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देहरादून का इतिहास
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thumb|right|300px|फारसी महाभारत में पाँचों पांडव और कृष्ण के साथ द्रोणाचार्यमान्यता है कि द्वापर युग में गुरु द्रोणाचार्य ने द्वारागांव के पास देहरादून शहर से 19 किमी पूर्व में देवदार पर्वत पर तप किया था। इसी से यह घाटी द्रोणाश्रम कहलाती है।A Brief History and profile of Dehradun https://web.archive.org/web/20070519221815/http://gov.ua.nic.in/schooleducation/DIET/diet_dehradun/district_profile.htm 19 मई 2007 Government of उत्तराखण्ड website.. केदारखंड को स्कंदपुराण का एक भाग माना जाता है। इसमें गढ़वाल की सीमाओं का वर्णन इस तरह है- गंगाद्वार-हरिद्वार से लेकर श्वेतांत पर्वत तक तथा तमसा-टौंस नदी से बौद्धांचल-बघाण में नन्दा देवी तक विस्तृत भूखंड जिसके एक ओर गंगा और दूसरी तरफ यमुना नदी बहती है। तमसा का प्रवाह भी देहरादून से होकर है।
रामायण काल से देहरादून के बारे में विवरण आता है कि रावण के साथ युद्ध के बाद भगवान राम और उनके छोटे भाई लक्ष्मण इस क्षेत्र में आए थे। अंग्रेज लेखक जीआरसी विलियम्स ने मेमोयर्स ऑफ दून में ब्राह्मण जनुश्रुति का उल्लेख करते हुए लिखा है कि लंका विजय के पश्चात् ब्राह्मण रावण को मारने का प्रायश्चित करने और प्रायश्चित स्वरूप तपस्या करने के लिए गुरु वशिष्ठ की सलाह पर भगवान राम लक्ष्मण के साथ यहां आए थे। राम ने ऋषिकेश में और लक्ष्मण ने तपोवन में पाप से मुक्ति के लिए वर्षो तपस्या की थी।
इसी प्रकार देहरादून जिले के अंतर्गत ऋषिकेश के बारे में भी स्कंदपुराण में उल्लेख है कि भगवान विष्णु ने दैत्यों से पीड़ित ऋषियों की प्रार्थना पर मधु-कैटभ आदि राक्षसों का संहार कर यह भूमि ऋषियों को प्रदान की थी। पुराणों में इस क्षेत्र को लेकर एक विवरण इस प्रकार भी है कि राम के भाई भरत ने भी यहां तपस्या की थी। तपस्या वाले स्थान पर भरत मंदिर बनाया गया था। कालांतर में इसी मंदिर के चारों ओर ऋषिकेश नगर का विकास हुआ। पुरातत्व की दृष्टि से भरत मंदिर की स्थापना सैकड़ों साल पुरानी है। स्कंद पुराण में तमसा नदी के तट पर आचार्य द्रोण को भगवान शिव द्वारा दर्शन देकर शस्त्र विद्या का ज्ञान कराने का उल्लेख मिलता है। यह भी कहा जाता है कि आचार्य द्रोण के पुत्र अश्वात्थामा द्वारा दुग्धपान के आग्रह पर भगवान शिव ने तमसा तट पर स्थित गुफा में प्रकट हुए शिवलिंग पर दुग्ध गिराकर बालक की इच्छा पूरी की थी। यह स्थान गढ़ी छावनी क्षेत्र में स्थित टपकेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर बताया जाता है। महाभारत काल में देहरादून का पश्चिमी इलाका जिसमें वर्तमान कालसी सम्मिलित है का शासक राजा विराट था और उसकी राजधानी वैराटगढ़ थी। पांडव अज्ञातवास के दौरान भेष बदलकर राजा विराट के यहां रहे। इसी क्षेत्र में एक मंदिर है जिसके बारे में लोग कहते कि इसकी स्थापना पांडवों ने की थी। इसी क्षेत्र में एक पहाड़ी भी है जहां भीम ने द्रौपदी पर मोहित हुए कीचक को मारा था। जब कौरवों तथा त्रिगता के शासक ने राजा विराट पर हमला किया तो पांडवों ने उनकी सहायता की थी।
महाभारत की लड़ाई के बाद भी पांडवों का इस क्षेत्र पर प्रभाव रहा और हस्तिनापुर के शासकों के अधीनस्थ शासकों के रूप में सुबाहू के वंशजों ने यहां राज किया। पुराणों मे देहरादून जिले के जिन स्थानों का संबंध रामायण एवं महाभारत काल से जोड़ा गया है उन स्थानों पर प्राचीन मंदिर तथा मूर्तियां अथवा उनके भग्नावशेष प्राप्त हुए हैं। इन मंदिरों तथा मूर्तियों एवं भग्नावशेषों का काल प्राय: दो हजार वर्ष तथा उसके आसपास का है। क्षेत्र की स्थिति और प्राचीन काल से चली आ रही सामाजिक परंपराएं, लोकश्रुतियां तथा गीत और इनकी पुष्टि से खड़ा समकालीन साहित्य दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र रामायण तथा महाभारत काल की अनेक घटनाओं का साक्षी रहा है। यमुना नदी के किनारे कालसी में अशोक के शिलालेख प्राप्त होने से इस बात की पुष्टि होती है कि यह क्षेत्र कभी काफी संपन्न रहा होगा। सातवीं सदी में इस क्षेत्र को सुधनगर के रूप में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी देखा था। यह सुधनगर ही बाद में कालसी के नाम से पहचाना जाने लगा। कालसी के समीपस्थ हरिपुर में राजा रसाल के समय के भग्नावशेष मिले हैं जो इस क्षेत्र की संपन्नता को दर्शाते हैं। लगभग आठ सौ साल पहले दून क्षेत्र में बंजारे लोग आ बसे थे। उनके बस जाने के बाद यह क्षेत्र गढ़वाल के राजा को कर देने लगा। कुछ समय बाद इस ओर इब्राहिम बिन महमूद गजनवी का हमला हुआ।
इससे भी भयानक हमला तैमूर का था। सन् 1368 में तैमूर ने हरिद्वार के पास राजा ब्रह्मदत्त से लड़ाई की। ब्रह्मदत्त का राज्य गंगा और यमुना के बीच था। बिजनौर जिले से गंगा को पार कर के मोहन्ड दर्रे से तैमूर ने देहरादून में प्रवेश किया था। हार जाने पर तैमूर ने बड़ी निर्दयता से मारकाट करवाई, उसे लूट में बहुत-सा धन भी मिला था। इसके बाद फिर कई सदियों तक इधर कोई लुटेरा नहीं आया। शाहजहां के समय में फिर एक मुगल सेना इधर आई थी। उस समय गढ़वाल में पृथ्वी शाह का राज्य था। इस राजा के प्रपौत्र फतेह शाह ने अपने राज्य की सीमा बढ़ाने के उद्देश्य से तिब्बत और सहारनपुर पर एक साथ चढ़ाई कर दी थी, लेकिन इतिहास के दस्तावेजों के अनुसार उसको युद्ध में हार का मुंह देखना पड़ा था। सन् 1756 के आसपास श्री गुरु राम राय ने दून क्षेत्र में अपनी सेना तथा शिष्यों के साथ प्रवेश किया और दरबार साहिब की नींव रखकर स्थायी रूप से यहीं बस गए।
गूजर और राजपूतों के आ जाने से धीरे-धीरे दून की आबादी बढ़ने लगी। आबादी तथा अन्न की उपज बढ़ने से गढ़वाल राज्य की आमदनी भी बढ़ने लगी। देहरादून की संपन्नता देखकर सन् 1757 में रूहेला सरदार नजीबुद्दौला ने हमला किया। इस हमले को रोकने में गढ़वाल राज्य नाकाम रहा, जिसके फलस्वरूप देहरादून मुगलों के हाथ में चला गया। देहरादून के तत्कालीन शासक नजब खाँ ने इसके परिक्षेत्र को बढ़ाने में भरपूर कोशिश की। उसने आम के पेड़ लगवाने, नहर खुदवाने तथा खेती का स्तर सुधारने में स्थानीय निकायों को भरसक मदद पहुंचाई, लेकिन नजब खाँ की मौत के बाद किसानों की दशा फिर दीनहीन हो गई।
गुरु राम राय दरबार के कारण यहां सिखों की आवाजाही भी बढ़ चुकी थी। अत: एक बार फिर से देहरादून का गौरव समृद्धशाली क्षेत्र के रूप में फैलने लगा। सन् 1785 में गुलाम कादिर ने इस क्षेत्र पर हमला किया। इस बार बड़ी मारकाट मची। गुलाम कादिर ने लौटते समय उम्मेद सिंह को यहां का गवर्नर बनाया। गुलाम कादिर के जिंदा रहते उम्मेद सिंह ने स्वामी भक्ति में कोई कमी न आने दी, लेकिन उनके मरते ही सन् 1796 में उम्मेद सिंह ने गढ़वाल राजा प्रद्युम्न शाह से संधि कर ली।
सन् 1801 तक देहरादून में अव्यवस्था बनी रही। प्रद्युम्न शाह का दामाद हरिसिंह गुलेरिया दून की प्रजा का उत्पीड़न करने वालों में सबसे आगे था। अराजकता के कारण दून की वार्षिक आय एक लाख से घटकर आठ हजार रुपये मात्र रह गई थी। प्रद्युम्न शाह के मंत्री रामा और धरणी नामक बंधुओं ने दून की व्यवस्था सुधार में प्रयास आरंभ किए ही थे कि प्रद्युम्न शाह के भाई पराक्रम शाह ने उनका वध करा दिया। अब देहरादून की सत्ता सहसपुर के पूर्णसिंह के हाथों में आ गई, किंतु वह भी व्यवस्था में सुधार न ला सका। पराक्रम शाह ने अपने मंत्री शिवराम सकलानी को इस आशय से देहरादून भेजा गया कि वह उसके हितों की रक्षा कर सके। शिवराम सकलानी के पूर्वज शीश राम को रोहिला युद्ध में वीरता दिखाने के कारण टिहरी रियासत ने सकलाना पट्टी में जागीर दी थी। इन सभी के शासन काल में देहरादून का गवर्नर उम्मेद सिंह ही बना रहा। वह एक चतुर राजनीतिज्ञ था इसी कारण प्रद्युम्न शाह ने अपनी एक पुत्री का विवाह उसके साथ करके उसे अपना स्थायी शासक नियुक्त कर दिया। कहा जाता है कि 1803 में गोरखा आक्रमण के समय उम्मेद सिंह ने अवसरवादिता का परिचय इस प्रकार दिया कि युद्ध के समय वह अपने ससुर के पक्ष में खड़ा नहीं देखा गया। देहरादून को उसकी संपन्नता के कारण ही समय-समय पर लुटेरों की लूट एवं तानाशाहों की प्रवृत्ति का शिकार बनते रहना पड़ा।
सन् 1760 में गोरखों ने अल्मोड़ा को जीतने के उपरांत गढ़वाल पर धावा बोला। गढ़वाल के राजा ने गोरखों को पच्चीस सौ रुपये वार्षिक कर के रूप में देना शुरू किया, लेकिन इतना नजराना पाने के बावजूद भी 1803 में गोरखों ने गढ़वाली सेना से युद्ध छेड़ दिया। गोरखों की विजय हुई और उनका अधिकार क्षेत्र देहरादून तक बढ़ गया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने देहरादून को गोरखों के प्रभाव से मुक्त कराने के लिए मोहन्ड और तिमली दर्रो से अंग्रेज सेना भेजी। अंग्रेजों ने बल का उपयोग करके गोरखों को खदेड़ बाहर किया और इस तरह उनका देहरादून में प्रभुत्व स्थापित हो गया। उन्होंने अपने आराम के लिए 1827-28 में लंढोर और मसूरी शहर बसाया। कुछ समय के लिए देहरादून जिला कुमाऊँ कमिश्नरी यानी मंडल में रहा फिर इसको मेरठ में मिला दिया गया। आज यह गढ़वाल मंडल में है। 1970 के दशक में इसे गढ़वाल मंडल में शामिल किया गया। सन् 2000 में उत्तरप्रदेश से अलग होकर बने उत्तरांचल [अब उत्तराखंड] की अस्थाई राजधानी देहरादून को बनाया गया। राजधानी बनने के बाद इस शहर का आकार निरंतर बढ़ रहा है।
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श्रेणी:देहरादून जिला