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जनकवि रामकेर
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अक्टूबर 2026
अक्टूबर 2026
thumb|यह जनकवि के पौत्र अश्वनी कुमार सिंह के द्वारा सहेज कर रखा गया है और अश्वनी जी के पुत्र तपन द्वारा अपलोड किया गया है
जनकवि रामकेर (21 जून 1904 – 29 जुलाई 1975) भारत के एक अत्यंत प्रतिष्ठित प्रगतिशील लोक-कवि, जनवादी कार्यकर्ता और किसान आंदोलन के प्रमुख सांस्कृतिक स्तंभ थे। [1] वे उत्तर प्रदेश के चंदौली (तत्कालीन बनारस जिला) के अंतर्गत मुगलसराय से छह मील पूरब में स्थित 'बथावर' नामक गाँव के रहने वाले थे। [0.1.1, 1] उन्होंने काशिका और भोजपुरी बोलियों में जन-चेतना, सामंतवाद-विरोधी, जमींदारी उन्मूलन तथा शोषित किसानों के हक पर आधारित ओजस्वी गीतों और कविताओं की रचना की। [1] महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने तत्कालीन बनारस के ग्रामीण अंचलों और किसान सम्मेलनों में जन-जागरण के लिए उनके साहित्यिक व ज़मीनी योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया था। [1]
प्रारंभिक जीवन और संघर्ष
जनकवि रामकेर का जन्म 21 जून 1904 (जेठ सुदी द्वादश, रविवार) को एक साधारण किसान (काश्तकार) परिवार में हुआ था। [1] वर्ष 1919 में उनके पिता के निधन के बाद बड़े भाई ने खेतीबाड़ी का जिम्मा संभाला और परिवार का अलग्योझा (बंटवारा) कर लिया। [1] रामकेर जी को बचपन में पढ़ने के लिए मदरसे भेजा गया, लेकिन वहां उनका मन नहीं लगा और मार-पीट के बाद उन्हें चरवाही करने के लिए भेज दिया गया। [1] बचपन से ही उन्हें रामायण-महाभारत की कथाएँ सुनने और जनता में घुलमिल जाने का गहरा शौक था। [1] 12-13 वर्ष की अवस्था में वे अपने क्षेत्र के प्रसिद्ध दर्जी शायर बेचन खलीफ़ा के शागिर्द बने, जिनसे उन्होंने काव्य के गुण सीखे। [1] जवानी के दिनों में वे घर से भागकर कोलकाता, पुरी और गंगासागर तक की व्यापक घुमक्कड़ी (यात्रा) पर भी रहे। [1] बाद में वे देवी-देवताओं की पारंपरिक पूजा और एकादशी आदि का व्रत छोड़कर आर्यसमाजी बन गए थे। [1]
जनवादी आंदोलन और जेल यात्रा
रामकेर जी की संगठित जनवादी राजनीतिक और साहित्यिक लड़ाई वर्ष 1936 से शुरू हुई, जब कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने चंदौली तहसील में संगठित रूप से काम करना प्रारंभ किया। [1] वहां डॉक्टर साहा से उनका परिचय हुआ और वे चंदौली के 'राजनीतिक स्कूलों' (प्रशिक्षण शिविरों) में शामिल हुए। [1] वे स्वामी सहजानंद सरस्वती, साथी त्रिपाठी और बनारस के प्रसिद्ध कम्युनिस्ट जन-नेता रुस्तम सैटिन जैसे नेताओं के साथ किसान सभाओं में सक्रिय रहे। [1] वर्ष 1944 के ऐतिहासिक 'बड़गाँव किसान सम्मेलन' में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। [1] 1943 में बंगाल के अकाल के दिनों में उन्होंने अपने गीतों के ज़रिए अकाल पीड़ितों की सहायता के लिए अनाज व फंड इकट्ठा किया और आगरा में एक नाटक भी खेला। [1]
सामंतवाद और ज़मींदारों के अत्याचार के खिलाफ मुखर गीत गाने के कारण स्थानीय ज़मींदार उनसे बेहद नाराज़ रहते थे। [1] वर्ष 1943 में होली के एक दिन पूर्व गाँव के पास हुई एक हिंसक घटना (6 कत्ल) का सहारा लेकर स्थानीय ज़मींदार ने उन्हें और 54 अन्य ग्रामीणों को राजनीतिक द्वेष के कारण झूठे मामले में गिरफ्तार करवा दिया। [1] इस कारण रामकेर जी को 'बनारस सेंट्रल जेल' में 8 महीने तक हवालात की कठोर सजा काटनी पड़ी। [1] बाद में न्यायालय द्वारा वे पूरी तरह बेकसूर बरी किए गए। [1]
साहित्यिक योगदान एवं पारिवारिक विरासत
वर्ष 1936 से 1943 के कालखंड में रामकेर जी काशी और उसके आस-पास के क्षेत्रों में जनवादी लड़ाई के प्रमुख सांस्कृतिक स्तंभ थे। [1] वे हिंदी साहित्य के शिखर कवियों डॉ. शिवमंगल सिंह 'सुमन' और नरेंद्र शर्मा के साथ गाँव-गाँव घूमकर जनवादी गीतों का गायन करते थे। [1] वर्ष 1947 में इलाहाबाद में आयोजित 'प्रगतिशील लेखक सम्मेलन' के कवि सम्मेलन में उन्होंने अपनी बनारसी बोली की कविताओं से सभी विद्वानों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। [1]
हिंदी साहित्य के प्रगतिशील भाषा आंदोलनों की समीक्षा के अनुसार, काशिका बोली में रामकेर जी के लेखन की धार संत कबीर की विद्रोही चेतना का स्मरण दिलाती है। [1] महान कवि शमशेर बहादुर सिंह ने अपने प्रसिद्ध आलोचनात्मक निबंध 'एक बिल्कुल पर्सनल एसे' में नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन जैसे युगप्रवर्तक कवियों के साथ जनकवि रामकेर जी के साहित्यिक अवदान पर भी विशेष टिप्पणियाँ की हैं। [1] प्रसिद्ध समीक्षक प्रो. मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने भी जनवादी काव्य परंपरा में लोक-कवियों की इस क्रांतिकारी भूमिका को सराहा है। [1]
उनकी कविताओं के संकलन में उनकी प्रमुख रचनाएँ जैसे 'भजन' (रचना काल 1959 ई०) और 'ख्याल' संकलित हैं। [1] रामकेर जी दो सन्तानों के पिता थे, जिनमें उनके पुत्र हरिशंकर थे। [1] हरिशंकर जी के छह बेटे-बेटियों में सबसे छोटे बेटे अश्वनी कुमार सिंह ने इन सभी दुर्लभ साहित्यिक दस्तावेज़ों, ऐतिहासिक चित्रों और मूल पांडुलिपियों को अत्यंत गरिमा के साथ संभाल कर सुरक्षित रखा है। [1] इस ऐतिहासिक विरासत को जनकवि रामकेर जी के प्रपौत्र तपन द्वारा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया गया है। [1]
उन्होंने रामचरितमानस की शैली (दोहा, सोरठा, चौपाई) में अपनी विस्तृत आत्मकथा भी लिखी थी: [1]
"गुलामखाना रही न भारत, निज आपन अधिकार करब,
घूम घूम के समझीता आला अदना सुधार करब..." [1]
राहुल सांकृत्यायन पर कविता
महापंडित राहुल सांकृत्यायन से उनका बहुत गहरा आत्मीय और वैचारिक जुड़ाव था। [1] राहुल जी की पुस्तकों और उनकी घुमक्कड़ी शैली से प्रभावित होकर रामकेर जी ने उनके प्रति अगाध श्रद्धा व्यक्त करते हुए यह प्रसिद्ध पंक्तियाँ लिखी थीं: [1]
"आगरा में एक देवता आयन, नाम था राहुल सांकृत्यायन
कैसे थे सूधि राहुल बाबा :
लम्बा तगड़ा, बुद्धी सयानी, पहिरावा कुल गेरुआ बानी
बोधी, ब्राह्मण छत्तीस भाषा, वर्धन पोथी कीन्ह प्रकाशा" [1]
निधन
29 जुलाई 1975 को इस महान जनकवि का निधन हो गया। [1] वे जीवन के अंतिम क्षणों तक जनता के अधिकारों और लोक-साहित्य की सेवा के लिए लगातार संघर्षरत रहे। [1]
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