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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

ज्ञानाश्रयी शाखा

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जनवरी 2017 इस शाखा के भक्त-कवि निर्गुणवादी थे और नाम की उपासना करते थे। गुरु को वे बहुत सम्मान देते थे और जाति-पाँति के भेदों को अस्वीकार करते थे। वैयक्तिक साधना पर वे बल देते थे। मिथ्या आडंबरों और रूढियों का वे विरोध करते थे। लगभग सब संत अपढ़ थे परंतु अनुभव की दृष्टि से समृध्द थे। प्रायः सब सत्संगी थे और उनकी भाषा में कई बोलियों का मिश्रण पाया जाता है इसलिए इस भाषा को 'सधुक्कड़ी' कहा गया है। साधारण जनता पर इन संतों की वाणी का ज़बरदस्त प्रभाव पड़ा है। इन संतों में प्रमुख कबीरदास थे। अन्य मुख्य संत-कवियों के नाम हैं - नानक, रैदास, दादूदयाल, सुंदरदास तथा मलूकदास। प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन ने निर्गुण भक्ति के स्वरूप के बारे में प्रश्न उठाए हैं तथा प्रतिपादित किया है कि संतों की निर्गुण भक्ति का अपना स्वरूप है जिसको वेदांत दर्शन के सन्दर्भ में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। उनके शब्द हैं: भक्‍ति या उपासना के लिए गुणों की सत्‍ता आवश्‍यक है। ब्रह्म के सगुण स्‍वरूप को आधार बनाकर तो भक्‍ति / उपासना की जा सकती है किन्‍तु जो निर्गुण एवं निराकार है उसकी भक्‍ति किस प्रकार सम्‍भव है ? निर्गुण के गुणों का आख्‍यान किस प्रकार किया जा सकता है ? गुणातीत में गुणों का प्रवाह किस प्रकार माना जा सकता है ? जो निरालम्‍ब है, उसको आलम्‍बन किस प्रकार बनाया जा सकता है। जो अरूप है, उसके रूप की कल्‍पना किस प्रकार सम्‍भव है। जो रागातीत है, उसके प्रति रागों का अर्पण किस प्रकार किया जा सकता है ? रूपातीत से मिलने की उत्‍कंठा का क्‍या औचित्‍य हो सकता है। जो नाम से भी अतीत है, उसके नाम का जप किस प्रकार किया जा सकता है। शास्‍त्रीय दृष्‍टि से उपर्युक्‍त सभी प्रश्‍न ‘निर्गुण-भक्‍ति‘ के स्‍वरूप को ताल ठोंककर चुनौती देते हुए प्रतीत होते हैं। कबीर आदि संतों की दार्शनिक विवेचना करते समय आचार्य रामचन्‍द्र शुक्ल ने यह मान्‍यता स्‍थापित की है कि उन्‍होंने निराकार ईश्‍वर के लिए भारतीय वेदान्‍त का पल्‍ला पकड़ा है।इस सम्‍बन्‍ध में जब हम शांकर अद्वैतवाद एवं संतों की निर्गुण भक्‍ति के तुलनात्‍मक पक्षों पर विचार करते हैं तो उपर्युक्‍त मान्‍यता की सीमायें स्‍पष्‍ट हो जाती हैं: (क) शांकर अद्वैतवाद में भक्‍ति को साधन के रूप में स्‍वीकार किया गया है, किन्‍तु उसे साध्‍य नहीं माना गया है। संतों ने (सूफियों ने भी) भक्‍ति को साध्‍य माना है। (ख) शांकर अद्वैतवाद में मुक्‍ति के प्रत्‍यक्ष साधन के रूप में ‘ज्ञान' को ग्रहण किया गया है। वहाँ मुक्‍ति के लिए भक्‍ति का ग्रहण अपरिहार्य नहीं है। वहाँ भक्‍ति के महत्‍व की सीमा प्रतिपादित है। वहाँ भक्‍ति का महत्‍व केवल इस दृष्‍टि से है कि वह अन्‍तःकरण के मालिन्‍य का प्रक्षालन करने में समर्थ सिद्ध होती है। भक्‍ति आत्‍म-साक्षात्‍कार नहीं करा सकती, वह केवल आत्‍म साक्षात्‍कार के लिए उचित भूमिका का निर्माण कर सकती है। संतों ने अपना चरम लक्ष्‍य आत्‍म साक्षात्‍कार या भगवद्‌-दर्शन माना है तथा भक्‍ति के ग्रहण को अपरिहार्य रूप में स्‍वीकार किया है क्‍योंकि संतों की दृष्‍टि में भक्‍ति ही आत्‍म-साक्षात्‍कार या भगवद्‌दर्शन कराती है। सन्दर्भ श्रेणी:काव्य शास्त्र श्रेणी:साहित्य निर्गुण काव्यधारा के प्रवर्तक कबीरदास जी हैं।