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तबला
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TABLA.jpg percussion भारतीय तालवाद्य, चमड़ा मढ़े दो ड्रम रस्सी में फँसे लकड़ी के गट्टों को हथौड़ी से ठोंक कर स्वर ऊँचा या नीचा नियत किया जाता है </div> पखावज, मृदंग, खोल, ढोलक, नगाड़ा, बोंगो
तबलाIn other languages: bn তবলা, prs طبلا, gu તબલા, kn ತಬಲಾ, ml തബല, mr तबला, ne तबला, or ତବଲା, ps طبله, pa ਤਬਲਾ, ta தபலா, te తబలా, ur طبلہ "nb" "nb" भारतीय संगीत में प्रयोग होने वाला एक तालवाद्य है जो मुख्य रूप से दक्षिण एशियाई देशों में बहुत प्रचलित है।डॉन माइकल रैंडल दि हार्वर्ड डिक्शनरी ऑफ़ म्यूजिक https://books.google.com/books?id=02rFSecPhEsC 2003 हार्वर्ड विश्वविद्यालय प्रेस 978-0-674-01163-2 820, 864 26 फ़रवरी 2017 https://web.archive.org/web/20170115230913/https://books.google.com/books?id=02rFSecPhEsC 15 जनवरी 2017 live यह लकड़ी के दो ऊर्ध्वमुखी, बेलनाकार, चमड़ा मढ़े मुँह वाले हिस्सों के रूप में होता है, जिन्हें रख कर बजाये जाने की परंपरा के अनुसार "दायाँ" और "बायाँ" कहते हैं। यह तालवाद्य हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में काफी महत्वपूर्ण है और अठारहवीं सदी के बाद से इसका प्रयोग शास्त्रीय एवं उप शास्त्रीय गायन-वादन में लगभग अनिवार्य रूप से हो रहा है। इसके अतिरिक्त सुगम संगीत और हिंदी सिनेमा में भी इसका प्रयोग प्रमुखता से हुआ है। यह बाजा भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, और श्री लंका में प्रचलित है।Tabla https://web.archive.org/web/20161221014807/https://www.britannica.com/art/tabla 21 दिसंबर 2016 एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका पहले यह गायन-वादन-नृत्य इत्यादि में ताल देने के लिए सहयोगी वाद्य के रूप में ही बजाय जाता था, परन्तु बाद में कई तबला वादकों ने इसे एकल वादन का माध्यम बनाया और काफी प्रसिद्धि भी अर्जित की।
नाम तबला की उत्पत्ति अरबी-फ़ारसी मूल के शब्द "तब्ल" से बतायी जाती है।रिचार्ड एम्मर्ट युकी मिन्गेशी Musical voices of Asia: report of (Asian Traditional Performing Arts 1978) एशिया की संगीतमय आवाज़: एशियाई परम्परागत प्रदर्शन कलायें 1978, रिपोर्ट https://books.google.com/books?id=hSEKAQAAMAAJ 25 दिसम्बर 2012 1980 हेईबोंशा 266 https://web.archive.org/web/20130604052058/http://books.google.com/books?id=hSEKAQAAMAAJ 4 जून 2013 live हालाँकि, इस वाद्य की वास्तविक उत्पत्ति विवादित है - जहाँ कुछ विद्वान् इसे एक प्राचीन भारतीय परम्परा में ही उर्ध्वक आलिंग्यक वाद्योंमुकुन्द भाले तबला वाद्य के आकार प्रकार में बदलाव से वादन पद्धति और रचनाओं में आये परिवर्तन अतोदय 2 जुलाई 2014 1 1 http://www.atodya.com/%E0%A4%A4%E0%A4%AC%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%86%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0/ कोलकाता वेब 2349-8196 26 फ़रवरी 2017 https://web.archive.org/web/20170227062531/http://www.atodya.com/%E0%A4%A4%E0%A4%AC%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%86%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0/ 27 फ़रवरी 2017 dead का विकसित रूप मानते हैं वहीं कुछ इसकी उत्पत्ति बाद में पखावज से निर्मित मानते हैं और कुछ लोग इसकी उत्पत्ति का स्थान पच्छिमी एशिया भी बताते हैं।
उत्पत्ति
तबले का इतिहास सटीक तौर पर नामालूम है और इसकी उत्पत्ति के बारे में कई उपस्थापनायें मौजूद हैं।रॉबर्ट ऍस॰ गौट्लिब Solo Tabla Drumming of North India उत्तर भारतीय एकल तबला वादन https://books.google.com/books?id=f-xk7L_DNcUC&pg=PA1 1993 मोतीलाल बनारसीदास 978-81-208-1093-8 1–3मैट डीन The Drum: A History ड्रम: एक इतिहास https://books.google.com/books?id=4CdzdFgfV8YC&pg=PA104 2012 स्केयरक्रो 978-0-8108-8170-9 104 26 फ़रवरी 2017 https://web.archive.org/web/20140101072455/http://books.google.com/books?id=4CdzdFgfV8YC 1 जनवरी 2014 live इसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में वर्णित विचारों को दो समूहों में बाँटा जा सकता है:
तुर्क-अरब उत्पत्ति
औपनिवेशिक शासन के दौरान इस परिकल्पना को काफी बलपूर्वक पुरःस्थापित किया गया कि तबले की मूल उत्पत्ति मुस्लिम सेनाओं के साथ चलने वाले जोड़े ड्रम से हुई है; इस स्थापना का मूल अरबी के "तब्ल" शब्द पर आधारित है जिसका अर्थ "ड्रम (ताल वाद्य)" होता है। बाबर द्वारा सेना के साथ ऐसे ड्रम लेकर चलने को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, हालाँकि तुर्क सेनाओं के साथ चलने वाले ये वाद्ययंत्र तबले से कोई समानता नहीं रखते बल्कि "नक्कारा" (भीषण आवाज़ पैदा करने वाले) से समानता रखते हैं।
दूसरी स्थापना के मुताबिक़, अलाउद्दीन खिलजी के समय में, अमीर ख़ुसरो ने "आवाज़ बाजा" (बीच में पतला तालवाद्य) को काट कर तबले का रूप देने की बात कही जाती है। हालाँकि, यह भी संभव नहीं लगता क्योंकि उस समय के कोई भी चित्र इस तरह के किसी वाद्य यंत्र का निरूपण नहीं करते। मुस्लिम इतिहासकारों ने भी अपने विवरणों में ऐसे किसी वाद्ययंत्र का उल्लेख नहीं किया है। उदाहरण के लिए, अबुल फैजी ने आईन-ए-अकबरी में तत्कालीन वाद्ययंत्रों की लंबी सूची गिनाई है, लेकिन इसमें तबले का ज़िक्र नहीं है।
एक अन्य तीसरे मतानुसार दिल्ली के ख़यात गायक सदारंग के शिष्य और प्रसिद्ध पखावज वादक रहमान खान के पुत्र, अमीर खुसरो (द्वितीय) ने 1738 ई॰ में पखावज से तबले का आविष्कार किया।Solo Tabla Drumming of North India: Inam Ali Khan ; Keramatullah Khan ; Wajid Hussain https://books.google.com/books?id=f-xk7L_DNcUC&pg=PA122 1993 Motilal Banarsidass Publ. 978-81-208-1093-8 122– 26 फ़रवरी 2017 https://web.archive.org/web/20170227064721/https://books.google.com/books?id=f-xk7L_DNcUC&pg=PA122 27 फ़रवरी 2017 live इससे पहले ख़याल गायन में भी पखावज से संगत की जाती थी। इस सिद्धांत में सत्यता संभावित है क्योंकि उस समय की लघु कलाकृतियों (मिनियेचर पेंटिंग) में तबले से मिलते-जुलते वाद्ययंत्र के प्रमाण मिलते हैं। हालाँकि, इससे यह प्रतीत होता है की इस वाद्ययंत्र की उत्पत्ति भारतीय उपमहादीप के मुस्लिम समुदायों में दिल्ली के आसपास हुई न कि यह अरब देशों से आयातित वाद्ययंत्र है।पीटर लाजौली The Dawn of Indian Music in the West पश्चिम में भारतीय संगीत का उदय https://books.google.com/books?id=OSZKCXtx-wEC&pg=PA37 2006 ब्लूम्सबरी ऐकेडमिक 978-0-8264-1815-9 37–39 26 फ़रवरी 2017 https://web.archive.org/web/20161213075546/https://books.google.com/books?id=OSZKCXtx-wEC 13 दिसंबर 2016 live नील सोर्रेल और पंडित राम नारायण जैसे संगीतविद पखावज काट कर तबला बनाये जाने की इस किम्वदंती में बहुत सत्यता नहीं देखते।
भारतीय उत्पत्ति
thumb|upright=1.2|चौथी-पाँचवी सदी की मूर्तियों में विविध वाद्ययंत्र बजाते गंधर्व, जिनमें दो नादवाद्य बजा रहे, हालाँकि ये तबले जैसे नहीं दीखते, अन्य मंदिर उत्कीर्णनों में अवश्य दिखता है।ऍस॰ प्रज्ञानंद A historical study of Indian music भारतीय संगीत का एक ऐतिहासिक अध्ययन https://books.google.com/books?id=guXibgtWsNwC 1981 मुंशीराम मनोहरलाल 82
भारतीय उत्पत्ति के सिद्धांत को मानने वाले तबले का मूल भारत में मानते हैं और यह कहते हैं कि मुस्लिम काल में इसने मात्र अरबी नाम ग्रहण कर लिया। भारतीय नाट्यशास्त्र के प्रणेता भरत मुनि के द्वारा उर्ध्वक आलिंग्यक वाद्यों के वर्णन की बात कही जाती है। ऐसे ही, हाथ में लेकर बजाये जाने वाले "पुष्कर" नामक तालवाद्यों से तबले की उत्पत्ति बतायी जाती है। "पुष्कर" वाद्य के प्रमाण छठवीं-सातवीं सदी के मंदिर उत्कीर्णनों में, ख़ासतौर पर मुक्तेश्वर और भुवनेश्वर मंदिरों में, प्राप्त होते हैं।रॉबर्ट ऍस॰ गौट्लिब Solo Tabla Drumming of North India उत्तर भारतीय एकल तबला वादन https://books.google.com/books?id=f-xk7L_DNcUC&pg=PA1 1993 मोतीलाल बनारसीदास 978-81-208-1093-8 2–3परशुराम सिंह The Guru Granth Sahib: Canon, Meaning and Authority गुरु ग्रंथ साहिव:पंथ, अर्थ और प्राधिकार https://books.google.com/books?id=HMvXAAAAMAAJ 2000 ऑक्स्फ़र्ड यूनिवर्सिटी प्रेस 978-0-19-564894-2 135–136 इन कलाकृतियों में वादक कलाकार दो या तीन अलग-अलग रखे तालवाद्यों को सामने रख कर बैठे दिखाए गए हैं और उनके हाथों और उँगलियों के निरूपण से वे इन्हें बजाते हुए प्रतीत होते हैं। हालाँकि, इन निरूपणों से यह नहीं पता चलता कि ये वाद्ययंत्र उन्हीं पदार्थों से निर्मित हैं और चर्मवाद्य ही हैं, जैसा की आधुनिक समय का तबला होता है।
तबला आज जिन पदार्थों से और जिस रूप में बनाया जाता है, ऐसे वाद्ययंत्रों के निर्माण के लिखित प्रमाण संस्कृत ग्रंथों में उपलब्ध हैं। "तबला"-जैसे वाद्ययंत्र के निर्माण सम्बन्धी सबसे पुरानी जानकारी संस्कृत नाट्य शास्त्र में मिलती है। इन तालवाद्यों को बजाने से सम्बंधित विवरण भी नाट्यशास्त्र में मिलती है। वहीं, दक्षिण भारतीय ग्रंथ, उदाहरणार्थ, शिलप्पदिकारम, जिसकी रचना प्रथम शताब्दी ईसवी मानी जाती है, लगभग तीस ताल वाद्यों का विवरण देता है जिनमें कुछ रस्सियों द्वारा कसे जाने वाले और अन्य शामिल हैं, लेकिन इसमें "तबला" नामक किसी वाद्य का विवरण नहीं है।ब्रूनों नेट्ल स्टोन ऍम॰ रथ जेम्स पोर्टल (et al) The Garland Encyclopedia of World Music विश्व संगीत का हार रूपी ज्ञानकोश https://books.google.com/books?id=ZOlNv8MAXIEC&pg=PA327 1998 टेलर & फ्रांसिस 978-0-8240-4946-1 327 26 फ़रवरी 2017 https://web.archive.org/web/20170418151350/https://books.google.com/books?id=ZOlNv8MAXIEC 18 अप्रैल 2017 live
इतिहास
thumbnail|200 ईपू की बौद्ध भाजे गुफाओं, महाराष्ट्र में, एक स्त्री तालवाद्यों का जोड़ा बजाते हुए और अन्य नर्तकी।पी ऍस मेश्राम इंडिका, भाग 18 https://books.google.com/books?id=vBxuAAAAMAAJ 1981 Heras Institute of Indian History and Culture 57–59
ताल और तालवाद्यों का वर्णन वैदिक साहित्य से ही मिलना शुरू हो जाता है।दि थ्योरी एंड प्रैक्टिस ऑफ़ तबला, नेम्पल्ली सदानंद, पॉपुलर प्रकाशन66-68 लेविस रौवेल म्यूजिक एंड म्य्म्यूज़िकल थाट इन अर्ली इंडिया https://books.google.com/books?id=h5_UCgAAQBAJ 2015 यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो प्रेस 978-0-226-73034-9 26 फ़रवरी 2017 https://web.archive.org/web/20161226053201/https://books.google.com/books?id=h5_UCgAAQBAJ 26 दिसंबर 2016 live दो या तीन अंगों वाला, डोरियों के सहारे लटका कर, हाथों से बजाये जाने वाले वाद्य यंत्र पुष्कर (अथवा "पुष्कल") के प्रमाण पाँचवीं सदी में होने के प्रमाण मिलते हैं जो मृदंग के साथ अन्य तालवाद्यों में गिने जाते थे, हालाँकि, तब इन्हें तबला नहीं कहा जाता था।मोनियर विलियम्स अर्न्स्ट ल्यूमान्न कार्ल कैपलर A Sanskrit-English Dictionary: Etymologically and Philologically Arranged with Special Reference to Cognate Indo-European Languages https://books.google.com/books?id=zUezTfym7CAC 2002 मोतीलाल बनारसीदास 978-81-208-3105-6 638–639 26 फ़रवरी 2017 https://web.archive.org/web/20170324070844/https://books.google.com/books?id=zUezTfym7CAC 24 मार्च 2017 live पांचवीं सदी से पूर्व की अजंता गुफाओं के भित्ति-चित्र जमीन पर रख कर बजाये जाने वाले ऊर्ध्वमुखी ड्रमों का निरूपण करते हैं।अनिल डी सिल्वा ऑटो जॉर्ज फॉन सिमसन म्यूजिक https://books.google.com/books?id=8dczAQAAIAAJ अंक 2 (मैन थ्रू हिज आर्ट) 1964 न्यू यॉर्क ग्राफिक लाइब्रेरी 22 71767819, उद्धरण: "To her left are two girls standing with cymbals in their hands, and two seated playing drums, one with a pair of upright drums like the modern Indian dhol, and the other, sitting cross-legged, with a drum held horizontally, like the modern mirdang." बैठ का ताल वाद्य बजाते हुए कलाकारों का ऐसा ही निरूपण एलोरा की प्रस्तर मूर्तियों में मिलता है,लिसा ओवेन कार्विंग डिवोशन इन दि जैन केव्ज एट एलोरा https://books.google.com/books?id=vHK2WE8xAzYC&pg=PA24 2012 ब्रिल एकेडेमिक 90-04-20629-9 24–25 26 फ़रवरी 2017 https://web.archive.org/web/20170205083836/https://books.google.com/books?id=vHK2WE8xAzYC 5 फ़रवरी 2017 live तथा अन्य स्थलों से भी।पिया ब्रैंकासिओ दि बुद्धिस्ट केव्ज एट औरंगाबाद: ट्रांस्फॉर्मेशन्स इन आर्ट एंड रेलिजन https://books.google.com/books?id=m_4pXm7dD78C 2010 ब्रिल एकेडेमिक 90-04-18525-9 21
पहली सदी के चीनी-तिब्बती यात्रियों द्वारा भी भारत में छोटे आकार के ऊर्ध्वमुखी ड्रमों का प्रचलन होने का विवरण प्राप्त होता है (पुष्कर को तिब्बती साहित्य में "जोंग्पा" कहा गया है)।རྫོགས་པ་, तिब्बती अंग्रेजी डिक्शनरी (2011) जैन और बौद्ध ग्रंथों, जैसे समवायसूत्र, ललितविस्तार और सूत्रालंकार इत्यादि में भी पुष्कर नामक इस तालवाद्य के विवरण मिलते हैं।राधा कुमुद मुखर्जी एनशियेंट इंडियन एडुकेशन: ब्रह्मनिकल एंड बुद्धिस्ट https://books.google.com/books?id=mjFfqpq7HhkC&pg=PA354 1989 मोतीलाल बनारसीदास 978-81-208-0423-4 354–355 26 फ़रवरी 2017 https://web.archive.org/web/20170311061811/https://books.google.com/books?id=mjFfqpq7HhkC 11 मार्च 2017 live
thumb|तबले से मिलते जुलते कुछ अन्य भारतीय वाद्ययंत्र
कई हिन्दू और जैन मंदिर, जैसे की राजस्थान के जयपुर स्थित एकलिंगजी मंदिर, तबले जैसे आकार के वाद्य बजाते हुए व्यक्ति का प्रस्तर मूर्तियों में निरूपण करते हैं। दक्षिण में यादव शासन के समय (1210 से 1247) में भी आईएस तरह के छोटे तालवाद्यों का प्रमाण मिलता है जब सारंगदेव संगीत रत्नाकर की रचना कर रहे थे। हालिया बिंबशास्त्रीय दावे जिनमें तबले को 1799 के आसपास का माना गया हैफ्रांस बल्थाज़र सोल्विन्स, A Collection of Two Hundred and Fifty Coloured Etchings https://web.archive.org/web/20170624232547/http://www.laits.utexas.edu/solvyns-project/solvynsonline/pages/Calcutta160.html 24 जून 2017 (1799) अब महत्वहीन हो चुकी हैं और भाजे गुफाओं से प्राप्त चित्र प्राचीन भारत में इस तरह के वाद्य का प्रयोग प्रमाणित करते हैं। जमीन पर रख कर बजाये जाने वाले ऊर्ध्वमुखी वाद्यों के प्रमाण कई हिन्दू मंदिरों से प्राप्त हुए हैं जो 500 ईपू के आसपास तक के समय के हैं।web.mit.edu/chintanv/www/tabla/class_material/Introduction%20to%20Tabla.ppt दक्षिण भारत में इसतरह के वाद्यों के मौजूद होने के प्रमाण के रूप में होयसलेश्वर मंदिर, कर्नाटकम का उदाहरण लिया जा सकता है जिसमें एक नक्काशी में नृत्य समारोह में एक स्त्री तबले जैसे वाद्य बजाती दिखाई गयी है।http://www.persee.fr/web/revues/home/prescript/article/befeo_0336-1519_1988_num_77_1_1741 Persée 20 February 2015 https://web.archive.org/web/20141229081556/http://www.persee.fr/web/revues/home/prescript/article/befeo_0336-1519_1988_num_77_1_1741 29 दिसंबर 2014 live
तबला, बजाने की कला के आधार पर मृदंग और पखावज से अलग है। इसमें हाथ की उंगलियों की कलात्मक गति का महत्व अधिक है। वहीं, पखावज और मृदंग पंजों की गति से बजाये जाते हैं क्योंकि इनपर आघात क्षैतिज रूप से किया जाता है और इस प्रकार इनके बोलों में जटिलता उतनी नहीं जितनी तबले में पाई जाती है।http://www.britannica.com/EBchecked/topic/579723/tabla तबला (म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट) – सितम्बर 2015 26 फ़रवरी 2017 https://web.archive.org/web/20141217222952/http://www.britannica.com/EBchecked/topic/579723/tabla 17 दिसंबर 2014 live अतः ध्वनिशास्त्रीय और वादन कला आधारित अध्ययनों में तबले की समानता तीनों वाद्यों के साथ स्थापित की जा सकती है; पखावज की तरह का "दायाँ", नक्कारे की तरह आकार वाला "बायाँ", ढोलक की तरह गमक वाला प्रयोग, तीनों प्राप्त होते हैं।आर॰ स्टीवर्ट, अप्रकाशित शोध प्रबन्ध, UCLA, 1974
अंग
अंगूठाकार|तबला और डुग्गी
"तबला" के दो अंग होते हैं, अर्थात इसमें दो ड्रम होते हैं जिनका आकार और आकृति एक दूसरे से कुछ भिन्नता लिए होती है।समीर चटर्जी A study of tabla: a comprehensive study with history, theory, and compositions accompanied by an instructional DVD https://books.google.com/books?id=Q_nZAAAAMAAJ 2006 छंदायन 21 26 फ़रवरी 2017 https://web.archive.org/web/20170227072321/https://books.google.com/books?id=Q_nZAAAAMAAJ 27 फ़रवरी 2017 liveविलियम एल्विस म्यूजिक ऑफ़ दि पीपल्स ऑफ़ दी वल्ड https://books.google.com/books?id=688hCQAAQBAJ&pg=PA252 2013 Cengage Learning 1-133-30794-9 252
तकनीकी तौर पर, एक सीधे हाथ वाले वादक द्वारा, दाहिने हाथ (कुशल हाथ) से बजाय जाने वाला अंग ही तबला कहलाता है। आम भाषा में इसे दायाँ या दाहिना कहते हैं। यह लगभग 15 सेंटीमीटर (~6 इंच) व्यास वाला और 25 सेंटीमीटर (~10 इंच) ऊँचाई वाला होता है।
बायें वाले हिस्से को क्षेत्र अनुसार डग्गा, डुग्गी अथवा धामा भी कहते हैं। पुराने प्राप्त चित्रों में दाहिने और बायें अंग का आकार लगभग समान पाया गया है और कभी कभी बायें का आकर छोटा भी। हालाँकि, अब बायाँ का आकार तबले की तुलना में काफी बड़ा होता है। दाहिना या तबला बहुधा लकड़ी का बना होता है जबकि बायाँ मिट्टी (पके बर्तन के रूप में जिस पर चमड़ा मढ़ा जाय) का भी होता है अथवा दोनों ही पीतल या फूल (मिश्र-धातु) के भी बने हो सकते हैं। बायाँ, चौड़े मुँह वाला, चमड़े मढ़ा ड्रम होता है जिसका आकार लगभग 20 सेंटीमीटर (~8 इंच) व्यास वाला और 25 सेंटीमीटर (~10 इंच) ऊँचाई वाला होता है।
दाहिने में डोरियों के बीच (जो अक्सर चमड़े की ही होती हैं) लकड़ी के छोटे आड़े बेलन बेलन लगे होते हैं, जिनपर हथौड़ी से चोट कर डोरियों के कसाव को बदला जा सकता है। इस क्रिया को सुर मिलाना कहते हैं। गायन-वादन के दौरान राग के मुख्य स्वर "सा" के साथ तबले की ध्वनि की तीक्ष्णता का मिलान किया जाता है, जिसे तबले को "षडज" पर मिलाना कहते हैं।नील सोर्रेल राम नारायण इंडियन म्यूजिक इन परफार्मेंस: अ प्रैक्टिकल इंट्रोडक्शन https://books.google.com/books?id=jNhRAQAAIAAJ&pg=PA40 1980 Manchester University Press 978-0-7190-0756-9 40–41 सितार के साथ, चूँकि तार वाद्य और ऊँची तीक्ष्णता का वाद्य है, तबले को "पंचम" पर भी मिलाया जाता है। बायें को सामान्यतः, तबले की तुलना में निचले स्वरों "मन्द्र पंचम" पर सुर में रखा जाता है। कलाकार अपनी हथेली के पिछले हिस्से (मणिबंध) के दबाव द्वारा भी बायें के सुरों में मामूली बदलाव कर सकते हैं।
इन दोनों अंगों के आकार में विषमता के कारण तीखे और चंचल बोल - ता, तिन, ना इत्यादि दाहिने पर बजाये जाते हैं और बायें का आकार बड़ा होने के कारण गंभीर आवाज वाले नाद धे, धिग इत्यादि बायें पर बजते हैं।मूल आवाजें और बोल http://chandrakantha.com/tablasite/bsicbols.htm#Tu chandrakantha.com 26 फरवरी 2017 en https://web.archive.org/web/20170426081855/http://chandrakantha.com/tablasite/bsicbols.htm#Tu 26 अप्रैल 2017 dead इसीलिए "बायें" को "बेस ड्रम" की तरह प्रयोग में लाया जाता है।
अंगूठाकार|तबला तरंग, जिसमें केवल कई "दायें" अलग-अलग सुरों में मिला कर, सरगम के रूप में बजाये जाते हैं।
तबलों के चमड़ा मढ़े मुख पर भी तीन हिस्से होते हैं:
चाट, चांटी, किनारा, किनार, की, या स्याही - सबसे किनारे का हिस्सा।
सुर, मैदान, लव, या लौ - स्याही और किनारे के बीच का भाग।
बीच, स्याही, सियाही, या गाँव - सबसे बीच का काला हिस्सा, जहाँ एक प्रकार का काला पदार्थ चिपका होता है, जिससे यह हिस्सा मोटा हो जाता है।
तबले के प्रत्येक हिस्से के बीचोबीच एक काले चकत्ते के रूप में जो हिस्सा होता है उसे "स्याही" कहते हैं। यह मुख्य रूप से चावल या गेहूँ के मंड में कई प्रकार की चीजे मिला कर बनाया गया एक लेप होता है जो सूख कर कड़ा हो जाने के बाद तबले के चमड़े की स्वाभाविक धवनि का परिष्कार करके इसे एक खनकदार आवाज़ प्रदान करता है। तबला निर्माण की प्रक्रिया के दौरान स्याही का समुचित प्रयोग एक निपुणता की चीज है और इस वाद्ययंत्र की गुणवत्ता काफ़ी हद तक स्याही आरोपण की कुशलता पर निर्भर होती है।
कुछ वादक, डुग्गी पर सियाही के बजाय, गूँधे गए आटे को चिपका कर सुखा लेते हैं, हालाँकि यह प्रक्रिया हर बार करनी पड़ती है और तबला वादन के बाद इसे खुरच कर हटा दिया जाता है। पंजाब में यह अभी भी प्रचलन में है और ऐसे "बायें" को "धामा" कहते हैं।
तबले के बोल
thumb|तबला वादन का एक उदाहरण।
तबले के बोलों को "शब्द", "अक्षर" या "वर्ण" भी कहते हैं। ये बोल परंपरागत रूप से लिखे नहीं बल्कि गुरु-शिष्य परम्परा में मौखिक रूप से सीखे सिखाये जाते रहे हैं। इसीलिए इनके नामों में कुछ विविधता देखने को मिलती है। अलग-अलग क्षेत्र और घराने के वादन में भी बोलों का अंतर आता है। एक ही बोल को बजाने के कई तरीकों का प्रचलन भी मिलता है। एक विवरण के अनुसार तबले के मूल बोलों की संख्या पंद्रह है जिनमें से ग्यारह दायें पर बजाये जाते हैं और चार बायें पर। नीचे डेविड कर्टनी लिखित "फंडामेंटल्स ऑफ़ तबला" और बालकृष्ण गर्ग लिखित बोलों का एक संक्षिप्त और सामान्यीकृत विवरण प्रस्तुत किया गया हैबालकृष्ण गर्ग डायमंड तबला गाइड https://books.google.com/books?id=HpRWw9KrtAEC&pg=PA20 डायमंड पाकेट बुक्स 978-81-7182-445-8 20–26 26 फ़रवरी 2017 https://web.archive.org/web/20170227064613/https://books.google.com/books?id=HpRWw9KrtAEC&pg=PA20 27 फ़रवरी 2017 live:
दाहिने के बोल
ता/ना - किनारा पर तर्जनी (पहली) उउंगली से, ठोकर के बाद उंगली तुरंत उठ जाती है।
ती - मैदान में तर्जनी से ठोकर, उंगली तुरंत उठ जाती है।
तिन् - सियाही पर तर्जनी से ठोकर, उंगली तुरंत उठ जाती है।
ते - तर्जनी अतिरिक्त बाकी तीन उंगलियाँ (या केवल मध्यमा) से सियाही पर, गुंजन नहीं।
टे - तर्जनी अँगुरी से सियाही पर, गुंजन नहीं।
तिट - दोहरे ठोकर का बोल, ते और टे का सामूहिक रूप (अन्य उच्चारण तिर)।
बायाँ के बोल
धा/धे - पहिली (या दूसरी) उंगली से बीच में ठोकर, मणिबंध (कलाई का पिछला हिस्सा) "मैदान" में रखा रहता है।
क/के/गे - पूरी हथेली खुली सपाट रख दी जाती है, गुंजन नहीं।
घिस्सा - बीच में ठोकर के हथेली का पिछला हिस्सा बीच की ओर सरकाया जाता है, जिससे से गुंजन धीरे-धीरे क्रमिक रूप से बंद होता है।
तबला के प्रमुख घराने
thumb|right|240px|पंजाब घराने के प्रसिद्ध भारतीय तबला वादक जाकिर हुसैन
तबला वादन के कुल छह घराने हैं-
दिल्ली घराना
लखनऊ घराना
फर्रुखाबाद घराना
अजराड़ा घराना
बनारस घराना
पंजाब घराना
दिल्ली घराने के प्रवर्तक उस्ताद सिध्दाथ॔ ख़ाँ थे और पंजाब घराने के अलावा बाकी के चार अन्य घराने भी दिल्ली घराने का ही विस्तार माने जाते हैं। लखनऊ घराने के प्रवर्तक मोदू ख़ाँ और बख़्शू ख़ाँ; फ़र्रूख़ाबाद घराने के प्रवर्तक विलायत अली ख़ाँ उर्फ़ हाजी साहब; अजराड़ा घराने के प्रवर्तक कल्लू ख़ाँ और मीरू ख़ाँ; बनारस घराने के प्रवर्तक पंडित राम सहाय और पंजाब घराने के प्रवर्तक उस्ताद फ़क़ीरबख़्श ख़ाँ थे।
प्रसिद्ध तबला वादक
प्रसिद्ध तबला वादकों में पंजाब घराने के अल्ला रक्खा ख़ाँhttps://khabar.ndtv.com/video/show/news/tabla-player-sandip-das-received-grammy-awards-449163 बनारस घराने के तबला वादक संदीप दास को मिला ग्रैमी अवॉर्ड वीडियो - हिन्दी न्यूज़ वीडियो एनडीटीवी ख़बर Khabar.ndtv.com 2017-02-13 2017-02-26 https://web.archive.org/web/20170220173227/https://khabar.ndtv.com/video/show/news/tabla-player-sandip-das-received-grammy-awards-449163 20 फ़रवरी 2017 dead और ज़ाकिर हुसैनक्रैग हैरिस http://www.allmusic.com/artist/zakir-hussain-mn0000695019/biography ज़ाकिर हुसैन:बायोग्राफी एंड हिस्ट्री आलम्यूज़िक 1951-03-09 2017-02-26 https://web.archive.org/web/20160816163859/http://www.allmusic.com/artist/zakir-hussain-mn0000695019/biography 16 अगस्त 2016 live (पिता पुत्र) का नाम आता है। ज़ाकिर हुसैन को मात्र 37 वर्ष की आयु में पद्म भूषण सम्मान प्राप्त हुआ और वे सबसे कम उम्र में यह सम्मान पाने वाले व्यक्ति बने, बाद में उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ग्रैमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तबला वादन को प्रतिष्ठित कराने में चतुरलाल का उल्लेखनीय योगदान रहा।
बनारस घराने के सामता प्रसाद मिश्र (गुदई महराज), अनोखेलाल मिश्र, कंठे महराज और किशन महाराज (2002 में पद्म विभूषण से सम्मानित) उल्लेखनीय हैं। इसी घराने के संदीप दास को भी ग्रैमी अवार्ड से सम्मानित किया गया है।संदीप दास को मिला ग्रैमी अवार्ड https://web.archive.org/web/20170220173227/https://khabar.ndtv.com/video/show/news/tabla-player-sandip-das-received-grammy-awards-449163 20 फ़रवरी 2017 , एनडीटीवी पर इंटरव्यू (फ़रवरी 2017)।
इनके अलावा प्रसिद्ध पाकिस्तानी तबला वादक शौक़त हुसैन ख़ाँ, मुंबई के योगेश शम्सी, त्रिलोक गुर्टू, कुमार बोस, तन्मय बोस, फ़जल क़ुरैशी इत्यादि के नाम उल्लेखनीय हैं।
इन्हें भी देखें
डमरू
ड्रम
ढोलक
मृदंग
टीका-टिप्पणी
nb
सन्दर्भ
30em
आगे पढ़ने हेतु
दि मेजर ट्रेडिशंस ऑफ़ नॉर्थ इंडियन तबला ड्रमिंग: अ सर्वे प्रेसेंटेशन बेस्ड ऑन परफॉर्मेंसेज बाय इंडियाज लीडिंग आर्टिस्ट्स, लेखक - रॉबर्ट ऍस॰ गौट्लिब, म्युज़िकवर्लाग ई॰ कात्ज़बिश्लर, 1977. ISBN 978-3-87397-300-8. en
दि तबला ऑफ़ लखनऊ: अ कल्चरल ऍनालिसिस ऑफ़ अ म्यूज़िकल ट्रेडिशन, लेखक - जेम्स किपेन, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1988. ISBN 0-521-33528-0. en
सोलो तबला ड्रमिंग ऑफ़ नॉर्थ इंडिया: टेक्स्ट & कमेंटरी, लेखक - रॉबर्ट ऍस॰ गौट्लिब, मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशन, 1993. ISBN 81-208-1093-7. en
फंडामेंटल्स ऑफ़ तबला, (भाग 1). लेखक - डेविड आर॰ कर्टनी, सुर संगीत सर्विसेस प्रकाशन, 1995. ISBN 0-9634447-6-X. en
एडवांस्ड थ्योरी ऑफ़ तबला, (भाग 2). लेखक - डेविड आर॰ कर्टनी, सुर संगीत सर्विसेस प्रकाशन, 2000. ISBN 0-9634447-9-4. en
मैन्युफैक्चर एंड रिपेयर ऑफ़ तबला, (भाग 3). लेखक - डेविड आर॰ कर्टनी, सुर संगीत सर्विसेस प्रकाशन, 2001. ISBN 1-893644-02-2. en
फोकस ऑन कायदाज ऑफ़ तबला, (भाग 4). लेखक - डेविड आर॰ कर्टनी, सुर संगीत सर्विसेस प्रकाशन, 2002. ISBN 1-893644-03-0. en
थ्योरी एंड प्रैक्टिस ऑफ़ तबला, लेखक- सदानंद नाइमपल्ली, पॉपुलर प्रकाशन, 2005. ISBN 81-7991-149-7 en
बाहरी कड़ियाँ
Tabla
ऍसऍसबी रेडियो, ऑस्ट्रेलिया - प्रसारण: बनारस घराने के पंडित चन्द्रनाथ शास्त्री का इंटरव्यू, बनारस घराने की विशिष्टताओं पर। en
श्रेणी:भारतीय वाद्य यंत्र
श्रेणी:तालवाद्य