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411 समाचार
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भारत के संविधान की छठी अनुसूची

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thumb|right|280px|पूर्वोत्तर भारत भारत के संविधान की छठी अनुसूची पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी अंचलों में निवास करने वाली जनजातियों के स्वाभिमान, परंपराओं और आत्मनिर्भर जीवन पद्धति को सम्मानित करने वाली एक दूरदर्शी संवैधानिक व्यवस्था है। यह केवल प्रशासनिक ढाँचा नहीं, बल्कि विविधता में एकता की भारतीय भावना का सजीव प्रतीक है, जो यह स्वीकार करती है कि हर समुदाय की अपनी विशिष्ट पहचान और शासन-पद्धति होती है। इस अनुसूची के माध्यम से जनजातीय समाज को स्वायत्तता और स्वशासन के ऐसे अधिकार प्रदान किए गए हैं, जिनसे वे अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन से जुड़े निर्णय स्वयं ले सकें।प्रभात कुमार दत्ता पंचाली सेन Governance in the Sixth Schedule Areas in India's North-East: Context, Content and Challenges इंडियन जर्नल ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 66 2 जून 2020 191–205 10.1177/0019556120916885 219000331 अवलोकन ब्रिटिश शासन के काल में असम प्रांत के वे सीमावर्ती भू-भाग, जहाँ जनजातीय समुदायों का वर्चस्व था, प्रशासनिक दृष्टि से विशेष श्रेणियों में विभाजित कर दिए गए थे। इन क्षेत्रों को “बहिष्कृत” तथा “आंशिक रूप से बहिष्कृत” घोषित किया जाना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि वह उस दूरी और अलगाव का प्रतीक था, जो औपनिवेशिक सत्ता और जनजातीय जीवन के बीच विद्यमान था। उत्तर-पूर्वी सीमांत क्षेत्र (वर्तमान अरुणाचल प्रदेश), नागा हिल्स जिला (वर्तमान नागालैण्ड) और लुशाई हिल्स जिला (वर्तमान मिज़ोरम) को पूर्णतः “बहिष्कृत क्षेत्र” का दर्जा दिया गया, जबकि खासी और जयंतिया हिल्स (वर्तमान मेघालय) को “आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्र” के रूप में चिह्नित किया गया। यह बहिष्करण एकतरफा नहीं, बल्कि द्विदिशात्मक था। एक ओर जहाँ इन जनजातीय क्षेत्रों को असम प्रांत की विधायिका और प्रशासनिक ढाँचे से अलग रखा गया, वहीं दूसरी ओर प्रांतीय कानूनों का प्रभाव भी इन क्षेत्रों पर लागू नहीं होता था। इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप जनजातीय समाज अपनी परंपरागत शासन प्रणालियों के अंतर्गत अपेक्षाकृत स्वतंत्र बना रहा। उन्होंने अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और न्यायिक जीवन का संचालन अपनी रीति-रिवाजों के अनुरूप किया, जबकि औपनिवेशिक शासन के साथ उनका संबंध प्रायः कराधान और सड़क निर्माण जैसे सीमित शासकीय उद्देश्यों तक ही सिमटकर रह गया। इस प्रकार यह व्यवस्था एक ओर अलगाव की नीति को दर्शाती है, तो दूसरी ओर जनजातीय स्वायत्तता की एक अनकही स्वीकृति भी प्रस्तुत करती है। भारत के संविधान के निर्माण के समय, जनजातीय समुदायों की विशिष्ट पहचान और उनके पारंपरिक जीवन-तंत्र को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी संवैधानिक संरचना गढ़ी गई, जिसने औपनिवेशिक काल की कुछ व्यवस्थाओं को नए स्वरूप में आगे बढ़ाया। इसी दृष्टि से छठी अनुसूची का सृजन हुआ, जिसका उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय क्षेत्रों को वास्तविक स्वायत्तता प्रदान करना और उन्हें अपनी पारंपरिक स्वशासन प्रणालियों को अक्षुण्ण रखने की स्वतंत्रता देना था। यह व्यवस्था केवल प्रशासनिक सुविधा का परिणाम नहीं थी, बल्कि उस गहन समझ का प्रतीक थी, जिसके अंतर्गत यह स्वीकार किया गया कि इन समुदायों की सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक मूल्य और जीवन-दृष्टि देश के अन्य भागों से भिन्न है। इसके विपरीत, भारत के अन्य जनजातीय क्षेत्रों को पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत रखा गया, जहाँ स्वायत्तता का स्वरूप अपेक्षाकृत सीमित और संरक्षित था। इस भिन्नता के पीछे का तर्क स्पष्ट करते हुए डॉ. भीमराव अंबेडकर ने यह रेखांकित किया कि असम के बाहर के अनेक जनजातीय समुदाय समय के साथ अपने आस-पास के बहुसंख्यक समाज की संस्कृति और जीवन-शैली में काफी हद तक समाहित हो चुके थे, जबकि असम के जनजातीय समुदायों ने अपनी मौलिक सांस्कृतिक पहचान, परंपराएँ और सामाजिक व्यवस्थाएँ अधिक दृढ़ता से सुरक्षित रखी थीं। उनके उत्तराधिकार, विवाह और रीति-रिवाजों की प्रणाली मुख्यधारा से स्पष्ट रूप से भिन्न थी। यही मूलभूत अंतर इस बात का आधार बना कि असम के लिए एक पृथक और अधिक सशक्त स्वायत्तता प्रदान करने वाली व्यवस्था की आवश्यकता अनुभव की गई। तत्कालीन असम राज्य में छठी अनुसूची के अंतर्गत जिन क्षेत्रों को स्वायत्त शासन की विशेष व्यवस्था प्रदान की गई, वे उस समय की प्रशासनिक दूरदर्शिता और जनजातीय अस्मिता के संरक्षण की गहरी प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करते हैं। इन क्षेत्रों को दो भागों—‘भाग ए’ और ‘भाग बी’—में विभाजित कर उनके लिए स्वायत्त जिला परिषदों की स्थापना की गई, ताकि स्थानीय समुदाय अपनी परंपराओं, संसाधनों और सामाजिक संरचनाओं के अनुरूप शासन संचालित कर सकें। ‘भाग ए’ के अंतर्गत संयुक्त खासी-जयंतिया पहाड़ियाँ और गारो पहाड़ियाँ (वर्तमान मेघालय), उत्तरी कछार पहाड़ियाँ और मिकिर पहाड़ियाँ (वर्तमान असम), लुशाई पहाड़ियाँ (वर्तमान मिजोरम) तथा नागा पहाड़ियाँ (वर्तमान नागालैंड) सम्मिलित थीं। ये क्षेत्र सांस्कृतिक विविधता और जनजातीय परंपराओं के जीवंत केंद्र थे, जहाँ स्वायत्त परिषदों के माध्यम से स्थानीय प्रशासन को सुदृढ़ आधार प्रदान किया गया। ‘भाग बी’ के अंतर्गत उत्तर-पूर्वी सीमांत क्षेत्र (वर्तमान अरुणाचल प्रदेश) और नागा जनजातीय क्षेत्र (वर्तमान नागालैंड) को रखा गया, जहाँ विशेष परिस्थितियों के अनुरूप प्रशासनिक प्रावधान विकसित किए गए। छठी अनुसूची के अंतर्गत तत्कालीन असम राज्य के क्षेत्रों का विभाजन केवल प्रशासनिक सुविधा का परिणाम नहीं था, बल्कि उनके सामाजिक-राजनीतिक विकास के स्तर को ध्यान में रखते हुए किया गया एक सुविचारित प्रयास था। ‘भाग ए’ के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों को अपेक्षाकृत अधिक विकसित और लोकतांत्रिक संस्थाओं के संचालन के योग्य माना गया, जहाँ स्वायत्त जिला परिषदें प्रभावी रूप से कार्य कर सकती थीं। इसके विपरीत, ‘भाग बी’ के क्षेत्रों को उस समय विकास की प्रारंभिक अवस्था में समझा गया, जहाँ प्रशासनिक नियंत्रण अधिक संवेदनशीलता और प्रत्यक्ष निगरानी की माँग करता था। फलस्वरूप इन क्षेत्रों का प्रशासन असम के राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकारों के अधीन रखा गया, जिससे वहाँ की परिस्थितियों के अनुरूप लचीली शासन व्यवस्था संभव हो सके। मणिपुर और त्रिपुरा, जो असम प्रांत का हिस्सा न होकर पृथक रियासतें थीं, प्रारंभ में छठी अनुसूची के दायरे से बाहर रह गए, यद्यपि उनकी जनजातीय संरचना और आवश्यकताएँ इस प्रकार की व्यवस्था के अनुकूल थीं। समय के साथ, उत्तर-पूर्व के राजनीतिक मानचित्र में परिवर्तन हुए—नागा हिल्स और लुशाई हिल्स क्रमशः नागालैंड और मिजोरम के रूप में स्वतंत्र राज्य बने, जिससे उनके लिए पूर्ववर्ती प्रावधान अप्रासंगिक हो गए। फिर भी, इन राज्यों के भीतर स्थित अल्पसंख्यक जनजातीय क्षेत्रों को बाद में छठी अनुसूची के अंतर्गत लाकर संरक्षण और स्वायत्तता प्रदान की गई। इसी क्रम में उत्तर-पूर्वी सीमांत क्षेत्र भी विकसित होकर अरुणाचल प्रदेश के रूप में एक स्वतंत्र राज्य बना। जब मेघालय ने असम से अलग होकर अपना अस्तित्व स्थापित किया, तब गारो, खासी और जयंतिया पहाड़ियों ने अपनी छठी अनुसूची के अंतर्गत प्राप्त स्वायत्त स्थिति को यथावत बनाए रखा, जो इस व्यवस्था की निरंतरता और प्रासंगिकता को दर्शाता है। दूसरी ओर, त्रिपुरा ने भी अपने जनजातीय क्षेत्रों की विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1982 में एक स्वायत्त जिला परिषद की स्थापना की और तत्पश्चात उसे छठी अनुसूची के अंतर्गत सम्मिलित करने का अनुरोध किया, जिसे 1984 में स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार, छठी अनुसूची समय के साथ विकसित होती हुई एक जीवंत संवैधानिक व्यवस्था के रूप में उभरी, जिसने बदलते राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्यों के अनुरूप जनजातीय स्वायत्तता और संरक्षण को सुदृढ़ किया।गदाधरा मोहपात्रा Decentralised Governance and Tribal Development in Scheduled Areas of Northeast India: A Case Study of the Tripura Tribal Areas Autonomous District Council इंडियन जर्नल ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 63 3 सितंबर 2017 10.1177/0019556117720616 छठी अनुसूची के जिले भारत में छठी अनुसूची के अंतर्गत 10 जिले हैं। +छठी अनुसूची के जिलों की सूचीक्रम संख्यास्वायत्त परिषदराज्य/केंद्र शासित प्रदेशमुख्यालयगठन1बोड़ोलैंड क्षेत्रीय परिषदअसमकोकराझार20032उत्तर कछार हिल्स स्वायत्त परिषदअसमहाफलांग19513कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषदअसमडिफू19524गारो हिल्स स्वायत्त जिला परिषदमेघालयतुरा19735जयन्तिया हिल आटोनोमस डिस्ट्रिक्ट काउन्सिलमेघालयजोवाई19736खासी हिल स्वायत्त जिला परिषदमेघालयशिलांग19737चकमा स्वायत्त ज़िला परिषदमिज़ोरमकमलानगर19728लाई स्वायत्त ज़िला परिषदमिज़ोरमलौंगत्लाइ19729मारा स्वायत्त ज़िला परिषदमिज़ोरमसइहा197210त्रिपुरा आदिवासी क्षेत्र स्वशासी जिला परिषदत्रिपुराखुमुलुंग1982 सन्दर्भ ग्रन्थसूची जंगखोंगम डौंगेल The Sixth Schedule to the constitution of India: Emergence and development 17–33 एम. अमरजीत सिंह Autonomy and Democratic Governance in Northeast India रूटलेज 2022 9781003158417 https://books.google.com/books?id=JTZbEAAAQBAJ&pg=PT26 10.4324/9781003158417-3 स्कोलाल कोम Identity and Governance: Demand for Sixth Schedule in Manipur भारतीय राजनीति विज्ञान पत्रिका LXXI 1 जनवरी-मार्च 2010 313–322 42748389 थोंगखोलाल हाओकिप Dereliction of Duties or the Politics of 'Political Quadrangle'? The Governor, Hill Areas Committee and Upsurge in the Hills of Manipur इंडियन जर्नल ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन 63 3 सितंबर 2017 456–474 10.1177/0019556117720606 158347359 पियांग एल. लाम खान https://www.epw.in/journal/2019/15/special-articles/institutional-exclusion-hill-tribes-manipur.html Institutional Exclusion of the Hill Tribes in Manipur: Demand for Protection under the Sixth Schedule आर्थिक और राजनीतिक साप्ताहिक 13 अप्रैल 2019 54 15 सुमरबिन उमडोर के. वनलालहरुइतलुआंगा All is not well in the Sixth Schedule - A Reaction to the Demand for the Sixth Schedule in Ladakh आर्थिक और राजनीतिक साप्ताहिक 58 49 9 दिसंबर 2023 https://www.epw.in/journal/2023/49/commentary/all-not-well-sixth-schedule.html बाहरी कड़ियाँ Sixth Schedule: Provisions as to the Administration of Tribal Areas in the States of Assam, Meghalaya, Tripura and Mizoram, विदेश मंत्रालय, भारत सरकार, retrieved 14 फरवरी 2024. श्रेणी:भारत की जनजातियाँ