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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

वायरस से परिचय

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thumb|right|सार्स-कोव-2 विरिऑन का चित्रण वायरस एक सूक्ष्म संक्रामक कण होता है जो जीवित प्राणियों की कोशिकाओं के अंदर ही अपनी संख्या बढ़ा सकता है। जब कोई कोशिका वायरस से संक्रमित होती है, तो वह कोशिका बहुत तेज़ी से हज़ारों समान वायरस की प्रतियां बनाने के लिए बाध्य हो जाती है। अधिकांश जीवित प्राणियों के विपरीत, वायरस में कोशिकाएँ नहीं होतीं जो विभाजित होकर बढ़ें; नए वायरस संक्रमित कोशिका के अंदर ही बनते हैं।Publications service 2007-09-01 On an invisible microbe antagonistic toward dysenteric bacilli: brief note by Mr. F. D'Herelle, presented by Mr. Roux https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0923250807001507 Research in Microbiology Commemoration of Felix Herelle's discovery 158 7 553–554 10.1016/j.resmic.2007.07.005 0923-2508 किंतु प्रायन जैसे सरल संक्रामक कणों से अलग, वायरस में जीन होते हैं, जो उन्हें परिवर्तन और विकास की क्षमता देते हैं। पर्यावरण में लाखों वायरस पाए जाते हैं, जिनमें से लगभग ४,८०० प्रजातियों का विस्तार से वर्णन किया गया है। उनका उद्गम स्पष्ट नहीं है — कुछ वायरस प्लास्मिड (डीएनए के टुकड़े जो कोशिकाओं के बीच स्थानांतरित हो सकते हैं) से विकसित हुए हो सकते हैं, जबकि कुछ बैक्टीरिया से।Nasir Arshan Kim Kyung Mo Caetano-Anollés Gustavo 2012-09-01 Viral evolution: Primordial cellular origins and late adaptation to parasitism https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC3575434/ Mobile Genetic Elements 2 5 247–252 10.4161/mge.22797 2159-2543 3575434 23550145 वायरस दो या तीन भागों से बने होते हैं। सभी वायरस में जीन होते हैं, जिनमें वायरस की जैविक जानकारी संग्रहीत होती है। ये जीन या तो डीएनए या आरएनए से बने होते हैं। सभी वायरसों के बाहर एक प्रोटीन आवरण होता है, जो उनके जीन की रक्षा करता है। कुछ वायरसों में इसके बाहर एक वसायुक्त परत भी होती है, जो उन्हें साबुन से नष्ट होने योग्य बनाती है। इस परत को वायरल आवरण कहा जाता है, जिसके माध्यम से वायरस नई कोशिका में प्रवेश करता है।Stanley W. M. Loring H. S. 1936-01 The Isolation of Crystalline Tobacco Mosaic Virus Protein from Diseased Tomato Plants https://ui.adsabs.harvard.edu/abs/1936Sci....83...85S/abstract Science en 83 2143 85 10.1126/science.83.2143.85 0036-8075 वायरस के आकार भिन्न-भिन्न होते हैं — कुछ सरल सर्पिल या बहुफलकाकार होते हैं, जबकि कुछ अधिक जटिल संरचना वाले। वायरस का आकार लगभग २० से ३०० नैनोमीटर तक होता है; लगभग ३३,००० से ५,००,००० वायरसों को एक पंक्ति में जोड़ने पर उनकी लंबाई केवल एक सेंटीमीटर होती है। वायरस कई तरीकों से फैलते हैं। कई वायरस केवल विशेष जीवों या ऊतकों को ही संक्रमित करते हैं। पौधों के वायरस प्रायः कीड़ों या अन्य जीवों द्वारा एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुँचते हैं। मनुष्यों और अन्य जानवरों के वायरस संक्रमित शारीरिक द्रवों के संपर्क से फैल सकते हैं। जैसे फ़्लू वायरस हवा में छींक या खाँसी से निकलने वाली नमी की बूंदों से फैलता है।https://microbiologycommunity.nature.com/posts/18900-rosalind-franklin-s-contributions-to-virology Rosalind Franklin's contributions to virology Nature Research Communities by Springer 2017-07-25 Research Communities by Springer Nature en 2025-10-18 30 मई 2023 https://web.archive.org/web/20230530133244/https://microbiologycommunity.nature.com/posts/18900-rosalind-franklin-s-contributions-to-virology dead नॉरोवायरस मल-मुख मार्ग से फैलता है, जिसमें हाथ, भोजन या पानी का दूषित होना शामिल है। रोटावायरस संक्रमित बच्चों के सीधे संपर्क से फैलता है। एचआईवी यौन संपर्क के दौरान शरीर के द्रवों से फैलता है। वहीं डेंगू जैसे वायरस खून चूसने वाले मच्छरों के माध्यम से फैलते हैं। आरएनए वायरस विशेष रूप से तेज़ी से परिवर्तन करते हैं और नई किस्मों को जन्म दे सकते हैं, जिनके विरुद्ध पहले से कोई सुरक्षा नहीं होती। उदाहरण के लिए, फ़्लू वायरस बार-बार रूप बदलता है, इसलिए हर वर्ष नया टीका आवश्यक होता है। ऐसे बड़े परिवर्तन कभी-कभी वैश्विक महामारी का कारण बनते हैं, जैसे २००९ की स्वाइन फ़्लू महामारी। ये परिवर्तन प्रायः तब होते हैं जब वायरस पहले अन्य पशुओं को संक्रमित करते हैं — जैसे चमगादड़ों में पाए जाने वाले कोरोनावायरस, या सूअर और पक्षियों में पाए जाने वाले फ़्लू वायरस, जो बाद में मनुष्यों में पहुँचे।Liu Yi Nickle David C. Shriner Daniel Jensen Mark A. Learn Gerald H. Mittler John E. Mullins James I. 2004-11-10 Molecular clock-like evolution of human immunodeficiency virus type 1 https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0042682204005537 Virology 329 1 101–108 10.1016/j.virol.2004.08.014 0042-6822 वायरस संक्रमण मनुष्यों, जानवरों और पौधों में रोग उत्पन्न कर सकते हैं। स्वस्थ मनुष्यों और जानवरों में इन संक्रमणों को अक्सर प्रतिरक्षा तंत्र नष्ट कर देता है, जिससे जीवनभर के लिए रोग-प्रतिरोधक क्षमता मिल जाती है। एंटीबायोटिक दवाएँ, जो बैक्टीरिया पर असर करती हैं, वायरस पर प्रभावी नहीं होतीं, परंतु एंटीवायरल दवाएँ घातक संक्रमणों का उपचार कर सकती हैं। टीके कई वायरस संक्रमणों को रोक सकते हैं और आजीवन सुरक्षा दे सकते हैं।Rotter M. L. 2001-08-01 Arguments for alcoholic hand disinfection https://www.journalofhospitalinfection.com/article/S0195-6701(01)90004-0/abstract Journal of Hospital Infection English 48 S4–S8 10.1016/S0195-6701(01)90004-0 0195-6701 11759024 खोज left|upright|thumbnail|एचआईवी-1 वायरस का स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोग्राफ़, हरे रंग का, लिम्फोसाइट से निकलता हुआ सन् १८८४ में फ्रांसीसी सूक्ष्मजीवविज्ञानी शार्ल शैंबरलां ने एक विशेष प्रकार का छन्ना बनाया, जिसके छिद्र बैक्टीरिया से छोटे थे। इस फ़िल्टर से उन्होंने बैक्टीरिया रहित तरल तैयार किया। १८९० के दशक में रूसी जीवविज्ञानी दिमित्री इवानोव्स्की ने इसी विधि से तंबाकू मोज़ेक वायरस का अध्ययन किया और पाया कि संक्रमित पत्तियों से निकाले गए रस को फ़िल्टर करने के बाद भी वह संक्रामक रहता है।Chantal Abergel, Matthieu Legendre, Jean-Michel Claverie, 2015-11-01 The rapidly expanding universe of giant viruses: Mimivirus, Pandoravirus, Pithovirus and Mollivirus https://academic.oup.com/femsre/article/39/6/779/550971?login=false FEMS Microbiology Reviews en 39 6 10.1093/fem 0168-6445 उसी समय, अन्य वैज्ञानिकों ने भी यह दिखाया कि ये सूक्ष्म जीव (बाद में जिन्हें वायरस कहा गया) बैक्टीरिया से अलग और उनसे लगभग १०० गुना छोटे होते हैं, फिर भी रोग उत्पन्न कर सकते हैं। १८९९ में डच जीवविज्ञानी मार्टिनस बेजेरिन्क ने पाया कि यह एजेंट केवल जीवित कोशिकाओं में ही बढ़ता है। उन्होंने इसे “संक्रामक जीवित द्रव” कहा। २०वीं शताब्दी की शुरुआत में अंग्रेज जीवविज्ञानी फ्रेडरिक ट्वॉर्ट और फ्रांसीसी-कनाडाई फेलिक्स ड’हरेल ने ऐसे वायरस खोजे जो बैक्टीरिया को संक्रमित करते थे। सन् १९३१ में इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी के आविष्कार से पहली बार वायरस को देखा जा सका। सन् १९३५ में अमेरिकी वैज्ञानिक वेंडे़ल मेरिडिथ स्टैनली ने तंबाकू मोज़ेक वायरस का अध्ययन किया और पाया कि यह मुख्य रूप से प्रोटीन से बना है। बाद में यह भी सिद्ध हुआ कि यह वायरस प्रोटीन और आरएनए दोनों से बना है। सन् १९५५ में रोज़ालिंड फ्रैंकलिन ने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी द्वारा तंबाकू मोज़ेक वायरस की पूरी संरचना स्पष्ट की — उन्होंने पाया कि इसका प्रोटीन एक सर्पिल नली के रूप में बना है, जिसके चारों ओर आरएनए लिपटा हुआ है, और यह आरएनए एकल श्रृंखला का होता है, डीएनए की तरह दोहरी श्रृंखला का नहीं। प्रारंभ में वैज्ञानिकों को यह नहीं पता था कि जीवित पशुओं के बिना वायरस को कैसे बढ़ाया जाए। सन् १९३१ में अमेरिकी रोगविज्ञानी अर्नेस्ट गुडपाश्चर और ऐलिस माइल्स वुड्रफ ने निषेचित मुर्गी के अंडों में फ़्लू वायरस को विकसित करके यह समस्या हल की। सन् १९४९ में जॉन फ्रैंकलिन एंडर्स, थॉमस हकल वेलर और फ्रेडरिक चैपमैन रॉबिन्स ने जीवित पशु कोशिकाओं की संस्कृति में पोलियो वायरस को सफलतापूर्वक उगाया। आज तक लगभग ४,८०० से अधिक वायरस प्रजातियों का विस्तृत विवरण किया जा चुका है।https://www.nytimes.com/2013/07/18/science/changing-view-on-viruses-not-so-small-after-all.html Changing View on Viruses: Not So Small After All (Published 2013) 2013-07-18 2025-10-18 en सन्दर्भ श्रेणी: जीवविज्ञान