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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

साबित बिन ज़हहाक़

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साबित बिन ज़हहाक़ रज़ीअल्लाहु तआला अन्हु (वफ़ात: 46 हिजरी) एक सहाबी थे। आपकी कुनियत अबू ज़ैद थी। आप रज़ीअल्लाहु तआला अन्हु ने बैअत-ए-अक़बा में इस्लाम क़बूल किया। ग़ज़वा-ए-बदर सहित अन्य तमाम ग़ज़वात में शिरकत की। सन 46 हिजरी में हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़ीअल्लाहु तआला अन्हु के अहद-ए-ख़िलाफ़त में शाम में वफ़ात पाई। नाम व वंशावली साबित नाम, अबू ज़ैद कुनियत, क़बीला बनू अशहल से हैं। सिलसिला-ए-नसब यह है: साबित बिन ज़हहाक़ बिन ख़लीफ़ा बिन सअलबा बिन अदी बिन कअब बिन अब्दुल अशहल। बेसत-ए-नबवी के तीसरे साल पैदा हुए, कुछ लोगों ने 3 हिजरी साल-ए-विलादत क़रार दिया है, लेकिन यह क़तअन ग़लत है। ग़ज़वात ग़ज़वा-ए-हमरा अल-असद में शामिल थे, ग़ज़वा-ए-ख़ंदक़ में आँहज़रतﷺ के साथ सवार थे और सहीह मुस्लिम की रिवायत के मुताबिक़ बैअत-ए-रिज़वान में शिरकत की थी। इब्न-ए-मंदा ने लिखा है कि इमाम बुख़ारी ने इनकी शिरकत-ए-बदर को तस्लीम किया है, अजब नहीं कि यह ख़याल सहीह हो, तिर्मिज़ी ने भी बदर में शामिल होने का ज़िक्र किया है। इब्न-ए-सअद की रिवायत के मुताबिक़ ग़ज़वा-ए-उहुद की शिरकत भी साबित होती है; क्योंकि उन्होंने हमरा अल-असद के ज़िक्र में ज़िमनन यह भी बयान किया है कि इस ग़ज़वे में सिर्फ़ वही लोग शामिल थे जिन्होंने ग़ज़वा-ए-उहुद में शिरकत की थी।طبقات ابن سعد :43 लेकिन हमारे नज़दीक यह तमाम रिवायतें नाक़ाबिल-ए-एतबार हैं, क्योंकि जिहाद की शिरकत के लिए 15 साल की उम्र ज़रूरी थी और जैसा कि ऊपर मालूम हुआ हज़रत साबितؓ का साल-ए-विलादत 3 नबवी है, इस बिना पर हिजरत के वक़्त उनकी उम्र कमोबेश 10 साल थी। ग़ज़वा-ए-बदर 2 हिजरी और ग़ज़वा-ए-उहुद 3 हिजरी में हुआ, इसलिए उस वक़्त उनकी उम्र 12, 13 साल की थी, जो जिहाद के लिए नाकाफ़ी है। बुख़ारी में अब्दुल्लाह बिन उमर से रिवायत आई है कि: أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَرَضَهُ يَوْمَ أُحُدٍ وَهُوَ ابْنُ أَرْبَعَ عَشْرَةَ سَنَةً فَلَمْ يُجِزْهُ وَعَرَضَهُ يَوْمَ الْخَنْدَقِ وَهُوَ ابْنُ خَمْسَ عَشْرَةَ سَنَةً فَأَجَازَهُ (بخاری، باب غزوۃ الخندق وھی الاحزاب، حدیث نمبر: 3788) वह ग़ज़वा-ए-उहुद में चौदह साल के थे, आँहज़रतﷺ के सामने पेश हुए तो जंग में शिरकत की इजाज़त नहीं मिली; लेकिन दूसरे साल ख़ंदक़ में पंद्रह साल के थे, इस बिना पर आँहज़रतﷺ ने इजाज़त दे दी। हज़रत बरा बिन आज़िबؓ के मुताल्लिक़ भी इसी क़िस्म की रिवायत है, इन रिवायतों की मौजूदगी में जो सहीह सनद से साबित हैं, दूसरी रिवायतों पर किसी तरह एतमाद नहीं किया जा सकता। इस बिना पर हमारे नज़दीक बदर व उहुद की बजाय इनका पहला ग़ज़वा-ए-ख़ंदक़ था और हमरा अल-असद में लड़ने की बजाय दूसरे कामों के लिए मुंतख़ब हुए थे; चुनांचे मुसन्निफ़-ए-इसाबा लिखते हैं: وکان لیلہ الی احمراء الاسد (کتاب مذکور:1/201) यानी वह आँहज़रतﷺ को हमरा अल-असद का रास्ता बताते थे। वफ़ात अहद-ए-नबवी के बाद शाम की सुकूनत इख़्तियार की, फिर शाम से बसरा मुंतक़िल हो गए और वहीं पर मुस्तक़िल सुकूनत-पज़ीर हो गए। हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़ीअल्लाहु तआला अन्हु के अहद-ए-ख़िलाफ़त में इंतक़ाल फ़रमाया, बाज़ों ने 46 हिजरी की तसरीह की है। आपसे चौदह अहादीस की रिवायत है।کتاب: مکمل اسلامی انسائیکلوپیڈیا، مصنف: مرحوم سید قاسم محمود، ص-568 इन्हें भी देखें मुहम्मद सहाबा और सहाबियात की सूची अशरह मुबशरह ख़लीफ़ा शरिया इस्लाम संदर्भ