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महाश्वेता देवी
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Mahashweta devi.jpg 220px महाश्वेता देवी महाश्वेता देवी 1926 1 14 y अविभाजित भारत के ढाका 2016 7 28 1926 1 14 कोलकाता, पश्चिम बंगाल, भारत राजनीतिक कार्यकर्ता, लेखक, राजनयिक बिजोन भट्टाचार्य नबरुन भट्टाचार्य अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस 1956–2016 उपन्यास, लघु कहानी, नाटक, निबंध भारत की अधिसूचित जनजातियाँ,आदिवासी,दलित,वंचित समुदाय गणनाट्य अग्निगर्भ, मातृछवि, नटी, जंगल के दावेदार, मीलू के लिए, मास्टर साहब। মহাশ্বেতা দেবীর স্বাক্ষর.svg
महाश्वेता देवी (14 जनवरी 1926 – 28 जुलाई 2016)विस्तृत जीवनी https://web.archive.org/web/20100326080914/http://www.rmaf.org.ph/Awardees/Biography/BiographyDeviMah.htm 26 मार्च 2010 रेमन मैगसेसे पुरस्कार.John Charles Hawley Encyclopedia of Postcolonial Studies http://books.google.com/books?id=tQILKOwnX-0C&pg=PA142 29 जुलाई 2016 2001 ग्रीनवुड प्रकाशन समूह 978-0-313-31192-5 142– एक भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका थीं। उन्हें 1996 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा
उनका जन्म सोमवार १४ जनवरी १९२६ को अविभाजित भारत के ढाका में हुआ था। उनके पिता मनीष घटक एक कवि और एक उपन्यासकार थे और उनकी माता धारीत्री देवी भी एक लेखिका और एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं। उनकी स्कूली शिक्षा ढाका में हुई। भारत विभाजन के समय किशोरवस्था में ही उनका परिवार पश्चिम बंगाल में आकर बस गया। बाद में उन्होने विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन से स्नातक (प्रतिष्ठा) अंग्रेजी में किया और फिर कोलकाता विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर अंग्रेजी में किया। कोलकाता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में मास्टर की डिग्री प्राप्त करने के बाद एक शिक्षक और पत्रकार के रूप में आपने अपना जीवन शुरू किया। तदुपरांत आपने कलकत्ता विश्वविद्यालय में अंग्रेजी व्याख्याता के रूप में नौकरी भी की। तत्पश्चात 1984 में लेखन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए आपने सेवानिवृत्त ले ली। 14 जनवरी 2018 को महाश्वेता देवी की 92 वें जन्मदिवस पर गूगल ने उन्हें सम्मान देते हुए उनका गूगल डूडल बनाया।
साहित्यिक जीवन
महाश्वेता देवी का नाम ध्यान में आते ही उनकी कई-कई छवियाँ आँखों के सामने प्रकट हो जाती हैं। दरअसल उन्होंने मेहनत व ईमानदारी के बलबूते अपने व्यक्तित्व को निखारा। उन्होंने अपने को एक पत्रकार, लेखिका, साहित्यकार और आंदोलनधर्मी के रूप में विकसित किया।
महाश्वेता जी ने कम उम्र में लेखन का शुरू किया और विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए लघु कथाओं का महत्वपूर्ण योगदान दिया। आपका पहला उपन्यास, "नाती", 1957 में प्रकाशित हुआ, ‘झाँसी की रानी’ महाश्वेता देवी की प्रथम गद्य रचना है। जो 1956 में प्रकाशन में आया। स्वयं उन्हीं के शब्दों में, "इसको लिखने के बाद मैं समझ पाई कि मैं एक कथाकार बनूँगी।" इस पुस्तक को महाश्वेता जी ने कलकत्ता में बैठकर नहीं बल्कि सागर, जबलपुर, पुणे, इंदौर, ललितपुर के जंगलों, झाँसी ग्वालियर, कालपी में घटित तमाम घटनाओं यानी 1857-58 में इतिहास के मंच पर जो हुआ उस सबके साथ-साथ चलते हुए लिखा। अपनी नायिका के अलावा लेखिका ने क्रांति के तमाम अग्रदूतों और यहाँ तक कि अंग्रेज अफसर तक के साथ न्याय करने का प्रयास किया है। आप बताती हैं कि "पहले मेरी मूल विधा कविता थी, अब कहानी और उपन्यास है।" उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियों में 'नटी', 'मातृछवि ', 'अग्निगर्भ' 'जंगल के दावेदार' और '1084 की मां', माहेश्वर, ग्राम बांग्ला हैं। पिछले चालीस वर्षों में,उनकी छोटी-छोटी कहानियों के बीस संग्रह प्रकाशित किये जा चुके हैं और सौ उपन्यासों के करीब (सभी बंगला भाषा में) प्रकाशित हो चुकी है।
ग्रन्थ तालिका
2 अरण्येर अधिकार
नैऋते मेघ
अग्निगर्भ
गणेश महिमा
हाजार चुराशीर मा
चोट्टि मुण्डा एबं तार तीर
शालगिरार डाके
नीलछबि (१९८६, अब, ढाका।)
बन्दोबस्ती
आइ.पि.सि ३७५
साम्प्रतिक
प्रति चुयान्न मिनिटे
मुख
कृष्णा द्बादशी
६इ डिसेम्बरेर पर
बेने बौ
मिलुर जन्य
घोरानो सिँड़ि
स्तनदायिनी
लायली आशमानेर आयना
आँधार मानिक
याबज्जीबन
शिकार पर्ब
अग्निगर्भ
ब्रेस्ट गिभार
डास्ट अन द्य रोड
आओयार नन-भेज काउ
बासाइ टुडु
तितु मीर
रुदाली
उनत्रिश नम्बर धारार आसामी
प्रस्थानपर्ब
ब्याधखन्ड
आयाम
इनकी कई रचनाओं पर फ़िल्म भी बनाई गई। इनके उपन्यास 'रुदाली ' पर कल्पना लाज़मी ने 'रुदाली' तथा 'हजार चौरासी की माँ' पर इसी नाम से 1998 में फिल्मकार गोविन्द निहलानी ने फ़िल्म बनाई। इन्हें 1979 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1986 में पद्मश्री ,1997 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ज्ञानपीठ पुरस्कार इन्हें नेल्सन मंडेला के हाथों प्रदान किया गया था। इस पुरस्कार में मिले 5 लाख रुपये इन्होंने बंगाल के पुरुलिया आदिवासी समिति को दे दिया था। साहित्य अकादमी से पुरस्कृत इनके उपन्यास 'अरण्येर अधिकार' आदिवासी नेता बिरसा मुंडा की गाथा है। उपन्यास 'अग्निगर्भ' में नक्सलबाड़ी आदिवासी विद्रोह की पृष्ठभूमि में लिखी गई चार लंबी कहानिया है।
निधन
28 जुलाई 2016 को कोलकाता में उनका देहावसान हो गया।
हिन्दी में कुछ कृतियां
(सभी बंग्ला से हिन्दी में रुपांतरण)
अक्लांत कौरव, अग्निगर्भ, अमृत संचय, आदिवासी कथा, ईंट के ऊपर ईंट, उन्तीसवीं धारा का आरोपी, उम्रकैद, कृष्ण द्वादशी, ग्राम बांग्ला, घहराती घटाएँ, चोट्टि मुंडा और उसका तीर, जंगल के दावेदार, जकड़न, जली थी अग्निशिखा, झाँसी की रानी, टेरोडैक्टिल, दौलति, नटी, बनिया बहू, मर्डरर की माँ, मातृछवि, मास्टर साब, मीलू के लिए, रिपोर्टर, रिपोर्टर, श्री श्री गणेश महिमा, स्त्री पर्व, स्वाहा और हीरो-एक ब्लू प्रिंट आदि
सन्दर्भ
श्रेणी:लेखक
श्रेणी:बांग्ला साहित्यकार
श्रेणी:ज्ञानपीठ सम्मानित
श्रेणी:मैगसेसे पुरस्कार विजेता
श्रेणी: भारतीय महिला साहित्यकार
श्रेणी:पद्मश्री प्राप्तकर्ता
श्रेणी:साहित्य और शिक्षा में पद्म विभूषण के प्राप्तकर्ता