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वाल्मीकि
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फरवरी 2017
महर्षि वाल्मीकि रामायण व योगविशिष्ट के रचयिता हिंदू धर्म आदिकवि, महर्षि, ब्रह्मर्षि, योगर्षि, आदिनाथ,मुनिनाथ, त्रिकालदर्शी, ज्ञानसागर, आदि अनंत, मोक्षवान, सृष्टिकर्ता, सर्वव्यापी, योगविशिष्ठ रचयिता भगवान वाल्मीकि आदि काव्य (रामायण) की रचना करते हुऐ रामायण, पावन योगविशिष्ट, अक्षर-लक्ष्य के रचनाकार वाल्मीकि प्रकट दिवस प्रचेता,( वरुण देव ) माता=चर्षणी]]
महर्षि वाल्मीकि संस्कृत रामायण के रचयिता हैं जो आदिकवि के रूप में प्रसिद्ध हैं।हजारीप्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली हजारीप्रसाद द्विवेदी http://books.google.be/books?id=oWEcVJJ5398C ९१ राजकमल प्रकाशन २००७ 9788126713639 उन्होंने वाल्मीकीय रामायण की रचना की। महर्षि वाल्मीकि वैदिक ऋषि थे, उन का रचित रामायण ग्रंथ एक महाकाव्य है जो कि अयोध्या के महाराज श्रीराम के जीवन में सत्य व कर्तव्य से, परिचित करवाता है।http://timesofindia.indiatimes.com/india/Maharishi-Valmeki-was-never-a-dacoit-Punjab-Haryana-HC/articleshow/5960417.cms संग्रहीत प्रति 23 नवंबर 2016 https://web.archive.org/web/20171117140733/https://timesofindia.indiatimes.com/india/Maharishi-Valmeki-was-never-a-dacoit-Punjab-Haryana-HC/articleshow/5960417.cms 17 नवंबर 2017 live आदिकवि शब्द 'आदि' और 'कवि' के मेल से बना है। 'आदि' का अर्थ 'प्रथम' और 'कवि' का अर्थ 'काव्य का रचयिता' होता है। माना जाता है कि महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत के प्रथम महाकाव्य के साथ संसार के पहले श्लोक भी कहे हैं जिस के पश्चात् ही रामायण की रचना हुई है। प्रथम संस्कृत महाकाव्य की रचना करने के कारण महर्षि वाल्मीकि आदिकवि हैं। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण नामक ऐतिहासिक ग्रंथ रच के बड़ा उपकार किया है।
रामायण में भगवान् वाल्मीकि ने २४००० श्लोकों में श्रीराम उपाख्यान ‘रामायण’ रचा। ऐसा वर्णन है कि - एक बार वाल्मीकि क्रौंच पक्षी के एक जोड़े को निहार रहे थे। वह जोड़ा प्रेमालाप में लीन था, तभी उन्होंने देखा कि बहेलिये ने प्रेम मग्न क्रौंच (सारस) पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया। इस पर मादा पक्षी विलाप करने लगी। उस के विलाप को देख के वाल्मीकि की करुणा जाग उठी और द्रवित अवस्था में उन के मुख से स्वतः ही यह श्लोक निकला।
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत् क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्।।
(अर्थ : हे दुष्ट, तुम ने प्रेम में मग्न क्रौंच पक्षी को मार दिया। जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी और तुझे भी वियोग झेलना पड़ेगा।)''
उसके बाद उन्होंने प्रसिद्ध महाकाव्य रामायण की रचना की और आदिकवि वाल्मीकि के नाम से अमर हो गये। अपने महाकाव्य "रामायण" में उन्होंने अनेक घटनाओं के समय सूर्य, चंद्र तथा अन्य नक्षत्र की स्थितियों का वर्णन किया है। इससे ज्ञात होता है कि महर्षि वाल्मीकि ज्योतिष विद्या एवं खगोल विद्या के प्रकाण्ड विद्वान् थे।
अपने वनवास काल के दौरान भगवान् श्रीराम महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में भी गये थे। भगवान् वाल्मीकि को श्रीराम के जीवन में घटित प्रत्येक घटना का पूर्ण ज्ञान था। सतयुग, त्रेता और द्वापर तीनों कालों में महर्षि वाल्मीकि का उल्लेख मिलता है इसलिए भगवान् वाल्मीकि को सृष्टिकर्ता भी कहते है, रामचरितमानस के अनुसार जब श्रीराम वाल्मीकि आश्रम आए थे तो महर्षि वाल्मीकि के चरणों में दण्डवत् प्रणाम करने के लिए वे भूमि पर डंडे की भांति लेट गए थे और उनके मुख से निकला "तुम त्रिकालदर्शी मुनिनाथा, विस्व बदर जिमि तुमरे हाथा।" अर्थात् आप तीनों लोकों को जानने वाले स्वयं प्रभु हैं। ये संसार आप के हाथ में एक बैर के समान प्रतीत होता है।आदिम जाति कल्याण विभाग
महाभारत काल में भी महर्षि वाल्मीकि का वर्णन मिलता है। जब पाण्डव कौरवों से युद्ध जीत जाते हैं तो द्रौपदी यज्ञ रखती है, जिस के सफल होने के लिये शंख का बजना जरूरी था परन्तु कृष्ण सहित सभी द्वारा प्रयास करने पर भी यज्ञ सफल नहीं होता तो कृष्ण के कहने पर सभी वाल्मीकि से प्रार्थना करते हैं। जब वाल्मीकि वहाँ प्रकट होते हैं तो शंख खुद बज उठता है और द्रौपदी का यज्ञ सम्पूर्ण हो जाता है। इस घटना को कबीर ने भी स्पष्ट किया है "सुपच रूप धार सतगुरु आए। पाण्डवों के यज्ञ में शंख बजाए।"
इन्हें भी देखें
रामायण
वाल्मीकि समाज
वल्मीक
सन्दर्भ
Valmiki वाल्मीकि
श्रेणी:रामायण
श्रेणी:संस्कृत विद्वान
श्रेणी:संस्कृत कवि