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निरंकारी
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निरंकारी सम्प्रदाय सिख धर्म का एक सम्प्रदाय है।हरबंस सिंह, (2011) Nirankaris [निरंकारी], (अंग्रेज़ी में) एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ सिखिज्म, भाग III, पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला, पृष्ठ 234–235 यह सन् 1851 में उत्तर-पश्चिम पंजाब में बाबा दयाल द्वारा स्थापित एक सुधार आंदोलन था। उन्होंने सिखों की प्रथाओं और मान्यताओं को वापस उसी रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जैसा उनके अनुसार गुरु नानक के समय प्रचलित थीं। यह आंदोलन सिख साम्राज्य के अंत और रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद सिख इतिहास में उभरा।https://books.google.com/books?id=YOI1nB_zTyAC Sikhism हार क्रिस्टन कलसी सेवा सिंह इन्फोबेस पब्लिशिंग 2009 978-1-4381-0647-2 11–12
निरंकारी किसी भी छवि के साथ "निराकार" ईश्वर की प्रस्तुति का दृढ़ता से विरोध करते हैं और मानते हैं कि साच्चा सिख धर्म नाम सिमरन (ईश्वर के नाम को याद रखना और दोहराना) पर आधारित है। वो बाबा दयाल दास वंश के जीवित वंशानुगत गुरुओं में विश्वास करते हैं। उनके अनुसार सिख धर्मग्रंथ एक खुला पाठ है जिसमें गुरु गोविन्द सिंह के बाद उनके जीवित गुरुओं के ज्ञान के साथ जोड़ा जा सकता है। निरंकारी मानते हैं कि धर्मग्रंथ की व्याख्या करने और सिखों का मार्गदर्शन करने के लिए एक मानव गुरु की आवश्यकता है।Sects and other groups: Sikhism, एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटैन्निका
निरंकारी स्वयं को सिख मानते हैं और सिख इतिहास का भाग मानते हैं। मूल रूप से रावलपिंडी में अपने दरबार के निकट के क्षेत्रों में बसे थे लेकिन सन् 1947 में भारत के विभाजन के बाद उन्होंने नव निर्मित मुस्लिम-प्रधान पाकिस्तान को छोड़ने का निर्णय लिया और सामूहिक रूप से भारत चले आये। सन् 1958 में उन्होंने चण्डीगढ़ में एक नया दरबार स्थापित किया। निरंकारी सिख समकालीन भारत में बस हुये हैं जिनमें श्रीनगर से कोलकाता तक के समुदाय शामिल हैं।
सन्दर्भ
श्रेणी:सम्प्रदाय