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जैवनैतिकता
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जैवनैतिकता जीवविज्ञान एवं दवाईयों में हुई प्रगति के कारण पैदा हुए नैतिक विवादों का दार्शनिक अध्ययन है। जैवनैतिकता उन नैतिक प्रश्नों से जुड़ा हुआ है जो जीव विज्ञान, जैवप्रोद्यौगिकी, औषधि, राजनीति, कानून तथा दर्शन के संबंधों के मध्य उठते हैं।
इतिहास
शब्दावली
बायोथिक्स (जैवनैतिकता) शब्द (यूनानी बायोस, जीवन, इथोस, व्यवहार) 1927 में फ्रिट्ज जार के द्वारा बनाया गया था, जिन्होंने कई ऐसे तर्कों और बहसों को इजाद किया जिनमें से कई जानवरों को लेकर किए जा रहे आज के जैव वैज्ञानिक शोध प्रचलित हैं। यह सब उन्होंने एक आलेख में किया था, जैसा कि वे इसे, जानवरों एवं पौधों के वैज्ञानिक उपयोग के संबंध में "जैवनैतिक अनिवार्यता" कहते हैं।लोलस, एफ. (2008). जैवनैतिकता और पशु अनुसंधान: एक व्यक्तिगत परिप्रेक्ष्य और फ्रिट्ज जह्र के योगदान पर एक नोट. जीव विज्ञान रेस., सैंटियागो, 41 (1), 119-123. <http://www.scielo.cl/scielo.php?script=sci_arttext&pid=S0716-97602008000100013&lng=es&nrm=iso https://web.archive.org/web/20131101152258/http://www.scielo.cl/scielo.php?script=sci_arttext&pid=S0716-97602008000100013&lng=es&nrm=iso 1 नवंबर 2013 >, 15 जनवरी 2010 को पुनःप्राप्त. doi: 10.4067/S0716-97602008000100013 पर प्राप्त.सैस, एच. एम. (2007). फ्रिट्ज जह्र की 1927 जैवनैतिकता के अवधारणा. कैनेडी इनस्ट एथिक्स जे, 17 (4), दिसंबर, 279-295. 1970 में, अमेरिकी बायोकेमिस्ट वान रेंसेलायर पॉटर ने भी जीव मंण्डल की एकजुटता को शामिल करते हुए इस शब्द का उपयोग व्यापक अर्थ में किया, इस प्रकार उन्होंने एक "वैश्विक नैतिकता" को जन्म दिया, जो कि मानव और पशु प्रजाति दोनों के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जैवविज्ञान, इकोलॉजी, औषधि और मानवीय मूल्यों के बीच में एक अनुशासन का प्रतिनिधित्व करती है।गोल्डिम, जे. आर. (2009). जैवनैतिकता की शुरुआत की दुबारा चर्चा: फ्रिट्ज जह्र का योगदान (1927). पर्सपेक्ट बीयोल मेड, सम, 377-380.लोल्स, एफ., ओपी. सीआईटी.
विषय का विकास
हालांकि जैवनैतिकता के मुद्दों पर प्राचीन काल से ही बहस होती आ रही है और आम लोगों का ध्यान संक्षिप्त रूप में बायोमेडिकल प्रयोगों में मानवीय विषयों की भूमिका पर भी गया। इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजी के द्वारा किए गए प्रयोग के रहस्योद्घाटन पर भी लोगों का ध्यान केन्द्रित रहा, लेकिन जैवनैतिकता का आधुनिक क्षेत्र पहली बार अकादमिक विषय के रूप में एंग्लोफोन सोसायटी में 1960 के दशक में प्रकट हुआ। इस तरह के विभिन्न क्षेत्रों जैसे अंग प्रत्यारोपण तथा एण्ड-ऑफ-लाईफ केयर के विभिन्न क्षेत्रों में तकनीकी प्रगतियों के साथ किडनी डायलिसिस एवं रेसपिरेटर्स के विकास ने इस संबंध में कुछ नए प्रश्न खड़े किये कि कब और कैसे देखभाल को वापस लिया जा सकता है। इसके अलावा, चूंकि ब्रिटेन और अन्य जगहों में दर्शन तार्किक वस्तुनिष्ठवाद और इनोटिविज्म के प्रभावों से दूर चला गया, नैतिकता के सिद्धान्तों के विकास तथा व्यवहारिक समस्याओं में इनकी उपयोगिता ने आंतरिक रूचि प्राप्त की. इन सवालों पर इंगलैण्ड के धार्मिक विद्वानों तथा दार्शनिकों द्वारा अक्सर चर्चा हुई, जिनमें जेम एंसकोंबे तथा आरएम हेयर का उल्लेखनीय योगदान रहा. 1970 के दशक तक, जैवनैतिक थिंक टैंक तथा शैक्षिक जैवनैतिक कार्यक्रमों का उभार हो चुका था। इस तरह के शुरूआती संस्थानों में 1969 में दार्शनिक डैनियल काल्लाहान तथा मनोवैज्ञानिक विलर्ड गेलिन के द्वारा स्थापित हेस्टिंग्स केन्द्र (मूलत: द इंस्टिट्युट ऑफ सोसायटी, इथिक्स एण्ड लाइफ सायंसेज) एवं 1971 में जॉर्जटाऊन विश्वविद्यालय में स्थापित कैनेडी इंस्टिट्युट ऑफ इथिक्स थे। जेम्स एफ. चाइल्ड्रेस एवं टॉम ब्युचैंप के द्वारा प्रकाशित नैतिकता की प्रथम पाठ्य पुस्तक - प्रिंसिपल ऑफ बायोकेमिकल इथिक्स - ने इस विषय में एक परिवर्तनकारी क्षण को चिह्नित किया।
पिछले तीन दशकों के दौरान जैवनैतिकता के मुद्दों ने कैरेन ऐन क्वीनलैन, नैन्सी कर्जन तथा तेरी शियावो की मौत से संबंधित आदालती मामलों के माध्यम से व्यापक स्तर पर ध्यान आकर्षित किया। इस क्षेत्र ने जाने-माने वकीलों के अपने कैडर का विकास किया, जैसे कि वाशिंगटन विश्वविद्यालय में अल जॉनसन, वरजिनिया विश्वविद्यालय में जॉन फ्लेचर, ब्राउन विश्वविद्यालय में जैकोब एम. अपेल, जॉन्स हॉपकिन्स में रूथ फैडेन तथा पेंसिलवेनिया विश्वविद्यालय में आर्थर कैपलन. 1995 में, राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने जैवनैतिकता पर राष्ट्रपति परिषद की स्थापना की, इससे यह संकेत गया कि यह क्षेत्र अतत: परिपक्वता के अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया है और संयुक्त राज्य अमेरिका में इसे स्वीकृति मिली है। राष्ट्रपति जॉर्ज व. बुश ने भी इस क्षेत्र में निर्णय प्रतिपादन हेतु जैव नैतिकता परिषद का आश्रय लिया, जैसे कि एम्ब्रियोनिक स्टेम-सेल शोध को सार्वजनिक धन देना.
उद्देश्य और संभावनाएं
जैव नौतिकता का क्षेत्र मानवीय जांच के एक व्यापक पट्टी को संबोधित है, जीवन की सीमाओं पर बहस (अर्थात गर्भपात, इच्छामृत्यु) के विस्तार से लेकर दुर्लभ हेल्थ केयर संसाधनों के आवंटन (अर्थात् अंग दान, हेल्थ केयर रेशनिंग) तथा धार्मिक या सांस्कृतिक कारणों से हेल्थ केयर को धीमा करने के अधिकार तक इसका फैलाव है। जैव नैतिकतावादी अक्सर अपने विषय की सूक्ष्म सीमा पर आपस में असहमत होते हैं, इस बात पर बहस करते हुए कि जीवविज्ञान और औषधि को शामिल को करते हुए क्या इस क्षेत्र के सभी प्रश्नों के नैतिक मूल्यांकन से खुद को जोड़ना चाहिए या केवल इन सवालों के सबसेट से. कुछ जैव नैतिकतावादी केवल चिकित्सा उपचार या तकनीकीगत नवोत्पाद तथा इंसानों के तिकित्सा इलाज के समय का संकीर्ण मूल्यांकन करते हैं। दूसरों जैव नैतिकतावादियों ने सभी कार्यों की नैतिकता, जो भय और दर्द को महसूस करने वाले जीवों की मदद या नुकसान कर सकती थी, को शामिल कर नैतिक मूल्यांकन का दायरा बढ़ा दिया, तथा औषधि और जीवविज्ञान से संबंधित जीवों के ऐसे सभी कार्यों को जैवनैतिकता के अंतर्गत ला दिया. हालांकि, अधिकतर जैव नैतिकतावादी इस विषय के सार्थक फ्रेमवर्क के विश्लेषण के लिए खाद्य प्रदान करने वाले विभिन्न विषयों का उपयोग करते हुए इन जटिल विषयों के बहस में इमानदार, नम्र और वुद्धिमतापूर्ण रवैये के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हैं।
सिद्धांत
इन क्षेत्रों में आधुनिक जैव नैतिकतावादियों का ध्यान मानव प्रयोगों पर सबसे पहली बार गया। जैवचिकित्सा तथा स्वभावजन्य शोध के विषय पर राष्ट्रीय मानव रक्षा आयोग की स्थापना प्रारंभ में मानव विषयों को लेकर होने वाले जैवचिकित्सा तथा स्वभावजन्य शोध के आधारभूत सिद्धान्तों की पहचान करने के लिए की गई थी। हालांकि, स्वायत्तता, उपकारिता और न्याय नामक मौलिक अधिकारों की घोषणा बैलमौंट रिपोर्ट (1979) में हुई - जिसने इन मुद्दों के विस्तृत क्षेत्र पर जैव नैतिकतावादियों की सोच को प्रभावित किया। दूसरों ने प्रमुख मूल्यों की इस सूची में नॉन-मालइफिशेंस, मानव गरिमा तथा जीवन की शुद्धता को जोड़ा है।
चिकित्सा नैतिकता
Medical ethics
चिकित्सा नैतिकता दवा के लिए लागू नैतिक मूल्य और निर्णयों का अध्ययन है। एक अध्ययनशील विषय के रूप में, चिकित्सा नैतिकता में नैदानिक समायोजन के व्यावहारिक अनुप्रयोग के साथ ही साथ इतिहास, दर्शन, धर्मशास्त्र पर इसके काम भी शामिल हैं।
चिकित्सा नैतिकता को सामान्यत: एक व्यवहारिक पेशेवर नैतिकता के रूप में समझा जाता है जबकि जैवनैतिकता विज्ञान के दर्शन और जैवप्रद्यौगिकी के मामलों को स्पर्श करते हुए अधिक व्यापक विषयों पर कार्य करती दिखती है। फिर भी, दोनों क्षेत्र अक्सर परस्पर व्याप्त हैं और शैली का मामला गौरव और अधिक पेशेवर मतैक्य से अधिक महत्वपूर्ण है। चिकित्सा नैतिकता के कई सिद्धान्त स्वास्थ्य सेवा नैतिकता की कई शाखाओं जैसे कि नर्सिंग नैतिकता के भाग हैं।
परिप्रेक्ष्य और कार्य-पद्धति
जैवनैतिकतावादी पृष्ठभूमि की एक विस्तृत विविधता से आए हैं और इनके पास विषयों की विविध कार्य पद्धति का प्रशिक्षण है। इस क्षेत्र में, प्रिंसटन विश्वविद्यालय के पीटर सिंगर, हेस्टिंग्स केंद्र के डैनियल कैलहान, तथा हार्वर्ड विश्वविद्यालय के डैनियल व्रॉक जैसे दर्शन में प्रशिक्षित व्यक्ति, शिकागो विश्वविद्यालय के मार्क सेगलर, कॉमेल विश्वविद्यालय के जोसेफ फिन्स जैसे चिकित्सा-प्रशिक्षित क्लिनिशियन जैव नैतिकतावादी, जैकोब अपेल एवं वेजली जे, स्मिथ जैसे कानूनविद, फ्रोसिस फुकुयामा जैसे राजनैतिक अर्थशास्त्री तथा जेम्स चाइल्ड्रेस के साथ ही कई धर्मशास्त्री शामिल हैं। एक बार औपचारिक रूप से प्रशिक्षित दार्शनिकों के प्रभुत्व में आ जाने के बाद यह क्षेत्र आगे बढ़कर बहुविषयक हो गया है, साथ ही कुछ आलोचकों का दावा है कि इस क्षेत्र के विकास पर विश्लेषणात्मक दर्शन का नकारात्मक प्रभाव पड़ता रहा है। इस क्षेत्र की अग्रणी पत्रिकाओं में हेस्टिंग्स सेंटर रिपोर्ट, जर्नल ऑफ मेडिकल इथिक्स तथा कैंब्रीज क्वारटर्ली ऑफ हेल्थकेयर इथिक्स शामिल हैं।
कई धार्मिक समुदायों के पास जैवनैतिक मामलों की जांच के अपने इतिहास हैं तथा उन्होंने इस पर नियम और दिशा निर्देश का विकास भी किया है कि उनकी अपनी विशिष्ट आस्था के दृष्टिकोण से इन मुद्दों को कैसे निपटाया जाय. यहूदी, ईसाई और
मुस्लिम, सभी ने इन मुद्दों पर एक महत्वपूर्ण शास्त्र मंडल का विकास कर लिया है। कई गैर पश्चिमी संस्कृतियों में, धर्म और दर्शन सख्त रूप से अलग नहीं हैं। उदाहरण के लिए, कई एशियाई संस्कृतियों में जैवनैतिक मुद्दों पर एक जीवंत बहस होती है। सामान्यत: बौद्ध जैव नैतिकता को, एक यथार्थवादी दृष्टि, जो एक तर्कबुद्धिपरक, व्यवहारिक दृष्टिकोण की ओर ले जाती है, द्वारा चिन्हित किया जाता है। बौध जैवनैतिकतावादियों में डैमिअन केवों शामिल हैं। भारत में वंदना शिवा हिन्दू परम्पराओं की हिमायत करने वाले जैवनैतिकतावादियों में अग्रणी हैं। अफ्रिका और आंशिक रूप से लैटिन अमेरिका में जैवनैतिकता पर बहस, विकासशील परिप्रेक्ष्य तथा जैव राजनैतिक शक्ति संबंधों में इसकी व्यवहारिक प्रासंगिकता पर केन्द्रित है।
इन्हें भी देखें
जैवनैतिकता (पत्रिका)
जॉन्स हॉपकिन्स बर्मन जैवनैतिकता के संस्थान
लिनाक्रे तिमाही
चिकित्सा कानून
नैदानिक नैतिकता के लिए संसाधन परामर्श
समस्या
प्रकाशित और सहकर्मी की समीक्षा वाली जैवनीतिपरक विश्लेषण के विषय वाले स्वास्थ्य विज्ञान के क्षेत्रों में शामिल है:
90%
गर्भपात
जंतु अधिकार
कृत्रिम गर्भाधान
कृत्रिम जीवन
कृत्रिम गर्भ
सहायता प्रदान की आत्महत्या
बायोपिरासी
बायोरिस्क
रक्त/रक्त प्लाज्मा (व्यापार)
शरीर संशोधन
मस्तिष्क-कंप्यूटर इंटरफेस
चिमेरस
परिच्छेदन
क्लोनिंग
गोपनीयता (मेडिकल रिकॉर्ड)
सहमति
गर्भनिरोधक (जन्म नियंत्रण)
क्रायोनिक्स
विकलांगता
युजनिक्स
इच्छामृत्यु (मानव, गैर मानव पशु)
ट्यूब प्रीतिभोज
जीन की चोरी
जीन थेरेपी
आनुवंशिक रूप से संशोधित खाद्य
आनुवांशिक रूप से परिष्कृत जीव
जीनोमिक्स
महान बंदर परियोजना
मानव प्रतिरूपण
मानव वृद्धि
मानव जेनेटिक इंजीनियरिंग
कायचिकित्सक या शल्यचिकित्सक
बांझपन का उपचार
जीवन विस्तार
जीवन का समर्थन
लोबोटामि
चिकित्सकीय कदाचार
चिकित्सा अनुसंधान
चिकित्सा यातना
नैतिक दायित्व
नैनोमेडिसिन
अंग के दान (निष्पक्ष, वर्ग और जाति पक्षपात)
दर्द प्रबंधन
अनिषेकजनन
अधिकारों के मरीजों के विधेयक
प्लेसबो
जनसंख्या नियंत्रण
पर्चे दवाओं (अमेरिका की कीमतें)
प्रजननीय उपकार
व्यावसायिक नैतिकता
साइकोसर्जरी
जीवन की गुणवत्ता (हेल्थकेयर)
मनोरंजक दवा का उपयोग
प्रजनन के अधिकार
रिप्रोजेनेटिक्स
वीर्य और अंडे (दान)
आध्यात्मिक नशीली दवाओं के प्रयोग
स्टेम सेल अनुसंधान
आत्महत्या
स्थानापन्न मातृत्व
तीन बच्चों के माता-पिता
ट्रांससेक्शुअलिटी
ट्रांसह्युमनिज़म
प्रत्यारोपण व्यापार
ज़ेनोट्रांसप्लान्टेशन
सन्दर्भ
आगे पढ़ें
सामान्य जैवनैतिकता
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ईसाई जैवनैतिकता
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