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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

रमाबाई रानडे

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रमाबाई रनाडे Ramabai-ranade.jpg 25 जनवरी 1863 देवराष्ट्रे, सतारा, बंबई प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत 25 मार्च 2, 1924 (आयु 61) भारतीय महिला शिक्षा और आत्मनिर्भरता महादेव गोविंद रानडे रमाबाई रनाडे (25 जनवरी 1863 – 1924) एक भारतीय समाजसेवी और 19वीं शताब्दी में पहली महिला अधिकार कार्यकर्ताओं में से एक थी। वह 1863 में कुरलेकर परिवार में पैदा हुई थी। 11 वर्ष की आयु में, उन्होंने जस्टिस महादेव गोविंद रानडे से विवाह किया, जो एक प्रतिष्ठित भारतीय विद्वान और सामाजिक सुधारक थे। सामाजिक असमानता के उस युग में, महिलाओं को स्कूल जाने और साक्षर बनने की इजाजत नहीं थी, रमाबाई, उनकी शादी के कुछ ही समय बाद, महादेव गोविंद रानडे के मजबूत समर्थन और प्रोत्साहन के साथ पढ़ने और लिखना सीखने लगी। अपनी मूल भाषा मराठी के साथ शुरू करके, रमाबाई ने अंग्रेजी और बंगाली की मास्टरी करने के लिए कड़ी मेहनत की। अपने पति से प्रेरित होकर, रमाबाई ने महिलाओं में सार्वजनिक बोलने को विकसित करने के लिए मुंबई में 'हिंदू लेडीज सोशल क्लब' की शुरुआत की। रमाबाई पुणे में 'सेवा सदन सोसाइटी' की संस्थापक और अध्यक्ष थी। रमाबाई ने अपने जीवन को महिलाओं के जीवन में सुधार के लिए समर्पित किया। रमाबाई रानडे ने अपने पति और अन्य सहयोगियों के साथ 1886 में पुणे में लड़कियों का पहला उच्च विद्यालय, प्रसिद्ध हुजूरपागा स्थापित किया। परिचय रमाबाई रानडे भारत में और बाहर आधुनिक महिला आंदोलन की अग्रणी रही। वह "सेवा सदन" की संस्थापक और अध्यक्ष थि, जो कि सभी भारतीय महिला संस्थानों में सब से सफल है और इसमें हजारों महिलाएं भाग लेती हैं। संस्थान की बेहद लोकप्रियता इस तथ्य के कारण थी कि यह रमाबाई के करीब से निजी पर्यवेक्षण के अधीन थी।  प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि रमाबाई रानडे का जन्म 25 जनवरी 1863 को कुरलेकर परिवार में हुआ था, जो कि सांगली जिले के एक छोटे से गांव देवराश्त्र, महाराष्ट्र में रहता था। उन दिनों लड़कियों को शिक्षित करना निषिद्ध था, उसके पिता ने उसे शिक्षित नहीं किया। 1873 में, उसका भारत के सामाजिक सुधार आंदोलन के एक अग्रणी,जस्टिस महादेव गोविंद रानडे से विवाह हो गया उन्होंने घर में महिलाओं के विरोध के बावजूद उसे शिक्षित करने के लिए अपना समय समर्पित किया और उन्हें एक आदर्श पत्नी और सामाजिक और शैक्षिक सुधारों में एक योग्य सहायिका बनने में मदद की। उसके मजबूत समर्थन और उसके दूरदर्शी पथ को साझा करने के साथ, रमाबाई ने अपनी सारी जिंदगी को महिलाओं को आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने के लिए लगा दी।  https://books.google.com/books?id=GEPYbuzOwcQC&pg=PA65&dq=ramabai+and+her+work&hl=en&sa=X&ei=3tH5T96nK8HOrQf57e29Bg&ved=0CEAQ6AEwAg#v=onepage&q=ramabai%20and%20her%20work&f=false Women and Social Reform in Modern India: A Reader – Sumit Sarkar, Tanika Sarkar – Google Books Books.google.co.in 13 August 2012 https://web.archive.org/web/20140626235437/http://books.google.com/books?id=GEPYbuzOwcQC#v=onepage&q=ramabai%20and%20her%20work&f=false 26 जून 2014 live वह 11 वर्ष की थी जब एक विद्वान, आदर्शवादी और एक क्रांतिकारी सामाजिक कार्यकर्ता, महादेव गोविंद रानडे से उसका विवाह हुआ। उस समय रमाबाई अनपढ़ थी, क्योंकि वह एक ऐसे समय में रहते थे जब एक लड़की का पड़ना या लिखना पाप माना जाता था। इसके विपरीत, उनके पति, "स्नातकों के राजकुमार" के रूप में संबोधित थे, वह प्रथम श्रेणी के सम्मान के साथ बॉम्बे विश्वविद्यालय से स्नातक थे। वह न केवल बॉम्बे में एलफिन्स्टन कॉलेज में अंग्रेजी और इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर के रूप में काम करते थे बल्कि एक प्राच्य अनुवादक और सामाजिक सुधारक भी थे। उन्होंने समाज में मौजूद बुराइयों के खिलाफ कड़ाई से काम किया। वह अस्पृश्यता, बाल विवाह और सती के खिलाफ थे। उन्होंने सार्वजनिक सभा का अधिग्रहण किया और सामाजिक विकास के लिए कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। उन्होंने अपने शुरुआती तीसवें दशक तक पूरे महाराष्ट्र की प्रशंसा हासल कर ली थी। उनकी व्यापक सोच, गतिशील दृष्टि, भावुक और समर्पित सामाजिक प्रतिबद्धता ने रमाबाई को प्रेरित किया और भविष्य के सामाजिक कार्य के लिए उसका रास्ता प्रबुद्ध किया। Kosambi Kosambi Meera Meera 2000 Intersections : socio-cultural trends in Maharashtra https://books.google.com/books?id=XU8dmAiaZSgC&printsec=frontcover&source=gbs_ge_summary_r&cad=0#v=onepage&q=ranade&f=false 101 New Delhi Orient Longman 9788125018780 9788125018780 9 January 2017 शिक्षा रमाबाई ने खुद को शिक्षित करने का एक मिशन बनाया, ताकि वह अपने पति के नेतृत्व में सक्रिय जीवन में एक समान साझीदार हो सकें। अपने प्रयासों में उन्होंने अपने विस्तारित परिवार में अन्य महिलाओं से बाधा और शत्रुता का सामना किया।  जस्टिस रानडे ने युवा रमाबाई को लिखित और मराठी, इतिहास, भूगोल, गणित और अंग्रेजी को नियमित रूप से पढ़ाया। वह उसे सभी समाचार पत्रों को पढ़ने और उसके साथ वर्तमान मामलों पर चर्चा करने के लिए प्रेरित करता था। वह उनकी समर्पित शिष्य बन गई और धीरे धीरे उनकी सचिव और उनकी भरोसेमंद दोस्त बन गई। रमाबाई का महत्वपूर्ण साहित्यिक योगदान मराठी में उनकी आत्मकथा आमच्या आयुष्यातील आठवणी है, "Diamond Maharashtra Sankritikosh", Durga Dixit, Pune, India, Diamond Publications, 2009, p. 40.  जिसमें वह अपने विवाहित जीवन का विस्तृत विवरण देती है। उस ने धर्म पर जस्टिस रानडे के व्याख्यान का एक संग्रह भी प्रकाशित किया। वह अंग्रेजी साहित्य की बहुत शौकीन थी।  रमाबाई ने मुख्य अतिथि के रूप में नासिक हाई स्कूल में अपनी पहली सार्वजनिक उपस्थिति की। जस्टिस रानडे ने उसका पहला भाषण लिखा। उसने जल्द ही अंग्रेजी और मराठी दोनों में सार्वजनिक बोलने की कला में महारत हासिल कर ली थी। उनके भाषण हमेशा सरल और दिल-छू रहे होते थे। उसने बॉम्बे में प्रार्थना समाज के लिए काम करना शुरू किया। उसने शहर में आर्य महिला समाज की एक शाखा स्थापित की। 1893 से 1901 तक रमाबाई अपनी सामाजिक गतिविधियों में लोकप्रियता के चरम पर थी। उसने बॉम्बे में हिंदू लेडीज सोशल एंड लिटररी क्लब की स्थापना की और भाषाओं, सामान्य ज्ञान, सिलाई और दस्तकारी में महिलाओं को प्रशिक्षित करने के लिए कई कक्षाएं शुरू कीं। सन्दर्भ श्रेणी:1862 में जन्मे लोग श्रेणी:मराठी लोग श्रेणी:भारतीय महिला श्रेणी:भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता