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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

भोजन मन्त्र

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भोजन मंत्र भोजन करने से पहले पढ़ा जाने वाला एक मंत्र है।Bhojan Mantra & Meaning https://www.aryasamajhouston.org/index.php?option=com_content&view=article&id=147&Itemid=140 Arya Samaj Greater Houston 27 August 2025Bhojan Mantra https://hssgermany.org/bhojan-mantra Hindu Swayamsevak Sangh E.V. (Germany) 27 August 2025 यह प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुसार प्रचलित है।Brahmarpanam: The Food Prayer https://www.sathyasai.org/about-us/health-corner/food-prayer Satya Sai Organisation 27 August 2025 भोजन मंत्र केवल धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से मानसिक एकाग्रता, कृतज्ञता और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा दिया जाता है। आधुनिक समय में भी कई घरों, मंदिरों और धार्मिक आयोजनों में भोजन से पहले इस मंत्र का पाठ किया जाता है। भोजन मंत्र ॐ ॐ बृह्मार्पणं बृह्महर्विबृह्माग्नौ बृह्मणा हुतम्। बृह्मैव तेन गन्तव्यं बृह्मकर्मसमाधिना॥ (गीता)Bhagavad Gita 4.24 https://www.holy-bhagavad-gita.org/chapter/4/verse/24 Bhagavad Gita 27 August 2025 ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु। सर्वविःयं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ (कठोपनिषद)Katha Upanishad Shanti Mantra: 'Om saha nāvavatu…' https://shlokam.org/texts/katha-invocation/ Shlokam.org 27 August 2025 10 दिसंबर 2025 https://web.archive.org/web/20251210073138/https://shlokam.org/texts/katha-invocation/ dead ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ भोजन मंत्र का अर्थ “बृह्मार्पणं बृह्महर्विबृह्माग्नौ बृह्मणा हुतम्। ब्रह्म के लिए, ब्रह्म रूप अग्नि में, ब्रह्म रूप आहुति के साथ हवन किया— “बृह्मैव तेन गन्तव्यं बृह्मकर्मसमाधिना॥” इस ब्रह्मरूप साधन के फलस्वरूप जो परम फल प्राप्त होगा, वह उसी ब्रह्मरूप में होगा। “ॐ सह नाववतु।” हम एक-दूसरे की रक्षा करें। “सह नौ भुनक्तु।” सभी भोग्य वस्तुएँ हम मिलकर उपभोग करें। “सर्वविःयं करवावहै।” हम मिलकर बड़ा पराक्रम करें। “तेजस्विनावधीतमस्तु।” हमारा अध्ययन और ज्ञान तेजस्वी हो। “मा विद्विषावहै।” हम एक-दूसरे से वैर त्याग करें। “॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥” सभी प्रकार की शांति हो — आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक। भोजन मंत्र का उद्देश्य हमें सात्विक (शुद्ध, शांतचित्त) मन से भोजन करना चाहिए। हमारे पूर्वजों ने भोजन करने से पहले ईश्वर को भोजन अर्पित करने की सलाह दी। इस प्रकार ग्रहण किया गया भोजन प्रसाद (पवित्र भोजन) बन जाता है। प्रार्थना से पात्र की सफाई, भोजन सामग्री की स्वच्छता, और पकाने की प्रक्रिया में स्वच्छता सुनिश्चित होने के कारण भोजन तीन प्रकार की अशुद्धियों से मुक्त हो जाता है। भोजन को शुद्ध करना आवश्यक है क्योंकि शुद्ध भोजन शुद्ध मन बनाने में सहायक होता है। ईश्वर को अर्पित किया गया भोजन पाचन तंत्र में 'वैष्णव' के माध्यम से पचता है। चूंकि ईश्वर वैष्णव के रूप में अग्नि में विद्यमान हैं, इसलिए वे अशुद्धियों के साथ भोजन को भी पचा लेते हैं। इस प्रकार भोजन में अशुद्धि होने पर भी मनुष्य पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। स्रोत श्रेणी:हिन्दू मंत्र श्रेणी:मंत्र