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१८५७ का स्वातंत्र्य समर
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१८५७ का स्वातंत्र्य समर १८५७चे स्वातंत्र्यसमर विनायक दामोदर सावरकर भारत मराठी, अंग्रेजी इतिहास (राष्ट्रवादी) सेठानी कम्पनी, मुम्बई (पुनर्प्रकाशित, भारत) 1909, 1949 (पुनर्प्रकाशन, भारत) 1909
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (मूल मराठी नाम : १८५७चे स्वातंत्र्यसमर) एक प्रसिद्ध इतिहास ग्रन्थ है जिसके लेखक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर थे। इस ग्रन्थ में उन्होंने तथाकथित 'सिपाही विद्रोह' का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिख कर ब्रिटिश शासन को हिला डाला था। यह ग्रन्थ को प्रकाशन से पूर्व ही प्रतिबन्धित होने का गौरव प्राप्त है। अधिकांश इतिहासकारों ने १८५७ के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक 'सिपाही विद्रोह' या अधिकतम भारतीय विद्रोह कहा था। दूसरी ओर भारतीय विश्लेषकों ने भी इसे तब तक एक योजनाबद्ध राजनीतिक एवं सैन्य आक्रमण कहा था, जो भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के ऊपर किया गया था।
सावरकर ने १८५७ की घटनाओं को भारतीय दृष्टिकोण से देखा। स्वयं एक तेजस्वी नेता व क्रांतिकारी होते हुए, वे १८५७ के शूरवीरों के साहस, वीरता, ज्वलन्त उत्साह व दुर्भाग्य की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने इस पूरी घटना को उस समय उपलब्ध साक्ष्यों व पाठ सहित पुनरव्याख्यित करने का निश्चय किया। उन्होंने कई महीने इण्डिया ऑफिस पुस्तकालय में इस विषय पर अध्ययन में बिताए। सावरकर ने पूरी पुस्तक मूलतः मराठी में लिखी व १९०८ में पूर्ण की। क्योंकि उस समय इसका भारत में मुद्रण असम्भव था, इसकी मूल प्रति इन्हें लौटा दी गई। इसका मुद्रण इंग्लैंड व जर्मनी में भी असफाल रहा। इंडिया हाउस में रह रहे कुछ छात्रों ने इस पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद किया और अन्ततः यह पुस्तक १९०९ में हॉलैंड में मुद्रित हुयी। इसका शीर्षक था, 'द इण्डियन वार ऑफ इंडिपेन्डेंस – 1857'। इस पुस्तक का द्वितीय संस्करण लाला हरदयाल द्वारा गदर पार्टी की ओर से अमरीका में निकला और तृतीय संस्करण सरदार भगत सिंह द्वारा निकाला गया। इसका चतुर्थ संस्करण नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा सुदूर-पूर्व में निकाला गया। फिर इस पुस्तक का अनुवाद उर्दु, हिंदी, पंजाबी व तमिल में किया गया। इसके बाद एक संस्करण गुप्त रूप से भारत में भी द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्त होने के बाद मुद्रित हुआ। इसकी मूल पाण्डुलिपि मैडम भीकाजी कामा के पास पैरिस में सुरक्षित रखी थी। यह प्रति अभिनव भारत के डॉ॰ क्यूतिन्हो को प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान पैरिसम संकट आने के दौरान सौंपी गई। डॉ॰ क्युतिन्हो ने इसे किसी पवित्र धार्मिक ग्रन्थ की भांति ४० वर्षों तक सुरक्षित रखा। भारतीय स्वतंत्रता उपरान्त उन्होंने इसे रामलाल वाजपेयी और डॉ॰ मूंजे को दे दिया, जिन्होंने इसे सावरकर को लौटा दिया। इस पुस्तक पर लगा निषेध अन्ततः मई, १९४६ में बंबई सरकार द्वारा हटा लिया गया।
पुस्तक में उठाए गये मुद्दे
पुस्तक लेखन से पूर्व सावरकर के मन में अनेक प्रश्न थे –
(1) सन् 1857 का यथार्थ क्या है?
(2) क्या वह मात्र एक आकस्मिक सिपाही विद्रोह था?
(3) क्या उसके नेता अपने तुच्छ स्वार्थों की रक्षा के लिए अलग-अलग इस विद्रोह में कूद पडे़ थे, या वे किसी बडे़ लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक सुनियोजित प्रयास था?
(4) योजना का स्वरूप क्या था?
(5) क्या सन् 1857 एक बीता हुआ बन्द अध्याय है या भविष्य के लिए प्रेरणादायी जीवन्त यात्रा?
(6) भारत की भावी पीढ़ियों के लिए 1857 का संदेश क्या है?
उन्हीं ज्वलन्त प्रश्नों का उत्तर ढ़ूढने की परिणति थी, 1857 का स्वातंत्र्य समर ।
प्रभाव
सावरकर जी द्वारा रचित इतिहास के इस महान रचना ने सन् 1914 के गदर आन्दोलन से 1943-45 की आजाद हिन्द फौज तक कम-से-कम दो पीढ़ियों को स्वतंत्रता के लिए संघर्ष की प्रेरणा दी। मुम्बई की ‘फ्री हिन्दुस्तान’ साप्ताहिक पत्रिका में मई 1946 में ‘सावरकर विशेषांक’ प्रकाशित किया, जिसमें के.एफ. नरीमन ने अपने लेख में स्वीकार किया कि आजाद हिन्द फौज की कल्पना और विशेषकर रानी झाँसी रेजीमेन्ट के नामकरण की मूल प्रेरणा सन 1857 की महान क्रान्ति पर वीर सावरकर की जब्तशुदा रचना में ही दिखाई देती है। उसी अंक के 'वेजवाडा की गोष्ठी' नामक पत्रिका के संपादक जी.वी. सुब्बाराव ने लिखा कि यदि सावरकर ने 1857 और 1943 के बीच हस्तक्षेप न किया होता तो मुझे विश्वास है कि ‘गदर’ शब्द का अर्थ ही बदल गया होता। यहां तक कि अब लॉर्ड वावेल भी इसे एक मामूली गदर कहने का साहस नहीं कर सकता। इस परिवर्तन का पूरा श्रेय सावरकर और केवल सावरकर को ही जाता है।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
भारतीय स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम
बाहरी सूत्र
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (विकिस्रोत)
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