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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

निर्जरा

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निर्जरा जैन दर्शन के अनुसार एक तत्त्व हैं।आचार्य नेमिचन्द्र २०१३ १३५ इसका अर्थ होता है आत्मा के साथ जुड़े कर्मों का क्षय करना। यह जन्म मरण के चक्र से मुक्त होने के लिए आवश्यक हैं। आचार्य उमास्वामी द्वारा विरचित जैन ग्रन्थ तत्त्वार्थ सूत्र का ९ अध्याय इस विषय पर हैं। निर्जरा संवर के पश्चात् होती हैं। जैन ग्रन्थ द्रव्यसंग्रह के अनुसार कर्म आत्मा को धूमिल करते देते हैं, निर्जरा से आत्मा फिर निर्मलता को प्राप्त होती हैं।Nemichandra, p. 94</div> भेद निर्जरा के दो भेद हैं:आचार्य नेमिचन्द्र २०१३ १२९ भाव निर्जरा द्रव्य निर्जरा माध्यम जैन ग्रंथों के अनुसार तप से निर्जरा होती हैं।जैन २०११ १२६ तत्त्वार्थसूत्र के अनुसार निर्जरा के लिए बाईस परिषह सहने योग्य हैं।जैन २०११ १२९ बाह्य तप सम्यक् अनशन सम्यक् अल्पआहार सम्यक् रसपरित्याग सम्यक् काय कलेश इन्हें भी देखें तत्त्व (जैन धर्म) सन्दर्भ ग्रन्थ https://books.google.co.in/books?id=g9CJ3jZpcqYC द्रव्यसंग्रह आचार्य नेमिचन्द्र Vikalp Printers २०१३ 81-903639-5-6 18 जनवरी 2016 https://web.archive.org/web/20160304094006/https://books.google.co.in/books?id=g9CJ3jZpcqYC 4 मार्च 2016 live शास्त्री प. कैलाशचन्द्र जैन धर्म २००७ आचार्य शंतिसागर 'छाणी' स्मृति ग्रन्थमाला 81-902683-8-4 जैन विजय कुमार आचार्य उमास्वामी तत्त्वार्थसूत्र https://books.google.co.in/books?id=zLmx9bvtglkC २०११ Vikalp Printers 978-81-903639-2-1 18 जनवरी 2016 https://web.archive.org/web/20151222164052/https://books.google.co.in/books?id=zLmx9bvtglkC 22 दिसंबर 2015 live श्रेणी:जैन दर्शन