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411 समाचार
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राष्ट्रीय सिख संगत

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मई 2021 राष्ट्रीय सिख संगत एक सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था है जो गुरू ग्रन्थ साहब के सन्देशों को पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में प्रसारित करने के लक्ष्य के साथ काम कर रही है। संगत का मानना है कि गुरू ग्रन्थ साहब केवल सिखों का ही नहीं वरन सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप का पवित्र धर्मग्रन्थ है। राष्ट्रीय सिख संगत पूरी तरह सामाजिक एवं सांस्कृतिक मंच है, न कि पांथिक। इसका मुख्य उद्देश्य है सामाजिक समरसता पैदा करना और सिख परम्परा, सिख इतिहास को जन-जन तक पहुंचाना। उल्लेखनीय है कि सिखों का बड़ा तेजस्वी इतिहास रहा है। देश और धर्म के लिए मर मिटने की परम्परा इनकी रही है। बड़े तो बड़े, बच्चे भी देश-पंथ के लिए शहीद हुए हैं। गुरु गोविन्द सिंह जी के दो पुत्रों जोरावर सिंह (9) तथा फतेह सिंह (7) को मुगलों ने दीवार में चुनवा दिया था। अपने अन्य दो पुत्रों-अजीत सिंह और जुझार सिंह को गुरु गोविन्द सिंह जी ने अपने हाथों से युद्ध के लिए सजाया था और मुगलों की भारी-भरकम सेना के खिलाफ उन्हें मैदान में उतारा था। वे दोनों साहिबजादे भी बड़े वीर थे। युद्ध के मैदान में वीरता दिखाते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। सच कहा जाए जो ऐसे ही वीरों और शहीदों के कारण मुगलों के अत्याचारों से उत्तर भारत में हिन्दुओं की रक्षा हो पाई। नहीं तो क्या होता, इसको अलकाधर खान योगी ने कहा है- ना कहूं अबकी, ना कहूं तबकी।होते न गोविन्द सिंह, ''तो सुन्नत होती सबकी। सिखों के इसी इतिहास को घर-घर तक पहुंचाने का कार्य राष्ट्रीय सिख संगत पिछले 25 साल से कर रही है। इस निमित्त पूरे देश में संगोष्ठियां एवं अन्य कार्यक्रम होते रहते हैं। इतिहास राष्ट्रीय सिख संगत की स्थापना 24 नवम्बर सन 1986 को गुरू नानक जी के प्रकाश पर्व के दिन हुई थी। लखनऊ के स्वर्गीय शमशेर सिंह जी इसके प्रथम राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय समन्वक थे। उन्होने चार वर्ष तक भारत एवं विदेशों की सघन यात्रा की। राष्ट्रीय सिख संगत की स्थापना की पृष्ठभूमि में 1984 के सिख विरोधी नरसंहार रहे हैं। संगत के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) श्री अविनाश जायसवाल बताते हैं कि 1984 में प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद 4 हजार से अधिक सिख बंधु मारे गए थे। इससे राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग बड़े चिन्तित हुए, क्योंकि इस विचारधारा को बचाने में सिखों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। ऐसे लोगों का मानना था कि हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए ही खालसा पंथ की स्थापना हुई थी। यानी सिख, हिन्दुत्व के रक्षक रहे हैं। हिन्दुत्व के इन रक्षकों की सामूहिक हत्या से देश में एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई थी। सिख भाई नाराज थे। अत: अनेक राष्ट्रवादी संगठनों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन नेतृत्व से सम्पर्क किया और उनसे निवेदन किया कि समाज में किसी भी जाति, पंथ के साथ ऐसी घटना न घटे, उनका मनोबल न टूटे इसलिए एक सशक्त मंच बनाएं। काफी विचार-मंथन के पश्चात् राष्ट्रीय सिख संगत की स्थापना 1986 में अमृतसर की पावन धरती पर की गई। अवसर था, श्रीगुरु नानकदेव जी का प्रकाश पर्व। इस निमित्त एक गरिमामय कार्यक्रम का आयोजन हुआ था और उसकी अध्यक्षता की थी लखनऊ के प्रसिद्ध सिख विद्वान सरदार शमशेर सिंह ने। यही राष्ट्रीय सिख संगत के प्रथम अध्यक्ष भी बने। इसके बाद वरिष्ठ प्रचारक सरदार चिरंजीव सिंह को अध्यक्ष का दायित्व दिया गया। इनके समय में संगत की देश में एक विशिष्ट पहचान बनी। वर्तमान में जयपुर की एक प्रसिद्ध हस्ती सरदार गुरुचरण सिंह गिल संगत के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। कार्य सिख संगत के कार्यों का आधार है "श्रीगुरुग्रन्थ साहिब"। उल्लेखनीय है कि यह ग्रन्थ सामाजिक समरसता और एकता का सन्देश देता है और इसमें पूरे भारत का प्रतिनिधित्व भी हुआ है। इसमें 6 गुरुओं, 15 भक्तों और 15 भट्टों की वाणियां हैं। ये गुरु, भक्त और भट्ट अनेक जातियों, अनेक पंथों और भारत के अनेक स्थानों से जुड़े हैं। श्रीगुरुग्रंथ साहिब के सन्देशों को सर-माथे पर लेकर संगत के कार्यकर्ता पूरे देश में सामाजिक समरसता का वातावरण तैयार कर रहे हैं और देश की एकता को मजबूती दे रहे हैं। संगत का मानना है कि सिख समाज के अधिकांश लोग देश-धर्म पर मर मिटने वाले, सेवाभावी और इनसानियत के मसीहा हैं। इसी विचार और भावना के साथ संगत के कार्यकर्ता सिख समाज से सम्पर्क और संवाद स्थापित करते हैं। राष्ट्रीय सिख संगत ने अपने 25 वर्ष के इतिहास में अनेक बड़े आयोजन किए हैं, जिनसे समाज को एक नई दिशा और सोच मिली है। कुछ वर्ष पूर्व नई दिल्ली में संगत ने उन भक्तों और भट्टों के वंशजों को सम्मानित किया था, जिनकी वाणी श्री गुरुग्रंथ साहिब में हैं। 300 साला गुरुता गद्दी वर्ष के अवसर पर श्री हजूर साहिब (नांदेड़) में संगत द्वारा लंगर का आयोजन किया गया। इसके अलावा शहीदी प्रदर्शनी, शस्त्र प्रदर्शनी आदि भी आयोजित हुर्इं। इससे पूर्व मुम्बई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने पथसंचलन किया और दादर स्थित गुरुद्वारे में मत्था टेका। सिख संगत के प्रयास से ही दो साल पूर्व श्री गुरु गोविन्द सिंह द्वारा औरंगजेब को लिखे गये पत्र "जफरनामा" पर नई दिल्ली में संगोष्ठी हुई और उसका हिन्दी अनुवाद भी पुस्तकाकार में प्रकाशित किया गया। उल्लेखनीय है कि श्री गुरु गोविन्द सिंह जी ने "जफरनामा" के माध्यम से औरंगजेब को उसकी कमियां गिनाई थीं और उसे चेताया भी था। गुरुओं की वाणी को लोगों तक पहुंचाने के लिए राष्ट्रीय सिख संगत की एक मासिक पत्रिका "संगत संसार" भी है। बाहरी कड़ियाँ राष्ट्रीय सिख संगत का जालघर राष्ट्रीय सिख संगत के प्रयासों से बह रही है समरसता की गंगाजून 2020 InternetArchiveBot श्रेणी:सिख धर्म श्रेणी:संगठन