Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

साधारण नमक

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

thumb|साधारण लवण और लवणदानी नमक या लवण (Common Salt) से साधारणतया भोजन में प्रयुक्त होने वाले लवण का बोध होता है। रासायनिक दृष्टि से यह सोडियम क्लोराइड (NaCl) है जिसका क्रिस्टल पारदर्शक एवं घनाकार होता है। शुद्ध लवण रंगहीन होता है, किंतु लोहमय अपद्रव्यों के कारण इसका रंग पीला या लाल हो जाता है। समुद्र के खारापन के लिये उसमें मुख्यत: सोडियम क्लोराइड की उपस्थिति कारण होती है। भौमिकी में लवण को हैलाइट (Halite) कहते हैं।http://www.efsa.europa.eu/en/press/news/050622 EFSA provides advice on adverse effects of sodium European Food Safety Authority 22 June 2005 9 June 2016 4 August 2017 https://web.archive.org/web/20170804134312/http://www.efsa.europa.eu/en/press/news/050622 live WHO issues new guidance on dietary salt and potassium https://www.who.int/mediacentre/news/notes/2013/salt_potassium_20130131/en/ 31 January 2013 WHO dead https://web.archive.org/web/20160720052736/http://www.who.int/mediacentre/news/notes/2013/salt_potassium_20130131/en/ 20 July 2016 dmy-allEurope PMC https://europepmc.org/article/med/22465720 2021-06-07 Presse Médicale 2012 22465720 Delahaye F. 41 6 Pt 1 644–649 10.1016/j.lpm.2012.02.035 7 June 2021 https://web.archive.org/web/20210607031645/https://europepmc.org/article/med/22465720 live http://books.nap.edu/openbook.php?record_id=18311 Sodium intake in populations: assessment of evidence 2013 Institute of Medicine of the National Academies Brian L. Strom Ann L. Yaktine Maria Oria 17 October 2013 live https://web.archive.org/web/20131019135047/http://books.nap.edu/openbook.php?record_id=18311 19 October 2013 dmy-all 10.17226/18311 24851297 978-0-309-28295-6 Committee on the Consequences of Sodium Reduction in Populations Food Nutrition Board Board on Population Health Public Health Practice Institute Of Medicine Strom B. L. Yaktine A. L. Oria M. भौतिक गुण शुद्ध लवण रंगहीन होता है, किंतु लोहमय अपद्रव्यों के कारण इसका रंग पीला या लाल हो जाता है। इसका द्रवणांक 804 डिग्री सें., आपेक्षिक घनत्व 2.16, अपवर्तनांक 10.542 तथा कठोरता 2.5 है। यह ठंडे जल में सुगमता से घुल जाता है और गरम जल में इसकी विलेयता कुछ बढ़ जाती है। हिम के साथ लवण को मिला देने से मिश्रण का ताप -21 डिग्री सें. तक गिर सकता है। thumb|right|लवण का स्फटिक प्राप्ति / स्रोत लवण समुद्र, प्राकृतिक लवणीन जलस्रोतों एवं शैलीय लवणनिक्षेपों के रूप में प्राप्त होता है। विश्व के विभिन्न भागों में इन निक्षेपों के विशाल भंडार हैं। सभी युगों के स्तरों में ये प्राय: उपलब्ध हैं, किंतु अधिकतर कैंव्रियन युग से मेसोज़ोइक युग के स्तरों में उपलब्ध होते हैं। पंजाब (पाकिस्तान), ईरान, संयुक्त राज्य अमरीका, आनटेरिऔ (कनाडा), नौवा स्कॉशा, कोलोराडो, उटाह, जर्मनी, वॉल्गा क्षेत्र तथा डोनेट बेसिन (सोवियत संघ) में लवण के प्रमुख निक्षेप पाए जाते हैं। लवण की कई सौ फुट तथा कहीं-कहीं कई हजार फुट तक मोटी तहें पर्वतों के रूप में एवं धरातल के नीचे पाई जाती हैं। प्राकृतिक लवणीन स्रोत के अंतर्गत लवणीन जल की झीलें, कुएँ तथा स्रोत (spring) आते हैं। लवणीन जल की ये झीलें किसी समय महासागरों के ही भाग होती होंगी जिससे जल में लवण का अंश पर्याप्त बढ़ गया है। इस जल को वाष्पित कर सुगमता से लवण प्राप्त किया जाता है। समुद्र के जल में लवण प्रचुर मात्रा में विद्यमान है। भारत में लवण के स्रोत सन् 1947 के पूर्व भारत में लवण का प्रधान स्रोत लवणश्रेणी (Salt Range) थी। खैबर (पाकिस्तान) में लवण की विशाल खानें हैं। यहाँ लवण की तह की मोटाई 100 फुट से भी अधिक है। यह लवण इतना अधिक वर्णहीन एवं पारदर्शक है कि यदि लवण की 10 फुट मोटी दीवाल के एक ओर प्रकाशपुंज रखा जाए तो दूसरी ओर कोई भी व्यक्ति सरलता से पढ़ सकता है। इस लवण निक्षेप पर पर्याप्त लंबे समय से खननकार्य होता चला आ रहा है। यहाँ लवण के खाननकार्य के समय एक प्रकार की धूल (Salt dust) विपुल मात्रा में बनती है। यह लवणीय धूल इंपीरियल केमिकल इंडस्ट्रीज द्वारा संचित की जाती है जो इसका उपयोग क्षारीय संयत्र (Alkali plant) में करते हैं। इस क्षेत्र से लवण के उत्पादन की मात्रा भारत विभाजन के पूर्व 1,87,490 टन था। खैबर लवण की शुद्धता 90 प्रतिशत से भी अधिक है। इसके अतिरिक्त अनेक स्थान और भी हैं जहाँ लवण के समृद्ध स्तर प्राप्त हुए हैं। ऐसा ही एक स्थान वाछी तथा दूसरा कोहर है। यहाँ पर लवण के अतिरिक्त पोटासियम क्लोराइड भी कुछ अंशों में विद्यमान है। विभाजन के पश्चात् यह भाग पाकिस्तान में चला गया है। इस समय भारत का शैल्य लवण स्रोत केवल हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में स्थित लवण की खानें हैं। यहाँ पर दो स्थानों गुंमा तथा ध्रंग में लवण की खुदाई का कार्य बहुत समय से होता रहा है। सड़क के किनारे-किनारे जोगिंदर नगर से मंडी तक अनेक स्थानों पर लवण जल के झरने हैं। गुंमा में लवण का एक निक्षेप 150 फुट से अधिक मोटा है, किंतु इस लवण में 10-15 प्रतिशत तक बालू के रूप में सिलिका मिला हुआ है। अत: यह लवण पूर्ण रूप से मनुष्य के खाने के योग्य नहीं है। लंबे समय से यह लवण पशुओं को खिलाने के उपयोग में लाया जाता रहा है। गुंमा में लवण निक्षेपों से एक पूर्णत; शुद्ध एवं श्वेत प्रकार का लवण उत्पन्न करने की योजना भारत सरकार बना रही है। ध्रंग में भी लवण जल के अनेक विशाल झरने हैं, जहाँ लवण के विलयन को वाष्पित कर उच्च प्रकार का लवण प्राप्त किया जा सकता है। भारत में लवण का द्वितीय स्रोत राजस्थान है। साँभर के समीप लगभग 90 वर्ग मील का एक बृहत् क्षेत्र है जो एक गर्त है। इस गर्त के निकटवर्ती क्षेत्रों का जल एकत्र हो जाता है और इस प्रकार लवणीन जल की एक झील बन जाती है। संभवत: इसका कारण निकटवर्ती क्षेत्रों की मिट्टी में लवण का विद्यमान होना ही है। यह लवण जल क्यारियों में एकत्र किया जाता है। यहाँ इसका धूप द्वारा वाष्पीकरण होता है, क्योंकि इस क्षेत्र में प्रचंड धूप पड़ती है। नवंबर के महीने में ये क्यारियाँ लवणजल से भरी जाती हैं तथा अप्रैल, मई तक अवक्षिप्त लवण को एकत्र कर लिया जाता है और जो बिटर्न (Bittern) शेष रहता है उसे झील के एक भाग में संचित कर दिया जाता है। इस प्रकार से प्राप्त लवण उत्तम होता है। लवण का उत्पादन इस क्षेत्र में पर्याप्त होता है। अभी तक इस लवण के उद्भव (Origin) का स्पष्टीकरण नहीं हुआ है। कुछ विद्वानों का कहना है कि यह वायुजनित लवण है जो समुद्र से वायु के साथ आता है और वर्षा के साथ राजस्थान में गिर जाता है तथा इस विशाल झील में संचित हो जाता है। बिटर्न का बहुत समय तक कोई मूल्य ही नहीं समझा जाता था, किंतु लेखक ने अनुसंधान करके पता लगाया है कि इस बिटर्न में लगभग 62 प्रतिशत सामान्य लवण, 25 प्रतिशत सोडियम सल्फेट तथा 8 प्रतिशत सोडियम कार्बोनेट होता है। इस क्षेत्र में सोडियम सल्फेट तथा सोडियम क्लोराइड के लवणों का विपुल मात्रा में संग्रह हा सकता है। उपयुक्त साधनों से लवण से सोडियम सल्फेट तथा सोडियम कार्बोनेट का पृथक्करण संभव हो सकता है। साँभर झील क्षेत्र में एक लंबे समय से खननकार्य किया जा रहा है, किंतु अभी तक लवण के उत्पादन तथा मात्रा में कोई ह्रास नहीं हुआ है। अत: यह झील लवण का एक चिरस्थायी स्रोत समझी जा सकती है। इसके अतिरिक्त राजस्थान में लवण के दो अन्य स्रोत विद्यमान हैं, प्रथम डिगाना झील तथा दूसरी डिडवाना झील। ये झीलें भी ठीक उसी प्रकार की हैं जैसी साँभर। इनमें से एक में सोडियम सल्फेट के बृहत् निक्षेप प्राप्त हुए हैं। झील के जल से पृथक होकर शुद्ध सोडियम सल्फेट का अवक्षेपण हो जाता है। कुछ वर्षों तक यह झील सोडियम सल्फेट का सस्ता स्रोत रही है। लवण का तीसरा स्रोत समुद्र का खारा जल है। गुजरात प्रदेश के समुद्री तट के काठियावाड़ से दक्षिणी बंबई तक तथा मद्रास (चेन्नई) के तटवर्ती क्षेत्रों में तूतीकोरीन के सीप ज्वार के समय लवणजल का एकत्र कर लवण का उत्पादन किया जाता है। यह कार्य मानसून के पश्चात् प्रारंभ किया जाता है तथा मानसून आने से पहले ही समाप्त कर दिया जाता है। बड़ौदा से बंबई जानेवाली रेलवे लाइन पर दोनों ओर लवण के बड़े-बड़े ढेर दिखाई पड़ते हैं। समुद्री जल से लवण बनाने की पश्चात् जो बिटर्न शेष रहता है उसमें मैग्नीशियम क्लोराइड बड़ी मात्रा में रहता है। लवण के कुछ कारखाने खराघोड़ा में इस आशय से स्थापित किए गए हैं कि इस बिटर्न से मैग्नीशियम क्लोराइड प्राप्त किया जाए जो विपुल मात्रा में सुगमता से मिल सकता है। इस स्रोत से लवण का उत्पादन बृहत् मात्रा में होता है और उत्पादन बहुत बढ़ाया जा सकता है। काठियावाड़ में ध्रांगध्रा, पोरबंदर तथा द्वारका के समीप क्षार के कारखाने प्रारंभ हो चुके हैं जो सॉल्वे (Salvay) की विधि द्वारा सोडियम कार्बोनेट का वाणिज्य स्तर पर उत्पादन करते हैं। चिल्का झील (उड़ीसा) भी लवणीय जल की झील है जो समुद्र से संबंधित है। यहाँ भी बृहत् स्तर पर लवण के उत्पादन का प्रयत्न किया जा रहा है। बंगाल भी पर्याप्त मात्रा में लवण का उत्पादन करता है और यहाँ भी उत्पादन बढ़ाने का प्रयत्न किया जा रहा है, किंतु यहाँ लवण बनाने में एक बड़ी कठिनाई यह है कि यहाँ गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के गिरने से बंगाल की खाड़ी के जल में लवण का अंश पर्याप्त कम हो जाता है। इन स्रोतों के अतिरिक्त कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ पर स्थलीय जल अत्यंत लवणीन होता है। प्राचीन समय में इस जल को वाष्पित कर लवण तैयार किया जाता था। राजस्थान में भरतपुर के समीप एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ कुओं का जल नितांत लवणीय है। यह जलकुओं से चमड़े के पुरों द्वारा खींचा जाता है और वाष्पित कर लवण बनाने के काम आता है। वाणिज्य स्तर पर इस स्रोत से लवण प्राप्त करने की योजनाओं के विकास का पूर्ण प्रयत्न किया जा रहा है। कुछ लघु स्रोत भी ऐसे हैं जिनसे लवण की प्राप्ति होती है, उदाहरणार्थ, बंबई के बुलडाना जिले की लूनर झील। यह 400 फुट गहरी है। वर्षा ऋतु में इसमें जल एकत्रित हो जाता है और वर्षा समाप्त होने पर शनै: शनै: वाष्पीकरण के पश्चात् यह झील लवण के अतिरिक्त सोडियम सल्फेट तथा सोडियम कार्बोनेट भी उत्पन्न करती है। अभी हाल में ही हिमाचल प्रदेश में घ्रग नामक क्षेत्र में लवण के बड़े विशाल स्रोत मिले हैं जो बहुत लंबे समय तक लवण का उत्पादन करते रहेंगे। खाने के अतिरिक्त लवण के उपयोग बहुत बड़ी मात्रा में दाहक सोडा, क्लोरीन और सोडियम धातु के निर्माण तथा अन्य उद्योगों में होता है। स्वास्थ्यपरक पहलू आज दुनिया में लवण की दैनिक खुराक 10-12 ग्राम प्रतिव्यक्ति है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के सुझाव के अनुसार ये एक चाय के चम्मच यानि, 5-6 ग्राम होना चाहिए। हाल के साक्ष्य बताते हैं कि इसकी आहार मात्रा प्रति दिन 2-3 ग्राम ही होनी चाहिए।The Hindu, रविवार, 31 मई 2009, Magazine, Page 6 - A pinch will do, डॉ जी सेंगोत्तुवेलु सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ लवण(लवण) तथा ph नोट्स बहुउपयोगी लवण श्रेणी:रसायन शास्त्र