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411 समाचार
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महेंद्रगिरि (ओड़िशा)

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महेंद्रगिरि Mahendragiriମହେନ୍ଦ୍ରଗିରି 1501 India महेंद्रगिरि का स्थान 300 right ओड़िशा गजपति ज़िल्ला पूर्वी घाट 18 58 28 N 84 22 05 E type:mountain_region:IN_scale:100000 dms inline,title सड़क महेंद्रगिरि (Mahendragiri) भारत के ओड़िशा राज्य के गजपति ज़िल्ले के पारलाखेमुण्डि नगरपालिका से प्राय: 53-54 कि.मी दुरी पर अवस्थित है। यह पूर्वी घाट का एक 1501 m ft ऊँचा पर्वत है। इस ऐतिहासिक पर्वत का शास्त्रों में उल्लेख है। यह कोरापुट ज़िल्ले के देओमाली पर्वत के बाद ओड़िशा का दूसरा सबसे ऊँचा पहाड़ है। शास्त्रानुसार यह भगवान परशुरामजी के वासस्थली है। "Orissa reference: glimpses of Orissa," Sambit Prakash Dash, TechnoCAD Systems, 2001"The Orissa Gazette," Orissa (India), 1964"Lonely Planet India," Abigail Blasi et al, Lonely Planet, 2017, ISBN 9781787011991 शास्त्रीय महत्त्व भगवान परशुरामजी के निवास स्थान, महेन्द्रपर्वत का प्रमुखता तथा वहाँ भगवान परशुरामजी के दर्शन के संबंध में विभिन्न शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है। श्रीमहाभारतम्, श्रीमद्वाल्मीकियरामाय, श्रीमद्भागवतमहापुराण तथा श्रीशिवमहापुराण आदि ग्रंथों से इस विषय से संबंधित महत्वपूर्ण शास्त्रोक्त प्रमाण निम्न में दिया गया है। • भगवान परशुराम के निवास स्थान के विषय में— ॰ श्रीमद्भागवतम् में उल्लेख है कि: आस्तेऽद्यापि महेन्द्राद्रौ न्यस्तदण्डः प्रशान्तधीः। उपगीयमानचरितः सिद्धगन्धर्वचारणैः॥ — श्रीमद्भागवतम् ९.१६.२६ भावार्थ: भगवान परशुराम आज भी महेन्द्रपर्वत पर निवास करते है। उन्होंने क्षत्रियोंके अस्त्रशस्त्र पुर्णतया त्याग कर दिया है और वे शांत तथा स्थिर वुद्धि होकर एक ब्राह्मण के रूप में स्थित है। उनके चरित्र और महान कार्यों के कारण सिद्ध, चारण और गंधर्व जैसे दिव्य प्राणीयों ने निरंतर उनका स्तवन और गुणगान करते है। ॰ इस विषय में श्रीमहाभारतम् में उल्लेख है कि: स प्रदाय महीं तस्मै कश्यपाय महात्मने। अस्मिन् महेन्द्रे शैलेन्द्रे वसत्यमितविक्रमः॥ — श्रीमहाभारतम् ३.११७.१४ भावार्थ: इस प्रकार सारी पृथ्वी महात्मा कश्यप को देकर अमित पराक्रमी परशुरामजी इस पर्वतराज महेन्द्र पर निवास करते है। सप्तद्वीपां वसुमतीं मारीचोऽगृह्णत द्विज:। राम॑ प्रोवाच निर्गच्छ वसुधातो ममाज्ञया।। स कश्यपस्य वचनात्‌ प्रोत्सार्य सरितां प्रतिम्‌। इषुपाते युधां श्रेष्ठ: कुर्वन्‌ ब्राह्मणशासनम्‌।। अध्यावसद्‌ गिरिश्रेष्ठं महेन्द्र पर्वतोत्तमम्‌। — श्रीमहाभारतम् ७.७०.२१-२३ भावार्थ: ब्रह्मर्षि कश्यप ने जब सातों द्वीपों से युक्त यह पृथ्वी दानमें ले ली, तब उन्होंने परशुरामजी से कहा-“अब तुम मेरी आज्ञासे इस पृथ्वी से निकल जाओ” (और कहीं अन्यत्र जाकर रहो)। कश्यपके इस आदेश से योद्धाओं में श्रेष्ठ परशुरामजी ने जितनी दूर बाण फेंका जा सकता है, समुद्र को उतनी ही दूर पीछे हटाकर ब्राह्मण की आज्ञा का पालन करते हुए उत्तम पर्वत गिरिश्रेष्ठ महेन्द्र पर निवास किया। महर्षि धौम्यने युधिष्ठिर से पूर्वदिशा के तीर्थोंका वर्णन करते हुए महेन्द्रपर्वत में परशुरामजी के निवास स्थान बताया है। महेन्द्रो नाम कौरव्य भार्गवस्य महात्मन:। अयजत्‌ तत्र कौन्तेय पूर्वमेव पितामह:।। — श्रीमहाभारतम् ३.८७.२२ भावार्थ: कुरुनन्दन! महात्मा भार्गवका निवासस्थान महेन्द्रपर्वत है। कुन्तीनन्दन! वहाँ ब्रह्माजी ने पूर्वकालमें यज्ञ किया था। जब काशी की राजकुमारी अंबा ने शाल्वके पास जाके उससे परित्यक्त होकर तापसों के आश्रम में अपनी समस्या का समाधान के लिए आइ तब वहाँ होत्रवाहनजी अंबा से यह बात कही। होत्रवाहन उवाच— रामं द्रक्ष्यसि भद्रे त्वं जामदग्न्यं महावने। उग्रे तपसि वर्तन्तं सत्यसंधं महाबलम्‌।। महेन्द्रं वै गिरिश्रेष्ठं रामो नित्यमुपास्ति ह। ऋषयो वेदविद्वांसो गन्धर्वाप्सरसस्तथा।। — श्रीमहाभारतम् ५.१७६.३०-३१ भावार्थ: होत्रवाहनजी बोले-भद्रे! जमदग्निनन्दन परशुराम एक महान्‌ वनमें उग्र तपस्या कर रहे है। वे महान्‌ शक्तिशाली और सत्यप्रतिज्ञ है। तुझे अवश्य ही उनका दर्शन प्राप्त होगा। परशुरामजी सदा पर्वतश्रेष्ठ महेन्द्र पर रहा करते है। वहाँ वेदवेत्ता महर्षि, गन्धर्व तथा अप्सराओंका भी निवास है। श्रीमहाभारतम् ५.१८६.११ के अनुसार परशुरामजी भीष्मजी से युद्ध करने के उपरांत विदा लेकर जैसे आये थे वैसे ही महेन्द्रपर्वत पर चले गये। ॰ इस विषय में श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण में भी उल्लेख है कि श्रीपरशुरामजी श्रीरामजी से पराजित होने के बाद महेन्द्रपर्वत पर तपस्या के लिए लौट गए: स हतान् दृश्य रामेण स्वाँल्लोकांस्तपसार्जितान्। जामदग्न्यो जगामाशु महेन्द्रं पर्वतोत्तमम्॥ — श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण, बालकांडम्, सर्ग-७६, श्लोक-२२ भावार्थ: जब जमदग्नि पुत्र श्रीपरशुरामजी ने देखा कि भगवान श्रीराम के बाण से वे पुण्यलोकों नष्ट हो गए जिन्हें उन्होंने अपनी तपस्या से उपार्जित किया था, तब वे शिघ्र ही उत्तम महेन्द्रपर्वत को चले गए है। • महेन्द्रपर्वत पर भगवान परशुरामजी के दर्शन किये हुए महानुभावों के विषय में— ॰ श्रीमहाभारतम् में उल्लेख है कि पाण्डवों ने अपने तीर्थयात्रा के समय कलिंगदेश (वर्तमान की ओडिशा) की यात्रा की थी। पवित्र वैतरणी नदी में स्नान करके पितृपुरुषों का तर्पण करने के पश्चात वे महेन्द्रपर्वत पर गए और वहाँ उन्होंने भगवान परशुराम के दर्शन प्राप्त किए। इस तीर्थयात्रा तथा भगवान परशुराम के साथ उनके दर्शन का विस्तृत वर्णन श्रीमहाभारतम् के वनपर्व के अध्याय ११४, ११५, ११६ और ११७ में किया गया है। इन अध्यायों से एक श्लोक इस प्रकार है: वैशम्पायन उवाच— ततश्चतुर्दशीं रामः समयेन महामनाः। दर्शयामास तान्‌ विप्रान्‌ धर्मराजं च सानुजम्‌।। — श्रीमहाभारतम् ३.११७.१६ भावार्थ: श्रीवैशम्पायनजी कहते है — जनमेजय! तदनन्तर चतुर्दशी तिथिको निश्चित समय पर महामना परशुरामजी ने उस पव॑तपर (महेन्द्रपर्वत) रहने वाले उन ब्राह्मणों तथा भाइयोंसहित युधिष्ठिरको दर्शन दिया। श्रीमहाभारतम् १.१२९.५३-५४ के अनुसार द्रोणाचार्यजी ने परशुरामजी से धनुर्वेद प्राप्त करने हेतु महेन्द्रपर्वत पर गए थे और वहाँ वे संपुर्ण धनुर्वेद तथा सारे अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया। श्रीमहाभारतम् १२.२.१४-१८ के अनुसार कर्ण ने भी महेन्द्रपर्वत पर जाकर परशुरामजी से धनुर्वेद की शिक्षा लिया है। ॰ श्रीमद्भागवतम् में उल्लेख है कि जब भगवान बलराम तीर्थयात्रा पर गए, तब उन्होंने भी स्वयं भगवान परशुराम के दर्शन किए थे: उपस्पृश्य महेन्द्राद्रौ, रामं दृष्ट्वाभिवाद्य च। — श्रीमद्भागवतम् १०.७९.१२ भावार्थ: महेन्द्रपर्वत पर श्रीबलरामजी ने भगवान परशुराम को देखकर उन्हें प्रणाम किया। • कुल पर्वतों में महेन्द्रपर्वत के उल्लेख के संदर्भ में—‌ ॰ श्रीमहाभारतम् में उल्लेख है कि: महेंद्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षवानपि। विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तैते कुलपर्वताः॥ —‌ श्रीमहाभारतम् ६.९.११ भावार्थ: महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान, ऋक्ष पर्वत, विंध्य और पारियात्र — ये सात के कुल (प्रमुख) पर्वत है। श्रीमहाभारतम् १४.४३.५ में महेन्द्रादि पर्वतों को पर्वतों के अधिपति बताया गया। ॰ यह समान विषय श्रीविष्णुमहापुराणम् २.३.३, श्रीब्रह्ममहापुराणम् के अध्याय-१९ के श्लोक-३ और अध्याय-२७ के श्लोक:१९-२०, श्रीब्रह्माण्डमहापुराणम् के भारतवर्ष के वर्णन प्रकरण के श्लोक:१८-१९ में भी वर्णित है। ॰ श्रीमद्भागवतम् ५.१९.१६ में भारतवर्ष के पर्वतों के वर्णन प्रकरण में महेन्द्रपर्वत का उल्लेख भी आया है। • अन्य प्रकरणों में भी महेन्द्रपर्वत का उल्लेख— ॰ अर्जुन ने जब पुर्वादिशा के तिर्थों में भ्रमण करते हुए कलिंग देश (वर्तमान की ओडिशा) होते हुए मणिपूर गए उस समय महेन्द्रपर्वत का दर्शन किये थे: स कलिंगानतिक्रम्य देशानायतनानि च। हर्म्याणि रमणीयानि प्रेक्षमाणो ययौ प्रभु:।। महेन्द्रपर्वतं दृष्ट्वा तापसैरुपशोभितम्‌। समुद्रतीरेण शनैर्मणिपूरं जगाम ह।। — श्रीमहाभारतम् १.२१४.१२-१३ भावार्थ: कलिंगदेश को लाँघकर शक्तिशाली अर्जुन अनेक देशों, मन्दिरों तथा रमणीय अट्टालिकाओं का दर्शन करते हुए आगे बढ़े। इस प्रकार वे तपस्वी मुनियोंसे सुशोभित महेन्द्रपर्वत का दर्शन कर समुद्र के किनारे-किनारे यात्रा करते हुए धीरे-धीरे मणिपूर पहुँच गये। ॰ श्रीमहाभारतम् २.१०.३०,३२ के अनुसार महेन्द्रादि पर्वत भगवान्‌ कुबेरकी उपासना करने का उल्लेख मिलता है। ॰ श्रीमहाभारतम् ३.१८८.११४ के अनुसार प्रलयकाल में महर्षि मार्कण्डेय जी ने भगवान् के उदर में प्रवेश कर ब्रह्माण्ड दर्शन करते समय महेन्द्रपर्वत का दर्शन करने का उल्लेख है। ॰ श्रीमहाभारतम् ५.११.११-१३ के अनुसार राजा नहुष इन्द्र पद पर अभिषिक्त होने के बाद काम-भोगमें आसक्त होकर महेन्द्रादि पर्वत पर अप्सराओं तथा देवकन्याओंके साथ भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करने का वर्णन मिलता है। ॰ भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह में महेन्द्रपर्वत का आगमन हुआ था: करवीरस्तथैवापि महाविभवसयुंत:। महेंद्र: पर्वतश्रेष्ठ आजगाम हिमालयम्।। — श्रीशिवमहापुराणम् २.३.३७.३१ भावार्थ: महान् ऐश्वर्यसे समन्वित होकर करवीर तथा पर्वतश्रेष्ठ महेन्द भी हिमालय के घर आये। निष्कर्ष: इन विभिन्न शास्त्रीय प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि महेन्द्रपर्वत भगवान परशुरामजी से विशेष रूप से संबद्ध एक प्राचीन एवं पवित्र पर्वत है। इन्हें भी देखें देओमाली पर्वत पूर्वी घाट गजपति ज़िला सन्दर्भ श्रेणी:ओड़िशा के पर्वत श्रेणी:गजपति ज़िला