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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

प्रज्ञानं ब्रह्म

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प्रज्ञानं ब्रह्म, ऋग्वेद का महावाक्य है, जिसका शाब्दिक अर्थ है - "प्रज्ञान ही ब्रह्म है"। यह महावाक्य ऋग्वेद के ऐतरेय उपनिषद में आया है। चार वेदों में चार महावाक्य है। इस महावाक्य का अर्थ है- 'प्रकट ज्ञान ब्रह्म है।' वह ज्ञान-स्वरूप ब्रह्म जानने योग्य है और ज्ञान गम्यता से परे भी है। वह विशुद्ध-रूप, बुद्धि-रूप, मुक्त-रूप और अविनाशी रूप है। वही सत्य, ज्ञान और सच्चिदानन्द-स्वरूप ध्यान करने योग्य है। उस महातेजस्वी देव का ध्यान करके ही हम 'मोक्ष' को प्राप्त कर सकते हैं। वह परमात्मा सभी प्राणियों में जीव-रूप में विद्यमान है। वह सर्वत्र अखण्ड विग्रह-रूप है। वह हमारे चित और अहंकार पर सदैव नियन्त्रण करने वाला है। जिसके द्वारा प्राणी देखता, सुनता, सूंघता, बोलता और स्वाद-अस्वाद का अनुभव करता है, वह प्रज्ञान है। वह सभी में समाया हुआ है। वही 'ब्रह्म' है। ऐतरेय उपनिषद के अन्त में सार रूप में आया है कि- एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्चमहाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव । बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥ ( अर्थ : यह ब्रह्म है, यह इन्द्र है, यह प्रजापति है। ये समस्त देवता तथा ये पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज—इस प्रकार ये पाँच महाभूत तथा ये छोटे-छोटे मिले हुए से बीजरूप समस्त प्राणी और इनसे भिन्न दूसरे भी अंडज, जरायुज, (जो गर्भ से उत्पन्न हुए हैं), स्वेदज (पसीने से उत्पन्न होने वाले) और उद्भिज (भूमि से निकलने वाले) तथा घोड़े, गायें, हाथी, मनुष्य जो कुछ भी यह जगत् है, जो भी कोई पंखो वाला और वह चलने-फिरने वाला और नही चलने वाला प्राणि समुदाय है, वह सब प्रज्ञा रूपी नेत्रो वाले हैं और प्रज्ञान पर ही प्रतिष्ठित (बैठे हुए) हैं। यह समस्त ब्रह्माण्ड, प्रज्ञा रूपी नेत्रों वाला है। प्रज्ञान ही इस स्थिति का आधार है। यह प्रज्ञान ही ब्रह्म है।) सन्दर्भ इन्हें भी देखें महावाक्य प्रज्ञा (हिन्दू धर्म) ऐतरेय उपनिषद सन्दर्भ श्रेणी:उपनिषद श्रेणी:महावाक्य श्रेणी:वेदांत श्रेणी:हिन्दू धर्म श्रेणी:हिन्दू धर्म आधार