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नारायण वामन तिलक
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नारायण वामन तिलक (6 दिसम्बर, 1861 – 1919) एक मराठी कवि थे।
नारायण वामन तिलक का जन्म ६ दिसंबर १८६१ में महाराष्ट्र राज्य के जिला रत्नगिरि के करज गाँव में हुआ था। इनके पिता का स्वभाव कठोर था तथा माता कोमल स्वभाव की थीं। इसलिए सब बच्चे माँ को ही अधिक मानते थे। माता का धर्म से तथा कविता से प्रेम था, अत: तिलक भी बाल्यावस्था से ही धार्मिक प्रवृत्ति के तथा कविता लिखने के शौकीन थे।
माता का देहांत ११ वर्ष की अवस्था में हो जाने के कारण उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन आया। उन्होंने निश्चय किया कि अब वे अपने पिता से अलग रहकर संसार में अपने लिए स्वयं ही मार्ग ढूँढ़ेगे। वे नासिक चले गए और वहाँ एक युवक के घर में शरण पाई। नासिक में उनकी भेंट प्रसिद्ध विद्वान् गणेश शास्त्री लेले से हुई। उन्होंने नारायण तिलक को संस्कृत की नि:शुल्क शिक्षा दी। एक हाई स्कूल के प्रिंसिपल ने उन्हें कक्षा में नि:शुल्क बैठने की अनुमति दी। इस प्रकार उन्होंने अंग्रेजी का अध्ययन आरंभ किया। इसी समय उनके पिता ने शेष चार बच्चों को भी नासिक भेज दिया कि वे नारायण के साथ रहें। उनको स्कूल छोड़कर जीविका की तलाश में इधर उधर भटकना पड़ा। फिर भी उन्होंने अपना अध्ययन नहीं छोड़ा।
कुछ कठिनाई के उपरांत एक स्वजातीय लड़की के साथ उनका विवाह हो गया। वे बहुत समय तक किसी एक वातावरण में न रह सके क्योंकि सत्य की खोज में उनकी तीव्र प्रतिभा बराबर उन्हें नवीन क्षेत्रों की ओर ढकेल रही थी। अपनी युवती पत्नी को उसके मायके में छोड़कर वे महाराष्ट्र का कोना-कोना छानते हुए दूर निकल जाते थे। वे कीर्तन करते, पुराण पढ़ते और व्याख्यान दिया करते थे। धार्मिक क्षेत्रों में वे बड़े उत्साह के साथ सत्य की खोज करते थे। किशोरावस्था में ही जातिवाद से घृणा कने लगे थे। उनकी प्रबल इच्छा थी कि वे बेड़ियाँ जो भारत माँ को जकड़े हुए हैं, तोड़ दी जाएँ। वे मूर्तिपूजा तथा जातिवाद रूपी दीवारों को गिरा देना चाहते थे।
उनकी भेंट नागपुर के एक धनी नागरिक अप्पा साहब से हुई जिन्होंने वैदिक तथा अन्य धर्मग्रंथों का संग्रह करने में काफी रकम खर्च की थी। नारायण वामन तिलक ने इन संस्कृत की रचनाओं का मराठी भाषा में अनुवाद किया।
एक दिन तिलक नागपुर से राजनाँदगाँव राजा के पास नौकरी करने जा रहे थे कि रेलगाड़ी में उनकी भेंट एक अंग्रेज मिशनरी से हुई जिसने उनको बाइबिल की प्रतिलिपि पढ़ने को दी। अरुचि होने के बावजूद उन्होंने इसे पढ़ने की प्रतिज्ञा की।
महीनों तक बाइबिल का अध्ययन करने के बाद मसीही धर्म की सत्यता का उनमें मन में विश्वास हो गया। उन्होंने अमरीकी-मराठी मिशन के पादरी जे.इ. ऐबट साहब से १० फरवरी, १८९५ ई. को बंबई में बप्तिस्मा ले लिया।
मनुष्य के नाते नारायण वामन तिलक ने अपने साथियों से जाति, धर्म और कुल का भेदभाव रखे बिना प्रेम किया। किसी विद्वान् ने उनसे प्रश्न किया कि 'प्रभु की सेवा क्या है?' तिलक जी ने उत्तर दिया कि 'जनसेवा ही प्रभु की सेवा के बराबर है। अपने हित को बिसार दो और दूसरों के हित को अपना हित समझो।'
भारतीय होने के नाते वे महान् देशभक्त थे। उनमें ऐसी ज्वलंत देशभक्ति विद्यमान थी जिसका अनुभव उनके संपर्क में आकर कोई भी व्यक्ति कर सकता था। वे कहा करते थे कि जब तक मनुष्य देशभक्त न हो, वह यीशु मसीह का सच्चा भक्त नहीं हो सकता।
संपूर्ण महाराष्ट्र के नगरों तथा गाँवों में मसीही जनता उनके बनाए हुए गानों को समय समय पर गाया करती है। उनकी मृत्यु १२ जून, १९४० ई. में महाबलेश्वर में हुई।
सन्दर्भ
श्रेणी:मराठी कवि