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विधि अनुवाद

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अंगूठाकार|विधि अनुवाद की जटिलता विधि अनुवाद ''' वह प्रक्रिया है जिसमें किसी भाषा में प्रयुक्त विधि संदर्भों और विधि उद्देश्यों की भाषा का अनुवाद किया जाता है। इसका अर्थ यह भी लिया जा सकता है कि यह केवल विधि में प्रयुक्त विशिष्ट प्रकार का अनुवाद है, जो हमेशा पूरी तरह से शुद्ध या सत्य नहीं होता। विधि का अनुवाद अपने स्वभाव में संस्कृति-निर्भर होता है, इसलिए विधि अनुवाद को भाषाई दृष्टि से पूर्ण पारदर्शी बनाना आवश्यक नहीं है। जहाँ संभव हो, अनुवाद में अपारदर्शिता से बचने के लिए लैटिन विधि शब्दावली का प्रयोग किया जा सकता है। वहीं, गैर-पश्चिमी भाषाओं में की विधिक बहस अक्सर विशिष्ट शब्दों की उत्पत्ति और ऐतिहासिक उदाहरणों पर आधारित होती है। उदाहरण के लिए, जापानी विधिक चर्चाओं में कुछ विशेष चीनी अक्षरों का प्रयोग किया जाता है,मिज़ुनो मकीको International Perspectives on Translation, Education and Innovation in Japanese and Korean Societies स्प्रिंगर 2018 978-3-319-68432-1 हेबर्ट डेविड जी. चाम 207–222 Linguistic Study of Court Interpreting in Lay Judge Trials in Japan 10.1007/978-3-319-68434-5_14 https://link.springer.com/chapter/10.1007/978-3-319-68434-5_14 जो कानूनी अर्थ और परंपरा दोनों को दर्शाते हैं। अनुवाद में अपारदर्शिता अनुबंध संबंधी गंभीर गलतफहमियों को जन्म दे सकती है, जिसके परिणामस्वरूप अनावश्यक मुकदमेबाजी हो सकती है। इसलिए, विधि अनुवाद आमतौर पर अनुभवी और विशेषज्ञ विधि अनुवादकों द्वारा ही किया जाता है। अनुवाद के कानूनी प्रभाव को लेकर किसी विवाद से बचने के लिए यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अनूदित पाठ “प्रामाणिक” है,अर्थात वह विधिक रूप से प्रभावी है, या यह केवल एक “सुविधाजनक अनुवाद” है, जिसका कानूनी प्रभाव नहीं होता। न्यायालय केवल प्रामाणिक ग्रंथों को ही लागू करते हैं और मुकदमेबाज(लिटिगेंट्स) के अधिकारों और कर्तव्यों के निर्धारण में केवल प्रामाणिक दस्तावेज़ों पर निर्भर रहते हैं; सुविधाजनक अनुवादों को विधि निर्णय में मान्यता नहीं दी जाती। स्रोत पाठ और लक्ष्य पाठ अधिकांश विधिक लेखन सटीक और तकनीकी होते है,जिसका उद्देश्य विधिक रूप से बाध्यकारी अधिकारों और कर्तव्यों को स्पष्ट रूप रूप से परिभाषित करना होता है|इसलिए, इन अधिकारों और कर्तव्यों का स्रोत पाठ और लक्ष्य पाठ के अनुवाद में सटीक रूप से मेल होना अत्यंत आवश्यक है। अनूदित पाठ में स्थापित विधिक अधिकारों और कर्तव्यों को समझने और सही ढंग से अनुवाद करने के साथ-साथ, विधिक अनुवादकों को स्रोत पाठ की विधिक प्रणाली और लक्ष्य पाठ की विधिक प्रणाली को भी ध्यान में रखना चाहिए, जो एक-दूसरे से काफी भिन्न हो सकती हैं।Sandrini, Peter (2018). Languages for Special Purposes: An International Handbook. Berlin/Boston: Walter de Gruyter. p. 554. ISBN 978-3-11-022800-7. यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, क्योंकि इसके लिए अनुवादक को व्यापक ज्ञान के साथ-साथ विभिन्न विधिक प्रणालियों की समझ भी होनी चाहिए, जो एक ही भाषा में मौजूद हो सकती हैं।Sandrini, Peter (2018). Languages for Special Purposes: An International Handbook. Berlin/Boston: Walter de Gruyter. p. 554. ISBN 978-3-11-022800-7. विभिन्न विधिक प्रणालियों के उदाहरणों में एंग्लो-अमेरिकी कॉमन कानून, इस्लामी कानून, और पारंपरिक जनजातीय कानून शामिल हैं। शब्दावली में रिक्तता के अलावा, स्रोत भाषा की पाठीय परंपराएँ अक्सर सांस्कृतिक रूप से निर्भर होती हैं और लक्ष्य संस्कृति की परंपराओं से मेल नहीं खा सकतीं|स्रोत भाषा में पाई जाने वाली भाषाई संरचनाएँ कभी-कभी लक्ष्य भाषा में सीधे समान रूप में उपलब्ध नहीं होतीं। इसलिए, अनुवादक को स्रोत पाठ में प्रयुक्त भाषा और लक्ष्य भाषा में तैयार किए गए पाठ के बीच भाषाई, सामाजिक और सांस्कृतिक समतुल्यता के कुछ मानकों द्वारा निर्देशित होना पड़ता है। ये मानक अनुवाद सिद्धांत में विभिन्न दृष्टिकोणों के रूप में परिभाषित विभिन्न सिद्धांतों के अनुरूप होते हैं। प्रत्येक मानक यह निर्धारित करता है कि स्रोत पाठ के किन तत्वों को लक्ष्य पाठ में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, कार्यात्मक दृष्टिकोण का अनुसरण करते हुए, अनुवादक स्रोत भाषा में प्रयुक्त संरचनाओं के समान कार्य करने वाली लक्ष्य भाषा की संरचनाएँ खोजने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार वे स्रोत पाठ के किसी अंश की कार्यात्मकता को उसके विशिष्ट शब्दों के अर्थ या उनके क्रम से अधिक महत्व देते हैं| अनुवाद से जुड़ी समस्याएँ भाषाविज्ञान के संदर्भ में लिप्यंकन के उपयोग को लेकर काफी विवाद रहा है। सामान्यतः, दो प्रकार के भाषाई अभिलेख वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण माने जाते हैं। पहला, वे अभिलेख जो ध्वनि की सामान्य विशेषताओं को दर्शाते हैं, और दूसरा, वे जो केवल किसी भाषा के विशिष्ट ध्वनिम पर केंद्रित होते हैं। हालाँकि लिप्यंकन पूरी तरह अवैध नहीं है, लेकिन यदि उसमें प्रयुक्त भाषाई विशेषताओं के बारे में पर्याप्त और विस्तृत टिप्पणी न हो, तो उसके गलत अर्थ निकाले जाने की संभावना बहुत अधिक होती है।Heffner, R.-M. S. (1934). "Concerning Transcription". Language. 10 (3): 286–290. doi:10.2307/409478. ISSN 0097-8507. JSTOR 409478.इस समस्या को स्पष्ट करने वाला एक उदाहरण है—लिखित रूप में किसी बोली को प्रदर्शित करना। इस स्थिति की मूल समस्या यह है कि लिप्यंकन किया गया पाठ केवल बोली गई भाषा का लिखित रूप नहीं होता, बल्कि वह उस व्यक्ति की भाषा भी बन जाता है जो उसे लिख रहा है। यानी, यह हमेशा किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा किया गया प्रस्तुतीकरण होता है, चाहे लिप्यंतरणकर्ता को उस भाषा की कितनी भी समझ क्यों न हो। हर लिप्यंकन वह कितना ही विस्तृत क्यों न हो, भाषण की एक व्याख्या होता है और इसमें यह चयन किया जाता है कि क्या शामिल किया जाए और क्या छोड़ा जाए। इसी कारण, यह बहुत आवश्यक है कि लिप्यंकन के रूप का चयन सोच-समझकर किया जाए ताकि बोली गई भाषा को लिखित रूप में सही ढंग से प्रस्तुत किया जा सके।Macaulay, Ronald K. S. (1991). ""Coz It Izny Spelt When They Say It": Displaying Dialect in Writing". American Speech. 66 (3): 280–291. doi:10.2307/455800. ISSN 0003-1283. JSTOR 455800 Macaulay, Ronald K. S. (1991). ""Coz It Izny Spelt When They Say It": Displaying Dialect in Writing". American Speech. 66 (3): 280–291. doi:10.2307/455800. ISSN 0003-1283. JSTOR 455800अनुवाद के विभिन्न तरीकों को अनुवाद सिद्धांत के विभिन्न तरीकों के साथ भ्रमित नहीं करना चाहिए। पहले का अर्थ है वे मानक जिन्हें अनुवादक अपने कार्य में अपनाते हैं, जबकि दूसरे का संबंध उन वैचारिक ढाँचों से है जो अनुवाद सिद्धांत के विकास में उपयोग किए जाते हैं। अधिकांश विधिवेत्ता अनुवाद सिद्धांत के शब्दों से परिचित नहीं होते। वे अक्सर अनुवादकों और दुभाषियों से शब्दशः अनुवाद की अपेक्षा करते हैं। उनके लिए यह गुणवत्ता का एक स्पष्ट मानक होता है। लेकिन वास्तव में, शब्दशः अनुवाद अक्सर उपयुक्त नहीं होता, क्योंकि अलग-अलग भाषाओं की व्याकरणिक संरचना और विभिन्न विधि प्रणालियों में अलग-अलग कानूनी शब्द और नियम होते हैं। अनुवाद करते समय सही शब्दों का चयन करना कठिन हो सकता है, क्योंकि हर शब्द का दूसरी भाषा में बिल्कुल समान अर्थ नहीं होता। दुनिया भर में विभिन्न संस्कृतियाँ हैं जहाँ विधि अनुवाद का बिल्कुल सटीक होना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि कानूनी अनुवादक किसी शब्द का एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद करते समय उसके अर्थ और प्रभाव दोनों को बनाए रखें।Gotti Maurizio Gotti, Maurizio (2016). "Linguistic Features of Legal Texts: Translation Issues". Statute Law Review. 37 (2): 144–155. doi:10.1093/slr/hmu027. ISSN 0144-3593. द्विभाषी विधिक शब्दकोश विधिक अनुवादक अक्सर विशेष प्रकार के द्विभाषी या बहुभाषी विधिक शब्दकोशों का उपयोग करते हैं। सावधानी बरतना आवश्यक है, क्योंकि कुछ द्विभाषी विधिक शब्दकोश निम्न गुणवत्ता के होते हैं और उनके उपयोग से गलत अनुवाद हो सकता है। द्विभाषी विधिक शब्दकोश सामान्यतः शाब्दिक समानार्थी अनुवाद देने के बजाय व्याख्या के संदर्भ स्रोत के रूप में अधिक उपयोगी होते हैं। एक भाषा से दूसरी भाषा में विधिक पाठ का अनुवाद करना विधि विशेषज्ञों के लिए चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि अनुवाद में कुछ हद तक स्वतंत्रता होती है—जहाँ अर्थ को बनाए रखना अधिक महत्वपूर्ण होता है, न कि शब्दों या वाक्य संरचना की पूरी समानता बनाए रखना। इसके अलावा, विशेषज्ञों के बीच इस बात पर भी बहस होती है कि क्या विधिक भाषा को केवल पेशेवर उपयोग के लिए लक्ष्य भाषा तक सीमित रखा जाए, या उसे व्यापक बनाया जाए ताकि आम जनता, विशेष रूप से द्विभाषी विधिक प्रणाली वाले समाजों में, उसे आसानी से समझ सके।Poon Wai Yee Emily Poon, Wai Yee Emily (2010). "Strategies for Creating a Bilingual Legal Dictionary". International Journal of Lexicography. 23 (1): 83–103. doi:10.1093/ijl/ecp037. ISSN 0950-3846. श्रेणी:न्यायिक लिखाई श्रेणी:न्यायिक संचार श्रेणी:अनुवाद