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हरनामदत्त शास्त्री
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हरनामदत्त शास्त्री (१८४३-१९१५)लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस संग्रह सूची संस्कृत व्याकरण के विद्वान थे। इनका जन्म जगाधरी (वर्तमान हरियाणा में) में हुआ था। इनके पिता का नाम मुरारिदत्त था। वाराणसी में शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात आप पाणिनि व्याकरण शास्त्र के प्रख्यात भाष्याचार्य हुए।सारस्वत, डॉ॰ परमानन्द (१९८४) साहित्य़स्रष्टा श्री विद्याधर शास्त्री, प्रकाशक: गनु प्रकाशन, बीकानेर पृष्ठ ३ आप चूरु (राजस्थान) में स्थापित हरनामदत्त शास्त्री संस्कृत पाठशाला के प्रधान शिक्षक थे।
भाष्याचार्य के वाराणसी निविष्ट शिष्य वर्ग में गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी, विद्यावाचस्पति बालचन्द्रजी, पंडित रामानन्दजी, पंडित जयदेवजी मिश्र तथा पंडित विलासरायजी के नाम उल्लेखनीय हैं।सारस्वत पृष्ठ४
संस्कृत महाकाव्य, हरनामाम्रितम् विद्यावाचस्पति विद्याधर शास्त्री द्वारा लिखित एक काव्य जीवनी है।
हरनामामृतम्
महाकाव्य में कवि ने पितामह हरनामदत्त शास्त्री की जीवन गाथा को दर्शाया है। यह उनके परिवार की प्रशंसा नहीं है बल्कि विद्वानों के विनम्र और शांत गुणों के बारे में पाठकों को चेत्रित करने का प्रयास है। कवि नवीन संस्कृत कविताओं के लेखन को भी प्रोत्साहित करना चाहते हैं। महाकाव्य सोलह सर्गों में विभाजित है।
सर्ग १-४
पहले सर्ग में कवि ने ईश्वर का आवाहन किया है। कवि ने इस नवीन कृति को भारतीय संस्कृति के प्रचार हेतु उपक्रम माना है। दूसरे सर्ग में नायक के पिता मुरारिदत्त के पुत्र अभाव में दुःख और शिव पूजा के पश्चात वरदान का उल्लेख है। इसी सर्ग में मुरारिदत्त परिवार परम्पराओं के रक्षण का निर्देश प्राप्त करते हैं। तीसरे सर्ग में नायक का जन्म होता है परन्तु शिशु की माँ का अकस्मात् देहांत हो जाता है और उसका पालन पोषण पित्रिव्या हरदेई करती है। इसके उपरांत बालक की पठन में अनुत्सुकता, मल्ल विद्या (कुश्ती) से आकर्षण और मुरारिदत्त का उसको विवाह बंधन में प्रतिबद्ध करने का वर्णन है। चौथे सर्ग में बालक कुछ समय तक पिता को प्रसन्न करने का प्रयास करता है परन्तु मल्ल विद्या में रुचि के कारण एक आगंतुक मल्ल (पहलवान) से युद्ध करके विजयी होता है। पिता सभी के सामने बालक का तिरस्कार करते हैं, कुपित होकर बालक घर छोड़कर चला जाता है। दिल्ली में वह एक दूसरे मल्ल से परास्त होता है और एक वृद्ध से प्रभावित होकर शिक्षा हेतु वाराणसी चला जाता है।
सर्ग ५-८
पांचवे सर्ग में वाराणसी के पवित्र पावन दृश्य का चित्रण है। वाराणसी में अध्यापक होनहार शिष्य को पाकर बहुत प्रसन्न होते हैं। अध्ययन की समाप्ति पर नायक वाराणसी में शिक्षक नियुक्त होता है और उसकी सुगम शिक्षा प्रणाली की ख्याति छात्रों को आकर्षित करती है। उसी समय पिता का पुत्र वियोग और नायक की पत्नी के सुचरित व्यव्हार का वर्णन है। एक यात्री से पिता को पुत्र की सूचना मिलती है और पुत्रवधू के सहित मुरारिदत्त काशी पहुँचता है। पिता नायक की उन्नति से अति प्रसन्न होता है और वाराणसी में थोड़े समय रहकर जगाधरी लौट जाता है। छठे सर्ग में नायक के घर पुत्र का जन्म होता है परन्तु नवजात शिशु का शीघ्र ही देहांत हो जाता है। इस दुर्भाग्य से नायक को बहुत दुःख होता है और उसका मन विचलित हो उठता है। वाराणसी के मनीषियों के उपदेश को पाकर नायक का मन स्थिर हो जाता है। सप्तम सर्ग में चूरु के सेठ भगवानदास बागला का वाराणसी आगमन होता है और वह नायक से चूरु में संस्कृत विद्यालय स्थापित करने की विनती करते हैं। प्रारंभ में नायक चूरु प्रवास को अस्वीकृत कर देता है परन्तु अंत में सेठ बागला की याचना से सहमत हो जाता है। आठवें सर्ग में चूरु निवासियों द्वारा भाष्याचार्य के अपूर्व स्वागत का वर्णन है। इसी सर्ग में मरुभूमि की मनोरमा का सुन्दर चित्रण है। नायक की सरल शिक्षा प्रणाली के कारण सुदूर क्षेत्रों से छात्रों का आगमन होता है और चूरु की ख्याति एक नव वाराणसी के रूप में होती है।
सर्ग ९-१२
नवें सर्ग में १८८९ में हुए अनाकाल का वर्णन है। नायक दुर्भिक्ष से विमोचन हेतु शिव पूजा का आयोजन करता है। पूजा के फलस्वरूप मरुदेश में मूसलाधार वर्षा का वर्णन इस सर्ग के विशेषता है। दसवें सर्ग में नायक भक्तों और शिष्यों सहित तीर्थ यात्रा पर प्रस्थान करते हैं। मरुभूमि में यात्रा के कष्ट और मधुर दृश्यों का सुन्दर चित्रण है। डाकुओं का एक गिरोह यात्रियों को घेर लेता है, नायक दस्युदल को अभयपूर्वक सम्बोधित करता है। नायक डाकुओं को सच्चे क्षत्रिय बनने का उपदेश देता है। ग्यारवें सर्ग में नायक अपने पुत्रों को गृहस्थ आश्रम पालन का उपदेश देता है और हरिद्वार के लिए प्रस्थान करता है। हरिद्वार में नायक सिद्दाश्रम में निवास करते हुए वानप्रस्थ आश्रम कर्मों का आचरण करता है। सर्ग में पर्वतीय सौंदर्य का रमणीय वर्णन है। बारहवें सर्ग में गुरुकुल कांगड़ी के छात्रावासीय वातावरण का चित्रण है। इसी सर्ग में नायक के विद्यार्थियों और सहयोगियों की सूची है। इस सूची में स्वामी श्रदानंद, काका कालेलकर, नरदेव शास्त्री और पदमसिंह शर्मा के नाम प्रमुख हैं। सर्ग में कुरुक्षेत्र का वर्णन है जहाँ नायक को ब्राह्मण सम्मलेन के अध्यक्ष के रूप में आमंत्रित किया गया है।
सर्ग १३-१६
संपूर्ण तेरहवां सर्ग नायक का ब्राह्मण सम्मलेन में अध्यक्ष पद से दिया गया व्याख्यान है। भाषण में नायक ब्राह्मण के कर्तव्यों तथा नियमित सेवाओं का आचरण करने के लिए ब्राह्मणों को उद्बोधित करता है। सर्ग विश्व कल्याण की कामना के साथ समाप्त होता है। यह सर्ग महाकाव्य का मुख्य सन्देश है। चौदहवें सर्ग में नायक सम्मिलित विद्वानों से 'वैदिक हिंसा हिंसा न भवति' विषय पर वाद विवाद करता है। नायक यज्ञ में पशुवध का विरोध करता है। सर्ग में यज्ञ तत्त्व का स्पष्ट तथा उद्भूत रूप से विवेचन है। पन्द्रहवें सर्ग में नायक कुम्भ पर्व के अवसर पर संस्कृत सम्मलेन को सम्बोधित करता है। भाषण में नायक ने सुरभाषा (संस्कृत) की गुरुता तथा सुलभता का वर्णन किया है। संस्कृत काव्य में संस्कृत के मह्त्त्व का प्रदर्शन इस काव्य की विशेषता है। सर्ग संस्कृत के प्रचार के लिए मंगलाचरण के साथ समाप्त होता है। सोलहवें सर्ग के आरंभ में नायक की जर्जर स्थिति तथा शिष्यों द्वारा उनकी चरणसेवा का उल्लेख है। सर्ग में नायक के उन शिष्यों की सूची है जिन्होनें भारतीय संस्कृति के प्रसार में योगदान दिया। भारतीय संस्कृति के सनातन तथा अक्षय होने की कामना के साथ महाकाव्य का समापन किया गया है।सारस्वत पृष्ठ२८-३३
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस संग्रह सूची में हरनामाम्रितम्
लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस संग्रह सूची में साहित्य़स्रष्टा श्री विद्याधर शास्त्री
श्रेणी:संस्कृत विद्वान