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प्राकृतिक खेती
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प्राकृतिक खेती वह खेती होती है, जिसमे फसलों पर किसी भी प्रकार का रासायनिक कीटनाशक https://web.archive.org/web/20221017105308/http://www.pashugyan.org/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A5%80%E0%A4%9F%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A4%95-%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%9C%E0%A5%88/ 17 अक्तूबर 2022 एवं उर्वरको का प्रयोग नहीं किया जाता है। सिर्फ प्रकृति के दौरान निर्मित उर्वरक और अन्य पेड़ पौधों के पत्ते खाद, पशुपालन, गोबर खाद एवं जैविक कीटनाशक https://web.archive.org/web/20221017105301/https://www.bighaat.com/hi/pages/pesticides 17 अक्तूबर 2022 उपयोग लाया जाता है यह एक प्रकार से विविध प्रकार की कृषि प्राणली है। जो फसलों और जीव-जन्तु पेड़ो को एकीकृत करके रखती हैं।प्राकृतिक खेती क्या है https://www.yojanahindime.in/natural-farming/
प्राकृतिक खेती, कृषि की प्राचीन पद्धति है। यह भूमि के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखती है। प्राकृतिक खेती में रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों का प्रयोग नहीं होता है, बल्कि प्रकृति में आसानी से उपलब्ध होने वाले प्राकृतिक तत्वों, तथा जीवाणुओं के उपयोग से खेती की जाती है | यह पद्धति पर्यावरण के अनुकूल है तथा फसलों की लागत कम करने में कारगर है | प्राकृतिक खेती में जीवामृत (जीव अमृत), घन जीवामृत एवं बीजामृत का उपयोग पौधों को पोषक तत्व प्रदान करने के लिए किया जाता है | इनका उपयोग फसलों पर घोल के छिड़काव अथवा सिंचाई के पानी के साथ में किया जाता है प्राकृतिक खेती में कीटनाशकों के रूप में नीमास्त्र, ब्रम्हास्त्र, अग्निअस्त्र, सोठास्त्र, दषा पड़नी, नीम पेस्ट, गोमूत्र का इस्तेमाल किया जाता है।प्राकृतिक कृषि https://mpnf.mpkrishi.org/ जून 2025 InternetArchiveBot
प्राकृतिक खेती की आवश्यकता
हम पिछले कई वर्षों से रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग फसलों पर करते आ रहे है। जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति खत्म हो चुकी है एवं भूमि के प्राकृतिक स्वरूप में भी बदलाव हो रहे है जो किसानो के लिए काफी नुकसानदायक है। रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग से जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण प्रतिदिन बढ़ रहा है। किसानों की फसल पैदावार कमाई का आधा हिस्सा रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक खरीदने में चला जाता है। क्योकि रासायनिक कीटनाशन काफी महंगे होते है।
इतिहास
300px|thumb|right|प्राकृतिक खेती के प्रवर्तक मसानोबू फुकुओका
प्राकृतिक खेती जापान के किसान एवं दार्शनिक मासानोबू फुकुओका द्वारा स्थापित कृषि की पर्यावरणरक्षी पद्धति है। फुकुओका ने इस पद्धति का विवरण जापानी भाषा में लिखी अपनी पुस्तक 'सिजेन नोहो' (自然農法 / shizen nōhō) में किया है। इसलिए कृषि की इस पद्धति को 'फुकुओका विधि' भी कहते हैं। इस पद्धति में 'कुछ भी न करने' की सलाह दी जाती है जैसे जुताई न करना, गुड़ाई न करना, उर्वरक न डालना, कीटनाशक न डालना, निराई न करना आदि।
भारत में खेती की इस पद्धति को 'ऋषि खेती' कहते हैं।
सिद्धान्त
फुकुओका ने प्राकृतिक खेती को निम्नलिखित पाँच सूत्रों में बाँध दिया है-
जुताई नहीं
उर्वरक नहीं
कीटनाशक नहीं (तथा वनस्पतिनाशक नहीं)
निराई नहीं
छंटाई नहीं (No pruning)
इन्हें भी देखें
जैविक खेती
बिना जुताई के खेती
राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन
बाहरी कड़ियाँ
खेती की ‘कुछ-मत-करो’ विधि की ओर (इण्डिया वाटर पोर्टल)
प्राकृतिक खेती के चार सिद्धांत (इण्डिया वाटर पोर्टल)
प्राकृतिक कृषि की विभिन्न शैलियाँ (इण्डिया वाटर पोर्टल)
एक कारण, प्राकृतिक कृषि के विस्तार न होने का (इण्डिया वाटर पोर्टल)
खरपतवारों की दोस्ती से करें खेती (बिना जुताई, खाद, दवाई और निंदाई की कुदरती खेती)
कुदरती खेती का एक अनूठा प्रयोग
सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती, हिमाचल प्रदेश
सन्दर्भ
श्रेणी:कृषि
श्रेणी:कृषि अर्थशास्त्र
श्रेणी:कृषि और पर्यावरण