411 REFERENCE · Wikipedia
बार्हस्पत्य सूत्र
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
बार्हस्पत्य सूत्र देवगुरु बृहस्पति भारत, नेपाल संस्कृत नास्तिक दर्शन
बार्हस्पत्य सूत्र देवगुरु बृहस्पति का ग्रन्थ है। बृहस्पति चार्वाक दर्शन के प्रणेता माने जाते हैं। यह ग्रंथ अप्राप्य माना जाता है। सर्व दर्शन संग्रह के पहले अध्याय में चार्वाक मत के सिद्धांतों का सार मिलता है। इसे लोकायत दर्शन के नाम से भी जाना जाता है। भूमि, जल, अग्नि, वायु जिनका प्रत्यक्ष अनुभव हो सकता है, इनके अतिरिक्त संसार में कुछ भी नहीं है। इन चार तत्वों के समिश्रण से ही चेतना शक्ति और बुद्धि का प्रादुर्भाव होता है। चार्वाक के अनुसार यावज्जीवेत सुखं जीवेत, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत। अर्थात जब तक जीवन है सुखों का उपभोग कर लेना चाहिए। भौतिक सुख को त्याज्य समझने की परंपरा को चार्वाक ने चुनौती दी। चूंकि इस लोक के अलावा और कोई दूसरा लोक नहीं है, इसलिए इस लोक का भरपूर आनंद लेना चाहिए, खूब ऐश-आराम करना चाहिए। शरीर के एक बार भस्म हो जाने पर वह पुन: वापिस लौट कर नहीं आता।भारतीय दर्शन की रूप-रेखा, प्रो॰ हरेन्द्र प्रसाद सिन्हा, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, २0१0, पृष्ठ-७९-८१, ISBN:978 81 208 2143 9, ISBN:978 81 208 2144 6नास्तिक दर्शन। २० मई २०१०। अभिगमन तिथि: २९ सितंबर २०१२
नास्तिक दर्शनों में चार्वाक, जैन और बौद्ध दर्शन आते हैं। ये वेदों के प्रमाण में विश्वास नहीं रखते, इसलिए नास्तिक दर्शन के अंतर्गत रखे गए हैं। ये ग्रन्थ ईसा पूर्व अंतिम शताब्दियों में, लगभग मौर्य काल में धीरे -धीरे गायब होता गया। इसके बाद इसे मात्र कुछ बचे व बोले गये सूत्रों के रूप में ही सहेजा जा सका। १९२८ में दक्षिणरंजन शास्त्री ने ऐसे ६० श्लोकों को प्रकाशित किया। १९५९ में उन्होंने ५४ चुने हुए श्लोक बार्हस्पत्य सूत्रम नाम से प्रकाशित किये। शास्त्री जी का मत था कि इसी प्रकार शेष अन्य श्लोकों को भी ढूंढा और प्रकाशित किया जा सकता है। २००२ में भट्टाचार्य ने कुछ और श्लोक ढूंढ कर निकाले, किन्तु इनमें विदेशी पाठ्य के मिले होने या अशुद्धता होने की बड़ी संभावना है।
इन संकलनों में अधिकांश कार्य भारतीय मध्य कालीन हैं, मोटे तौर पर लगभग ८वीं से १२वीं शताब्दी के बीच के। सायण द्वारा भारतीय दर्शन पर विशिष्ट टीका १४वीं शताब्दी में सर्वदर्शनसंग्रह नाम से निकली जिसमें चार्वाक के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है। किन्तु ये चार्वाक के पाठ सीधे मूल रूप में नहीं दिखाती है वरन १४वीं शताब्दी के एक शिक्षित वेदांतज्ञ के पढ़े और समझे सिद्धांतों के रूप में देती है। भट्टाचार्य ने ६८ श्लोक ९ पृष्ठों में पृष्ठ पर दिये हैं। बार्हस्पत्यसूत्रम अर्थात बार्हस्पत्य अर्थशास्त्रम भी इनसे प्रभावित किन्तु पारदर्शी और भ्रष्टरूप है।बार्हस्पत्यसूत्रम अर्थात बार्हस्पत्य अर्थशास्त्रम, संपादक एफ़.डब्ल्यु. थॉमस। १९२१। सीएफ़ भट्टाचार्य। २००२। पृ.६
सन्दर्भ
दक्षिणारंजन शास्त्री। चार्वाक दर्शन। पुरोगामी प्रकाशनी। १९६७
आर भट्टाचार्य। चार्वाक फ्रैग्मेण्ट्स: अ न्यू कलेक्शन। जर्नल ऑफ़ इण्डियन फ़िलॉसफ़ी-खण्ड ३०, संख्या-६। दिसंबर २००२। पृ:५९७-६४०
बाहरी कड़ियाँ
बार्हस्पत्य सूत्र (ओपेन लाइब्रेरी)
बार्हस्पत्य सूत्र (आर्काइव_डॉट_ओआरजी)
बार्हस्पत्य सूत्र
श्रेणी:हिन्दू धर्म के मत
श्रेणी:हिन्दू धर्म ग्रन्थ
श्रेणी:बृहस्पति