Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

समानान्तर सिनेमा

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

सिनेमा के 3 प्रकार माने जाते है - व्यावसायिक सिनेमा, समानान्तर सिनेमा, क्षेत्रीय सिनेमा। समानान्तर सिनेमा भारतीय सिनेमा में एक फ़िल्म-आन्दोलन था, जो 1950 के दशक में पश्चिम बंगाल राज्य में मुख्यधारा के वाणिज्यिक भारतीय सिनेमा के विकल्प के रूप में उत्पन्न हुआ तथा जिसका प्रतिनिधित्व विशेष रूप से लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा ने किया, जिसे आज बॉलीवुड के रूप में जाना जाता है। इटैलियन न्यूरेलिज्म से प्रेरित, समानांतर सिनेमा फ्रांसीसी नयी लहर (फ्रेंच न्यू वेव) और जापानी नयी लहर (जापानी न्यू वेव) से ठीक पहले शुरू हुआ, और 1960 के दशक के भारतीय नयी लहर (भारतीय न्यू वेव) का अग्रदूत बन गया। आन्दोलन शुरू में बाङ्ला सिनेमा के नेतृत्व में था और सत्यजीत रे, मृणाल सेन, ऋत्विक घटक, तपन सिन्हा जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित फिल्म निर्माताओं ने इसका निर्माण किया। बाद में इसे भारत और बांग्लादेश के अन्य फिल्म उद्योगों में प्रमुखता मिली। समानांतर सिनेमा की सब से बड़ी समस्या थी कि वो अपने आप को आर्थिक धारा में शामिल करना चाहता था, जिसके करना उसने अपनी पहचाना को ख दिया। यह अपनी गंभीर सामग्री, यथार्थवाद और प्रकृतिवाद के लिए जाना जाता है, जो समय के समाजशास्त्रीय जलवायु पर गहरी नजर के साथ प्रतीकात्मक तत्व हैं और सम्मिलित नृत्य और गीत रूटीन की अस्वीकृति के लिए मुख्यधारा की भारतीय फिल्मों से विशिष्ट हैं। इतिहास उत्थान भारतीय सिनेमा में यथार्थवाद का आरम्भ 1920 और 1930 के दशक का है। इसके सबसे पुराने उदाहरणों में से एक बाबूराव पेंटर की 1925 की मूक फिल्म 'सावकारी पाश'प्रहलाद अग्रवाल, हिंदी सिनेमा : आदि से अनंत..., भाग-1, साहित्य भंडार, 50, चाहचंद (जीरो रोड), इलाहाबाद, पेपरबैक संस्करण-2014, पृष्ठ-14,44. एक क्लासिक थी। यह फ़िल्म एक गरीब किसान (वी शांताराम द्वारा अभिनीत) के बारे में थी, जो "एक लालची साहूकार को अपनी जमीन देने को मजबूर हो जाता है और शहर की ओर पलायन कर एक मिल वर्कर बन जाता है।"http://filmheritagefoundation.co.in/savkari-pash-the-indian-shylock-1925-80-mins/ Savkari Pash (The Indian Shylock), 1925, 80 mins 2015-06-07 Film Heritage Foundation https://web.archive.org/web/20150614181338/http://filmheritagefoundation.co.in/savkari-pash-the-indian-shylock-1925-80-mins/ 14 जून 2015 dead dmy-all यह यथार्थवादी सफलता के रूप में भारतीय सिनेमा के विकास में एक मील का पत्थर बन गया है। 1937 में शांताराम की फिल्म 'दुनिया न माने' ने भी भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति की आलोचना की।India's Art House Cinema Lalit Mohan Joshi British Film Institute 17 July 2007 http://www.bfi.org.uk/features/imagineasia/guide/contemporary/india-arthouse.html 2 June 2009 dead https://web.archive.org/web/20091122162218/http://www.bfi.org.uk/features/imagineasia/guide/contemporary/india-arthouse.html 22 November 2009 यह फ़िल्म उस समय बनायी गयी थी जब नारी स्वतंत्रता जैसा कोई शब्द समाज ने नहीं सुना था। इसमें स्त्री की गरिमा को बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है। जो लोग यह मानते हैं कि औरत आदमी के पैर की जूती है, उनके गाल पर यह करारे तमाचे की तरह थी।भृगुनाथ पाण्डेय, हिंदी सिनेमा : आदि से अनंत..., भाग-1, सं॰ प्रहलाद अग्रवाल, साहित्य भंडार, 50, चाहचंद (जीरो रोड), इलाहाबाद, पेपरबैक संस्करण-2014, पृष्ठ-80. प्रारम्भिक समय सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक, बिमल रॉय, मृणाल सेन, तपन सिन्हा, ख़्वाजा अहमद अब्बास, बुद्धदेव दासगुप्ता, चेतन आनंद, गुरुदत्त और वी. शांताराम जैसे अग्रगामी निर्देशकों के द्वारा 1940 के दशक के अंत से 1965 के अंत तक समानांतर सिनेमा आंदोलन शुरू हुआ। यह काल भारतीय सिनेमा के 'स्वर्ण युग' का हिस्सा माना जाता है। इस सिनेमा ने इस समय के भारतीय साहित्य से बहुत अधिक उधार लिया है। इसलिए समकालीन भारतीय समाज का एक महत्वपूर्ण अध्ययन बन गया है और अब विद्वानों और इतिहासकारों द्वारा इसका उपयोग बदलते जनसांख्यिकी और सामाजिक-आर्थिक के साथ-साथ भारतीय आबादी के राजनीतिक स्वभाव का नक्शा बनाने के लिए किया जाता है। अपनी शुरुआत से ही भारतीय सिनेमा में ऐसे लोग हैं जो मनोरंजन से अधिक माध्यमों का उपयोग करना चाहते थे और करते थे। उन्होंने इसका इस्तेमाल प्रचलित मुद्दों को उजागर करने के लिए और कभी-कभी खुले नये मुद्दों को जनता के लिए उद्घाटित करने के लिए किया। भारतीय सिनेमा के सामाजिक यथार्थवादी आंदोलन के शुरुआती उदाहरणों में ख्वाजा अहमद अब्बास द्वारा निर्देशित और लिखित धरती के लाल (1946) (1943 के बंगाल के अकाल के बारे में एक फिल्म) और नीचा नगर (1946) चेतन आनंद द्वारा निर्देशित और ख्वाजा अहमद अब्बास द्वारा लिखित फिल्म है। 'नीचा नगर' ने पहले कान फिल्म समारोह ग्रांड पुरस्कार जीता। तब से भारतीय स्वतंत्र फ़िल्में १९५० के दशक में और १९६० के दशक में कान फ़िल्म महोत्सव में पाल्मे डी'ओर के लिए अक्सर प्रतिस्पर्धा में रहीं, जिनमें से कुछ ने समारोह में बड़े पुरस्कार जीते। 1950 और 1960 के दशक के दौरान, बौद्धिक फिल्म निर्माता और कहानीकार सांगीतिक फिल्मों से निराश हो गये। इसका मुकाबला करने के लिए उन्होंने फिल्मों की एक शैली बनाई, जिसमें वास्तविकता को एक कलात्मक दृष्टिकोण से दर्शाया गया। इस अवधि के दौरान बनी अधिकांश फिल्मों को राज्य सरकारों द्वारा भारतीय फिल्म बिरादरी से एक प्रामाणिक कला शैली को बढ़ावा देने के लिए वित्त पोषित किया गया था। सबसे प्रसिद्ध भारतीय 'नव-यथार्थवादी' बंगाली फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे थे। उनके बाद श्याम बेनेगल, मृणाल सेन, अडूर गोपालकृष्णन, जी. अरविंदन और गिरीश कासारवल्ली थे। सत्यजीत रे की सबसे प्रसिद्ध फिल्में पथेर पांचाली (1955),अपराजितो (1956) और अपुर संसार (1959) थीं, जिसने 'अपु त्रयी' का गठन किया।नई दुनिया, 'विश्व सिनेमा' विशेषांक, 1995, संपादक- अभय छजलानी, पृष्ठ-168. इनकी उत्पादन बजट थी ₹ 150,000 ($ 3000)। तीनों फिल्मों ने कान्स, बर्लिन और वेनिस फिल्म समारोहों में बड़े पुरस्कार जीते और आज भी इन्हें सार्वकालिक महान् फिल्मों में सूचीबद्ध किया जाता है। कुछ कला फ़िल्मों ने व्यावसायिक सफलता भी हासिल की है, एक उद्योग में जो अपने अतियथार्थवाद या 'काल्पनिक' फिल्मों के लिए जाना जाता है और इनमें कला और व्यावसायिक सिनेमा दोनों की सफलतापूर्वक संयुक्त विशेषताएँ हैं।नई दुनिया, 'विश्व सिनेमा' विशेषांक, 1995, संपादक- अभय छजलानी, पृष्ठ-167. इसका एक प्रारंभिक उदाहरण बिमल रॉय की दो बीघा ज़मीन (1953) थी, जो एक व्यावसायिक और महत्वपूर्ण सफलता थी। फिल्म ने 1954 के कान फिल्म फेस्टिवल में अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीता और भारतीय नयी लहर (इंडियन न्यू वेव) का मार्ग प्रशस्त किया। हिंदी सिनेमा के सबसे सफल फिल्मकारों में से एक हृषिकेश मुखर्जी को 'मध्य सिनेमा' का अग्रणी नाम दिया गया था और वे ऐसी फिल्में बनाने के लिए प्रसिद्ध थे जो बदलते मध्यवर्ग के लोकाचार को दर्शाते थे। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार, मुखर्जी ने "मुख्यधारा के सिनेमा की असाधारणता और कला सिनेमा के वास्तविक यथार्थ के बीच एक मध्य मार्ग बनाया"। जाने-माने फिल्म निर्माता बासु चटर्जी ने भी मध्यवर्गीय जीवन पर केन्द्रित 'पिया का घर', 'रजनीगंधा' और 'एक रुका हुआ फैसला' जैसी फिल्मों का निर्माण किया। इसी प्रकार कला और व्यावसायिक सिनेमा को एकीकृत करनेवाले एक और फिल्म निर्माता गुरु दत्त थे, जिनकी फिल्म प्यासा (१९५७)) टाइम पत्रिका की 'सार्वकालिक' (ऑल-टाइम) १०० सर्वश्रेष्ठ फिल्मों की सूची में थी। एक त्रुटिहीन कला फिल्म के व्यावसायिक रूप से सफल होने का सबसे ताजा उदाहरण हरप्रीत संधू की कनाडियन-पंजाबी फिल्म 'वर्क वेदर वाइफ' है। यह पंजाबी फिल्म उद्योग में सिनेमा की शुरुआत का प्रतीक है। 1960 के दशक में भारत सरकार ने भारतीय विषयों पर आधारित स्वतंत्र कला फिल्मों का वित्तपोषण शुरू किया। कई निर्देशक पुणे में फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) के स्नातक थे। बंगाली फिल्म निर्देशक ऋत्विक घटक संस्थान में प्रोफेसर और एक प्रसिद्ध निर्देशक थे। हालांकि रे के विपरीत घटक ने अपने जीवनकाल में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नहीं की। उदाहरण के लिए, घटक की नागरिक (1952) शायद एक बंगाली कला फिल्म का सबसे पहला उदाहरण था, रे की पाथेर पांचाली से तीन साल पहले निर्मित, लेकिन 1977 में उनकी मृत्यु के बाद तक रिलीज नहीं हुई थी। उनकी पहली व्यावसायिक रिलीज़ 'अजांत्रिक' (1958) भी हर्बी फिल्मों से कई साल पहले की, इस मामले में एक ऑटोमोबाइल, एक निर्जीव वस्तु को चित्रित करने वाली, कहानी में एक चरित्र के रूप में, शुरुआती फिल्मों में से एक थी। अजांत्रिक का नायक 'बिमल' सत्यजीत रे के 'अभिजन' (१९६२) में निंदक कैब ड्राइवर नरसिंह (सौमित्र चटर्जी द्वारा अभिनीत) पर एक प्रभाव के रूप में भी देखा जा सकता है। कर्नाटक के सिनेमा ने एन लक्ष्मीनारायण की पहली निर्देशित फिल्म 'नांदी' (1964) में अतियथार्थवाद की आशा की पहली किरण देखी। राजकुमार, कल्पना और हरिनी जैसे मुख्य कलाकारों की विशेषता के कारण फिल्म एक महत्वपूर्ण और व्यावसायिक सफलता दोनों थी। वादिराज द्वारा निर्मित यह एक अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में स्क्रीनिंग करने वाली पहली कन्नड़ फिल्म होने के साथ एक ऐतिहासिक फिल्म थी। 1970 और 1980 के दशक में इस आंदोलन ने महत्वपूर्ण गति प्राप्त की जिसके परिणामस्वरूप कन्नड़ सिनेमा को कई राष्ट्रीय पुरस्कार और अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिली। विकास १९७० और १९८० के दशक के दौरान समानांतर सिनेमा ने हिन्दी सिनेमा की मुख्यधारा में काफी हद तक प्रवेश किया। इसका नेतृत्व गुलज़ार, श्याम बेनेगल, मणि कौल, राजिंदर सिंह बेदी, कांतिलाल राठौड़ और सईद अख्तर मिर्ज़ा जैसे निर्देशकों ने किया था और बाद में गोविन्द निहलानी जैसे निर्देशक इस दौर के भारतीय कला सिनेमा के मुख्य निर्देशक बन गये। मणि कौल की आरंभिक कई फिल्में उसकी रोटी (१९७१), आषाढ़ का एक दिन (१९७२) और दुविधा (१९७४) अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी प्रशंसित हुई और समीक्षकों ने भी उनकी सराहना की। उन्हें सम्मानित किया गया। बेनेगल के निर्देशन में अंकुर (१९७४) एक बड़ी महत्वपूर्ण सफलता थी और इसके बाद कई काम ऐसे हुए जिन्होंने आंदोलन में एक और आयाम बनाया।सिनेमा के चार अध्याय, डॉ॰ टी॰ शशिधरन, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण-2018, पृष्ठ-50. ऋत्विक घटक के छात्र कुमार साहनी ने अपनी पहली फीचर 'माया दर्पण' (१९७२) प्रदर्शित की जो भारतीय कला सिनेमा की एक ऐतिहासिक फिल्म बन गयी। इन फिल्म-निर्माताओं ने अपनी अलग शैली में यथार्थवाद को बढ़ावा देने की कोशिश की, हालाँकि उनमें से कई ने अक्सर लोकप्रिय सिनेमा की कुछ मिलावटों को स्वीकार किया। इस समय के समानांतर सिनेमा ने युवा अभिनेताओं की एक पूरी नयी पीढ़ी खड़ी की, जिसमें शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल, अमोल पालेकर, ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरबंदा, पंकज कपूर, दीप्ति नवल, फारुख शेख और यहाँ तक ​​कि हेमा मालिनी, राखी, रेखा जैसे व्यावसायिक सिनेमा के कलाकारों ने भी कला सिनेमा में काम किया। अडूर गोपालकृष्णन ने १९७२ में अपनी पहली फीचर फिल्म 'स्वयंवरम' के साथ मलयालम सिनेमा में भारतीय नयी धारा (इंडियन न्यू वेव) का विस्तार किया। भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग के लंबे समय बाद मलयालम सिनेमा ने १९८० के दशक और १९९० के दशक की शुरुआत में अपने 'स्वर्ण युग' का अनुभव किया। इस समय सबसे प्रशंसित भारतीय फिल्म निर्माताओं में से कुछ मलयालम उद्योग से थे - अडूर गोपालकृष्णन, केपी कुमारन, जी अरविंदन, जॉन अब्राहम, पद्मराजन, भारतन, टी वी चंद्रन और शाजी एन करुण। गोपालकृष्णन, जिन्हें अक्सर सत्यजीत रे का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माना जाता है, इस अवधि के दौरान अपनी कुछ सबसे प्रशंसित फिल्मों का निर्देशन किया - एलिप्पाथयम (१९८१), जिसने लंदन फिल्म महोत्सव में सदरलैंड ट्रॉफी जीता , साथ ही मथिलुकल (१९८९), जिसने वेनिस फिल्म उत्सव में प्रमुख पुरस्कार जीते। शाजी एन करुण की पहली फ़िल्म पिरावि (१९८९) ने कान फिल्म समारोह में कैमरा डी'ओर (१९८९) जीता, जबकि उनकी दूसरी फिल्म 'स्वाहम' (१९९४) कान फिल्म समारोह (१९९४) में पाल्मे डी'ओर प्रतियोगिता में थी। उनकी तीसरी फिल्म 'वानप्रस्थम' (१९९९) को भी कान फिल्म समारोह में चुना गया, जिससे वे ऐसे एकमात्र भारतीय फिल्म निर्माता बन गये जो लगातार तीन फिल्मों को कान फ़िल्मोत्सव में ले जा सके। बालाचंदर, सीवी श्रीधर, जे महेंद्रन, बालू महेंद्र, पी भारतीराजा, मणिरत्नम, कमल हासन, बाला, सेल्वराघवन, मिस्किन, वेट्रिमारन और राम ने तमिल सिनेमा के लिए वैसा ही काम किया है। तेलुगू में व्यावसायिक सिनेमा के वर्चस्व के दौरान पट्टाभिरामी रेड्डी, केएनटी शास्त्री, बी नरसिंह राव और अक्किनेनी कुटुम्बा राव ने अंतरराष्ट्रीय पहचान के लिए तेलुगु समानांतर सिनेमा का नेतृत्व किया। गिरीश कासारवल्ली, गिरीश कर्नाड और ब॰ व॰ कारन्त ने कन्नड़ फिल्म उद्योग में समानांतर सिनेमा के लिए मार्ग प्रशस्त किया। इस काल में कई साहित्यकारों ने सिनेमा में प्रवेश किया या सहयोग किया। इस अवधि के अन्य उल्लेखनीय फिल्म निर्माताओं में से कुछ प्रमुख व्यक्तित्व पी लंकेश, जीवी अय्यर और एमएस सथ्यू थे, जिनका बाद में 1980 के दशक में टीएस नागभरण , बारगुरु रामचंद्रप्पा, शंकर नाग, चन्द्रशेखर कम्बार ने अनुसरण किया था। अभिनेताओं में लोकेश, अनंत नाग, एल वी शारदा, वासुदेव राव, सुरेश हेब्लिकर, वैशाली कसरवली, अरुंधति नाग और कई अन्य ने प्रसिद्धि प्राप्त की। भवेन्द्रनाथ सैकिया और जाह्नु बरुआ ने इस क्षेत्र में असमिया सिनेमा के लिए किया काम किया, जबकि अरीबम स्याम शर्मा ने मणिपुरी सिनेमा में समानांतर फिल्मों का नेतृत्व किया। अवनति १९९० के दशक की शुरुआत में फिल्म निर्माण और फिल्मों के व्यवसायीकरण में बढ़ती लागतों का कला फिल्मों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।सिनेमा के चार अध्याय, डॉ॰ टी॰ शशिधरन, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण-2018, पृष्ठ-52. तथ्य यह है कि इसमें निवेश रिटर्न की गारंटी नहीं दी जा सकती है जिससे कला फिल्मों को फिल्म निर्माताओं के बीच कम लोकप्रिय बनाया जा सकता है। अंडरवर्ल्ड के वित्तपोषण, राजनीतिक और आर्थिक उथल-पुथल, टेलीविजन और पाइरेसी समानांतर सिनेमा के लिए घातक खतरा साबित हुआ और इसमें अवनति हुई। अवनति के अन्य प्रमुख कारण भारत में समानान्तर सिनेमा की अवनति का एक बड़ा कारण यह है कि एफएफसी या नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने इन फिल्मों के वितरण या प्रदर्शनी पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। मुख्य धारा की प्रदर्शनी प्रणाली ने इन फिल्मों को नहीं लिया क्योंकि इन फिल्मों में तथाकथित 'मनोरंजन मूल्य' नहीं थे जिनकी उन्हें तलाश थी। इस तरह की फिल्म के लिए छोटे थिएटर बनाने की बात चल रही थी, लेकिन प्रदर्शनी के इस वैकल्पिक मोड को महसूस करने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया था। इस प्रकार इन फ़िल्मों को प्रदर्शित करने के लिए कुछ फ़िल्मी सोसाइटियों को छोड़ दिया गया; वह भी एकल स्क्रीनिंग के आधार पर। टेलीविजन के आगमन और इसकी लोकप्रियता से फिल्म समाज के आंदोलन में गिरावट आयी। धीरे-धीरे सरकार ने ऐसी फिल्मों के संरक्षण को कम कर दिया, क्योंकि उनके पास केवल अनदेखी फिल्में थीं जिन्हें उनकी बैलेंस शीट पर दिखाया जाना था। समानांतर सिनेमा अपने वास्तविक अर्थों में हमेशा मुख्यधारा के सिनेमा के हाशिए पर था। चूँकि अधिकांश समानांतर सिनेमा ने प्रतिगामी विश्वदृष्टि को खारिज कर दिया था जो मुख्य रूप से मुख्यधारा के सिनेमा में सन्निहित थे, जिन्हें उन्होंने मुख्यधारा के उत्पादन, वितरण और प्रदर्शनी प्रणाली में कभी स्वीकार नहीं किया।एक वैकल्पिक प्रदर्शनी प्रणाली या एक आर्ट हाउस सर्किट की अनुपस्थिति के साथ, जैसा कि पश्चिम में कहा जाता है, वर्तमान पीढ़ी के फिल्म निर्माताओं द्वारा बनायी गयी कई ऑफ बीट फिल्में जैसे सुशांत मिश्रा, हिमांशु खटुआ, आशीष अविकुंठक, मुरली नायर, अमिताभ चक्रवर्ती, परेश कामदार, प्रिया कृष्णास्वामी, विपिन विजय, रामचंद्र पीएन, अश्विनी मल्लिक, आनंद सुब्रमण्यन, संजीवन लाल, अमित दत्ता, उमेश विनायक कुलकर्णी, गुरविंदर सिंह, बेला नेगी का कभी कोई बड़ा दर्शक वर्ग नहीं रहा। पुनरुत्थान 'समानान्तर सिनेमा' शब्द को बॉलीवुड में निर्मित ऑफ-बीट फिल्मों पर लागू किया जाने लगा है, जहाँ कला फिल्मों में पुनरुत्थान का अनुभव होना शुरू हो गया है। इसने 'मुंबई नॉयर' के रूप में जानी जाने वाली एक विशिष्ट शैली का उदय किया। शहरी फिल्में मुंबई शहर में सामाजिक समस्याओं को दर्शाती हैं। 'मुंबई नॉयर' का परिचय राम गोपाल वर्मा की सत्या (१९९८) से हुआ। हालांकि 'मुंबई नॉयर' एक शैली है जिसे महत्त्वाकांक्षा में कलात्मक नहीं माना जाता है। हालांकि यह मुंबई के अंडरवर्ल्ड के यथार्थवादी चित्रण पर ध्यान केंद्रित करता है। ये आम तौर पर व्यावसायिक फिल्में हैं। भारत में निर्मित कला फिल्मों के अन्य आधुनिक उदाहरणों को समानान्तर सिनेमा शैली के भाग के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिनमें रितुपर्णो घोष का उत्सव (2000) और दहन (1997), मणिरत्नम का 'युवा' (2004), नागेश कुकुनूर का '३ दीवारें' ( २००३) और 'डोर' (२००६), मनीष झा की मातृभूमि (२००४), सुधीर मिश्रा की 'हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी' (२००५), जाह्नु बरुआ की 'मैंने गाँधी को नहीं मारा (२००५), पान नलिन की 'घाटी' (२००६), ओ'नीर की 'माई ब्रदर ... निखिल' (२००५) और 'बस एक पल' (२००६), अनुराग कश्यप की ब्लैक फ्राइडे (२००७), विक्रमादित्य मोटवाने की 'उदय' (२००९), किरण राव की 'धोबीघाट' (२०१०), अमित दत्ता की सोनचिड़ी (२०११) और नवीनतम सनसनी है आनन्द गांधी की 'शिप ऑफ़ थिसस' (२०१३)। भारतीय अंग्रेजी में बोली जाने वाली स्वतंत्र फिल्में भी कभी-कभी निर्मित होती हैं। उदाहरणस्वरूप- रेवती के 'मित्र माइ फ्रेंड (२००२), अपर्णा सेन के मिस्टर & मिसेज अय्यर (२००२) और 15 पार्क एवेन्यू (२००६), होमी अदजानिया के 'बीइंग साइरस' (२००६), ऋतुपर्णो घोष के 'द लास्ट लियर' (२००७), और सूनी तारापोरवाला की 'लिटिल ज़िज़ो' (२००९)। आज सक्रिय अन्य भारतीय कला फ़िल्म निर्देशकों में बुद्धदेव दासगुप्ता, अपर्णा सेन, गौतम घोष, संदीप रे ( सत्यजीत रे के बेटे), कौशिक गांगुली, सुमन मुखोपाध्याय और कमलेश्वर मुखर्जी बाङ्ला सिनेमा में शामिल हैं। अडूर गोपालकृष्णन, शाज़ी एन॰ करुण, टीवी चंद्रन, सांसद सुकुमारन नायर, श्यामाप्रसाद, डॉ॰ बीजू और सनल कुमार ससीधरन मलयालम सिनेमा में; हिन्दी सिनेमा में कुमार शाहनी, केतन मेहता, गोविंद निहलानी, श्याम बेनेगल, अमित दत्ता, मनीष झा, आशिम अहलूवालिया, अनुराग कश्यप, आनंद गांधी और दीपा मेहता; तमिल सिनेमा में मणिरत्नम और बाला; तेलुगु सिनेमा में रजनीश डोमपल्ली और नरसिम्हा नंदी; जाह्नु बरुआ हिन्दी और असमिया सिनेमा में, तथा मराठी सिनेमा में अमोल पालेकर और उमेश विनायक कुलकर्णी शामिल हैं। आमिर खान ने अपने प्रोडक्शन स्टूडियो के साथ २१ वीं सदी की शुरुआत में सामाजिक सिनेमा के अपने ब्रांड की शुरुआत की, जिसमें व्यावसायिक मसाला फिल्मों और यथार्थवादी समानांतर सिनेमा के बीच का अंतर था, जो कि पूर्व के मनोरंजन और उत्पादन मूल्यों के साथ बाद के विश्वसनीय कथनों और मजबूत संदेशों का संयोजन है। उन्होंने भारत और विदेशों में व्यावसायिक सफलता और आलोचनात्मक प्रशंसा दोनों अर्जित करने के साथ समानांतर सिनेमा को मुख्यधारा के दर्शकों के लिए पेश करने में मदद की है। वैश्विक प्रभाव १९४० और १९५० के दशक में भारतीय समानांतर सिनेमा की प्रारंभिक अवधि के दौरान आंदोलन इतालवी सिनेमा और फ्रांसीसी सिनेमा से प्रभावित हुआ, विशेष रूप से इतालवी नवजागरण के साथ-साथ फ्रांसीसी काव्यात्मक यथार्थवाद से । सत्यजीत रे ने विशेष रूप से इतालवी फिल्म निर्माता विटोरियो डी सिका के 'बाइसिकल थीव्स' (१९४८) और फ्रांसीसी फिल्म निर्माता जीन रेनॉयर की 'रिवर' (१९५१) का हवाला दिया, जिनसे उन्हें सहायता मिली और उनकी पहली फिल्म पथेर पांचाली (१९५५) पर प्रभाव पड़ा, साथ ही बंगाली साहित्य और शास्त्रीय भारतीय रंगमंच का प्रभाव भी पड़ा। बिमल रॉय की 'दो बीघा ज़मीन' (१९५३) भी डे सिका की 'बाइसिकल थीव्स' से प्रभावित था। भारतीय नयी धारा भी उसी समय के आसपास शुरू हुई जब फ्रेंच न्यू वेव और जापानी न्यू वेव शुरु हुई। जब से चेतन आनंद के नीचा नगर ने १९४६ में उद्घाटन कान फिल्म महोत्सव में ग्रैंड पुरस्कार जीता तबसे भारतीय समानांतर सिनेमा फिल्में अक्सर कई दशकों तक अंतर्राष्ट्रीय मंचों और फिल्म समारोहों में दिखाई देती रहीं। इससे भारतीय स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं को वैश्विक दर्शकों तक पहुँचने की सुविधा मिली। उनमें सबसे प्रभावशाली सत्यजीत रे थे, जिनकी फ़िल्में यूरोपीय, अमेरिकी और एशियाई दर्शकों के बीच सफल हुईं। मार्टिन स्कॉरसे, जेम्स आइवरी, अब्बास किरोस्तामी, एलिया कज़ान, फ्रांकोइस ट्रूफ़ोट, कार्लोस जौरा, इसाओ ताकाहाता जैसे फिल्म निर्माताओं का प्रभाव सत्यजित रे पर पड़ा और रे के काम का बाद में दुनिया भर में प्रभाव पड़ा। वेस एंडरसन उनकी सिनेमाई शैली से प्रभावित हैं और कई अन्य जैसे अकीरा कुरोसावा उनके काम की प्रशंसा करते हैं। "आने वाले युवा नाटक, जिनमें मध्य-अर्द्धशतक के बाद से कला घरों में बाढ़ आ गयी है, उन पर अपु त्रयी का पर्याप्त ऋण है।" (१९५५-१९५९)। रे की फिल्म कंचनजंघा (१९६२) ने एक कथात्मक संरचना पेश की जो बाद के हाइपरलिंक सिनेमा से मिलती जुलती है। 'द एलियन' (१९६७) नामक फिल्म के लिए रे की स्क्रिप्ट , जिसे अंततः रद्द कर दिया गया था, के लिए व्यापक रूप से माना जाता है कि वह स्टीवन स्पीलबर्ग की ईटी (१९८२) की प्रेरणा थी। इरा सैक्स का 'फोर्टी शेड्स ऑफ़ ब्लू (२००५) 'चारुलता' का एक ढीला रीमेक था, और ग्रेगरी नावा के 'माई फैमिली' (१९९५) ​​में अंतिम दृश्य 'अपुर संसार' (१९५९) के अंतिम दृश्य से दोहराया गया है। रे की फिल्मों के समान सन्दर्भ हाल की कृतियों जैसे सेक्रेड एविल (२००६) में और दीपा मेहता के 'तत्त्व त्रयी' और जीन-ल्यूक गोडार्ड की फिल्मों में पाये जाते हैं। एक अन्य प्रमुख फिल्मकार मृणाल सेन हैं, जिनकी फिल्मों को उनके मार्क्सवादी विचारों के लिए जाना जाता है। अपनी कार्यशीलता के दौरान मृणाल सेन की फ़िल्मों को कान्स, बर्लिन, वेनिस, मॉस्को, कार्लोवी वैरी, मॉन्ट्रियल, शिकागो और काहिरा सहित लगभग सभी प्रमुख फिल्म समारोहों से पुरस्कार मिले हैं। उनकी फिल्मों के रेट्रोस्पेक्टिव्स को दुनिया के लगभग सभी बड़े शहरों में दिखाया गया है। एक अन्य बंगाली स्वतंत्र फिल्मकार ऋत्विक घटक अपनी मृत्यु के लंबे समय बाद १९९० के दशक की शुरुआत में वैश्विक दर्शकों तक पहुँचने लगे। घटक की फिल्मों के पुनर्संग्रहण के लिए एक परियोजना शुरू की गई थी। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों (और बाद में डीवीडी रिलीज) ने भी तेजी से वैश्विक दर्शकों को उत्पन्न किया है। रे की फिल्मों के साथ घटक की फिल्में कई सर्वकालिक महान् फिल्मों के चुनावों में भी दिखाई दीं। सत्यजीत रे की कई फिल्में 'दृश्य और ध्वनि' आलोचकों के सर्वेक्षण में सम्मिलित थीं, जिनमें 'अपू त्रयी' १९९२ में चतुर्थ स्थान पर (यदि वोटों को आपस में मिलाया जाये तो) रही। 'संगीत कक्ष' (१९९२ की गणना में) २७वें स्थान पर, 'चारुलता' क्रमांक ४१ पर और 'वन में दिन और रातें' ८१ वें स्थान पर रही। २००२ के 'दृश्य और ध्वनि' समीक्षकों और निर्देशकों के सर्वेक्षण में गुरु दत्त की फ़िल्में 'प्यासा' और 'कागज़ के फूल' (दोनों १६०वें) और ऋत्विक घटक की फ़िल्म 'मेघे ढाका' (२३१ वें स्थान पर) और 'कोमल गंधार' ३४६वें स्थान पर रहीं। १९९८ में एशियाई फिल्म पत्रिका 'सिनेमाया' द्वारा किये गये आलोचकों के सर्वेक्षण में 'अपु त्रयी' (अगर वोट मिलाया जाए तो) नंबर १ पर है। रे की 'चारुलता' और 'द म्यूज़िक रूम' दोनों ११वें स्थान पर संयुक्त रूप से और घटक की 'सुवर्णरेखा' भी ११वें स्थान पर संयुक्त रूप से रही। १९९९ में 'द विलेज वॉयस टॉप २५०' "शताब्दी की सर्वश्रेष्ठ फिल्में" के आलोचकीय चुनाव में 'अपू त्रयी' ५ वें स्थान पर शामिल थी। 'अपू त्रयी', 'प्यासा' और मणिरत्नम के नायकन को टाइम पत्रिका की 'सार्वकालिक १०० सर्वश्रेष्ठ फिल्में' (२००५) की सूची में शामिल किया गया था। १९९२ में 'साइट एंड साउंड' आलोचकीय सर्वेक्षण ने सत्यजि रे को 'सार्वकालिक शीर्ष १० निर्देशकों' की अपनी सूची में ७ वें स्थान पर, जबकि गुरुदत्त २००२ के 'साइट एंड साउंड' के 'सबसे महान् निर्देशक' के सर्वेक्षण में ७३ वें स्थान पर थे। सिनेमेटोग्राफर सुब्रत मित्रा, जिन्होंने रे की 'अपु त्रयी' के साथ अपनी शुरुआत की, का भी दुनिया भर में सिनेमैटोग्राफी पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव था। सेटों पर दिन के उजाले के प्रभाव को फिर से बनाने के लिए उनकी सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों में से एक उछाल प्रकाश था। उन्होंने 'अपु त्रयी' के दूसरे भाग 'अपराजितो' (१९५६) को फिल्माते हुए तकनीक का अग्रगामी प्रयोग किया। सत्यजीत रे ने जिन प्रायोगिक तकनीकों का अग्रगामी प्रयोग किया है उनमें कुछ फोटो-नकारात्मक फ्लैशबैक और एक्स-रे डिजिटेशन शामिल हैं, जबकि 'प्रतिद्वन्द्वी' (१९७२) को फिल्माया गया। इन्हें भी देखें भारतीय सिनेमा हिन्दी सिनेमा सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ श्रेणी:फ़िल्म श्रेणी:भारतीय फ़िल्में श्रेणी:हिन्दी फ़िल्में