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नारायण पण्डित (गणितज्ञ)
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नारायण पण्डित नामक गणितज्ञ हितोपदेश के लेखक नारायण पण्डित नारायण पण्डित
नारायण पण्डित (१३४०–१४००) भारत के एक प्रमुख गणितज्ञ थे। उन्होंने १३५६ में गणितीय संक्रियाओं के बारे में गणित कौमुदी नामक पुस्तक लिखी। इसके फलस्वरुप क्रमचय-संचय (:en:combinatorics) में कई विकास हुये। प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ चन्द्रकान्त राजू उन्हें बनारस-निवासी मानते हैं।http://ckraju.net/blog/?p=17 Wikipedia: Narayana Pandit 1 23 फ़रवरी 2015 https://web.archive.org/web/20150223090742/http://ckraju.net/blog/?p=17 23 फ़रवरी 2015 dead
गणित की इतिहासकार किम प्लॉफ्कर लिखती हैं कि केरलीय गणित सम्प्रदाय के अलावा, भास्कर द्वितीय के बाद नारायण पण्डित के ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए गणित के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।52
नारायण पण्डित की दो मुख्य कृतियाँ है- पहली "गणितकौमुदी" नामक अंकगणितीय ग्रन्थ तथा दूसरा बीजगणित वातांश' नामक बीजगणितीय ग्रन्थ। नारायण को भास्कर द्वितीय के लीलावती तथा कर्मप्रदीपिका (अथवा कर्मपद्धति) की विस्तृत टीका के लेखक के रूप में भी जाना जाता है।J. J. O'Connor and E. F. Robertson (2000). Narayana https://web.archive.org/web/20080124154540/http://www-gap.dcs.st-and.ac.uk/~history/Biographies/Narayana.html 24 जनवरी 2008 , MacTutor History of Mathematics archive. यद्यपि कर्मप्रदीपिका में मूल कार्य थोड़ा ही है, इसमें संख्याओं का वर्ग करने हेतु सात विभिन्न विधियाँ हैं। एक ऐसा योगदान जो कि पूर्णरुपेण लेखक का मौलिक है साथ ही बीजगणित में योगदान तथा माया वर्ग (मैजिक स्क्वायर)।
नारायण के अन्य मुख्य कार्यों में कई गणितीय विकास शामिल हैं, जैसे वर्गमूल का सन्निकट (लगभग) मान निकालने हेतु एक नियम, दूसरी ऑर्डर की अनिर्धार्य समीकरण में छानबीन, nq2 + 1 = p2 (पैल की समीकरण), इण्टरमी़डिएट उच्च ऑर्डर समीकरणों का हल, शून्य सहित गणितीय संक्रियायें, कई ज्यामितीय नियम तथा मायावी वर्ग उसके जैसी अन्य आकृतियों की चर्चा। इस बात के भी प्रमाण मिलते हैं कि नारायण ने भास्कर द्वितीय के कार्य अवकल गणित (डिफरेन्शियल कैलकुलस) के विचार में भी थोड़ा योगदान दिया। नारायण ने चक्रीय चतुर्भुज के विषय में भी योगदान दिया।Ian G. Pearce (2002). Mathematicians of Kerala https://web.archive.org/web/20081219151102/http://www-gap.dcs.st-and.ac.uk/~history/Projects/Pearce/Chapters/Ch9_2.html 19 दिसंबर 2008 . MacTutor History of Mathematics archive. University of St Andrews.
नारायण को किसी क्रम के सभी परमुटेशनों की सिस्टैमैटिक रूप से उत्पत्ति हेतु एक विधि विकसित करने का भी श्रेय दिया जाता है।
गोसंख्या
गणितकौमुदी में नारायण पण्डित ने गायों के वंशविस्तार से सम्बन्धित निम्नलिखित समस्या दी है-
प्रतिवर्षं गौः सूते वर्षत्रितयेन तर्णकी तस्याः ।
विद्वन् विंशतिवर्षैः गोरेकस्याश्च सन्ततिं कथय ॥ १६ ॥Gaṇitakaumudī of Nārāyaṇa Paṇḍita
कोई गाय प्रति वर्ष एक बछिया जनती है। प्रत्येक बछिया, चौथे वर्ष से आरम्भ करके प्रति वर्ष एक बछिया जनती है। २० वर्ष के बाद कितनी गायें और कितनी बछियाँ हो जायेंगीं?
आधुनिक गणित की भाषा में पुनरावृत क्रम (recurrence sequences) निम्नलिखित होगा:
Nn = Nn-1 + Nn-3 for n > 2,
with initial values
N0 = N1 = N2 = 1.
आरम्भ के कुछ पद (terms) ये होंगे : 1, 1, 1, 2, 3, 4, 6, 9, 13, 19, 28, 41, 60, 88,... A000930.
इन पदों का सीमान्त अनुपात (limit ratio) अतिस्वर्ण-अनुपात (supergolden ratio) होगा।
इस अनुक्रम की परिभाषा और अति-स्वर्ण-अनुपात का फ़िबोनाच्ची अनुक्रम और स्वर्ण अनुपात के परिभाषा से घनिष्ट सम्बन्ध है।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
भारतीय गणित
गणित कौमुदी
बाहरी कड़ियाँ
विश्वकोश लेख
भारतीय गणितज्ञ-नारायण पंडित
नारायणपण्डितकृता गणितकौमुदी (प्रथमो भाग:)
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