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लक्षणा
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अक्टूबर 2022
लक्षणा शब्द-शक्ति का एक प्रकार है। लक्षणा, शब्द की वह शक्ति है जिससे उसका अभिप्राय सूचित होता है।
कभी-कभी ऐसा होता है कि शब्द के साधारण अर्थ से उसका वास्तविक अभिप्राय नहीं प्रकट होता। वास्तविक अभिप्राय उसके साधारण अर्थ से कुछ भिन्न होता है। शब्द की जिस शक्ति से साधारण से भिन्न और दूसरा वास्तविक अर्थ प्रकट होता है, उसे लक्षणा कहते हैं। शब्द का वह अर्थ जो अभिधा शक्ति द्वारा प्राप्त न हो बल्कि लक्षणा शक्ति द्वारा प्राप्त हो, लक्ष्यार्थ कहलाता है।
परिभाषा - शब्द की वह शक्ति जिसमें श्रोता या पाठक को उस शब्द के मूल अर्थ को छोड़कर लक्ष्य कर रही कई बात का बोध कराती है लक्षणा शब्द शक्ति कहलाती है।
उदाहरण - रमेश गधा है
प्रकार
साहित्य में लक्षणा शक्ति दो प्रकार की मानी गई है— रूढ़ि और प्रयोजनवती।
रूढ़ि लक्षणा
जहाँ पर कुछ लक्ष्यार्थ रुढ़ हो गए हैं। जैसे 'कार्य में कुशल'। कुशल का शब्दार्थ 'कुश इकट्ठा करनेवाला' होता है, पर यह शब्द दक्ष या निपुण के अर्थ में रुढ़ हो गया है। इस प्रकार का अर्थ रुढिलक्षणा द्वारा प्रकट होता है।
रूढ़ि लक्षणा में रूढ़ि के कारण मुख्यार्थ को छोड़कर उससे सम्बन्ध रखने वाला अन्य अर्थ ग्रहण किया जाए। जैसे 'राजस्थान वीर है।' राजस्थान प्रदेश वीर नहीं हो सकता। इसमें मुख्यार्थ की बाधा है। इससे इसका लक्ष्यार्थ 'राजस्थान निवासी' होता है, क्योंकि राजस्थान से उसके निवासी का आधाराधेयभाव का सम्बन्ध है। यहाँ राजस्थानियों के लिए 'राजस्थान' कहना रूढ़ि है।
प्रयोजनवती लक्षणा
वह लक्षणा जो प्रयोजन द्वारा वाच्यार्थ से भिन्न अर्थ प्रकट करे। प्रयोजनवती लक्षणा में किसी विशेष प्रयोजन की सिद्धि के लिए लक्षणा की जाती है, जैसे-
'बहुत सी तलवारें मैदान में आ गईं' इस वाक्य में यदि हम तलवार का अर्थ तलवार ही करके रह जाते हैं तो अर्थ में बाधा पड़ती है। इससे प्रयोजनवश हमें तलवार का अर्थ तलवारबंद सिपाही लेना पड़ता है। अतः जिस लक्षणा द्वारा यह अर्थ लिया वह प्रयोजनवती हुई।
प्रयोजनवती लक्षणा के दो मुख्य भेद हैं- गौणी, शुद्धा।
गौणी लक्षणा
गौणी में सादृश्य सम्बन्ध से अर्थात समान गुण या धर्म के कारण लक्ष्यार्थ का ग्रहण किया जाए।
गौणी लक्ष्णा के दो मुख्य भेद होते हैं-
१. सारोपा गौणी २. साध्यवसाना गौणी
शुद्धा लक्षणा
शुद्धा लक्षणा में सादृश्य सम्बन्ध के अतिरिक्त अन्य सम्बन्ध से लक्ष्यार्थ का बोध होता है। शुद्धा लक्षणा के चार भेद हैं- उपादान लक्षणा, लक्षणलक्षणा, सारोपा लक्षणा और साध्यावसाना लक्षणा।
उपादान लक्षणा
जहाँ वाक्यार्थ की संगति के लिए अन्य अर्थ के लक्षित किए जाने पर भी अपना अर्थ न छूटे वहाँ उपादानलक्षणा होती है। उपादान का अर्थ है ग्रहण-लेना। इसमें वाच्यार्थ का सर्वथा त्याग नहीं होता। जैसे, 'पगड़ी की लाज रखिये। लक्ष्यार्थ होता है पगड़ीधारी की लाज। यहाँ पगड़ी अपना अर्थ न छोड़ते हुए पगड़ीधारी का आक्षेप करता है। यहाँ दोनों साथ-साथ हैं। अत: उपादान लक्षणा है।
लक्षणलक्षणा
जहाँ वाक्यार्थ की सिद्धि के लिए वाक्यार्थ अपने अर्थ को छोड़कर केवल लक्ष्यार्थ को सूचित करे, वहाँ लक्षणलक्षणा होती है।
इसमें अमुख्यार्थ को अनिवत होने के लिए मुख्यार्थ अपना अर्थ बिल्कुल छोड़ देता है। जैसे, 'पेट में आग लगी है।' यह एक सार्थक वाक्य है। इसमें 'आग लगी है' वाक्य अपना अर्थ छोड़ देता है और लक्ष्यार्थ होता है कि भूख लगी है। इससे लक्षण-लक्षणा है।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
अभिधा
व्यंजना
लक्षणा
बाहरी कड़ियाँ
अर्थ गौरव की ऊर्जा है शब्द शक्ति (ओपेन बुक्स ऑनलाइन)
काव्य का लक्ष्य
श्रेणी:व्याकरण
श्रेणी:भारतीय काव्यशास्त्र