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कुरुक्षेत्र युद्ध
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महाभारत का युद्ध 300px|center300px|center महाभारत महाकाव्य की हस्तलिखित पाण्डुलिपि, चित्र सहित 1050 BC कुरुक्षेत्र, वर्तमान हरियाणा राज्य कौरवों की पराजय, पाण्डवों को सत्ता प्राप्त पाण्डवों के सेनापति धृष्टद्युम्न कौरवों के सेनापति भीष्म धृष्टद्युम्न भीष्म,द्रोण,कर्ण,शल्य,अश्वत्थामा 7 अक्षौहिणी १५,३०,९०० सैनिक 11 अक्षौहिणी २४,०५,७०० सैनिक सभी योद्धाओ में से केवल 8 ज्ञात वीर ही बचे-पाँचों पाण्डव, कृष्ण, सात्यकि, युयुत्सु सभी योद्धाओ में से केवल ३ ज्ञात वीर ही शेष-अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कृतवर्मा
कुरुक्षेत्र युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य कुरु साम्राज्य के सिंहासन की प्राप्ति के लिए लड़ा गया था। महाभारत के अनुसार इस युद्ध में भारतवर्ष के प्रायः सभी जनपदों ने भाग लिया था। महाभारत व अन्य वैदिक साहित्यों के अनुसार यह प्राचीन भारत में वैदिक काल के इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध था। महाभारत-गीताप्रेस गोरखपुर,सौप्तिकपर्व इस युद्ध में लाखों क्षत्रिय योद्धा मारे गये जिसके परिणामस्वरूप वैदिक संस्कृति तथा सभ्यता का पतन हो गया था। इस युद्ध में सम्पूर्ण भारतवर्ष के राजाओं के अतिरिक्त बहुत से अन्य देशों के यादव अन्य देशों में कौनसे यादव थे? वीरों ने भी भाग लिया और सब के सब वीर गति को प्राप्त हो गये। महाभारत-गीताप्रेस गोरखपुर,भीष्मपर्व इस युद्ध के परिणामस्वरुप भारत में ज्ञान और विज्ञान दोनों के साथ-साथ वीर क्षत्रियों का अभाव हो गया। एक तरह से वैदिक संस्कृति और सभ्यता जो विकास के चरम पर थी उसका एकाएक विनाश हो गया। प्राचीन भारत की स्वर्णिम वैदिक सभ्यता इस युद्ध की समाप्ति के साथ ही समाप्त हो गयी। इस महान युद्ध का उस समय के महान ऋषि और दार्शनिक भगवान वेदव्यास ने अपने महाकाव्य महाभारत में वर्णन किया, जिसे सहस्राब्दियों तक सम्पूर्ण भारतवर्ष में गाकर एवं सुनकर याद रखा गया। महाभारत-गीताप्रेस गोरखपुर,आदिपर्व, प्रथम अध्याय
युद्ध की ऐतिहासिकता विद्वानों की चर्चा का विषय बनी हुई है।https://books.google.com/books?id=KkpdLnZpm78C Delhi: Ancient History Singh Upinder Berghahn Books 2006 9788187358299 85Singh 2009 19Case Studies in Archaeology and World Religion: The Proceedings of the Cambridge Conference Timothy Insoll 166 Archaeopress ऋग्वेद में उल्लिखित दस राजाओं की लड़ाई ने कुरुक्षेत्र युद्ध की कहानी का मूल आधार बनाया हो सकता है। महाभारत के वृत्तांत में युद्ध का बहुत विस्तार और संशोधन किया गया था, जो इसे संदिग्ध बनाता है।Murthy S. S. N. The Questionable Historicity of the Mahabharata Electronic Journal of Vedic Studies 10 5 8 September 2016 1084-7561 10.11588/ejvs.2003.5.782 1–15 https://crossasia-journals.ub.uni-heidelberg.de/index.php/ejvs/article/view/782 26 January 2019 26 जनवरी 2019 https://web.archive.org/web/20190126164815/https://crossasia-journals.ub.uni-heidelberg.de/index.php/ejvs/article/view/782 dead कुरुक्षेत्र युद्ध को एक ऐतिहासिक तिथि प्रदान करने का प्रयास किया गया है, जिसमें अनुसंधान का सुझाव दिया गया है। 1000 ई.पू.Singh 2009 19 हालांकि, लोकप्रिय परंपरा का दावा है कि युद्ध कलियुग में संक्रमण को चिह्नित करता है, जो इसे 3102 ईसा पूर्व से डेटिंग करता है। The Mahabharata: Volume 1, Volume 1 Penguin UK 2015 9788184753882
महाभारत में मुख्यतः चंद्रवंशियों के दो परिवार कौरव और पाण्डव के बीच हुए युद्ध का वृत्तांत है। १०० कौरवों और पाँच पाण्डवों के बीच कुरु साम्राज्य की भूमि के लिए जो संघर्ष चला उससे अंतत: महाभारत युद्ध का सृजन हुआ। उक्त युद्ध को हरियाणा में स्थित कुरुक्षेत्र के आसपास हुआ माना जाता है। इस युद्ध में पाण्डव विजयी हुए थे। महाभारत में इस युद्ध को धर्मयुद्ध कहा गया है, क्योंकि यह सत्य और न्याय के लिए लड़ा जाने वाला युद्ध था। महाभारत काल से जुड़े कई अवशेष दिल्ली में पुराना किला में मिले हैं। पुराना किला को पाण्डवों का किला भी कहा जाता है।http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V11_242.gif दिल्ली सिटी द इमपेरिकल गजेटटियर ऑफ इण्डिया,१९०९, भाग ११, पेज २३६ 11 मई 2010 https://web.archive.org/web/20160303190534/http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V11_242.gif 3 मार्च 2016 dead कुरुक्षेत्र में भी भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा महाभारत काल के बाण और भाले प्राप्त हुए हैं।http://www.archaeologyonline.net/artifacts/scientific-verif-vedas.html आरकेलोजी ऑनलाइन, साइन्टिफिक वेरिफिकेशन ऑफ वैदिक नोलेज, कुरुक्षेत्र 11 मई 2010 https://web.archive.org/web/20100326015150/http://www.archaeologyonline.net/artifacts/scientific-verif-vedas.html 26 मार्च 2010 dead गुजरात के पश्चिमी तट पर समुद्र में डूबे ७०००-३५०० वर्ष पुराने शहर खोजे गये हैंhttp://www.ias.ac.in/currsci/jul10/articles29.htm आई एस डॉट कॉम, आरटिकल २९ 11 मई 2010 https://web.archive.org/web/20100215014029/http://www.ias.ac.in/currsci/jul10/articles29.htm 15 फ़रवरी 2010 live , जिनको महाभारत में वर्णित द्वारका के सन्दर्भों से जोड़ा गयाhttp://www.archaeologyonline.net/artifacts/scientific-verif-vedas.html आरकेलोजी ऑनलाइन, साइन्टिफिक वेरिफिकेशन ऑफ वैदिक नोलेज, ऐविडेन्स फार ऐन्शियन्ट पोर्ट सिटी ऑफ द्वारका 11 मई 2010 https://web.archive.org/web/20100326015150/http://www.archaeologyonline.net/artifacts/scientific-verif-vedas.html 26 मार्च 2010 dead , इसके अलावा बरनावा में भी लाक्षागृह के अवशेष मिले हैंhttp://bagpat.nic.in/lakshagrah.htm लाक्षागृह 11 मई 2010 https://web.archive.org/web/20090410012022/http://bagpat.nic.in/lakshagrah.htm 10 अप्रैल 2009 live , ये सभी प्रमाण महाभारत की वास्तविकता को सिद्ध करते हैं।
पृष्ठभूमि
thumb|right|250px|कुरुराज्य सभा में द्रौपदी का अपमान
महाभारत युद्ध होने का मुख्य कारण कौरवों की उच्च महत्वाकांक्षाएँ और धृतराष्ट्र का पुत्र मोह था। कौरव और पाण्डव आपस में चचेरे भाई थे। वेदव्यास जी से नियोग के द्वारा विचित्रवीर्य की भार्या अम्बिका के गर्भ से धृतराष्ट्र और अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु उत्पन्न हुए। धृतराष्ट्र ने गान्धारी के गर्भ से सौ पुत्रों को जन्म दिया, उनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था। पाण्डु के युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव आदि पाँच पुत्र हुए| धृतराष्ट्र जन्म से ही नेत्रहीन थे अतः उनकी जगह पर पाण्डु को राज दिया गया जिससे धृतराष्ट्र को सदा पाण्डु और उसके पुत्रों से द्वेष रहने लगा। यह द्वेष दुर्योधन के रूप मे फलीभूत हुआ और शकुनि ने इस आग में घी का काम किया। शकुनि के कहने पर दुर्योधन ने बचपन से लेकर लाक्षागृह तक कई षडयंत्र किये। परन्तु हर बार वो विफल रहा। युवावस्था में आने पर जब युधिष्ठिर को युवराज बना दिया गया तो उसने उन्हें लाक्षागृह भिजवाकर मारने की कोशिश की परन्तु पाण्डव बच निकले। पाण्डवों की अनुपस्थिति में धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को युवराज बना दिया परन्तु जब पाण्डवों ने वापिस आकर अपना राज्य वापिस मांगा तो उन्हें राज्य के नाम पर खण्डहर रुपी खाण्डव वन दिया गया। धृतराष्ट्र के अनुरोध पर गृहयुद्ध के संकट से बचने के लिए युधिष्ठिर ने यह प्रस्ताव भी स्वीकार कर लिया। पाण्डवों ने श्रीकृष्ण की सहायता से इन्द्र की अमारावती पुरी जितनी भव्य नगरी इन्द्रप्रस्थ का निर्माण किया। पाण्डवों ने विश्वविजय करके प्रचुर मात्रा में रत्न एवं धन एकत्रित किया और राजसूय यज्ञ किया। दुर्योधन पाण्डवों की उन्नति देख नहीं पाया और शकुनि के सहयोग से द्यूत में छ्ल से युधिष्ठिर से उसका सारा राज्य जीत लिया और कुरु राज्य सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र करने का प्रयास कर उसे अपमानित किया। सम्भवतः इसी दिन महाभारत के युद्ध के बीज पड़ गये थे। अन्ततः पुनः द्यूत में हारकर पाण्डवों को १२ वर्षो को ज्ञातवास और १ वर्ष का अज्ञातवास स्वीकार करना पड़ा। परन्तु जब यह शर्त पूरी करने पर भी कौरवों ने पाण्डवों को उनका राज्य देने से मना कर दिया। तो पाण्डवों को युद्ध करने के लिये बाधित होना पड़ा, परन्तु श्रीकृष्ण ने युद्ध रोकने का हर सम्भव प्रयास करने का सुझाव दिया।
thumb|left|225px|महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण और अर्जुन
तब श्रीकृष्ण पाण्डवों की तरफ से कुरुराज्य सभा में शांतिदूत बनकर गये और वहाँ श्रीकृष्ण ने दुर्योधन से पाण्डवों को केवल पाँच गाँव देकर युद्ध टालने का प्रस्ताव रखा। परन्तु जब दुर्योधन ने पाण्डवों को सुई की नोंक जितनी भी भूमि देने से मना कर दिया तो अन्ततः युधिष्ठिर को युद्ध करने के लिये बाधित होना पड़ा। इस प्रकार कौरवों ने ११ अक्षौहिणी तथा पाण्डवों ने ७ अक्षौहिणी सेना एकत्रित कर ली। युद्ध की तैयारियाँ पूर्ण करने के बाद कौरव और पाण्डव दोनों दल कुरुक्षेत्र पहुँचे, जहाँ यह भयंकर युद्ध लड़ा गया महाभारत-गीताप्रेस गोरखपुर
कुरुक्षेत्र के उस भयानक और घमासान संहारक युद्ध का अनुमान महाभारत के भीष्म पर्व में दिये एक श्लोक महाभारत गीताप्रेस गोरखपुर, भीष्म पर्व-४६.१ से लगाया जा सकता है कि
“ न पुत्रः पितरं जज्ञे पिता वा पुत्रमौरसम्।
भ्राता भ्रातरं तत्र स्वस्रीयं न च मातुलः॥ „
“ अर्थात् : उस युद्ध में न पुत्र पिता को, न पिता पुत्र को, न भाई भाई को, न मामा भांजे को, न मित्र मित्र को पहचानता था''' „
ऐतिहासिकता
right|thumb|350px|महाभारतकालीन भारतवर्ष का मानचित्र
महाभारत युद्ध को आमतौर पर वैदिक युग में लगभग 950 ईसा पूर्व के समय का माना जाता है।https://www.telegraphindia.com/1150201/jsp/bihar/story_10960.jsp Experts dig up 950BC as epic war date 16 सितंबर 2017 https://web.archive.org/web/20170916140121/https://www.telegraphindia.com/1150201/jsp/bihar/story_10960.jsp 16 सितंबर 2017 live अधिकतर पश्चिमी विद्वान् इसे १००० ईसा पूर्व से १५०० ईसा पूर्व मानते है विद्वानों ने इसकी तिथि निर्धारित करने के लिये इसमें वर्णित सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहणों के बारे में अध्ययन किया है और इसे ३१ वीं सदी ईसा पूर्व का मानते हैं, लेकिन मतभेद अभी भी जारी है। इसकी कई भारतीय और पश्चिमी विद्वानों द्वारा भिन्न-भिन्न तिथियाँ निर्धारित की गयी हैं-
विश्व विख्यात भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ वराहमिहिर के अनुसार महाभारत युद्ध २४४९ ईसा पूर्व हुआ था। ए.डी. पुशलकर, पृष्ठ.272
विश्व विख्यात भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ आर्यभट के अनुसार महाभारत युद्ध १८ फ़रवरी ३१०२ ईसा पूर्व में हुआ था। एज ऑफ भारत वार , जी सी अग्रवाल और के एल वर्मा, पृष्ठ-81
चालुक्य राजवंश के सबसे महान सम्राट् पुलकेसि २ के ५वी शताब्दी के ऐहोल अभिलेख में यह बताया गया है कि भारत युद्ध को हुए ३,७३५ वर्ष बीत गए हैं, इस दृष्टि से महाभारत का युद्ध ३१०० ईसा पूर्व लड़ा गया होगा। गुप्ता और रामचन्द्रन (1976), p.55; ए.डी. पुशलकर, HCIP, भाग I, पृष्ठ.272
पुराणों की मानें तो यह युद्ध १९०० ईसा पूर्व हुआ था, पुराणों में दी गई विभिन्न राज वंशावलियों को यदि चन्द्रगुप्त मौर्य से मिला कर देखा जाये तो १९०० ईसा पूर्व की तिथि निकलती है, परन्तु कुछ विद्वानों के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य १५०० ईसा पूर्व में हुआ था, यदि यह माना जाये तो ३१०० ईसा पूर्व की तिथि निकलती है क्योंकि यूनान के राजदूत मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक "इंडिका" में जिस चन्द्रगुप्त का उल्लेख किया है वो गुप्त वंश का राजा चन्द्रगुप्त भी हो सकता है। ए.डी. पुशलकर, हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ इण्डियन पीपुल, भाग I, अध्याय XIV, पृष्ठ.273
अधिकतर पश्चिमी यूरोपीय विद्वानों जैसे मायकल विटजल के अनुसार भारत युद्ध १२०० ईसा पूर्व में हुआ था, जो इसे भारत में लौह युग (१२००-८०० ईसा पूर्व) से जोड़कर देखते हैं। एम विटजल, अरली सन्स्क्रिटाइजेशन: आरिजन एण्ड डेवलेपमेन्ट ऑफ कुरु स्टेट, इ जे वी एस भाग.1 न.4 (1995
कुछ पश्चिमी यूरोपीय विद्वानों जैसे पी वी होले महाभारत में वर्णित ग्रह-नक्षत्रों की आकाशीय स्थितियों का अध्ययन करने के बाद इसे १३ नवंबर ३१४३ ईसा पूर्व में आरम्भ हुआ मानते हैं। http://www.ignca.nic.in/nl002503.htm डेटिंग ऑफ महाभारत वार 13 अप्रैल 2010 12 मार्च 2010 https://web.archive.org/web/20100312001754/http://ignca.nic.in/nl002503.htm dead
अधिकतर भारतीय विद्वान् जैसे बी ऐन अचर, एन एस राजाराम, के. सदानन्द, सुभाष काक ग्रह-नक्षत्रों की आकाशीय गणनाओं के आधार पर इसे ३०६७ ईसा पूर्व में आरम्भ हुआ मानते हैं। http://www.dharmakshetra.com/articles/dating%20of%20the%20Mahabharat.htm धर्मक्षेत्र.कॉम/महाभारत 13 अप्रैल 2010 20 अप्रैल 2010 https://web.archive.org/web/20100420033710/http://www.dharmakshetra.com/articles/dating%20of%20the%20Mahabharat.htm dead
भारतीय विद्वान् पी वी वारटक महाभारत में वर्णित ग्रह-नक्षत्रों की आकाशीय गणनाओं के आधार पर इसे १६ अक्तूबर ५५६१ ईसा पूर्व में आरम्भ हुआ मानते हैं। http://www.hindunet.org/hindu_history/ancient/mahabharat/mahab_vartak.html हिन्दुनेट-भारत इतिहास 13 अप्रैल 2010 16 अप्रैल 2009 https://web.archive.org/web/20090416100137/http://hindunet.org/hindu_history/ancient/mahabharat/mahab_vartak.html dead
कुछ विद्वानों जैसे पी वी वारटक के अनुसार यूनान के राजदूत मेगस्थनीजअपनी पुस्तक "इंडिका" में अपनी भारत यात्रा के समय जमुना (यमुना) के तट पर बसे मेथोरा (मथुरा) राज्य में शूरसेनियों से मिलने का वर्णन करते है, मेगस्थनीज यह बताते है कि ये शूरसेनी किसी हेराकल्स नामक देवता की पुजा करते थे और ये हेराकल्स काफी चमत्कारी पुरुष होता था तथा चन्द्रगुप्त से १३८ पीढ़ियों पहले था। हेराकल्स ने कई विवाह किए और कई पुत्र उत्पन्न किए। परन्तु उसके सभी पुत्र आपस में युद्ध करके मारे गये। यहाँ यह साफ है कि ये हेराकल्स श्रीकृष्ण ही थे, विद्वान् इसे हरिकृष्ण कह कर श्रीकृष्ण से जोडते है क्योंकि श्रीकृष्ण चन्द्रगुप्त से १३८ पीढ़ियों पहले थे तो अगर एक पीढ़ी को २०-३० वर्ष दें तो ३१००-५६०० ईसा पूर्व श्रीकृष्ण का जन्म समय निकलता है अत इस हिसाब से ५६००-३१०० ईसा पूर्व के समय महाभारत का युद्ध हुआ होगा।
मोहनजोदड़ो में १९२७ में मैके द्वारा किये गये पुरातात्विक उत्खनन में मिली एक पत्थर की टेबलेट में एक छोटे बालक को दो पेड़ों को खींचता दिखाया गया है और उन पेड़ों से दो पुरुषों को निकलकर उस बालक को प्रणाम करते हुए भी दिखाया गया है, यह दृश्य भगवान श्रीकृष्ण की बचपन की यमलार्जुन-लीला से समानता दिखाता है, अत कई विद्वान् यह मानते है कि मोहनजोदड़ो सभ्यता के लोग महाभारत की कथाओं से परिचित थे। इस कारण भी इस युद्ध को ३००० ईसा पूर्व माना गया है। http://books.google.com/books?id=WgnfbxkFsFoC&pg=PA81&dq=mackay+report+part+A+tablet+found&as_brr=3&cd=3#v=onepage&q=mackay%20report%20part%20A%20tablet%20found&f=false एज ऑफ महाभारत वार 13 मई 2010 https://web.archive.org/web/20131114020109/http://books.google.com/books?id=WgnfbxkFsFoC&pg=PA81&dq=mackay+report+part+A+tablet+found&as_brr=3&cd=3#v=onepage&q=mackay%20report%20part%20A%20tablet%20found&f=false 14 नवंबर 2013 live
श्रीकृष्ण द्वारा शांति का अंतिम प्रयासमहाभारत,उद्योगपर्व गीताप्रेस गोरखपुर
thumb|left|225px|कौरव सभा में श्रीकृष्ण
१२ वर्षों के ज्ञातवास और १ वर्ष के अज्ञातवास की शर्त पूरी करने पर भी जब कौरवों ने पाण्डवों को उनका राज्य देने से मना कर दिया तो पाण्डवों को युद्ध करने के लिये बाधित होना पड़ा। परन्तु श्रीकृष्ण ने कहा कि यह युद्ध सम्पूर्ण विश्व सभ्यता के विनाश का कारण बन सकता है अतः उन्होने युद्ध रोकने का हर सम्भव प्रयास करने का सुझाव दिया। श्रीकृष्ण ने कहा कि दुर्योधन को एक अन्तिम अवसर अवश्य देना चाहिए, इसलिये श्रीकृष्ण पाण्डवों की तरफ से कुरुराज्य सभा में शांतिदूत बनकर गये और दुर्योधन से पाण्डवों के सामने केवल पाँच गाँव देकर युद्ध टालने का प्रस्ताव रखा। जब दुर्योधन ने पाण्डवों को सुई की नोंक जितनी भी भूमि देने से मना कर दिया तो श्रीकृष्ण ने उसे समझाया कि दुर्योधन के इस हठ के कारण उसके वंश और साथियों के साथ-साथ कई निर्दोष लोगों को युद्ध की बलि चढ़ना पड़ेगा। इस बात क्रोधित होकर दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को बन्दी बनाने की कोशिश की परन्तु श्रीकृष्ण माया का प्रयोग करके सबको अपने विराट रूप से भयभीत कर वहाँ से चले गये। इसके बाद तो युधिष्ठिर को युद्ध करने के लिये विवश होना ही पड़ा। उसी समय भगवान वेदव्यास ने धृतराष्ट्र के पास जाकर कहा कि तुम्हारे पुत्रों ने समस्त गुरुजनों की बातों की अवहेलना करके अन्ततः महाविनाशकारी युद्ध को खड़ा ही कर दिया। धृतराष्ट्र के युद्ध की संसूचना जानने की विनती करने पर वेदव्यास जी ने उन्हे कहा कि यदि तुम इस महायुद्ध को देखना चाहते हो तो मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि प्रदान कर सकता हूँ। इस पर धृतराष्ट्र ने कहा कि इसमें मेरे ही कुल का विनाश होना है, इसलिये मैं इस युद्ध अपनी आँखों से नहीं देखूँगा। अतः आप कृपा करके ऐसी व्यवस्था कर दें कि मुझे इस युद्ध का समाचार मिलता रहे। यह सुनकर वेदव्यास जी ने संजय को बुलाकर उसे दिव्य दृष्टि दे दी और कहा, “हे धृतराष्ट्र! मैंने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान कर दिया है। सम्पूर्ण युद्ध क्षेत्र में कोई भी बात ऐसी न रहेगी जो इससे छुपी रहे। यह तुम्हें इस महायुद्ध का सारा वृत्तान्त सुनायेगा।” इतना कहकर वेदव्यास जी चले गये।
युद्ध की तैयारियाँ और कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थानगीता प्रेस गोरखपुर, महाभारत
thumb|right|275px|महाभारत युद्ध मे भाग लेने वाले विभिन्न जनपदों की स्थिति
जब यह निश्चित हो गया कि युद्ध तो होगा ही, तो दोनों पक्षों ने युद्ध के लिए तैयारियाँ शुरू कर दीं। दुर्योधन पिछ्ले १३ वर्षों से ही युद्ध की तैयारी कर रहा था, उसने बलराम जी से गदा युद्ध की शिक्षा प्राप्त की तथा कठिन परिश्रम और अभ्यास से गदा युद्ध करने में भीम से भी अच्छा हो गया। शकुनि ने इन वर्षों मे की विश्व के अधिकतर जनपदों को अपनी तरफ कर लिया। दुर्योधन कर्ण को अपनी सेना का सेनापति बनाना चाहता था परन्तु शकुनि के समझाने पर दुर्योधन ने पितामह भीष्म को अपनी सेना का सेनापति बनाया, जिसके कारण भारत और विश्व के कई जनपद दुर्योधन के पक्ष मे हो गये। पाण्डवों की तरफ केवल वही जनपद थे जो धर्म और श्रीकृष्ण के पक्ष मे थे। महाभारत के अनुसार महाभारत काल में कुरुराज्य विश्व का सबसे बड़ा और शक्तिशाली जनपद था। विश्व के सभी जनपद कुरुराज्य से कभी युद्ध करने की भूल नहीं करते थे एवं सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखते थे। अत: सभी जनपद कुरुओं द्वारा लाभान्वित होने के लोभ से युद्ध में उनकी सहायता करने के लिये तैयार हो गये। पाण्डवों और कौरवों द्वारा यादवों से सहायता मांगने पर श्रीकृष्ण ने पहले तो युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की और फिर कहा कि "एक तरफ मैं अकेला और दूसरी तरफ मेरी एक अक्षौहिणी नारायणी सेना", अब अर्जुन व दुर्योधन को इनमें से एक का चुनाव करना था। अर्जुन ने तो श्रीकृष्ण को ही चुना, तब श्रीकृष्ण ने अपनी एक अक्षौहिणी सेना दुर्योधन को दे दी और खुद अर्जुन का सारथि बनना स्वीकार किया। इस प्रकार कौरवों ने ११ अक्षौहिणी तथा पाण्डवों ने ७ अक्षौहिणी सेना एकत्रित कर ली। फिर श्रीकृष्ण ने कर्ण से मिलकर उसे यह समझाया कि वह पाण्डवों का ही भाई है अतः वह पाण्डवों की तरफ से युद्ध करे, परन्तु कर्ण ने दुर्योधन के ऋण और मित्रता के कारण कौरवों का साथ नहीं छोड़ा। इसके बाद कुन्ती के विनती करने पर कर्ण ने अर्जुन को छोड़कर उसके शेष चार पुत्रों को अवसर प्राप्त होने पर भी न मारने का वचन दिया। इधर इन्द्र ने भी ब्राह्मण का वेष बनाकर कर्ण से उसके कवच और कुण्डल ले लिये। जिससे कर्ण की शक्ति कम हो गयी और पाण्डवों का उत्साह बढ़ गया क्योंकि उस अभेद्य कवच के कारण कर्ण को किसी भी दिव्यास्त्र से मारा नहीं जा सकता था।
सेना विभाग एवं संरचनाएँ, हथियार और युद्ध सामग्री
दोनों पक्षों की सेनाएँ महाभारत,भीष्मपर्व, अध्याय १-४० में दिये गये जनपदों का वर्णन तथा इन जनपदों के कौरव एवं पाण्डव पक्ष से लडने के आधार पर बनायी गयी सूची
सेना विभाग
पाण्डवों और कौरवों ने अपनी सेना के क्रमशः ७ और ११ विभाग अक्षौहिणी में किये। एक अक्षौहिणी में २१, ८७० रथ, २१, ८७० हाथी, ६५, ६१० सवार और १,०९,३५० पैदल सैनिक होते हैं।वी के एस ब्लागl कृष्ण की मृत्यु और कलियुग की प्रारम्भ। मेरी कलम से- कृष्णा वीरेन्द्र न्यासभारतीय साहित्य संग्रहजनवरी 2021 InternetArchiveBot यह प्राचीन भारत में सेना का माप हुआ करता था। हर रथ में चार घोड़े और उनका सारथि होता है हर हाथी पर उसका हाथीवान बैठता है और उसके पीछे उसका सहायक जो कुर्सी के पीछे से हाथी को अंकुश लगाता है, कुर्सी में उसका मालिक धनुष-बाण से सज्जित होता है और उसके साथ उसके दो साथी होते हैं जो भाले फेंकते हैं तदनुसार जो लोग रथों और हाथियों पर सवार होते हैं उनकी संख्या २, ८४, ३२३ होती हैं एक अक्षौहिणी सेना में समस्त जीवधारियों- हाथियों, घोड़ों और मनुष्यों-की कुल संख्या ६, ३४, २४३ होती हैं, अतः १८ अक्षौहिणी सेना में समस्त जीवधारियों- हाथियों, घोड़ों और मनुष्यों-की कुल संख्या १, १४, १६, ३७४ होगी। अठारह अक्षौहिणियों के लिए यही संख्या ११, ४१६ ,३७४ हो जाती है अर्थात ३, ९३, ६६० हाथी, २७, ५५, ६२० घोड़े, ८२, ६७, ०९४ मनुष्य।http://dharmkibaat.blogspot.com/2010/02/blog-post_09.html महाभारत की सेना 11 मई 2010 5 मार्च 2016 https://web.archive.org/web/20160305113244/http://dharmkibaat.blogspot.com/2010/02/blog-post_09.html dead
महाभारत युद्ध में भाग लेने वाली कुल सेना निम्नलिखित है
कुल पैदल सैनिक-१९, ६८, ३००
कुल रथ सेना-३, ९३, ६६०
कुल हाथी सेना-३, ९३, ६६०
कुल घुड़सवार सेना-११, ८०, ९८०
कुल न्यूनतम सेना-३९,०६,६००
कुल अधिकतम सेना-१, १४, १६, ३७४
यह सेना उस समय के अनुसार देखने में बहुत बड़ी लगती है परन्तु जब ३२३ ईसा पूर्व यूनानी राजदूत मेगस्थनीज भारत आया था तो उसने चन्द्रगुप्त जो कि उस समय भारत का सम्राट् था, के पास ३०,००० रथों, ९००० हाथियों तथा ६,००,००० पैदल सैनिकों से युक्त सेना देखी। अतः चन्द्रगुप्त की कुल सेना उस समय ६, ३९, ००० के आस पास थी http://www.indianetzone.com/25/military_administration_chandragupta_maurya.htm चन्द्रगुप्त मौर्य की सेना 11 मई 2010 21 मई 2010 https://web.archive.org/web/20100521020959/http://www.indianetzone.com/25/military_administration_chandragupta_maurya.htm dead http://books.google.com/books?id=oAo1X2eagywC&pg=PA33&dq=army+of+chandragupta+maurya&as_brr=3&cd=2#v=onepage&q=army%20of%20chandragupta%20maurya&f=false द पर्सनल जनरल स्टडी मैनुएल, हिस्ट्री ऑफ इण्डिया 11 मई 2010 https://web.archive.org/web/20140917141005/http://books.google.com/books?id=oAo1X2eagywC#v=onepage&q=army%20of%20chandragupta%20maurya&f=false 17 सितंबर 2014 live , जिसके कारण सिकंदर ने भारत पर आक्रमण करने का विचार छोड़ दिया था और पुनः अपने देश लौट गया था। यह सेना प्रामाणिक तौर पर प्राचीन विश्व इतिहास की सबसे विशाल सेना मानी जाती है। यह तो सिर्फ एक राज्य मगध की सेना थी, अगर समस्त भारतीय राज्यों की सेनाएँ देखें तो संख्या में एक बहुत विशाल सेना बन जायेगी। अतः महाभारत काल में जब भारत बहुत समृद्ध देश था, इतनी विशाल सेना का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं, जिसमें की सम्पूर्ण भारत देश के साथ साथ अनेक अन्य विदेशी जनपदों ने भी भाग लिया था।
हथियार और युद्ध सामग्री
महाभारत के युद्ध मे कई तरीके के हथियार प्रयोग मे लाये गये। प्रास, ऋष्टि, तोमर, लोहमय कणप, चक्र, मुद्गर, नाराच, फरसे, गोफन, भुशुण्डी, शतघ्नी, धनुष-बाण, गदा, भाला, तलवार, परिघ, भिन्दिपाल, शक्ति, मुसल, कम्पन, चाप, दिव्यास्त्र, एक साथ कई बाण छोड़ने वाली यांत्रिक मशीनें।महाभारत-भीष्मपर्व, श्लोक-११९.२-३ गीता प्रेस गोरखपुर
सैन्य संरचनाएँ
प्राचीन समय में युद्ध के के समय में सेनापति को सेना के कई व्यूह बनाने पड़ते थे जिससे की शत्रु की सेना में आसानी से प्रवेश पाया जा सके तथा राजा और मुख्य सेनापतियों को बन्दी बनाया या मार गिराया जा सके। इसमें अपनी सम्पूर्ण सेना को व्यूह के नाम या गुण वाली एक विशेष आकृति मे व्यवस्थित किया जाता है। इस प्रकार की व्यूह रचना से छोटी से छोटी सी सेना भी विशालकाय लगने लगती है और बड़ी से बड़ी सेना का सामना कर सकती है जैसा की महाभारत के युद्ध में पाण्डवों की केवल ७ अक्षौहिणी सेना ने कौरवो की ११ अक्षौहिणी सेना का सामना करके यह सिद्ध कर दिखाया। महाभारत के १८ दिन के युद्ध में दोनों पक्ष के सेनापतियों द्वारा कई प्रकार के व्यूह बनाये गए। जो निम्नलिखित हैं-
{| class="wikitable"
|-
|<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">क्रोन्च व्यूह
|<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">मकर व्यूह
|<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">कूर्म व्यूह
|<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">त्रिशूल व्यूह
|<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">चक्र व्यूह
|<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">कमल व्यूह
|<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">ओर्मी व्यूह
|<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">वज्र व्यूह
|<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">मण्डल व्यूह
|<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">गरुड व्यूह
|<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">शकट व्यूह
|<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">असुर व्यूह
|<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">देव व्यूह
|<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">सूचि व्यूह
|<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">चन्द्रकाल व्यूह
|<div style="font-size:105%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:green">शृंगघटक व्यूह
|-
|}
महाभारत काल के सबसे शक्तिशाली योद्धागीता प्रेस गोरखपुर , महाभारत-ये श्रेणियाँ महाभारत के भीष्म पर्व के रथातिरथसंख्यानपर्व में भीष्म जी द्वारा इन पात्रों के युद्ध कौशल, युद्ध में कम से कम हार, अधिक से अधिक शक्तिशाली दिव्यास्त्रों की संख्या आदि के आधार पर दी गयी हैं। ये श्रेणियाँ इसलिये दी गयी हैं जिससे कि पाठक महाभारत काल के सबसे शक्तिशाली योद्धाओं के बारे में जान सकें।
युद्ध का प्रारम्भ और अंत
thumb|right|400px|कुरुक्षेत्र की तरफ प्रस्थान करती पाण्डव और कौरव सेनाएँ, स्रोतभागवतम् डाट ओआरजी
युद्ध की तैयारियाँ पूर्ण करने के बाद कौरव और पाण्डव दोनों दल कुरुक्षेत्र पहँचे। पाण्डवों ने कुरुक्षेत्र के पश्चिमी क्षेत्र में सरस्वती नदी के दक्षिणी तट पर बसे समन्तपंचक तीर्थ से बहुत दूर हिरण्यवती नदी (सरस्वती की ही एक सहायक धारा) के तट के पास अपना पड़ाव डाला और कौरवो ने कुरुक्षेत्र के पूर्वी भाग मे वहाँ से कुछ योजन की दूरी पर एक समतल मैदान मे अपना पड़ाव डाला। दोनों पक्षों ने वहाँ चिकने और समतल प्रदेशों मे जहाँ घास और ईंधन की अधिकता थी, अपनी सेना का पड़ाव डाला। युधिष्ठिर ने देवमंदिरों, तीर्थों और महर्षियों के आश्रमों से बहुत दूर हिरण्यवती नदी के तट के समीप हजारों सैन्य शिविर लगवाये। वहाँ प्रत्येक शिविर में प्रचुर मात्रा में खाद्य सामग्री, अस्त्र-शस्त्र, यन्त्र और कई वैद्य और शिल्पी वेतन देकर रखे गये। दुर्योधन ने भी इसी तरह हजारों पड़ाव डाले महाभारत, उद्योग पर्व,१६९.१ वहाँ केवल दोनों सेनाओ के बीच में युद्ध के लिये ५ योजन का घेरा छोड़ दिया गया था। महाभारत, उद्योग पर्व,१९५.१ फिर अगले दिन प्रातः दोनों पक्षो की सेनाएँ एक दूसरे के आमने-सामने आकर खड़ी हो गयीं।
<div style="font-size:125%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:black">युद्ध के नियम बनाये जाना
पाण्डवों ने अपनी सेना का पड़ाव समन्त्र पंचक तीर्थ पास डाला और कौरवों ने उत्तम और समतल स्थान देखकर अपना पड़ाव डाला। उस संग्राम में हाथी, घोड़े और रथों की कोई गणना नहीं थी। पितामह भीष्म की सलाह पर दोनों दलों ने एकत्र होकर युद्ध के कुछ नियम बनाये। उनके बनाये हुए नियम निम्नलिखित हैं-
संख्यानियम१प्रतिदिन युद्ध सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक ही रहेगा२युद्ध समाप्ति के पश्चात् छल कपट छोड़कर सभी लोग प्रेम का व्यवहार करेंगे३रथी रथी से, हाथी वाला हाथी वाले से और पैदल पैदल से ही युद्ध करेगा४एक वीर के साथ एक ही वीर युद्ध करेगा५ भय से भागते हुए या शरण में आये हुए लोगों पर अस्त्र-शस्त्र का प्रहार नहीं किया जायेगा६जो वीर निहत्था हो जायेगा उस पर कोई अस्त्र नहीं उठाया जायेगा७युद्ध में सेवक का काम करने वालों पर कोई अस्त्र नहीं उठायेगा
<div style="font-size:125%;border:none;margin: 0;padding:.1em;color:black">युद्ध से पूर्व
thumb|left|175px|श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाना
इस प्रकार युद्ध संबंधी नियम बना कर दोनों दल युद्ध के लिये प्रस्तुत हुए। पाण्डवों के पास सात अक्षौहिणी सेना थी और कौरवों के साथ ग्यारह अक्षौहिणी सेना थी। दोनों पक्ष की सेनाएँ पूर्व तथा पश्चिम की ओर मुख करके खड़ी हो गयीं। कौरवों की तरफ से भीष्म और पाण्डवों की तरफ से अर्जुन सेना का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। कुरुक्षेत्र के केवल ५ योजन (४० किलोमीटर) के क्षेत्र के घेरे मे दोनों पक्ष की सेनाएँ खड़ी थीं। महाभारत गीताप्रेस गोरखपुर, भीष्म पर्व, अध्याय १-१० युद्ध से पूर्व अर्जुन श्रीकृष्ण से अपने रथ दोनों सेनाओं के मध्य में ले जाने को कहते हैं जिससे वह यह देख ले कि युद्ध में उसे किन किन योद्धाओं का सामना करना है। जब अर्जुन युद्ध क्षेत्र में अपने गुरु द्रोण, पितामह भीष्म एवं अन्य संबंधियों को देखता है तो वह बहुत शोकग्रस्त एवं उदास हो जाता है। वह श्रीकृष्ण से कहता है कि जिनके लिये हम ये सारे राजभोग प्राप्त करना चाहते हैं, वे तो यहाँ इस युद्ध क्षेत्र में उसी राजभोग की प्राप्ति के लिये हमारे विपक्ष मे खड़े हैं इन्हें मारकर हम राज प्राप्त करके भी क्या करेगें। अतएव मैं युद्ध नहीं करूँगा, ऐसा कहकर अर्जुन अपने धनुष रखकर रथ के पिछले भाग में बैठ जाता है तब श्रीकृष्ण योग में स्थित होकर उसे गीता का ज्ञान देते हैं और कहते हैं कि संसार में जो आया है उसको एक ना एक दिन जाना ही पड़ेगा। यह शरीर और संसार दोनों नश्वर हैं परन्तु इस शरीर के अन्दर रहने वाला आत्मा शरीर के मरने पर भी नहीं मरता। जिस तरह मनुष्य पुराने वस्त्र त्याग कर नये वस्त्र पहनता है उसी प्रकार आत्मा भी पुराना शरीर त्याग कर नया शरीर धारण करती है इसको तुम ऐसे समझो कि यह सब प्रकृति तुम से करवा रहीं है तुम केवल निमित्त मात्र हो। श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञान योग,भक्ति योग और कर्म योग तीनों की शिक्षा देते हैं जिसे सुनकर अर्जुन युद्ध के लिये तैयार हो जाता है।
युद्ध का विवरण एवं घटनाक्रम
कुरुक्षेत्र युद्ध के परिणाम
महाभारत एवं अन्य पौराणिक ग्रंथों के अनुसार यह युद्ध भारत वंशियों के साथ-साथ अन्य कई महान वंशों तथा वैदिक ज्ञान विज्ञान के पतन का कारण बना। महाभारत में वर्णित इस युद्ध के कुछ मुख्य परिणाम निम्न लिखित हैं-
नकारात्मक फल
यह युद्ध प्राचीन भारत के इतिहास का सबसे विध्वंसकारी और विनाशकारी युद्ध सिद्ध हुआ। इस युद्ध के बाद भारतवर्ष की भूमि लम्बें समय तक वीर क्षत्रियों से विहीन रही। इस युद्ध में लाखों वीर योद्धा मारे गये।
गांधारी के शापवश यादवों के वंश का भी विनाश हो गया। लगभग सभी यादव आपसी युद्ध में मारे गये, जिसके बाद श्रीकृष्ण ने भी इस धरती से प्रयाण किया।
इस युद्ध के समापन एवं श्रीकृष्ण के महाप्रयाण के साथ ही वैदिक युग एवं सभ्यता के अंत का आरम्भ हुआ, भारत से वैदिक ज्ञान और विज्ञान का लोप होने लगा। जिसे पौराणिक विद्वानों ने कलियुग के आगमन से जोड़ा।
पूरे भारतवर्ष में सम्पूर्ण जनपदों की अर्थव्यवस्था बहुत खराब हो गयी, भारत में गरीबी के साथ साथ अज्ञानता फैल गयी।
भविष्य पुराण के अनुसार इस युद्ध के बाद भारत में निरन्तर शतियों तक विदेशियों (मलेच्छों) के आक्रमण होते रहे, कुरुवंश के अंतिम राजा क्षेमक भी मलेच्छों से युद्ध करते हुए मारे गये, जिसके बाद तो यह आर्यावर्त देश सब प्रकार से क्षीण हो गया, कलियुग के बढ़ते प्रभाव को देखकर तथा सरस्वती नदी के लुप्त हो जाने पर लगभग ८८००० वैदिक ऋषि-मुनि हिमालय चले गये और इस प्रकार भारतवर्ष ऋषि-मुनियों के ज्ञान एवं विज्ञान से भी हीन हो गया।
समस्त ऋषि-मुनियों के चले जाने पर भारत में धर्म का नेतृत्व ब्राह्मण करने लगे, जो पहले केवल यज्ञ करते थे एवं वेदों का अध्ययन करते थे। ब्राह्मणों ने वैदिक धर्म को लम्बे समय तक बचाये रखा, परन्तु पौराणिक ग्रंथों में दिये वर्णन के अनुसार कलियुग के प्रभाव से ब्राह्मण वर्ग भी नहीं बच पाया और उनमें से कुछ दूषित एवं भ्रष्ट हो गये, मंत्रों का सही तरीके से उच्चारण करने की विधि भूल जाने के कारण वैदिक मंत्रों का दिव्य प्रभाव भी सीमित रह गया। कुछ भ्रष्ट ब्राह्मणों ने बाद के समाज में कई कुरीतियाँ एवं प्रथाएँ चला दी, जिसके कारण क्षुद्र एवं पिछड़े वर्ग का शोषण होने लगा एवं सतीप्रथा, छुआछूत जैसी प्रथाओं ने जन्म लिया। यह सूचना पौराणिक आधार एवं वैदिक काल के बाद समाज में फैली कुरीतियों के आधार पर दी गयी है, इसका उद्देश्य किसी वर्ग को अपमानित करना नहीं है। परन्तु कई ब्राह्मणों ने कठोर तप एवं नियमों का पालन करते हुए कलियुग के प्रभाव के बावजूद वैदिक सभ्यता को किसी न किसी अंश में जीवित रखा, जिसके कारण आज भी ऋग्वेद एवं अन्य वैदिक ग्रंथ सहस्रों वर्षों बाद लगभग उसी रूप में उपलब्ध हैं।
सकारात्मक फल
इस युद्ध का एक सकारात्मक फल पूरी मानव जाति को श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को सुनायी गयी ज्ञानरूपी वाणी श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में प्राप्त हुआ।
इस युद्ध के बाद युधिष्ठिर के राज्य-अभिषेक के साथ धरती पर धर्म के राज्य की स्थापना हुई।
हिन्दू परम्पराओं एवं पुराणों में दी गयी प्राचीन राजवंशों की सूची के आधार पर तथा अन्य वैदिक ग्रंथों में दी गयी ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर महाभारत काल के बाद का प्राचीन भारतीय राजवंश ऐतिहासिक घटना कालक्रम में निम्नलिखित है-
सन्दर्भ
2
बाहरी कड़ियाँ
कुरुक्षेत्र (शहर)
कुरुक्षेत्र युद्ध की काल गणना https://web.archive.org/web/20060217125416/http://ignca.nic.in/nl002503.htm 17 फ़रवरी 2006 -इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र
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वेद-पुराण - यहाँ चारों वेद एवं दस से अधिक पुराण हिन्दी अर्थ सहित उपलब्ध हैं। पुराणों को यहाँ सुना भी जा सकता है।
महर्षि प्रबंधन विश्वविद्यालय https://web.archive.org/web/20080408110939/http://is1.mum.edu/vedicreserve/puran.htm 8 अप्रैल 2008 -यहाँ सम्पूर्ण वैदिक साहित्य संस्कृत में उपलब्ध है।
ज्ञानामृतम् - वेद, अरण्यक, उपनिषद् आदि पर सम्यक् जानकारी
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