोता युधिष्ठिर एवं हेममाली हैं। जब युधिष्ठिर आषाढ मास के कृष्ण पक्ष एकादशी का नाम एवं महत्त्व पूछते हैं, तब वासुदेव जी इस कथा को कहते हैं। मेघदूत में महाकवि कालिदास जी ने किसी शापित यक्ष के विषय में उल्लेख किया है। मेघदूत में वह यक्ष मेघ को हि दूत स्वीकार कर उसके माध्यम से अपनी पत्नी के लिए सन्देश भेजता है, यह कथानक वहाँ प्राप्त होता है। कालिदास जी की वह मेघदूत की कथा इस कथा से प्रभावित है ऐसा माना जाता है। हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। उनमें आषाढ़ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहते हैं। आषाढ़ कृष्ण एकादशी का नाम योगिनी है। इसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यह इस लोक में भोग और परलोक में मुक्ति देने वाली है। यह तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। योगिनी एकादशी पूर्ण व्रत कथा प्राचीन काल की बात है। हस्तिनापुर नगरी धर्म, सत्य और भक्ति का केंद्र मानी जाती थी। उसी नगरी में धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों और प्रजा सहित निवास करते थे। वे सदा श्रीकृष्ण के चरणों में लीन रहते थे और प्रत्येक व्रत, नियम तथा धर्म का पालन पूर्ण श्रद्धा से करते थे। एक दिन प्रातःकाल जब सभा में विद्वान ब्राह्मण, मंत्री और भाई एकत्रित थे, तब युधिष्ठिर के मन में एक विशेष जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उन्होंने विनम्र भाव से भगवान श्रीकृष्ण से कहा- "हे माधव! आपने हमें अनेक व्रतों और उनके फलों के विषय में बताया है। कृपा करके यह भी बताइए कि आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी का क्या महत्व है? उसका नाम क्या है और उससे कौन-सा फल प्राप्त होता है?" युधिष्ठिर की श्रद्धा और जिज्ञासा देखकर श्रीकृष्ण मंद मुस्कुराए। उनके मुख पर करुणा और प्रेम झलक रहा था। वे बोले- "हे धर्मराज! जिस एकादशी के विषय में तुम जानना चाहते हो, उसका नाम योगिनी एकादशी है। यह अत्यंत पुण्यदायिनी है और पापों का नाश करने वाली है। इसके प्रभाव से मनुष्य भयंकर दुखों से मुक्त हो जाता है।" फिर श्रीकृष्ण ने एक प्राचीन कथा सुनानी आरंभ की। बहुत समय पहले अलकापुरी नाम की एक दिव्य नगरी थी। यह नगरी कुबेर की राजधानी थी। चारों ओर सुंदर उद्यान, बहती नदियाँ, पुष्पों की सुगंध, दिव्य भवन और स्वर्ण जटित महल थे। वहाँ देवताओं, यों और गंधों का वास था। कुबेर देव धन के स्वामी थे और भगवान शिव के परम भक्त भी थे। वे प्रतिदिन नियमपूर्वक शिव पूजन करते थे। उनके महल में सदा भक्ति, शांति और अनुशासन का वातावरण रहता था। कुबेर के सेवकों में एक अत्यंत सुंदर यक्ष था। उसका नाम था हेममाली। वह पुष्पों का संग्रह कर शिव पूजन हेतु लाने का कार्य करता था। प्रतिदिन प्रातःकाल वह नंदनवन जाता, वहाँ से ताजे फूल चुनकर लाता और कुबेर को सौंपता। हेममाली का रूप अत्यंत आकर्षक था। उसका शरीर कांतिमय था, नेत्र कमल समान थे और स्वर मधुर था। परंतु उसके मन में एक विशेष आकर्षण था वह था उसकी पत्नी विश्वावसु। विश्वावसु अप्सरा तुल्य सुंदर स्त्री थी। उसका सौंदर्य देखकर देवता भी मोहित हो जाते थे। वह नृत्य, संगीत और प्रेमभाव में निपुण थी। हेममाली अपनी पत्नी से अत्यंत प्रेम करता था। जब भी उसे अवसर मिलता, वह कुबेर की सेवा छोड़कर उसके साथ समय बिताना चाहता था। एक दिन की बात है। उस दिन भी कुबेर को शिव पूजन के लिए पुष्पों की आवश्यकता थी। परंतु उस दिन हेममाली का मन अपनी पत्नी के साथ रहने में लगा हुआ था। वह नंदनवन तो गया, परंतु पुष्प एकत्र करने के स्थान पर वह विश्वावसु के साथ विहार करने लगा। वे दोनों वन में संगीत, नृत्य और प्रेम में इतने मग्न हो गए कि समय का भान ही नहीं रहा। उधर कुबेर अपने महल में शिव पूजन की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने देखा कि समय बीत रहा है, परंतु हेममाली अभी तक पुष्प लेकर नहीं आया। कुबेर को चिंता हुई। उन्होंने सेवकों से पूछा-"हेममाली अभी तक क्यों नहीं आया?" किसी के पास उत्तर नहीं था। कुछ समय बाद हेममाली देर से पुष्प लेकर पहुँचा। उसके चेहरे पर अभी भी प्रेम का भाव झलक रहा था। उसके वस्त्र अस्त-व्यस्त थे और मन एकाग्र नहीं था। कुबेर ने यह सब देखकर समझ लिया कि वह अपने कर्तव्य से विमुख हुआ है। क्रोधित होकर कुबेर बोले- "हे दुष्ट! तूने अपने स्वार्थ और सुख के लिए मेरे आदेश की अवहेलना की। मेरी सेवा छोड़कर तू विषय-विलास में लीन रहा। तू शिवभक्ति का अपमानी है।" कुबेर का क्रोध भयानक था। उनकी आँखें लाल हो गईं। उन्होंने श्राप देते हुए कहा- "आज से तू कोढ़ी बनकर पृथ्वी पर भटकता रहेगा। तैरा सुंदर शरीर नष्ट हो जाएगा। तुझ पर भयंकर रोग चढ़ेगा और तू दर-दर भटकेगा।" शाप सुनते ही हेममाली काँप उठा। उसी क्षण उसका शरीर विकृत होने लगा। चमकता हुआ रूप नष्ट हो गया। शरीर पर घाव होने लगे। पीड़ा असहनीय हो गई। वह भूमि पर गिर पड़ा और रोने लगा। "हे स्वामी! मुझसे भारी अपराध हो गया। मुझे क्षमा कर दीजिए। मैं आपका सेवक हूँ।" परंतु कुबेर का शाप अटल था। कुछ ही क्षणों में हेममाली यक्षलोक से पृथ्वी पर गिर पड़ा। वह एक भयानक रोगी बन चुका था। उसका शरीर सड़ने लगा था। लोग उसे देखकर दूर भागते थे। भूख, प्यास, रोग और अपमान से पीड़ित होकर वह जंगलों, पर्वतों और नगरों में भटकने लगा। उसकी पत्नी विश्वावसु भी दुखी थी, परंतु शाप के कारण वह सहायता नहीं कर सकती थी। दिन बीतते गए। वर्ष बीत गए। हेममाली ने अत्यंत कष्ट सहा। कभी उसे भोजन नहीं मिलता, कभी पीड़ा से तड़पता रहता। उसके मन में केवल एक ही विचार था- "मैंने अपने कर्तव्य से विमुख होकर यह सब भोगा है। यह मेरे कर्मों का फल है।" एक दिन भटकते-भटकते वह बदरिकाश्रम के निकट पहुँचा। वहाँ महान तपस्वी मार्कण्डेय ऋषि निवास करते थे। वह आश्रम के समीप पहुँचा तो उसे शांति का अनुभव हुआ। वहाँ वातावरण में भक्ति और तपस्या की सुगंध थी। किसी प्रकार वह घिसटते हुए आश्रम के भीतर गया और ऋषि के चरणों में गिर पड़ा। आँखों से आँसू बहाते हुए बोला- "हे महर्षि! मैं अत्यंत पापी हूँ। अपने कर्तव्य से गिरकर मैंने यह अवस्था पाई है। कृपा करके मुझे उद्धार का मार्ग बताइए।" मार्कण्डेय ऋषि करुणामय थे। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से उसका संपूर्ण वृत्तांत जान लिया। वे बोले- "हे हेममाली! तूने अपने स्वामी और भगवान शिव का अपमान किया। इसलिए यह दंड मिला। परंतु यदि तू सच्चे मन से पश्चाताप करे, तो मुक्ति संभव है।" हेममाली ने हाथ जोड़कर कहा- "मुझे कोई भी मार्ग बताइए। मैं सब कुछ करने को तैयार हूँ।" ऋषि बोले- "आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में योगिनी एकादशी आती है। यदि तू श्रद्धा से उसका पालन करेगा, तो तेरा समस्त पाप नष्ट होगा और शाप से मुक्ति मिलेगी।" हेममाली को जैसे जीवन का नया प्रकाश मिल गया। उसने मन में दृढ़ निश्चय किया कि वह पूरी श्रद्धा से इस एकादशी का पालन करेगा। समय आने पर योगिनी एकादशी आई। उस दिन हेममाली ने सच्चे मन से भगवान विष्णु का स्मरण किया। उसने अपने हृदय से अहंकार, लोभ और वासना का त्याग किया। पूरे दिन वह भगवान के नाम का जप करता रहा। "नारायण… नारायण… नारायण…" उसकी आँखों से आँसू बहते रहे। वह अपने अपराधों को स्मरण कर पश्चाताप करता रहा। रात्रि में भी उसने विश्राम नहीं किया और भक्ति में लीन रहा। जब द्वादशी की सुबह हुई, तब आकाश से दिव्य प्रकाश उतरा। एक दिव्य विमान प्रकट हुआ। उसमें से विष्णुदूत उतरे। उन्होंने हेममाली से कहा- "हे पुण्यात्मा! तेरे व्रत और भक्ति से भगवान प्रसन्न हुए हैं। तेरा शाप नष्ट हो चुका है।" क्षणभर में हेममाली का रोग समाप्त हो गया। उसका शरीर पुनः दिव्य, सुंदर और तेजस्वी हो गया। वह प्रसन्न होकर रोने लगा। "हे प्रभु! आपकी कृपा से मैं पुनः जीवित हुआ।" विष्णुदूत उसे विमान में बैठाकर स्वर्गलोक ले गए। वह पुनः अलकापुरी पहुँचा। कुबेर ने उसे देखकर कहा- "अब तू शुद्ध हो चुका है। मेरी सेवा में पुनः लग जा।" हेममाली ने जीवन भर भक्ति और कर्तव्य का पालन किया। श्रीकृष्ण यह कथा सुनाकर युधिष्ठिर से बोले- "हे राजन! योगिनी एकादशी का ऐसा प्रभाव है कि वह सबसे बड़े पापी को भी मुक्त कर देती है। जो श्रद्धा से इसका पालन करता है, वह इस लोक और परलोक में सुख पाता है।" युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कहा- "हे प्रभु! आपने मुझे महान रहस्य बताया। मैं जीवन भर इसका सम्मान करूँगा।" इस प्रकार योगिनी एकादशी की यह पवित्र कथा समाप्त होती जो व्यक्ति किसी कारणवश व्रत नहीं रख सकता, वह केवल योगिनी एकादशी की कथा सुनने मात्र से भी पुण्य का भागीदार बनता है। उद्देश्य भगवान कृष्ण ने कहा- हे राजन! यह योगिनी एकादशी का व्रत 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर फल देता है। इसके व्रत से समस्त पाप दूर हो जाते हैं और अंत में स्वर्ग प्राप्त होता है। यह भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर को इस एकादशी का महत्व बताया था। एकादशी पूजा विधि एकादशी के दिन सबसे पहले सुबह उठकर स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और एकादशी व्रत का संकल्प करें। घर के मंदिर में पूजा करने से पहले एक वेदी बनाएं और उस पर 7 धान (उरद, मूंग, गेहूं, चना, जौ, चावल और बाजरा) रखें। 5 आम या अशोक के पत्ते कलश में रखकर वेदी पर रख दें। अब वेदी पर भगवान विष्णु की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करें। उसके बाद भगवान विष्णु को पीले फूल, मौसमी फल और तुलसी की दाल चढ़ाएं। फिर अगरबत्ती का प्रयोग कर विष्णु जी की आरती करें। शाम को भगवान विष्णु की आरती करने के बाद फल लें। रात को सोने के बजाय भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करें। अगली सुबह किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं और जितना हो सके उतना दान और दक्षिणा देकर उसे विदा करें। इसके बाद अपना खुद का खाना खाकर व्रत तोड़ें। ''' इन्हें भी देखें देवशयनी एकादशी सन्दर्भ बाह्य कडियाँ योगिनी एकादशी एकादशी महात्म्य श्रेणी:संस्कृति श्रेणी:हिन्दू त्यौहार श्रेणी:धार्मिक त्यौहार श्रेणी:एकादशी