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सेंग खासी
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सेंग खासी (या सेंगखासी) मेघालय का एक अल्पसंख्यक समाज एवं आन्दोलन है। ये मूल खासी हैं। मूल खासी धर्म और संस्कृति को संरक्षित रखने के लिए शुरू किए गए सेंग खासी आंदोलन की याद में हर वर्ष 'सेंग कुट नेम' नामक महोत्सव मनाया जाता है। अंग्रेजों के आक्रमण से खासी संस्कृति और भाषा को बचाने के लिए 23 अगस्त 1899 को 16 बहादुर राष्ट्रभक्त खासी युवकों ने 'सेंग खासी' का गठन किया था।
एक समय था जब खासी, जयंतिया और गारो की पहाड़ियों पर इन्हीं का राज्य था और वीरता में ही नहीं, ज्ञान और संस्कृति के मामले में भी यह समुदाय अद्वितीय था। इस समाज का प्रभाव इंडोनेशिया, लाओ और कंबोडिया के जनजातीय पहनावे, बोलचाल और रीतिरिवाजों तक देखा गया। लगभग डेढ़ सौ साल पहले अंग्रेज वहां आए और अपनी सत्ता को मजबूत करने के तमाम उपकरण और तौर-तरीके अपनाते हुए ब्रिटिश मिशनरी भी अपनी छत्रछाया में ले आए। खासी समाज के सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी तीरथ सिंह (जिन्हें खासी भाषा में श्री के लिए यू का प्रयोग करते हुए यू तीरोथ सिंह कहा जाता है) की शहादत आज भी प्रेरणा का स्रोत है। जब ब्रिटिश अत्याचार और धर्मांतरण की तीव्रता बढ़ी तो 23 नवंबर, 1899 को सोलह खासी नौजवानों ने अपनी जनजातीय आस्था और परंपरा बचाने के लिए सेंगखासी संगठन की स्थापना की। अब यह दिन एक त्योहार बन गया है, जिसे सेंगकुट स्नेम कहा जाता है। इस दिन चावल और जल के साथ निराकार ईश्वर की पूजा की जाती है और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्थापित सेंगखासी आंदोलन के नायकों का स्मरण करते हुए नई पीढ़ी में अपनी संस्कृति और समाज की धार्मिकता के संस्कार रोपे जाते हैं। इस दिन एक प्रसिद्ध खासी उक्ति दोहराई जाती है- ‘लाएद लालादेय, बुरोम इया कीवेई’ यानी अपना भी सम्मान करो और दूसरों का भी सम्मान करो।
http://archive.jansatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=56055:2013-12-08-04-21-36&catid=32:2012-01-01-05-57-23 दक्षिणावर्त : बदलाव की गंध 11 अगस्त 2015 https://web.archive.org/web/20160304223446/http://archive.jansatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=56055:2013-12-08-04-21-36&catid=32:2012-01-01-05-57-23 4 मार्च 2016 dead
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
सेंग खासी आन्दोलन का जालघर
श्रेणी:भारतीय समाज