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411 समाचार
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बंगाल विधान परिषद

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बंगाल विधान परिषद বঙ্গীয় আইন পরিষদ bn Bengal Legislative Council बंगाल विधानमंडल Badge of British Bengal.svg 120px एकसदनीय विधायिका (1862–1937)उच्च सदन (1937–1947) बंगाल संविधान सभा (निचला सदन, 1937–1947) 1862 1947 पश्चिम बंगाल विधान परिषद (भारत)पूर्वी बंगाल प्रांतीय सरकार (पाकिस्तान) सभापति (अंतिम) नूरुल अमीन 12 (1862 में)20 (1892 में)53 (1909 में)140 (1919 में)63–65 (1935 में) सीमित मताधिकार एवं पृथक निर्वाचक मंडल कलकत्ता, ब्रिटिश भारत बंगाल विधान परिषद (Bengal Legislative Council; বঙ্গীয় আইন পরিষদ) ब्रिटिश भारत में बंगाल प्रेसीडेंसी की विधायिका थी। 1862 में स्थापित यह परिषद 1937 तक बंगाल की एकमात्र विधायी संस्था (एकसदनीय विधायिका) थी। भारत सरकार अधिनियम 1935 के लागू होने के बाद जब बंगाल विधानमंडल को द्विसदनीय रूप दिया गया, तब बंगाल विधान परिषद ने उच्च सदन के रूप में कार्य किया, जबकि बंगाल विधानसभा इसका निचला सदन बनी। यह परिषद 1947 में बंगाल के विभाजन तक अस्तित्व में रही। इतिहास एवं विधायी विकास 1. भारतीय परिषद अधिनियम 1861 एवं स्थापना (1862) 1861 के भारतीय परिषद अधिनियम के तहत 1862 में बंगाल के लेफ्टिनेंट-गवर्नर की सहायता हेतु 12 सदस्यीय बंगाल विधान परिषद की स्थापना की गई। इसमें अधिकांश सदस्य ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारी होते थे और कुछ गैर-सरकारी सदस्यों को नामित किया जाता था। इसका कार्य मुख्य रूप से स्थानीय कानूनों पर सलाह देना था। 2. भारतीय परिषद अधिनियम 1892 1892 के सुधारों के माध्यम से परिषद के सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 20 कर दी गई। इसके तहत कलकत्ता नगर निगम, विश्वविद्यालयों, जिला परिषदों और नगर पालिकाओं जैसे स्थानीय निकायों द्वारा सिफारिश किए गए प्रतिनिधियों को भी स्थान दिया जाने लगा, जिससे सीमित प्रतिनिधित्व की शुरुआत हुई। 3. मॉर्ले-मिंटो सुधार (1909) 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम ने परिषद के आकार का विस्तार करते हुए सदस्यों की संख्या 53 कर दी। इस अधिनियम के तहत पहली बार भारतीय राजनीति में धर्म के आधार पर मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorates) की शुरुआत की गई। 4. मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार और द्वैध शासन (1919) भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत बंगाल विधान परिषद का पुनर्गठन एक विशाल प्रतिनिधि निकाय के रूप में किया गया: परिषद के सदस्यों की कुल संख्या बढ़ाकर 140 कर दी गई, जिसमें 114 निर्वाचित और शेष मनोनीत सदस्य थे। प्रांतों में 'द्वैध शासन' (Dyarchy) लागू किया गया। प्रांतीय विषयों को दो भागों में बांटा गया—'हस्तांतरित' (Transferred) विषय (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य), जो भारतीय मंत्रियों को सौंपे गए; और 'आरक्षित' (Reserved) विषय (जैसे वित्त, पुलिस), जो गवर्नर और उनकी कार्यकारी परिषद के नियंत्रण में रहे। सर सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने इसी व्यवस्था के तहत बंगाल के स्थानीय स्वायत्त शासन मंत्री के रूप में कार्य किया। 5. भारत सरकार अधिनियम 1935 (उच्च सदन के रूप में) 1935 के अधिनियम के तहत प्रांतीय स्वायत्तता लागू की गई और द्वैध शासन को समाप्त कर दिया गया। बंगाल विधानमंडल को द्विसदनीय (Bicameral) बनाया गया: **निचला सदन:** बंगाल विधानसभा (250 सीटें, प्रत्यक्ष चुनाव)। **उच्च सदन:** बंगाल विधान परिषद (63 से 65 सीटें)। उच्च सदन के रूप में विधान परिषद एक स्थायी सदन बन गया, जो कभी भंग नहीं होता था; इसके एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक तीन वर्ष में सेवानिवृत्त होते थे। परिषद की संरचना (1935 के बाद) 1935 के अधिनियम के अंतर्गत उच्च सदन (परिषद) के 63 से 65 सदस्यों का विभाजन निम्नानुसार था: **सामान्य (गैर-मुस्लिम) सीटें:** 10 (प्रत्यक्ष चुनाव) **मुस्लिम सीटें:** 17 (प्रत्यक्ष चुनाव) **यूरोपीय सीटें:** 3 (प्रत्यक्ष चुनाव) **बंगाल विधानसभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचित (अप्रत्यक्ष):** 27 **गवर्नर द्वारा मनोनीत सदस्य:** न्यूनतम 6 और अधिकतम 8 विधान परिषद के सभापति (1937–1947) द्विसदनीय व्यवस्था के दौरान उच्च सदन के प्रमुख सभापति निम्नलिखित रहे: क्र. नाम कार्यकाल राजनीतिक संबद्धता 1 सत्येन्द्र चंद्र मित्र 1937 – 1942 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 2 सर अजीजुल हक 1942 अखिल भारतीय मुस्लिम लीग 3 नूरुल अमीन 1946 – 1947 अखिल भारतीय मुस्लिम लीग विभाजन और विघटन (1947) 1947 में ब्रिटिश शासन की समाप्ति और भारत के विभाजन के समय बंगाल प्रांत को पश्चिम बंगाल (भारत) और पूर्वी बंगाल (पाकिस्तान) में विभाजित कर दिया गया। 14–15 अगस्त 1947 को बंगाल विधान परिषद औपचारिक रूप से समाप्त हो गई: 1. **भारत:** स्वतंत्र भारत में 1952 में संविधान के अनुच्छेद 168 के तहत पश्चिम बंगाल विधान परिषद का पुनर्गठन उच्च सदन के रूप में किया गया (जिसे बाद में 1969 में विधानसभा के प्रस्ताव द्वारा समाप्त कर दिया गया)। 2. **पाकिस्तान:** पूर्वी बंगाल में एकसदनीय व्यवस्था अपनाई गई और उच्च सदन को जारी नहीं रखा गया। संदर्भ इन्हें भी देखें