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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

खंड-१

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रश्मिरथी / प्रथम सर्ग / भाग 1 From Hindi Literature Jump to: navigation, search कवि: रामधारी सिंह "दिनकर" ~*~*~*~*~*~*~*~ 'जय हो' जग में जले जहाँ भी, नमन पुनीत अनल को, जिस नर में भी बसे, हमारा नमन तेज को, बल को। किसी वृन्त पर खिले विपिन में, पर, नमस्य है फूल, सुधी खोजते नहीं, गुणों का आदि, शक्ति का मूल। ऊँच-नीच का भेद न माने, वही श्रेष्ठ ज्ञानी है, दया-धर्म जिसमें हो, सबसे वही पूज्य प्राणी है। क्षत्रिय वही, भरी हो जिसमें निर्भयता की आग, सबसे श्रेष्ठ वही ब्राह्मण है, हो जिसमें तप-त्याग। तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के, पाते हैं जग में प्रशस्ति अपना करतब दिखला के। हीन मूल की ओर देख जग गलत कहे या ठीक, वीर खींच कर ही रहते हैं इतिहासों में लीक। जिसके पिता सूर्य थे, माता कुन्ती सती कुमारी, उसका पलना हुआ धार पर बहती हुई पिटारी। सूत-वंश में पला, चखा भी नहीं जननि का क्षीर, निकला कर्ण सभी युवकों में तब भी अद्‌भुत वीर। तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी, जाति-गोत्र का नहीं, शील का, पौरुष का अभिमानी। ज्ञान-ध्यान, शस्त्रास्त्र, शास्त्र का कर सम्यक् अभ्यास, अपने गुण का किया कर्ण ने आप स्वयं सुविकास। अलग नगर के कोलाहल से, अलग पुरी-पुरजन से, कठिन साधना में उद्योगी लगा हुआ तन-मन से। निज समाधि में निरत, सदा निज कर्मठता में चूर, वन्यकुसुम-सा खिला जग की आँखों से दूर। नहीं फूलते कुसुम मात्र राजाओं के उपवन में, अमित बार खिलते वे पुर से दूर कुंज-कानन में। समझे कौन रहस्य ? प्रकृति का बड़ा अनोखा हाल, गुदड़ी में रखती चुन-चुन कर बड़े कीमती लाल। जलद-पटल में छिपा, किन्तु रवि कब तक रह सकता है? युग की अवहेलना शूरमा कब तक सह सकता है? पाकर समय एक दिन आखिर उठी जवानी जाग, फूट पड़ी सबके समक्ष पौरुष की पहली आग। रंग-भूमि में अर्जुन था जब समाँ अनोखा बाँधे, बढ़ा भीड़-भीतर से सहसा कर्ण शरासन साधे। कहता हुआ, 'तालियों से क्या रहा गर्व में फूल? अर्जुन! तेरा सुयश अभी क्षण में होता है धूल।' 'तूने जो-जो किया, उसे मैं भी दिखला सकता हूँ, चाहे तो कुछ नयी कलाएँ भी सिखला सकता हूँ। आँख खोल कर देख, कर्ण के हाथों का व्यापार, फूले सस्ता सुयश प्राप्त कर, उस नर को धिक्कार।' इस प्रकार कह लगा दिखाने कर्ण कलाएँ रण की, सभा स्तब्ध रह गयी, गयी रह आँख टँगी जन-जन की। मन्त्र-मुग्ध-सा मौन चतुर्दिक् जन का पारावार, गूँज रही थी मात्र कर्ण की धन्वा की टंकार। फिरा कर्ण, त्यों 'साधु-साधु' कह उठे सकल नर-नारी, राजवंश के नेताओं पर पड़ी विपद् अति भारी। द्रोण, भीष्म, अर्जुन, सब फीके, सब हो रहे उदास, एक सुयोधन बढ़ा, बोलते हुए, 'वीर! शाबाश !' द्वन्द्व-युद्ध के लिए पार्थ को फिर उसने ललकारा, अर्जुन को चुप ही रहने का गुरु ने किया इशारा। कृपाचार्य ने कहा- 'सुनो हे वीर युवक अनजान' भरत-वंश-अवतंस पाण्डु की अर्जुन है संतान। 'क्षत्रिय है, यह राजपुत्र है, यों ही नहीं लड़ेगा, जिस-तिस से हाथापाई में कैसे कूद पड़ेगा? अर्जुन से लड़ना हो तो मत गहो सभा में मौन, नाम-धाम कुछ कहो, बताओ कि तुम जाति हो कौन?' 'जाति! हाय री जाति !' कर्ण का हृदय क्षोभ से डोला, कुपित सूर्य की ओर देख वह वीर क्रोध से बोला 'जाति-जाति रटते, जिनकी पूँजी केवल पाषंड, मैं क्या जानूँ जाति ? जाति हैं ये मेरे भुजदंड। 'ऊपर सिर पर कनक-छत्र, भीतर काले-के-काले, शरमाते हैं नहीं जगत् में जाति पूछनेवाले। सूत्रपुत्र हूँ मैं, लेकिन थे पिता पार्थ के कौन? साहस हो तो कहो, ग्लानि से रह जाओ मत मौन। 'मस्तक ऊँचा किये, जाति का नाम लिये चलते हो, पर, अधर्ममय शोषण के बल से सुख में पलते हो। अधम जातियों से थर-थर काँपते तुम्हारे प्राण, छल से माँग लिया करते हो अंगूठे का दान।