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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

गंग कवि

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http://dhankedeshme.blogspot.com/2010/09/blog-post_27.html अगस्त 2020 जुलाई 2016 कविराव गंग या 'महाकवि गंग ' (1538 -1625 ई.) हिन्दी के कवि थे। उनका वास्तविक नाम गंगाधर था। वे अकबर के दरबारी कवि थे। जन्म, निधनतिथि तथा जन्मस्थान विवादास्पद है। वैसे ये इकनौर (जिला इटावा) के ब्रह्मराव कहे जाते हैं। शिवसिंह सेंगर के आधार पर मिश्रबंधु इनका जन्म सं. १५९५, तासी इनका रचनाकाल संवत् १६१२ और आचार्य रामचंद्र शुक्ल १७वीं शताब्दी विक्रमी का अंत मानते हैं। इनका निधन संवत १६५२ और १६६५ के बीच हो सकता है। परिचय गंग रीतिकालीन काव्य परंपरा के प्रथम महत्वपूर्ण कवि थे। ये उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के इकनौर गांव, ब्लॉक महेवा, थाना बकेवर, के निवासी थे। इनका मूल नाम गंगाधर राव था। ये जाति के राव तथा अकबर के दरबारी कवि थे। इसके अतिरिक्त ये रहीम, बीरबल, मानसिंह तथा टोडरमल के भी प्रिय थे। ये बड़े स्वाभिमानी थे। कहते हैं कि अपनी स्पष्टवादिता के कारण ये जहाँगीर के कोपभाजन हुए और उसने इन्हें हाथी से कुचलवा दिया। गुलाब कवि ने इस घटना को लक्ष्य करके कहा था- 'गंग ऐसे गुनी को गयंद से चिराइये'। कवि के पुत्र ने भी 'गंग को लेन गनेस पठायो' कहकर इसी ओर इंगित किया है। अकबर तथा उनके दरबार के अन्य लोग, यथा-रहीम, बीरबल, मानसिंह, टोडरमल इनका बहुत आदर करते थे। प्रवाद है कि रहीम ने इनके एक छप्पय पर प्रसन्न होकर ३६ लाख रुपए भेंट किए थे। कहा जाता है कि जहाँगीर इनकी किसी रचना से अत्यंत रुष्ट हुआ और उन्हें हाथी से कुचलवा कर मार डालने का दंड दिया। किंतु इस प्रकार उनकी मृत्यु हुई, इसका कोई पुष्ट प्रमाण नहीं है। कवि गंग दरबार में अंतिम समय में कहते हैं - कभी न भडुआ रण चढ़े,कभी न बाजी बंब। सकल सभाहि प्रनाम करि,विदा होत कवि गंग।। कवि गंग के विषय में कहा गया हैः उत्तम पद कवि गंग के कविता को बलवीर। केशव अर्थ गँभीर को सूर तीन गुन धीर॥ अकबर के साथ ही रहीम, बीरबल, मानसिंह तथा टोडरमल आदि अकबर के दरबारीगण कवि गंग के चाहने वाले थे। इनके दो छन्दों पर रीझकर रहीम ने 36 लाख रुपये दे दिए थे। रहीम की दानशीलता और विनम्रता से प्रभावित होकर गंग कवि ने एक बार उनसे यह दोहा कहा - सीखे कहाँ नवाब जू, ऐसी दैनी दैन। ज्यों-ज्यों कर ऊँचौं कियौं, त्यों-त्यों नीचे नैन॥ खानखाना ने बड़ी सरलता से दोहे में ही उतर दिया - देनहार कोउ और है, देत रहत दिन-रैन। लोग भरम हम पै करें, तासों नीचे नैन।। रचनाएँ गंग कवि, अकबर के दरबार में रहकर वे समस्याओं की पूर्ति किया करते थे। इनकी गंग छापधारी स्फुट रचनाएँ उपलब्ध हैं जिनमें प्रशस्तियाँ और हास्य व्यंग्य की चुभती उक्तियाँ हैं। गंग पदावली, गंगपचीसी और गंग रत्नावली नाम से इनकी रचनाएँ संगृहीत पायी जाती हैं। शृंगार, वीर आदि रसों की इनकी उक्तियाँ वाग्वैदग्ध्यपूर्ण एवं प्रभावकारी हैं। इनकी आलोचनात्मक एवं व्यंग्यपरक उक्तियाँ मार्मिक, निर्भीक और स्पष्ट हैं। 'चंद छंद बरनन की महिमा' नाटक खड़ी बोली का एक ग्रंथ भी इनका लिखा बताया जाता है पर इसमें अनेक विद्वानों को संदेह है। गंग की कविता अलंकार और शब्द वैचित्र्य से भरपूर है। साथ ही उसमें सरसता और मार्मिकता भी है। मुख्य ग्रंथ हैं -'गंग पदावली, 'गंग पचीसी' तथा 'गंग रत्नावली। भिखारीदासजी ने इनके विषय में कहा है- 'तुलसी गंग दुवौ भए, सुकविन में सरदार।' उनकी रचनाओं को शब्दों का सारल्य के साथ साथ वैचित्र्य, अलंकारों का प्रयोग और जीवन की व्याहारिकता अत्यन्त रसमय एवं अद्भुत बना देते हैं। एक बानगी देखिएः तारों के तेज में चंद्र छिपै नहिं, सूर्य छिपै नहिं बादल छाये। चंचल नारि के नैन छिपें नहिं, प्रीत छिपै नहिं पीठ दिखाये। जंग छिड़े रजपूत छिपै नहिं, दाता छिपै नहिं याचक आये। 'गंग' कहें सुन शाह अकब्बर कर्म छिपै न भभूत लगाये॥ कवि गंग द्वारा रचित एक और सवैया देखिये .. माता कहे मेरो पूत सपूत बहिन कहे मेरो सुन्दर भैया। बाप कहे मेरे कुल को है दीपक लोक लाज मेरी के है रखैया॥ नारि कहे मेरे प्रानपती हैं उनकी मैं लेऊँ निसदिन ही बलैया। ''कवि गंग कहे सुन शाह अकबर गाँठ में जिनकी है सफेद रुपैया॥ श्रेणी:हिन्दी कवि