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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या

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मोहनलाल पंड्या से भ्रमित न हों जो भारत के एक स्वतंत्रता सेनानी थे। मोहनलाल विष्णुलाल पण्ड्या (१८५० - ४ सितम्बर, १९१२) भारतेन्दु युगीन हिन्दी सेवी साहित्यकार थे। वे पुरातत्व के विद्वान थे और प्रसिद्ध पुराविद् राजेन्द्रलाल मित्र के मित्र थे। उन्होने पृथ्वीराज रासो के पुनरुद्धार का भार उठाया और उसका सम्पादन किया। ग्रियर्सन : भाषा और साहित्य चिन्तन (लेखक : अरुन कुमार, पृष्ठ ९१) जो काशी नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित हुआ। इन्होंने 'रासो संरक्षा' नामक पुस्तक लिखी थी। इसके अतिरिक्त लगभग एक दर्जन अन्य पुस्तकों की रचना भी इन्होंने की है। जीवनी मोहनलाल पण्ड्या का जन्म सन् १८५० में हुआ था। उनके पूर्वज १३वीं-१४वीं गुजरात छोड़कर दिल्ली आकर बस गए थे। पश्चात् उनका परिवार आगरा के गोकुलपुरा में आकर बस गया, बाद में मोहनलाल जी के पिता श्री विष्णुलाल जी नौकरी के कारण मथुरा के गोलपाड़ा मौहल्ले में, मकान ले कर स्थायी रूप से बस आगये। विष्णुलाल जी मथुरा के प्रसिद्ध सेठ लक्ष्मीचन्द के यहाँ मुख्य कोषाध्यक्ष थे। प्रारम्भ में मोहनलाल पण्ड्या को संस्कृत, हिन्दी की शिक्षा घर पर ही दी गई फिर उन्हें आगरा के 'सैंट जाॅन्स कालेज' में पढ़ने के लिए भेजा गया। विष्णुलाल जी अपने पुत्र मोहनलाल को अच्छी शिक्षा दिलवाना चाहते थे अतः उन्होंने सेठजी से कह कर अपना स्थानान्तरण, सेठजी की वाराणसी वाली कोठी में करवा लिया। सेठ लक्ष्मीचन्द की वाराणसी आदि कई नगरों में व्यापारिक कोठियाँ थीं। वाराणसी में मोहनलाल पण्ड्या ने क्वीन्स कालेज और जयनारायण काॅलेज में शिक्षा प्राप्त की तथा कुछ ही समय में गुजराती, हिन्दी, के अतिरिक्त अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, फारसी आदि भाषाओं पर भी समान आधिकार प्राप्त कर लिया। पिता विष्णुलाल पण्ड्या की रुचि साहित्यिक चर्चा में अधिक थी इसलिए वे कोठी के कार्य से निवृत्त होकर नियमित भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र जी के यहाँ चले जाया करते थे। पिता के साथ मोहनलाल जी भी प्राय: भारतेन्दु जी के यहाँ जाते रहते थे। इस प्रकार उनकी रुचि भी साहित्यिक चर्चाओं की ओर बढ़ गई और धीरे-धीरे भारतेन्दु जी के यहाँ उनकी बैठक नियमित हो गई। भारतेन्दु जी से प्रभावित हो कर मोहनलाल पण्ड्या हिन्दी भाषा के परम सेवक बन गये और उन्होंने शपथ ली की वे हिन्दी की सेवा करेंगे और सदा शुद्ध हिन्दी में ही कार्य करेंगे। काशी की साहित्यिक गतिविधियों में भी मोहनलाल पण्ड्या बढ़-चढ़ भाग लेने लगे। कुछ ही दिनों में अपनी प्रतिभा से मोहनलाल पण्ड्या ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा के आरम्भिक सदस्यों में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया। काशी नागरी प्रचारिणी सभा में वे बाबू श्यामसुन्दर दास, राय कृष्णदास आदि विख्यात हिन्दी सेवी साहित्यकारों के सम्पर्क में आये जिससे उनकी प्रतिभा में चार चाँद लग गये। जब पिता अस्वस्थ रहने लगे तो उन्होंने पुत्र मोहनलाल पण्ड्या को अवध के नवाब फैयाज आली खानबहादुर को सुपुर्द कर दिया। नवाब साहब ने मोहनलाल पण्ड्या की योग्यता को देखते हुए उन्हें अपना निजी सचिव नियुक्त कर लिया परन्तु धर्मनिष्ठ मोहनलाल पण्ड्या का मन बहुत दिनों तक नवाब साहब के यहाँ नहीं लगा और उन्होंने नवाब साहब की नौकरी से त्यागपत्र दे कर उदयपुर के महाराणा के यहाँ नौकरी कर ली। महाराणा ने उनकी धर्मनिष्ठा और कुशल प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए, उन्हें श्री नाथद्वारा और काँकरौली के पुष्टिमार्गीय गोस्वामी बालकों के नाबालिक होने के कारण, वहाँ का प्रबन्धक नियुक्त किया। बाद में महाराणा ने उन्हें उदयपुर की दीवानी अदालत में नियुक्त किया और राज्य काउंसिल का सदस्य तथा सचिव बना दिया। अन्त में मोहनलाल पण्ड्या प्रतापगढ़ (राजस्थान) राज्य के दीवान रहे और वहाँ से सेवानिवृत्त हो कर मथुरा आ गये तथा अपने पैतृक आवास में रहने लगे। विक्टोरिया की डायमंड जुबली के अवसर पर आपने एक हजार रुपये सरकारी कोष में दे कर यह प्रर्थना की थी कि इसकी व्याज से प्रति वर्ष कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में दो पदक दिये जाएँ। मोहनलाल पण्ड्या राॅयल एशियाटिक सोसाइटी के भी सदस्य रहे थे। उनके पास श्रेष्ठ पुस्तकों का विशाल संग्रह था जो उन्होेंने अपने जीवन के अंतिम दिनों में मथुरा के पुरातत्व संग्रहालय को दे दिया। मथुरा के आर्य समाज को भी आपने पर्याप्त धन दे कर सहायता की थी। लगभग बासठ वर्ष की आयु में ४ सितम्बर, १९१२ को मोहनलाल पण्ड्या का मथुरा में निधन हुआ। पृथ्वीराज रासो का सम्पादन जब कविराज श्यामलदास ने अपनी 'पृथ्वीराज चरित्र' नामक पुस्तक में अनेक प्रमाणों के द्वारा 'पृथ्वीराज रासो' को अप्रामाणिक ठहराया, तब उसके खण्डन में मोहनलाल पंड्या ने 'रासो संरक्षा' नामक एक पुस्तक लिखी। उनका तर्क था कि रासो में दिए गए संवत ऐतिहासिक संवतों से 90-91 वर्ष पीछे पड़ते हैं। उन्होंने यह विचार उपस्थित किया कि यह अन्तर भूल नहीं है, बल्कि किसी कारण से रखा गया है। चन्दबरदाई मोहनलाल एक अच्छे पत्रकार भी थे। भारतेन्दु द्वारा सम्पादित 'हरिश्चंद्र चंद्रिका' का प्रकाशन जब रुकने जा रहा था, तब आपने उसे सँभाला। अपने संपादन काल में उन्होंने उसका नाम 'मोहन चंद्रिका' रख दिया था। सन्दर्भ श्रेणी:हिन्दी सेवी