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पाल-चितरिया नरसंहार
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पाल-चितरिया नरसंहार
पाल-चितरिया नरसंहार (जिसे पाल-दढवाव नरसंहार भी कहा जाता है) 7 मार्च 1922 को ब्रिटिश भारत की इडर रियासत (वर्तमान साबरकांठा जिला, गुजरात) के पाल, चितरिया और दढवाव गाँवों में हुआ एक क्रूर हत्याकांड था। इसमें ब्रिटिश पुलिस बल (मेवाड़ भील कोर) ने सामाजिक सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लगभग 1,200 निहत्थे भील आदिवासियों को गोलियों से भून दिया था। इस घटना को अक्सर 'गुजरात का जलियांवाला बाग' कहा जाता है।
पृष्ठभूमि
20वीं सदी के आरंभ में राजस्थान और गुजरात की सीमा पर स्थित रियासतों में भील और गरासिया आदिवासी अत्यधिक लगान, जागीरदारों के शोषण, और 'बेगार' (बिना पारिश्रमिक के जबरन मजदूरी) की प्रथा से पीड़ित थे।
इस शोषण के विरुद्ध उदयपुर के व्यापारी और सामाजिक कार्यकर्ता मोतीलाल तेजावत ने आदिवासियों को एकजुट करना शुरू किया। उन्होंने 1921 में 'एकी आंदोलन' (एकी का अर्थ एकता) की शुरुआत की। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य आदिवासियों को लगान न देने के लिए संगठित करना, शराब और अंधविश्वास से दूर रखना तथा बेगार प्रथा का बहिष्कार करना था। यह आंदोलन शीघ्र ही मेवाड़, सिरोही और विजयनगर से होते हुए इडर रियासत तक फैल गया।
घटना का विवरण
7 मार्च 1922 को आमलकी एकादशी (होली से ठीक पहले) के अवसर पर हीर नदी के तट पर स्थित पाल गाँव में एक विशाल आदिवासी सभा बुलाई गई थी। इस सभा में पाल, चितरिया, दढवाव और आसपास के क्षेत्रों से लगभग 2,000 से अधिक आदिवासी एकत्रित हुए थे।
सभा शांतिपूर्ण थी और मोतीलाल तेजावत लोगों को संबोधित कर रहे थे। उसी समय ब्रिटिश सेना की मेवाड़ भील कोर (MBC) के अधिकारी मेजर एच.जी. सटन के नेतृत्व में पुलिस बल वहाँ पहुँचा।
बिना किसी पूर्व चेतावनी के पुलिस ने निहत्थे आदिवासियों पर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी।
गोलियों से बचने के लिए कई लोग भागते समय नदी और पास के सूखे कुओं में कूद गए।
प्रत्यक्षदर्शियों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, मौके पर लगभग 1,200 आदिवासी मारे गए।
इस गोलीबारी में मोतीलाल तेजावत को भी दो गोलियाँ लगीं, लेकिन उनके साथियों ने उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला और वे भूमिगत हो गए।
लीपापोती और ऐतिहासिक उपेक्षा
जलियांवाला बाग नरसंहार (1919) के विपरीत, ब्रिटिश सरकार ने इस घटना को पूरी तरह दबा दिया:
तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारियों ने अपनी आधिकारिक रिपोर्ट में मृतकों की संख्या केवल 22 बताई।
दूरदराज के आदिवासी और पहाड़ी इलाके में होने के कारण राष्ट्रीय प्रेस में इस घटना को अधिक स्थान नहीं मिल सका।
ब्रिटिश औपनिवेशिक अभिलेखों में इसे केवल "उपद्रवी आदिवासियों को तितर-बितर करने की कार्रवाई" के रूप में दर्ज किया गया।
राष्ट्रीय मान्यता और स्मारक
स्वतंत्रता के बाद दशकों तक यह ऐतिहासिक घटना पाठ्यपुस्तकों से गायब रही।
28 फरवरी 2003 को गुजरात सरकार ने पाल गाँव में इस घटना की स्मृति में एक शहीद स्मारक और प्रेरणा स्थल का निर्माण करवाया।
नई दिल्ली में 2022 के गणतंत्र दिवस की परेड में गुजरात राज्य की झांकी का विषय "पाल-दढवाव नरसंहार: आदिवासियों का स्वतंत्रता संग्राम" रखा गया, जिससे इस घटना को देशव्यापी पहचान मिली।
संदर्भ सूची (References)
शर्मा, बृज किशोर (1990). Peasant Movements in Rajasthan (1920–1949). Pointer Publishers, Jaipur.
व्यास, एन. एन. (1980). Tribal Movements in Western India. Tribal Research Institute, Udaipur.
गुजरात राज्य अभिलेखागार (State Archives of Gujarat): इडर स्टेट रिकॉर्ड्स (1922-1923), पॉलिटिकल डिपार्टमेंट फाइलें।
पत्र सूचना कार्यालय (PIB), भारत सरकार: 26 जनवरी 2022 प्रेस विज्ञप्ति — Gujarat Tableau at Republic Day Parade depicting Pal-Dadhvav massacre.