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महादेवी वर्मा
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महादेवी वर्मा जी Mahadevi4.jpg yes 1907 3 26 फ़र्रुख़ाबाद, संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध, ब्रिटिश राज yes 1987 9 11 1907 3 26 प्रयागराज, उत्तर प्रदेश, भारत उपन्यासकार, कवयित्री, लघुकथा लेखिका भारतीय संस्कृत, प्रयागराज विश्वविद्यालय से बीसवीं शताब्दी छायावाद यममेरा परिवारपथ के साथी डॉक्टर स्वरूप नारायण वर्मा 1956: पद्म भूषण 1982: ज्ञानपीठ पुरस्कार1988: पद्म विभूषण
महादेवी वर्मा (26 मार्च 1907 — 11 सितम्बर 1987) हिन्दी भाषा की कवयित्री थीं। वे हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तम्भोंस्तंभ क none में से एक मानी जाती हैं।वर्मा 1985 38-40 आधुनिक हिन्दी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने के कारण उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है। http://literaryindia.com/Literature/Indian-Authors/mahadevi-verma.html Mahadevi Verma: Modern Meera 3 मार्च 2007 एचटीएमएल लिटररी इंडिया en https://web.archive.org/web/20070321205859/http://literaryindia.com/Literature/Indian-Authors/mahadevi-verma.html 21 मार्च 2007 dead कवि निराला ने उन्हें “हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती” भी कहा है।निराला की पंक्तियाँ ख none महादेवी ने स्वतन्त्रता के पहले का भारत भी देखा और उसके बाद का भी। वे उन कवियों में से एक हैं जिन्होंने व्यापक समाज में काम करते हुए भारत के भीतर विद्यमान हाहाकार, रुदन को देखा, परखा और करुण होकर अन्धकार को दूर करने वाली दृष्टि देने की कोशिश की। http://www.tadbhav.com/Mahadevi%20ka.htm#mahadevi महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा 28 अप्रैल 2007 एचटीएमएल तद्भव https://web.archive.org/web/20070922133831/http://www.tadbhav.com/Mahadevi%20ka.htm#mahadevi 22 सितंबर 2007 dead न केवल उनका काव्य बल्कि उनके सामाजसुधार के कार्य और महिलाओं के प्रति चेतना भावना भी इस दृष्टि से प्रभावित रहे। उन्होंने मन की पीड़ा को इतने स्नेह और शृंगार से सजाया कि दीपशिखा में वह जन-जन की पीड़ा के रूप में स्थापित हुई और उसने केवल पाठकों को ही नहीं समीक्षकों को भी गहराई तक प्रभावित किया।सृजनगाथा ग none
उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी की कविता में उस कोमल शब्दावली का विकास किया जो अभी तक केवल ब्रजभाषा में ही संभव मानी जाती थी। इसके लिए उन्होंने अपने समय के अनुकूल संस्कृत और बांग्ला के कोमल शब्दों को चुनकर हिन्दी का जामा पहनाया। संगीत की जानकार होने के कारण उनके गीतों का नाद-सौंदर्य और पैनी उक्तियों की व्यंजना शैली अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने अध्यापन से अपने कार्यजीवन की शुरूआत की और अन्तिम समय तक वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या बनी रहीं। उनका बाल-विवाह हुआ परन्तु उन्होंने अविवाहित की भाँति जीवन-यापन किया। प्रतिभावान कवयित्री और गद्य लेखिका महादेवी वर्मा साहित्य और संगीत में निपुण होने के साथ-साथ http://www.taptilok.com/2006/01-03-2006/sahitya_Hindi_sahitya.html गद्यकार महादेवी वर्मा 26 मार्च 2007 एचटीएमएल ताप्तीलोक https://web.archive.org/web/20060517185155/http://www.taptilok.com/2006/01-03-2006/sahitya_Hindi_sahitya.html 17 मई 2006 dead कुशल चित्रकार और सृजनात्मक अनुवादक भी थीं। उन्हें हिन्दी साहित्य के सभी महत्त्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है। भारत के साहित्य आकाश में महादेवी वर्मा का नाम ध्रुव तारे की भाँति प्रकाशमान है। गत शताब्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला साहित्यकार के रूप में वे जीवन भर पूजनीय बनी रहीं। वे पशु पक्षी प्रेमी थी गाय उनको अति प्रिय थी ।वशिष्ठ आर.के. उत्तर प्रदेश (मासिक पत्रिका) अंक-7 2002 सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, उ.प्र. लखनऊ, भारत 24 विजय राय
वर्ष 2007 उनका जन्म शताब्दी के रूप में मनाया गया। 27 अप्रैल 1982 को भारतीय साहित्य में अतुलनीय योगदान के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से इन्हें सम्मानित किया गया था। गूगल ने इस दिवस की याद में वर्ष 2018 में गूगल डूडल के माध्यम से मनाया । वर्मा सृष्टि सुभद्रा कुमारी चौहान थी महादेवी वर्मा की रूममेट, गूगल ने किया आज का दिन उन्हें समर्पित दैनिक जागरण २७ अप्रैल २०१८ https://www.jagran.com/news/national-mahadevi-varma-is-todays-google-doodle-know-all-about-the-celebrated-hindi-poet-17882596.html hi २७ अप्रैल २०१८ https://web.archive.org/web/20180428011719/https://www.jagran.com/news/national-mahadevi-varma-is-todays-google-doodle-know-all-about-the-celebrated-hindi-poet-17882596.html 28 अप्रैल 2018 live
जीवनी
जन्म और परिवार
महादेवी का जन्म 26 मार्च 1907 को प्रातः 8 बजेसिंह 2007 38-40 फ़र्रुख़ाबाद उत्तर प्रदेश, भारत में हुआ। उनके परिवार में लगभग 200 वर्षों या सात पीढ़ियों के बाद पहली बार पुत्री का जन्म हुआ था। अतः बाबा बाबू बाँके विहारी जी हर्ष से झूम उठे और इन्हें घर की देवी — महादेवी मानते हुए पुत्री का नाम महादेवी रखा। उनके पिता श्री गोविंद प्रसाद वर्मा भागलपुर के एक कॉलेज में प्राध्यापक थे। उनकी माता का नाम हेमरानी देवी था। हेमरानी देवी बड़ी धर्म परायण, कर्मनिष्ठ, भावुक एवं शाकाहारी महिला थीं। विवाह के समय अपने साथ सिंहासनासीन भगवान की मूर्ति भी लायी थीं वे प्रतिदिन कई घंटे पूजा-पाठ तथा रामायण, गीता एवं विनय पत्रिका का पारायण करती थीं और संगीत में भी उनकी अत्यधिक रुचि थी। इसके बिल्कुल विपरीत उनके पिता गोविन्द प्रसाद वर्मा सुन्दर, विद्वान, संगीत प्रेमी, नास्तिक, शिकार करने एवं घूमने के शौकीन, माँसाहारी तथा हँसमुख व्यक्ति थे। महादेवी वर्मा के मानस बंधुओं में सुमित्रानन्दन पन्त एवं निराला का नाम लिया जा सकता है, जो उनसे जीवन पर्यन्त राखी बँधवाते रहे।पांडेय 1968 10 निराला जी से उनकी अत्यधिक निकटता थी, http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2004/jo_rekhayen.htm जो रेखाएँ कह न सकेंगी 30 मार्च 2007 एचटीएम अभिव्यक्ति https://web.archive.org/web/20060929151041/http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2004/jo_rekhayen.htm 29 सितंबर 2006 dead उनकी पुष्ट कलाइयों में महादेवी जी लगभग चालीस वर्षों तक राखी बाँधती रहीं।
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/msid-1575202.cms
महाकवि का बजट
नवभारत टाइम्स
7 फरवरी 2007
30 मार्च 2007
शिक्षा
महादेवी जी की शिक्षा इन्दौर में मिशन स्कूल से प्रारम्भ हुई साथ ही संस्कृत, अंग्रेज़ी, संगीत तथा चित्रकला की शिक्षा अध्यापकों द्वारा घर पर ही दी जाती रही। बीच में विवाह जैसी बाधा पड़ जाने के कारण कुछ दिन शिक्षा स्थगित रही। विवाहोपरान्त महादेवी जी ने 1919 में क्रास्थवेट कॉलेज इलाहाबाद में प्रवेश लिया और कॉलेज के छात्रावास में रहने लगीं। 1921 में महादेवी जी ने आठवीं कक्षा में प्रान्त भर में प्रथम स्थान प्राप्त किया। यहीं पर उन्होंने अपने काव्य जीवन की शुरुआत की। वे सात वर्ष की अवस्था से ही कविता लिखने लगी थीं और 1925 तक जब उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की, वे एक सफल कवयित्री के रूप में प्रसिद्ध हो चुकी थीं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी कविताओं का प्रकाशन होने लगा था। कालेज में सुभद्रा कुमारी चौहान के साथ उनकी घनिष्ठ मित्रता हो गई। सुभद्रा कुमारी चौहान महादेवी जी का हाथ पकड़ कर सखियों के बीच में ले जाती और कहतीं ― “सुनो, ये कविता भी लिखती हैं”। 1932 में जब उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम॰ए॰ पास किया तब तक उनके दो कविता संग्रह नीहार तथा रश्मि प्रकाशित हो चुके थे।
वैवाहिक जीवन
सन् 1916 में उनके बाबा श्री बाँके विहारी ने इनका विवाह बरेली के पास नबाव गंज कस्बे के निवासी श्री स्वरूप नारायण वर्मा से कर दिया, जो उस समय दसवीं कक्षा के विद्यार्थी थे। श्री वर्मा इण्टर करके लखनऊ मेडिकल कॉलेज में बोर्डिंग हाउस में रहने लगे। महादेवी जी उस समय क्रास्थवेट कॉलेज इलाहाबाद के छात्रावास में थीं। श्रीमती महादेवी वर्मा को विवाहित जीवन से विरक्ति थी। कारण कुछ भी रहा हो पर श्री स्वरूप नारायण वर्मा से कोई वैमनस्य नहीं था। सामान्य स्त्री-पुरुष के रूप में उनके सम्बन्ध मधुर ही रहे। दोनों में कभी-कभी पत्राचार भी होता था। यदा-कदा श्री वर्मा इलाहाबाद में उनसे मिलने भी आते थे। श्री वर्मा ने महादेवी जी के कहने पर भी दूसरा विवाह नहीं किया। महादेवी जी का जीवन तो एक संन्यासिनी का जीवन था। उन्होंने जीवन भर श्वेत वस्त्र पहना, तख्त पर सोईं और कभी शीशा नहीं देखा। सन् 1966 में पति की मृत्यु के बाद वे स्थायी रूप से इलाहाबाद में रहने लगीं।
कार्यक्षेत्र
महादेवी का कार्यक्षेत्र लेखन, सम्पादन और अध्यापन रहा। उन्होंने इलाहाबाद में प्रयाग महिला विद्यापीठ के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया। यह कार्य अपने समय में महिला-शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम था। इसकी वे प्रधानाचार्य एवं कुलपति भी रहीं। 1923 में उन्होंने महिलाओं की प्रमुख पत्रिका ‘चाँद’ का कार्यभार संभाला। १९३० में नीहार, १९३२ में रश्मि, १९३४ में नीरजा, तथा १९३६ में सांध्यगीत नामक उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हुए। १९३९ में इन चारों काव्य संग्रहों को उनकी कलाकृतियों के साथ वृहदाकार में यामा शीर्षक से प्रकाशित किया गया। उन्होंने गद्य, काव्य, शिक्षा और चित्रकला सभी क्षेत्रों में नए आयाम स्थापित किये। इसके अतिरिक्त उनकी 18 काव्य और गद्य कृतियां हैं जिनमें मेरा परिवार, स्मृति की रेखाएं, पथ के साथी, शृंखला की कड़ियाँ और अतीत के चलचित्र प्रमुख हैं। सन १९५५ में महादेवी जी ने इलाहाबाद में साहित्यकार संसद की स्थापना की और पं इलाचंद्र जोशी के सहयोग से साहित्यकार का सम्पादन संभाला। यह इस संस्था का मुखपत्र था। उन्होंने भारत में महिला कवि सम्मेलनों की नीव रखी। सुधा (मासिक पत्रिका) मई 1933 लखनऊ 30 मार्च 2007
इस प्रकार का पहला अखिल भारतवर्षीय कवि सम्मेलन 15 अप्रैल 1933 को सुभद्रा कुमारी चौहान की अध्यक्षता में प्रयाग महिला विद्यापीठ में सम्पन्न हुआ। चाँद (मासिक पत्रिका) मई 1933 लखनऊ 30 मार्च 2007 वे हिन्दी साहित्य में रहस्यवाद की प्रवर्तिका भी मानी जाती हैं। http://www.sawnet.org/books/authors.php?Verma+Mahadevi Mahadevi Verma 30 मार्च 2007 एचटीएम सॉनेट en https://web.archive.org/web/20070928145755/http://www.sawnet.org/books/authors.php?Verma+Mahadevi 28 सितंबर 2007 live
thumb|center|550px|महादेवी वर्मा, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि साहित्यकारों के साथ
महादेवी बौद्ध धर्म से बहुत प्रभावित थीं। महात्मा गांधी के प्रभाव से उन्होंने जनसेवा का व्रत लेकर झूसी में कार्य किया और भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में भी हिस्सा लिया। 1936]] में नैनीताल से 25 किलोमीटर दूर रामगढ़ कसबे के उमागढ़ नामक गाँव में महादेवी वर्मा ने एक बंगला बनवाया था। जिसका नाम उन्होंने मीरा मन्दिर रखा था। जितने दिन वे यहाँ रहीं इस छोटे से गाँव की शिक्षा और विकास के लिए काम करती रहीं। विशेष रूप से महिलाओं की शिक्षा और उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए उन्होंने बहुत काम किया। आजकल इस बंगले को महादेवी साहित्य संग्रहालय के नाम से जाना जाता है। http://www.kmvn.org/famouspersonalities.aspx Famous Personalities Mahadevi Verma 30 मार्च 2007 एएसपीएक्स कुमाऊँ मंडल विकास निगम लिमिटेड en https://web.archive.org/web/20070519183244/http://www.kmvn.org/famouspersonalities.aspx 19 मई 2007 deadhttp://www.indradhanushindia.org/magazine/oct2007/13.htm महादेवी पहाड़ों का वसंत मनाती थीं 10 नवंबर 2007 एचटीएम इंद्रधनुष इंडिया https://web.archive.org/web/20071011040938/http://indradhanushindia.org/magazine/oct2007/13.htm 11 अक्तूबर 2007 dead शृंखला की कड़ियाँ में स्त्रियों की मुक्ति और विकास के लिए उन्होंने जिस साहस व दृढ़ता से आवाज़ उठाई हैं और जिस प्रकार सामाजिक रूढ़ियों की निन्दा की है उससे उन्हें महिला मुक्तिवादी भी कहा गया। http://www.indiatogether.org/women/people/varma.htm Forging a Feminist Path 30 मार्च 2007 एचटीएमएल इंडिया टुगेदर en https://web.archive.org/web/20021019230033/http://www.indiatogether.org/women/people/varma.htm 19 अक्तूबर 2002 dead महिलाओं व शिक्षा के विकास के कार्यों और जनसेवा के कारण उन्हें समाज-सुधारक भी कहा गया है। http://www.womenunlimited.net/catalogue/autobiographies_11.htm Mahadevi Verma 30 मार्च 2007 एचटीएमएल वुमनअनलिमिटड en https://web.archive.org/web/20070823092226/http://www.womenunlimited.net/catalogue/autobiographies_11.htm 23 अगस्त 2007 dead उनके सम्पूर्ण गद्य साहित्य में पीड़ा या वेदना के कहीं दर्शन नहीं होते बल्कि अदम्य रचनात्मक रोष समाज में बदलाव की अदम्य आकांक्षा और विकास के प्रति सहज लगाव परिलक्षित होता है।http://www.usm.maine.edu/wompo/Mahadevi-Verma.html Mahadevi Verma 30 मार्च 2007 एचटीएमएल वॉम्पो - वुमंस पॉयट्री लिस्टसर्व en https://web.archive.org/web/20070316002425/http://www.usm.maine.edu/wompo/Mahadevi-Verma.html 16 मार्च 2007 dead
उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद नगर में बिताया। 11 सितम्बर 1987 को इलाहाबाद में रात 9 बजकर 30 मिनट पर उनका देहान्त हो गया।
प्रमुख कृतियाँ
महादेवी वर्मा की रचनाएँ
महादेवी जी कवयित्री होने के साथ-साथ विशिष्ट गद्यकार भी थीं। उनकी कृतियाँ इस प्रकार हैं।
thumb|200px|पन्थ तुम्हारा मंगलमय हो। महादेवी के हस्ताक्षर
thumb|200px|महादेवी वर्मा की प्रमुख गद्य रचनाएँ
कविता संग्रह
१. नीहार (१९३०)२. रश्मि (१९३२)३. नीरजा (१९३४)४. सांध्यगीत (१९३६)
५. दीपशिखा (१९४२) ६. सप्तपर्णा (अनूदित-१९५९)
७. प्रथम आयाम (१९७४)
८. अग्निरेखा (१९९०)
श्रीमती महादेवी वर्मा के अन्य अनेक काव्य संकलन भी प्रकाशित हैं, जिनमें उपर्युक्त रचनाओं में से चुने हुए गीत संकलित किये गये हैं, जैसे आत्मिका, परिक्रमा, सन्धिनी (१९६५), यामा (१९३६), गीतपर्व, दीपगीत, स्मारिका, नीलांबरा और आधुनिक कवि महादेवी आदि।
महादेवी वर्मा का गद्य साहित्य
रेखाचित्र: अतीत के चलचित्र (१९४१) और स्मृति की रेखाएं (१९४३),
संस्मरण: पथ के साथी (१९५६) और मेरा परिवार (१९७२) और संस्मरण (१९८३)
चुने हुए भाषणों का संकलन: संभाषण (१९७४)
निबंध: शृंखला की कड़ियाँभारतीय नारी की विषम परिस्थितियों पर अनेक दृष्टियों से विचार (१९४२), विवेचनात्मक गद्य (१९४२), साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबंध (१९६२), संकल्पिता (१९६९)
ललित निबंध: क्षणदायात्रा, कला और साहित्य से संबंधित मौलिक विचार (१९५६)
कहानियाँ: गिल्लू
संस्मरण, रेखाचित्र और निबंधों का संग्रह: हिमालय (१९६३),
अन्य निबंध में संकल्पिता तथा विविध संकलनों में स्मारिका, स्मृति चित्र, संभाषण, संचयन, दृष्टिबोध उल्लेखनीय हैं। वे अपने समय की लोकप्रिय पत्रिका ‘चाँद’ तथा ‘साहित्यकार’ मासिक की भी सम्पादक रहीं। हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने प्रयाग में ‘साहित्यकार संसद’ और रंगवाणी नाट्य संस्था की भी स्थापना की।
महादेवी वर्मा का बाल साहित्य
महादेवी वर्मा की बाल कविताओं के दो संकलन छपे हैं।
ठाकुरजी भोले हैं
आज खरीदेंगे हम ज्वाला
समालोचना
आधुनिक गीत काव्य में महादेवी जी का स्थान सर्वोपरि है। उनकी कविता में प्रेम की पीर और भावों की तीव्रता वर्तमान होने के कारण भाव, भाषा और संगीत की जैसी त्रिवेणी उनके गीतों में प्रवाहित होती है वैसी अन्यत्र दुर्लभ है।
महादेवी के गीतों की वेदना, प्रणयानुभूति, करुणा और रहस्यवाद काव्यानुरागियों को आकर्षित करते हैं। पर इन रचनाओं की विरोधी आलोचनाएँ सामान्य पाठक को दिग्भ्रमित करती हैं। आलोचकों का एक वर्ग वह है, जो यह मानकर चलते हैं कि महादेवी का काव्य नितान्त वैयक्तिक है। उनकी पीड़ा, वेदना, करुणा, कृत्रिम और बनावटी है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे मूर्धन्य आलोचकों ने उनकी वेदना और अनुभूतियों की सच्चाई पर प्रश्न चिह्न लगाया है —शुक्ल घ none दूसरी ओर
आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जैसे समीक्षक उनके काव्य को समष्टि परक मानते हैं।द्विवेदी ङ none
शोमेर ने ‘दीप’ (नीहार), मधुर मधुर मेरे दीपक जल (नीरजा) और मोम सा तन गल चुका है कविताओं को उद्धृत करते हुए निष्कर्ष निकाला है कि ये कविताएं महादेवी के ‘आत्मभक्षी दीप’ अभिप्राय को ही व्याख्यायित नहीं करतीं बल्कि उनकी कविता की सामान्य मुद्रा और बुनावट का प्रतिनिधि रूप भी मानी जा सकती हैं।
सत्यप्रकाश मिश्र छायावाद से संबंधित उनकी शास्त्र मीमांसा के विषय में कहते हैं ― “महादेवी ने वैदुष्य युक्त तार्किकता और उदाहरणों के द्वारा छायावाद और रहस्यवाद के वस्तु शिल्प की पूर्ववर्ती काव्य से भिन्नता तथा विशिष्टता ही नहीं बतायी, यह भी बताया कि वह किन अर्थों में मानवीय संवेदन के बदलाव और अभिव्यक्ति के नयेपन का काव्य है। उन्होंने किसी पर भाव साम्य, भावोपहरण आदि का आरोप नहीं लगाया केवल छायावाद के स्वभाव, चरित्र, स्वरूप और विशिष्टता का वर्णन किया।” http://www.tadbhav.com/Mahadevi%20ka.htm महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा 26 मार्च 2007 एचटीएमएल तद्भव https://web.archive.org/web/20070922133831/http://www.tadbhav.com/Mahadevi%20ka.htm 22 सितंबर 2007 dead
प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे मनीषी का मानना है कि जो लोग उन्हें पीड़ा और निराशा की कवयित्री मानते हैं वे यह नहीं जानते कि उस पीड़ा में कितनी आग है जो जीवन के सत्य को उजागर करती है।श्रोत्रिय च none
यह सच है कि महादेवी का काव्य संसार छायावाद की परिधि में आता है, पर उनके काव्य को उनके युग से एकदम असम्पृक्त करके देखना, उनके साथ अन्याय करना होगा। महादेवी एक सजग रचनाकार हैं। बंगाल के अकाल के समय १९४३ में इन्होंने एक काव्य संकलन प्रकाशित किया था और बंगाल से सम्बंधित “बंग भू शत वंदना” नामक कविता भी लिखी थी। इसी प्रकार चीन के आक्रमण के प्रतिवाद में हिमालय नामक काव्य संग्रह का सम्पादन किया था। यह संकलन उनके युगबोध का प्रमाण है।
गद्य साहित्य के क्षेत्र में भी उन्होंने कम काम नहीं किया। उनका आलोचना साहित्य उनके काव्य की भांति ही महत्वपूर्ण है। उनके संस्मरण भारतीय जीवन के संस्मरण चित्र हैं।
उन्होंने चित्रकला का काम अधिक नहीं किया फिर भी जलरंगों में ‘वॉश’ शैली से बनाए गए उनके चित्र धुंधले रंगों और लयपूर्ण रेखाओं का कारण कला के सुंदर नमूने समझे जाते हैं। उन्होंने रेखाचित्र भी बनाए हैं। दाहिनी ओर करीन शोमर की क़िताब के मुखपृष्ठ पर महादेवी द्वारा बनाया गया रेखाचित्र ही रखा गया है। उनके अपने कविता संग्रहों यामा और दीपशिखा में उनके रंगीन चित्रों और रेखांकनों को देखा जा सकता है।
पुरस्कार व सम्मान
thumb|200px|right|डाकटिकट
उन्हें प्रशासनिक, अर्धप्रशासनिक और व्यक्तिगत सभी संस्थाओँ से पुरस्कार व सम्मान मिले।
1943 में उन्हें ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ एवं ‘भारत भारती’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद 1952 में वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्या मनोनीत की गयीं। 1956 में भारत सरकार ने उनकी साहित्यिक सेवा के लिये ‘पद्म भूषण’ की उपाधि दी। 1971 में साहित्य अकादमी की सदस्यता ग्रहण करने वाली वे पहली महिला थीं। http://www.sahitya-akademi.org/sahitya-akademi/fello.htm en Conferment of Sahitya Akademi Fellowship 3 मार्च 2007 एचटीएमएल साहित्य अकैडमी https://web.archive.org/web/20070927223134/http://www.sahitya-akademi.org/sahitya-akademi/fello.htm 27 सितंबर 2007 dead 1988 में उन्हें मरणोपरांत भारत सरकार की पद्म विभूषण उपाधि से सम्मानित किया गया।
सन 1969 में विक्रम विश्वविद्यालय, 1977 में कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल, 1980 में दिल्ली विश्वविद्यालय तथा 1984 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने उन्हें डी.लिट की उपाधि से सम्मानित किया।
इससे पूर्व महादेवी वर्मा को ‘नीरजा’ के लिये 1934 में ‘सक्सेरिया पुरस्कार’, 1942 में ‘स्मृति की रेखाएँ’ के लिये ‘द्विवेदी पदक’ प्राप्त हुए। ‘यामा’ नामक काव्य संकलन के लिये उन्हें भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्राप्त हुआ। http://www.webindia123.com/government/award/jnanpith.htm en Jnanpith Award २९ मार्च 2007 एचटीएमएल वेबइंडिया https://web.archive.org/web/20080915173248/http://www.webindia123.com/government/award/jnanpith.htm 15 सितंबर 2008 dead वे भारत की 50 सबसे यशस्वी महिलाओं में भी शामिल हैं। गुप्ता इंदिरा India’s 50 Most Illustrious Women 2004 आइकॉन बुक्स en 38-40 30 मार्च 2007 https://books.google.co.in/books?id=joQxcgAACAAJ
1968 में सुप्रसिद्ध भारतीय फ़िल्मकार मृणाल सेन ने उनके संस्मरण ‘वह चीनी भाई’ http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2001/chinibhai.htm वह चीनी भाई 26 मार्च 2007 एचटीएमएल अभिव्यक्ति https://web.archive.org/web/20060621131426/http://abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2001/chinibhai.htm 21 जून 2006 dead पर एक बांग्ला फ़िल्म का निर्माण किया था जिसका नाम था नील आकाशेर नीचे। http://mrinalsen.org/neel_akasher_niche.htm नील आकाशेर नीचे 26 मार्च 2007 एचटीएमएल मृणाल सेन en https://web.archive.org/web/20070419214259/http://mrinalsen.org/neel_akasher_niche.htm 19 अप्रैल 2007 dead
16 सितंबर 1991 को भारत सरकार के डाकतार विभाग ने जयशंकर प्रसाद के साथ उनके सम्मान में 2 रुपये का एक युगल टिकट भी जारी किया है। http://www.indianpost.com/viewstamp.php/Alpha/M/MAHADEVI%20VERMA?PHPSESSID=fcb7e71cf6772341cae0bd9dabc9642f इंडिया पोस्ट 26 मार्च 2007 एचटीएमएल इंडियनपोस्ट en
महादेवी वर्मा का योगदान
thumb|250px|महादेवी से जुड़े विशिष्ट स्थल
साहित्य में महादेवी वर्मा का आविर्भाव उस समय हुआ जब खड़ीबोली का आकार परिष्कृत हो रहा था। उन्होंने हिन्दी कविता को बृजभाषा की कोमलता दी, छंदों के नये दौर को गीतों का भंडार दिया और भारतीय दर्शन को वेदना की हार्दिक स्वीकृति दी। इस प्रकार उन्होंने भाषा साहित्य और दर्शन तीनों क्षेत्रों में ऐसा महत्त्वपूर्ण काम किया जिसने आनेवाली एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया। शचीरानी गुर्टू ने भी उनकी कविता को सुसज्जित भाषा का अनुपम उदाहरण माना है।शचीरानी छ none उन्होंने अपने गीतों की रचना शैली और भाषा में अनोखी लय और सरलता भरी है, साथ ही प्रतीकों और बिंबों का ऐसा सुंदर और स्वाभाविक प्रयोग किया है जो पाठक के मन में चित्र सा खींच देता है।पालीवाल ज none छायावादी काव्य की समृद्धि में उनका योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। छायावादी काव्य को जहाँ प्रसाद ने प्रकृतितत्त्व दिया, निराला ने उसमें मुक्तछंद की अवतारणा की और पंत ने उसे सुकोमल कला प्रदान की वहाँ छायावाद के कलेवर में प्राण-प्रतिष्ठा करने का गौरव महादेवी जी को ही प्राप्त है। भावात्मकता एवं अनुभूति की गहनता उनके काव्य की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता है। हृदय की सूक्ष्मातिसूक्ष्म भाव-हिलोरों का ऐसा सजीव और मूर्त अभिव्यंजन ही छायावादी कवियों में उन्हें ‘महादेवी’ बनाता है।वांजपे प्रो शुभदा पुष्पक (अर्ध-वार्षिक पत्रिका) अंक-6 2006 कादम्बिनी क्लब हैदराबाद, भारत 113 editor: डॉ॰ अहिल्या मिश्र २३ अप्रैल २००७ वे हिन्दी बोलने वालों में अपने भाषणों के लिए सम्मान के साथ याद की जाती हैं। उनके भाषण जन सामान्य के प्रति संवेदना और सच्चाई के प्रति दृढ़ता से परिपूर्ण होते थे। वे दिल्ली में 1983 में आयोजित तीसरे विश्व हिन्दी सम्मेलन के समापन समारोह की मुख्य अतिथि थीं। इस अवसर पर दिये गये उनके भाषण में उनके इस गुण को देखा जा सकता है। http://www.vishwahindi.com/mahadeviji.htm समापन समारोह है, तो मन भारी है २८ अप्रैल २००७ एचटीएम विश्व हिंदी सम्मेलन https://web.archive.org/web/20071008182938/http://www.vishwahindi.com/mahadeviji.htm 8 अक्तूबर 2007 dead
यद्यपि महादेवी ने कोई उपन्यास, कहानी या नाटक नहीं लिखा तो भी उनके लेख, निबंध, रेखाचित्र, संस्मरण, भूमिकाओं और ललित निबंधों में जो गद्य लिखा है वह श्रेष्ठतम गद्य का उत्कृष्ट उदाहरण है।रामजी पांडे झ none उसमें जीवन का सम्पूर्ण वैविध्य समाया है। बिना कल्पना और काव्यरूपों का सहारा लिए कोई रचनाकार गद्य में कितना कुछ अर्जित कर सकता है, यह महादेवी को पढ़कर ही जाना जा सकता है। उनके गद्य में वैचारिक परिपक्वता इतनी है कि वह आज भी प्रासंगिक है।राजेन्द्र उपाध्याय ञ none समाज सुधार और नारी स्वतंत्रता से संबंधित उनके विचारों में दृढ़ता और विकास का अनुपम सामंजस्य मिलता है। सामाजिक जीवन की गहरी परतों को छूने वाली इतनी तीव्र दृष्टि, नारी जीवन के वैषम्य और शोषण को तीखेपन से आंकने वाली इतनी जागरूक प्रतिभा और निम्न वर्ग के निरीह, साधनहीन प्राणियों के अनूठे चित्र उन्होंने ही पहली बार हिंदी साहित्य को दिये।
मौलिक रचनाकार के अलावा उनका एक रूप सृजनात्मक अनुवादक का भी है जिसके दर्शन उनकी अनुवाद-कृत ‘सप्तपर्णा’ (१९६०) में होते हैं। अपनी सांस्कृतिक चेतना के सहारे उन्होंने वेद, रामायण, थेरगाथा तथा अश्वघोष, कालिदास, भवभूति एवं जयदेव की कृतियों से तादात्म्य स्थापित करके ३९ चयनित महत्वपूर्ण अंशों का हिन्दी काव्यानुवाद इस कृति में प्रस्तुत किया है। आरम्भ में ६१ पृष्ठीय ‘अपनी बात’ में उन्होंने भारतीय मनीषा और साहित्य की इस अमूल्य धरोहर के सम्बंध में गहन शोधपूर्ण विमर्ष किया है जो केवल स्त्री-लेखन को ही नहीं हिंदी के समग्र चिंतनपरक और ललित लेखन को समृद्ध करता है। http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/Rishabhdeo/bhaarti_chintan_parmpra_saptprNaa_Alekh_mahadevi.htm भारतीय चिंतन परंपरा और ‘सप्तपर्णा’ २५ अप्रैल २००७ एचटीएम साहित्यकुंजजून 2020 InternetArchiveBot
इन्हें भी देखें
हिंदी साहित्य
छायावादी युग
आधुनिक हिंदी गद्य का इतिहास
महादेवी वर्मा की रचनाएँ
टीका-टिप्पणी
क. स्तंभ क none छायावाद के अन्य तीन स्तंभ हैं, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और सुमित्रानंदन पंत।
ख. निराला की पंक्तियाँ ख none हिंदी के विशाल मन्दिर की वीणापाणी, स्फूर्ति चेतना रचना की प्रतिमा कल्याणी ―निराला
ग. सृजनगाथा ग none
उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी को कोमलता और मधुरता से संसिक्त कर सहज मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का द्वार खोला, विरह को दीपशिखा का गौरव दिया और व्यष्टि मूलक मानवतावादी काव्य के चिंतन को प्रतिष्ठापित किया। उनके गीतों का नाद-सौंदर्य और पैनी उक्तियों की व्यंजना शैली अन्यत्र दुर्लभ है। ―निशा सहगल http://www.srijangatha.com/march%2007/shesh-vishesh.hastakshar.mahadevivarma.htm हिन्दी की सरस्वतीः महादेवी वर्मा 25 मार्च 2007 एचटीएमएल सृजनगाथा https://web.archive.org/web/20070705085254/http://www.srijangatha.com/march%2007/shesh-vishesh.hastakshar.mahadevivarma.htm 5 जुलाई 2007 dead
घ. शुक्ल घ none
“इस वेदना को लेकर उन्होंने हृदय की ऐसी अनुभूतियाँ सामने रखी हैं, जो लोकोत्तर हैं। कहाँ तक ये वास्तविक अनुभूतियाँ हैं और कहाँ तक अनुभूतियों की रमणीय कल्पना, यह नहीं कहा जा सकता।” ―आचार्य रामचंद्र शुक्ल
ङ. द्विवेदी ङ none
“महादेवी का ‘मैं’ सन्दर्भ भेद से सबका नाम है।” सच्चाई यह है कि महादेवी व्यष्टि से समष्टि की ओर जाती हैं। उनकी पीड़ा, वेदना, करुणा और दुखवाद में विश्व की कल्याण कामना निहित है। ―हज़ारी प्रसाद द्विवेदी
च. श्रोत्रिय च none वस्तुत: महादेवी की अनुभूति और सृजन का केंद्र आँसू नहीं आग है। जो दृश्य है वह अन्तिम सत्य नहीं है, जो अदृश्य है वह मूल या प्रेरक सत्य है। महादेवी लिखती हैं: “आग हूँ जिससे ढुलकते बिन्दु हिमजल के” और भी स्पष्टता की माँग हो तो ये पंक्तियाँ देखें: मेरे निश्वासों में बहती रहती झंझावात/आँसू में दिनरात प्रलय के घन करते उत्पात/कसक में विद्युत अंतर्धान। ये आँसू सहज सरल वेदना के आँसू नहीं हैं, इनके पीछे जाने कितनी आग, झंझावात प्रलय-मेघ का विद्युत-गर्जन, विद्रोह छिपा है। ―प्रभाकर श्रोत्रिय http://ind.jagran.com/sahitya/Inner.aspx?idarticle=517&idcategory=5 महादेवी: आँसू नहीं आग है 26 मार्च 2007 एचटीएमएल जागरण 13 अगस्त 2013 https://web.archive.org/web/20130813224424/http://hindi.yahoo.com/ dead
छ. शचीरानी छ none
महादेवी जी की कविता सुसज्जित भाषा का अनुपम उदाहरण है ―शचीरानी गुर्टूगुर्टू शचीरानी महादेवी वर्मा 4 18 अप्रैल 2007
ज. पालीवाल ज none
महादेवी के प्रगीतों का रूप विन्यास, भाषा, प्रतीक-बिंब लय के स्तर पर अद्भुत उपलब्धि कहा जा सकता है। ―कृष्णदत्त पालीवालपालीवाल कृष्णदत्त आजकल (मासिक पत्रिका) 2007 प्रकाशन विभाग, सूचना भवन सी जी ओ कॉम्पलेक्स, लोदीरोड, नई दिल्ली-110 003 15 30 मार्च 2007
झ. रामजी पांडे झ none
एक महादेवी ही हैं जिन्होंने गद्य में भी कविता के मर्म की अनुभूति कराई और ‘गद्य कवीतां निकषं वदंति’ उक्ति को चरितार्थ किया है। विलक्षण बात तो यह है कि न तो उन्होंने उपन्यास लिखा, न कहानी, न ही नाटक फिर भी श्रेष्ठ गद्यकार हैं। उनके ग्रंथ लेखन में एक ओर रेखाचित्र, संस्मरण या फिर यात्रावृत्त हैं तो दूसरी ओर सम्पादकीय, भूमिकाएँ, निबंध और अभिभाषण, पर सबमें जैसे सम्पूर्ण जीवन का वैविध्य समाया है। बिना कल्पनाश्रित काव्य रूपों का सहारा लिए कोई रचनाकार गद्य में इतना कुछ अर्जित कर सकता है, यह महादेवी को पढ़कर ही जाना जा सकता है। ―रामजी पांडेयवर्मा 1997 113
ञ. राजेन्द्र उपाध्याय ञ none
महादेवी का गद्य जीवन की आँच में तपा हुआ गद्य है। निखरा हुआ, निथरा हुआ गद्य है। 1956 में लिखा हुआ उनका गद्य आज 50 वर्ष बाद भी प्रासंगिक है। वह पुराना नहीं पड़ा है। ―राजेन्द्र उपाध्यायउपाध्याय राजेन्द्र आजकल (मासिक पत्रिका) मार्च 2007 प्रकाशन विभाग, सूचना भवन सी जी ओ कॉम्पलेक्स, लोदीरोड, नई दिल्ली-110 003 66 30 मार्च 2007
सन्दर्भ
2
ग्रन्थसूची
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बाहरी कड़ियाँ
Mahadevi Verma महादेवी वर्मा
जीवनी और निबंध
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http://www.jagran.com/sahitya/inner.aspx?idcategory=5&idarticle=954 माधुर्यभाव की उपासिका महादेवी जागरण 25 मार्च 2007 https://web.archive.org/web/20070928030716/http://www.jagran.com/sahitya/inner.aspx?idcategory=5&idarticle=954 28 सितंबर 2007 live
http://www.srijangatha.com/march%2007/shesh-vishesh.hastakshar.mahadevivarma.htm निशा सहगल हिन्दी की सरस्वतीः महादेवी वर्मा सृजनगाथा 25 मार्च 2007 https://web.archive.org/web/20070705085254/http://www.srijangatha.com/march%2007/shesh-vishesh.hastakshar.mahadevivarma.htm 5 जुलाई 2007 dead
डॉ॰ बिमलेश तेवतिया http://www.taptilok.com/2006/16-07-2006/sahitya_sankala_ki.html श्रृंखला की कड़ियां: स्व-निर्मित संविधान ताप्तीलोक 30 मार्च 2007 26 मार्च 2020 https://web.archive.org/web/20200326183233/http://www.taptilok.com/2006/16-07-2006/sahitya_sankala_ki.html dead
प्रो॰ ऋषभदेव शर्मा http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/R/Rishabhdeo/bhaarti_chintan_parmpra_saptprNaa_Alekh_mahadevi.htm भारतीय चिंतन परंपरा और ‘सप्तपर्णा’ साहित्य कुंज 1 जुलाई 2007 https://web.archive.org/web/20071006171359/http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/R/Rishabhdeo/bhaarti_chintan_parmpra_saptprNaa_Alekh_mahadevi.htm 6 अक्तूबर 2007 dead
डॉ॰ राजेन्द्र गौतम http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/R/RajendraGautam/mahadevi_ke_kavya_mein_kranti_chetna.htm महादेवी के काव्य में क्रांति-चेतना साहित्य कुंज 6 मई 2007 https://web.archive.org/web/20071011132033/http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/R/RajendraGautam/mahadevi_ke_kavya_mein_kranti_chetna.htm 11 अक्तूबर 2007 dead
संस्मरण
वर्मा महादेवी http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2001/chinibhai.htm रेखाचित्र ‘वह चीनी भाई’ अभिव्यक्ति 25 जुलाई 2006 https://web.archive.org/web/20060621131426/http://abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2001/chinibhai.htm 21 जून 2006 dead
वर्मा महादेवी http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2004/jo_rekhayen.htm संस्मरण ‘जो रेखाएं कह न सकेंगी’ अभिव्यक्ति 25 जुलाई 2006 https://web.archive.org/web/20060929151041/http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2004/jo_rekhayen.htm 29 सितंबर 2006 dead
विविध
सी आर राजश्री http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/C/CRRajshree/mahadevi_rekhachitr_Alekh.htm महादेवी की रचना 'गोरा और सोना पर आलेख साहित्य कुंज 11 दिसंबर 2007 https://web.archive.org/web/20090614201941/http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/C/CRRajshree/mahadevi_rekhachitr_Alekh.htm 14 जून 2009 dead
वर्मा महादेवी http://www.bbc.co.uk/hindi/news/cluster/2007/11/071119_bachchan_mahadevi.shtml महादेवी वर्मा पर बीबीसी हिन्दी की खास पेशकश बीबीसी हिन्दी 27 नवंबर 2007 https://web.archive.org/web/20071127134010/http://www.bbc.co.uk/hindi/news/cluster/2007/11/071119_bachchan_mahadevi.shtml 27 नवंबर 2007 live</div>
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श्रेणी:ज्ञानपीठ सम्मानित
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श्रेणी:भारत भारती
श्रेणी:मंगला प्रसाद पुरस्कार
श्रेणी:१९५६ पद्म भूषण
श्रेणी:फ़र्रूख़ाबाद के हिन्दी कवि
श्रेणी:भारतीय महिला साहित्यकार
श्रेणी:इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र
श्रेणी:साहित्य अकादमी फ़ैलोशिप से सम्मानित
श्रेणी:साहित्य और शिक्षा में पद्म विभूषण के प्राप्तकर्ता