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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

उणादि सूत्र

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सितंबर 2026 सितंबर 2026 उणादिसूत्र का अर्थ है : 'उण्' से प्रारम्भ होने वाले कृत् प्रत्ययों का ज्ञापन करनेवाले सूत्रों का समूह। 'कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण्' यह उणादि का प्रारंभिक सूत्र है। शाकटायन को उणादिसूत्रों का कर्ता माना जाता है किन्तु प्राध्यापक का॰ बा॰ पाठक के अनुसार, उणादि सूत्रों के रचयिता शाकटायन नहीं बल्कि स्वयं पाणिनि ही थे।http://www.transliteral.org/dictionary/%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A8/word शाकटायन 24 फ़रवरी 2017 https://web.archive.org/web/20170224212934/http://www.transliteral.org/dictionary/%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A8/word 24 फ़रवरी 2017 dead उणादिसूत्र ५ पादों (भागों) में विभक्त हैं। नारायण भट्ट के अनुसार उणादिसूत्रों की कुल संख्या 765 है। यह संख्या श्वेतस्वामी की संख्या से 12 अधिक है। उणादिसूत्रों के अनेक प्रसिद्ध टीकाकार हुए हैं जिनमें उज्ज्वलदत्त (इनका समय 1250 ई. के लगभग माना जाता है), भोज और नारायण भट्ट आदि प्रमुख हैं। पाणिनि के समय जो उणादिसूची थी वह कुछ संशोधित रूप में आज भी विद्यमान है। उज्ज्वलदत्त की टीका से युक्त उणादिसूत्र इस समय उपलब्ध हैं। इसका जो वर्तमान रूप है उसमें कुछ बाद के शब्द भी आ गये हैं, जैसे दीनार (लैटिन- Denarius) जो भारतवर्ष में १०० ई से पूर्व किसी भी स्थिति में नहीं प्रचलित हो सकता था। उणादिसूत्र के प्रथम पाद का कुछ आरम्भिक भाग नीचे दिया है- 1-1 कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण् ॥ करोतीति कारुः शिल्पी कारकश्च । ’7-3-33 आतो युक्…’ वातीति वायुः । पायुर्गुदम् । जयत्यभिभवति रोगान् जायुरौषधम् । मिनोति प्रक्षिपति देहे ऊष्माणमिति मायुः पित्तम् । स्वादुः । साध्नोति परकार्यं साधुः । अश्नुते आशु शीघ्रम् । आशुर्व्रीहिः पाटलः स्यात् । 1-2 छन्दसीणः ॥ मा न आयौ । 1-3 दॄसनिजनिचरिचटिभ्यो ञुण् ॥ दीर्यत इति दारु । स्नुः प्रस्थः सानुरस्त्रियाम् । जानु । जानुनी । इह ’7-3-35 जनिवध्योश्च’ इति न निषेधः । अनुबन्धद्वयसामर्थ्यात् । चारु रम्यम् । चाटु प्रियं वाक्यम् । मृगय्वादित्वात्कुप्रत्यये चटु इत्यपि । 1-4 किञ्जरयोः श्रिणः ॥ किं शृणोतीति किंशारुः सस्यशूकं बाणश्च । जरामेति जरायुर्गर्भाशयः । गर्भाशयो जरायुः स्यात् । 1-5 त्रो रश्च लः ॥ तरन्त्यनेन वर्णा इति तालुः । 1-6 कृके वचः कश्च ॥ कृकेन गलेन वक्तीति कृकवाकुः । ’कृकवाकुर्मयूरे च सरटे चरणायुधे’ इति विश्वः । 1-7 भृमृशीतॄचरित्सरितनिधनिमिमस्जिभ्य उः ॥ भरति बिभर्ति वा भरुः, स्वामी हरश्च । म्रियन्तेऽस्मिन्भूतानि मरुर्निर्जलदेशः । शेते शयुरजगरः । तरुर्वृक्षः । चरन्ति भक्षयन्ति देवता इममिति चरुः । त्सरुः खड्गादिमुष्टिः । तनु स्वल्पम् । तन्यते कर्मपाशोऽनया इति तनुः, शरीरं च । स्त्रियां मूर्तिस्तनुस्तनूः । धनुः शस्त्रविशेषः । धनुषा च धनुं विदुः । धनुरिवाजनि वक्र इति श्रीहर्षः । मयुः किंनरः । मद्गुः पानीयकाकिकेति रभसः । न्यङ्क्वादित्वात्कुत्वम् जश्त्वेन सस्य दः । परिचय निरुक्त में यास्क ने "नाम" को धातुज कहा है और शाकटायन का उल्लेख किया है। शाकटायन का इस बात पर विशेष आग्रह था कि नाम धातुज होते हैं। उनके अनुसार व्युत्पन्न एवं अव्युत्पन्न सभी शब्द धातुज हैं और प्रकृति प्रत्ययों के आधार पर उनकी सिद्धि व्युत्पन्न है। अपने इस आग्रह और दृष्टिकोण को सुव्यक्त करने की दृष्टि से उन्होंने "उणादि सूत्रों" का निर्माण किया और सभी शब्दों को धातुज सिद्ध किया। महाभाष्य और काशिका द्वारा इसका निर्देश प्राप्त होता है ("बाहुलकं प्रकृतेस्तनुदृष्टे" आदि के द्वारा) और इन उणादिकों की प्रकृति, उनकी स्थिति का संक्षेपतः पूर्ण विवेचन भी हो जाता है। ऐसे शब्दों को भी धातु प्रत्यय द्वारा सिद्ध करने की प्रक्रिया, जो व्युत्पन्न न हों, पाणिनि के समक्ष भी थी। तभी उन्होंने इस प्रकार के शब्दों के वर्ग किए हैं और उनको मान्यता दी है, जैसे संज्ञाप्रमाण अर्थात् लोकव्यवहार में प्रचलन, यथोपदिष्ट और उणादि आदि। "उणादयो बहुलम्" सूत्रनिर्देश से यह स्पष्ट है कि इनकी स्थिति ठीक नहीं है- कहीं इनकी प्रवृत्ति है अर्थात् धात्वर्थ के साथ सुयोज्यता है, कहीं अप्रवृत्ति अर्थात् अयोग्यता, कहीं किसी प्रकार युक्त होना और कहीं नहीं, कभी कुछ और कभी कुछ। इस "बहुलम्" शब्द की विशेषता आचार्यों के शब्दों में इस प्रकार है- क्वचित्प्रवृत्तिः क्वचित्भाषा क्वचिदन्यमेव। विधेर्विविधानम् बहुधा समीक्ष्य चतुर्विधम् बाहुलकं वदन्ति। तथा उणादि का कार्यनिर्देश इस प्रकार किया है- क्वचित् सुयोज्याधात्वर्था क्वाप्ययोज्या उणादिषु। क्वचित् कथंचित् योज्या स्यु: वक्ष्यन्ते तत्र तत्र ते। आदि। साथ ही उणादि के विश्लेषण का नियम बताते हुए कहा है- संज्ञासु धातुरूपाणि प्रत्ययाश्चत तत: परे। कार्याद्विद्यादनूबन्धमेतच्छज्ञस्त्रमुणादिषु। अर्थात् जो संज्ञा सामने आए उसमें पहले कौन सी धातु हो सकती है इसे खोजें, तदनंतर प्रत्यय की खोज करें, फिर जो ह्रस्वत्व-दीर्घत्व आदि विकार हुआ है उसके विचार से अनुबंध लगा लें -- यह उणादि का शास्त्र है। कालान्तर में उणादि नियमों के प्रयोग में सावधानी न रखने के कारण यह केवल वैयाकरणों को तोष देनेवाला ही हो सका जिससे इसकी उपयोगिता अपने समग्र रूप में सुव्यक्त न हो सकी। सन्दर्भ इन्हें भी देखें व्याकरण (वेदांग) व्युत्पत्तिशास्त्र शाकटायन बाहरी कड़ियाँ उणादिसूत्र (संस्कृत विकिस्रोत) उणादिसूत्राणि उणादिप्रकरणम् श्रेणी:संस्कृत श्रेणी:व्याकरण श्रेणी:पंचांग व्याकरण