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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

परमार भोज

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Statue of Raja Bhoja 01.jpg भोपाल में राजा भोज की मूर्ति परम-भट्टारकमहाराजाधिराजपरमेश्वर मालवा के राजा सी. 1010-1055 ई.पू परमार सिंधुराज जयसिंह प्रथम रानी लीलावती पद्मावती और विभिन्न अन्य संभवतः जयसिंह प्रथम श्री-भोज-देव सिंधुराज सावित्री (भोज-प्रबंध के अनुसार) शैववाद, हिंदू धर्म File:Bhoja's royal sign-manual.png रॉयल साइन-मैनुअल भोज (शासनकाल लगभग 1010-1055 ई.) एक भारतीय राजा थे जो कि परमार राजवंश के थे। उनका राज्य मध्य भारत में मालवा क्षेत्र के आसपास केंद्रित था, जहां उनकी राजधानी धार-नगर स्थित थी। भोज ने अपने राज्य का विस्तार करने के प्रयासों में अपने लगभग सभी पड़ोसियों के साथ युद्ध लड़े, जिसमें अलग-अलग सफलता मिली। अपने चरम पर, उनका साम्राज्य उत्तर में चित्तौड़ से लेकर दक्षिण में ऊपरी कोंकण तक और पश्चिम में साबरमती नदी से लेकर पूर्व विदिशा तक फैला हुआ था। भोज वस्तुतः चन्देल सम्राट विद्याधरवर्मन से पराजित हो उनके अधिकृत राजा थे। कहा जाता है कि वर्तमान मध्यप्रदेश के भोजपुर को राजा भोज ने ही बसाया था, तब उसका नाम भोजपाल नगर था, जो कि कालान्तर में भोजपुर हो गया। राजा भोज ने भोजपाल नगर के पास ही एक समुद्र के समान विशाल तालाब का निर्माण कराया था, जो पूर्व और दक्षिण में भोजपुर के विशाल शिव मंदिर तक जाता था। आज भी भोजपुर जाते समय, रास्ते में शिवमंदिर के पास उस तालाब की पत्थरों की बनी विशाल पाल दिखती है। उस समय उस तालाब का पानी बहुत पवित्र और बीमारियों को ठीक करने वाला माना जाता था। कहा जाता है कि राजा भोज को चर्म रोग हो गया था तब किसी ऋषि या वैद्य ने उन्हें इस तालाब के पानी में स्नान करने और उसे पीने की सलाह दी थी जिससे उनका चर्मरोग ठीक हो गया था। उस विशाल तालाब के पानी से शिवमंदिर में स्थापित विशाल शिवलिंग का अभिषेक भी किया जाता था। राजा भोज स्वयं बहुत बड़े विद्वान थे और कहा जाता है कि उन्होंने धर्म, खगोल विद्या, कला, कोशरचना, भवननिर्माण, काव्य, औषधशास्त्र आदि विभिन्न विषयों पर पुस्तकें लिखी हैं जो अब भी विद्यमान हैं। इनके समय में कवियों को राज्य से आश्रय मिला था। उन्होने सन् 1000 ई. से 1055 ई. तक राज्य किया। इनकी विद्वता के कारण जनमानस में एक कहावत प्रचलित हुई- कहाँ राजा भोज, कहाँ गांगेय, तैलंग। धार में भोज शोध संस्थान में भोज के ग्रन्थों का संकलन है। भोज रचित 84 ग्रन्थों में दुनिया में केवल 21 ग्रन्थ ही शेष है। भोज बहुत बड़े वीर, प्रतापी, और गुणग्राही थे। इन्होंने अनेक देशों पर विजय प्राप्त की थी और कई विषयों के अनेक ग्रन्थों का निर्माण किया था। ये बहुत अच्छे कवि, दार्शनिक और ज्योतिषी थे। सरस्वतीकण्ठाभरण, शृंगारमञ्जरी, चम्पूरामायण, चारुचर्या, तत्वप्रकाश, व्यवहारसमुच्चय आदि अनेक ग्रन्थ इनके लिखे हुए बतलाए जाते हैं। इनकी सभा सदा बड़े बड़े पण्डितों से सुशोभित रहती थी। इनकी पत्नी का नाम लीलावती था जो बहुत बड़ी विदुषी थी। जब भोज जीवित थे तो कहा जाता था- अद्य धारा सदाधारा सदालम्बा सरस्वती। पण्डिता मण्डिताः सर्वे भोजराजे भुवि स्थिते॥ (आज जब भोजराज धरती पर स्थित हैं तो धारा नगरी सदाधारा (अच्छे आधार वाली) है; सरस्वती को सदा आलम्ब मिला हुआ है; सभी पण्डित आदृत हैं।) जब उनका देहान्त हुआ तो कहा गया - अद्य धारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती। पण्डिताः खण्डिताः सर्वे भोजराजे दिवं गते ॥ (आज भोजराज के दिवंगत हो जाने से धारा नगरी निराधार हो गयी है ; सरस्वती बिना आलम्ब की हो गयी हैं और सभी पंडित खंडित हैं।)तिलक मंजरी .. परिचय भोजप्रबन्ध में वर्णित 'भोज की राज्यप्राप्ति' की कथा के अनुसार भोज, धारा नगरी के 'सिन्धुल' नामक राजा के पुत्र थे और इनकी माता का नाम सावित्री था । जब ये पाँच वषं के थे, तभी इनके पिता अपना राज्य और इनके पालनपोषण का भार अपने भाई मुंज पर छोड़कर स्वर्गवासी हुए थे। मुंज इनकी हत्या करना चाहता था, इसलिये उसने बंगाल के वत्सराज को बुलाकर उसको इनकी हत्या का भार सौंपा । वत्सराज इन्हें बहाने से देवी के सामने बलि देने के लिये ले गया । वहाँ पहुँचने पर जब भोज को मालूम हुआ कि यहाँ मैं बलि चढ़ाया जाऊँगा, तब उन्होंने अपनी जाँघ चीरकर उसके रक्त से बड़ के एक पत्ते पर दो श्लोक लिखकर वत्सराज को दिए और कहा कि थे मुंज को दे देना । उस समय वत्सराज को इनकी हत्या करने का साहस न हुआ और उसने इन्हें अपने यहाँ ले जाकर छिपा रखा । जब वत्सराज भोज का कृत्रिम कटा हुआ सिर लेकर मुंज के पास गया, और भोज के श्लोक उसने उन्हें दिए, तब मुंज को बहुत पश्चाताप हुआ । मुंज को बहुत विलाप करते देखकर वत्सराज ने उन्हें असल हाल बतला दिया और भोज को लाकर उनके सामने खड़ा कर दिया । मुंज ने सारा राज्य भोज को दे दिया और आप सस्त्रीक वन को चले गए । राजा भोज को इस असार संसार से विदा हुए करीब पौने नौ सौ वर्ष से अधिक बीत चुके हैं, परन्तु फिर भी इसका यश भारत के एक सिरे से दूसरे तक फैला हुआ है । भारतवासियों के मतानुसार यह नरेश स्वयं विद्वान और विद्वानों का आश्नयदाता था । इसीसे हमारे यहाँ के अनेक प्रचलित किस्से - कहानियों के साथ इसका नाम जुड़ा हुआ मिलता है । राजा भोज यह राजा परमार वंश में उत्पन्न हुआ था । यद्यपि इस समय मालवे के परमार अपने को विक्रम संवत् के चलाने वाले प्रसिद्ध नरेश विक्रमादित्य के वंशज मानते हैं। राजा भोज. श्रीयुत विश्वेश्वरनाथ रेउ. पृ. 1.इलाहाबाद.हिंदुस्थानी एकेडेमी, यु. पी.1932. कहते हैं, भोज बहुत बड़े वीर, प्रतापी, पंडित और गुण-ग्राही थे । इन्होंने अनेक देशों पर विजय प्राप्त की थी और कई विषयों के अनेक ग्रंथों का निर्माण किया था । इनका समय १० वीं ११ वीं शताब्दी माना गया है । ये बहुत अच्छे कवि, दार्शनिक और ज्योतिषी थे । सरस्वतीकण्ठाभरण, शृंगारमञ्जरी, चम्पूरामायण, चारुचर्या, तत्वप्रकाश, व्यवहार-समुच्चय आदि अनेक ग्रन्थ इनके लिखे हुए बतलाए जाते हैं । इनकी सभा सदा बड़े बड़े पण्डितों से सुशोभित रहती थी । इनकी पत्नी का नाम लीलावती था जो बहुत बड़ी विदुषी थी । रोहक इनका प्रधानमंत्री और भुवनपाल मंत्री था। कुलचंद्र, साढ़ तथा तरादित्य इनके सेनापति थे जिनकी सहायता से भोज ने राज्यसंचालन सुचारु रूप से किया। अपने चाचा मुंज की ही भाँति यह भी पश्चिमी भारत में एक साम्राज्य स्थापित करना चाहते थे और इस इच्छा की पूर्ति के लिये इन्हें अपने पड़ोसी राज्यों से हर दिशा में युद्ध करना पड़ा। मुंज की मृत्यु शोकजनक परिस्थिति में हो जाने से परमार बहुत ही उत्तेजित थे और इसीलिये परमार भोज चालुक्यों से बदला लेन के विचार से दक्षिण की ओर सेना लेकर चढ़ाई करने को प्रेरित हुए। उन्होंने ने दाहल के कलबुरी गांगेयदेव तथा तंजौर (तंच्यावूर) के राजेन्द्र चोल से संधि की ओर साथ ही साथ दक्षिण पर आक्रमण भी कर दिया, परंतु तत्कालीन राजा चालुक्य जयसिंह द्वितीय[सोलंकी] ने बहादुरी से सामना किया और अपना राज्य बचा लिया। सन् 1044 ई. के कुछ समय बाद जयसिंह के पुत्र सोमेश्वर द्वितीय ने परमारों से फिर शत्रुता कर ली और मालवा राज्य पर आक्रमण कर भोज को भागने के लिये बाध्य कर दिय। धारानगरी पर अधिकार कर लेने के बाद उसने आग लगा दी, परन्तु कुछ ही दिनों बाद सोमेश्वर ने मालव छोड़ दिया और भोज ने राजधानी में लोटकर फिर सत्ताधिकार प्राप्त कर लिया। सन् 1018 ई. के कुछ ही पहले भोज ने इंद्ररथ नामक एक व्यक्ति को, जो संभवत: कलिंग के गांग राजाओं का सामंत था, हराया था जयसिंह द्वितीय तथा इंद्ररथ के साथ युद्ध समाप्त कर लेने पर भोज ने अपनी सेना भारत की पश्चिमी सीमा से लगे हुए देशों की ओर बढ़ाई और पहले लाट नामक राज्य पर, जिसका विस्तार दक्षिण में बंबई राज्य के अंतर्गत सूरत तक था, आक्रमण कर दिया। वहाँ के राजा चालुक्य कीर्तिराज ने आत्मसमर्पण कर दिया और भोज ने कुछ समय तक उसपर अधिकार रखा। इसके बाद लगभग सन् 1020 ई. में भोज ने लाट के दक्षिण में स्थित तथा थाना जिले से लेकर मालागार समुद्रतट तक विस्तृत कोंकण पर आक्रमण किया और शिलाहारों के अरिकेशरी नामक राजा को हराया। कोंकण को परमारों के राज्य में मिला लिया गया और उनके सामंतों के रूप में शिलाहारों ने यहाँ कुछ समय तक राज्य किया। सन् 1008 ई. में जब महमूद गज़नबी ने पंजाबे शाही नामक राज्य पर आक्रमण किया, भोज ने भारत के अन्य राज्यों के साथ अपनी सेना भी आक्रमणकारी का विरोध करने तथा शाही आनंदपाल की सहायता करने के हेतु भेजी परंतु हिंदू राजाओं के इस मेल का कोई फल न निकला और इस अवसर पर उनकी हार हो गई। सन् 1043 ई. में भोज ने अपने भृतिभोगी सिपाहियों को पंजाब के मुसलमानों के विरुद्ध लड़ने के लिए दिल्ली के राजा के पास भेजा। उस समय पंजाब गज़नी साम्राज्य का ही एक भाग था और महमूद के वंशज ही वहाँ राज्य कर रहे थे। दिल्ली के राजा को भारत के अन्य भागों की सहायता मिली और उसने पंजाब की ओर कूच करके मुसलमानों को हराया और कुछ दिनों तक उस देश के कुछ भाग पर अधिकार रखा परंतु अंत में गज़नी के राजा ने उसे हराकर खोया हुआ भाग पुन: अपने साम्राज्य में मिला लिया। भोज ने एक बार दाहल के कलचुरी गांगेयदेव के विरुद्ध भी चढ़ाई कर दी जिसने दक्षिण पर आक्रमण करने के समय उसका साथ दिया था। गांगेयदेव हार गया परंतु उसे आत्मसमर्पण नहीं करना पड़ा। सन् 1055 ई. के कुछ ही पहले गांगेय के पुत्र कर्ण ने गुजरात के चौलुक्य भीम प्रथम के साथ एक संधि कर ली और मालव पर पूर्व तथा पश्चिम की ओर से आक्रमण कर दिया। भोज अपना राज्य बचाने का प्रबंध कर ही रहा था कि बीमारी से उसकी आकस्मिक मृत्यु हो गई और राज्य सुगमता से आक्रमणकारियों के अधिकार में चला गया। उत्तर में भोज ने चन्देलों के देश पर भी आक्रमण किया था जहाँ विद्याधरवर्मन नामक महाराजा राज करता था। जिसमे भोज वस्तुतः विद्याधरवर्मन से पराजित हो उनके अधिकृत राजा बन गया। भोज ने अपने अभियानों के तहत ग्वालियर के कच्छपघाट वंश के राजा कितिराजा पर आक्रमण किया और कच्छपघाट चन्देलों के जागीरदार थे, हालांकि भोज ने उन्हे अपनी तरफ मिलाने की कोशिस की लेकिन उन्होंने अपने प्रिय राजा से गद्दारी करना अस्वीकार कर इस आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया। तब तक चन्देल सेना आ गई और भोज को पीछे हटना पड़ा। महोबा, देबकुंड और त्रिपुरी के शिलालेख के अनुसार, 1027 ईस्वी में भोज ने मालवा और त्रिपुरी की संयुक्त सेना ने साथ में चन्देल राज्य पर हमले की योजना बनाई और आक्रमण कर दिया। युद्ध में विद्याधरवर्मन ने मालवा के परमार राजा भोज और त्रिपुरी के कल्चुरी राजा गांगेयदेव को पराजित कर उन्हे बंदी बना कलिंजर की कैदखाने में डाल दिया। ग्वालियर और महोबा के शिलालेख के अनुसार, फिर भोज भोजदेव ने कालकुरी के चंद्रमा यानी गंगेय देव के साथ मिलकर एक शिष्य की तरह भय से भरे हुए युद्ध के इस गुरु, यानी विद्याधरवर्मन की पूजा की, उनकी महानता का गान किया और बार बार गुहाई भी लगाई की आपके अधीन ही राजा रहेंगे, तब भोज और गंगेय देव पर दया कर विद्याधरवर्मन ने उन्हें रिहा कर दिया।https://books.google.com/books/about/Boot_Hooves_and_Wheels.html?id=ywfsCgAAQBAJ Boot, Hooves and Wheels: And the Social Dynamics behind South Asian Warfare Bose Saikat K. 2015-06-01 Vij Books India Pvt Ltd 978-93-84464-54-7 enhttps://books.google.com/books/about/A_Comprehensive_History_of_India_pt_1_2.html?id=ucQKAQAAIAAJ A Comprehensive History of India: pt. 1-2. [no special title 1992 Orient Longmans 978-81-7007-121-1 enhttps://books.google.com/books/about/The_Dynastic_History_of_Northern_India_e.html?id=zAduAAAAMAAJ The Dynastic History of Northern India (early Mediaeval Period) Ray Hem Chandra 1973 Munshiram Manoharlal Publishers enhttps://books.google.com/books/about/Political_History_of_Northern_India_from.html?id=CpMBAAAAMAAJ Political History of Northern India, from Jain Sources (c. 650 A.D. to 1300 A.D.) With a Foreword by Vasudeva Sarana Agrawala Choudhary Gulab Chandra 1954 Sohanlal Jaindharma Pracharak Samiti en तदांतर परमार और कलचूरी राजवंश के राजा चन्देल साम्राज्य के अधीन राजा रहे। बीच बीच में हालांकि कुछ राजा विद्रोह कर स्वतंत्र हुए परंतु वो मात्र कुछ दिनों बाद ही चन्देल सम्राटों द्वारा पराजित हो उनके अधीन हो जाते थे।Lakshmīkānta Mālavīya, ‎Pradhī Mālavīya sfnVimala Candra Pāṇḍeya 1962 sfn Uttarī Bhārata kā itihāsa: History of northern India 2007 sfn भोज ने राजस्थान में शाकंभरी के चाहमनों के विरुद्ध भी युद्ध की घोषणा की और तत्कालीन राजा चाहमान वीर्यराम को हराया। इसके बाद उसने चाहमानों के ही कुल के अनहिल द्वारा शालित नदुल नामक राज्य को जीतने की धमकी दी, परंतु युद्ध में परमार हार गए और उनके प्रधान सेनापति साढ़ को जीवन से हाथ धोना पड़ा। भोज ने गुजरात के चौलुक्यों [सोलंकी ] से भी, जिन्होंने अपनी राजधानी अनहिलपट्टण में बनाई थी, बहुत दिनों तक युद्ध किया। चालुक्य सोलंकी नरेश मूलराज प्रथम के पुत्र चंमुदराज को वाराणसी जाते समय मालवा में परमार भोज के हाँथों अपमानित होना पड़ा था। उसके पुत्र एवं उत्तराधिकारी बल्लभराज को इसपर बड़ा क्रोध आया और उसने इस अपमान का बदला लेने की सोची। उसने भोज के विरुद्ध एक बड़ी सेना तैयार की और भोज पर आक्रमण कर दिया, परंतु दुर्भाग्यवश रास्ते में ही चेचक से उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद वल्लभराज के छोटे भाई दुर्लभराज ने सत्ता की बागडोर अपन हाथों में ली। कुछ समय बाद भाज ने उसे भी युद्ध में हराया। दुर्लभराज के उत्तराधिकारी भीम के राज्यकाल में भोज ने अपने सेनापति कुलचंद्र को गुजरात के विरुद्ध युद्ध करने के लिए भेजा। कुलचंद्र ने पूरे प्रदेश पर विजय प्राप्त की तथा उसकी राजधानी अनहिलपट्टण को लूटा। भीम ने एक बार आबू पर आक्रमण कर उसके राजा परमार ढंडु को हराया था, जब उसे भागकर चित्रकूट में भोज की शरण लेनी पड़ी थी। जैसा ऊपर बताया जा चुका है, सन् 1055 ई. के थोड़े ही पहले भीम ने कलचुरी कर्ण से संधि करके मालवा पर आक्रमण कर दिया था परन्तु भोज के रहते वे उस प्रदेश पर अधिकार न पा सके। कथा राजा भोज से सम्बन्धित अनेक कथाएँ हैं। अलबेरूनी ने अपने भ्रमण वृत्तान्त में एक अद्भुत कथा लिखी है । वह लिखता है कि 'मालवे की राजधानी धार में , जहाँ पर इस समय भोजदेव राज्य करता है , राज-महल के द्वार पर, शुद्ध चांदी का एक लंबा टुकड़ा पड़ा है । उसमें मनुष्य की आकृति दिखाई देती है । लोग इसकी उत्पत्ति की कथा इस प्रकार बतलाते हैं' - "प्राचीन काल में किसी समय एक मनुष्य कोई विशेष प्रकार का रासायनिक पदार्थ लेकर वहाँ के राजा के पास पहुँचा । उस रासायनिक पदार्थ का यह गुण था कि उसके उपयोग से मनुष्य अमर , विजयी , अजेय और मनोवाञ्छित कार्य करने में समर्थ हो सकता था । उस पुरुष ने , राजा को उसका सारा हाल बतला कर , कहा कि आप अनुक समय अकेले आकर इसका गुण आजमा सकते हैं । इस पर राजा ने उसकी बात मान लीं और साथ ही उस पुरुष की चाही हुई सब वस्तुऐं एकचित्र कर देने की , अपने कर्मचारियों को आज्ञा दें दी । इसके बाद वह पुरुष कई दिनों तक एक बड़ी कड़ाही में तेल गरम करता रहा । और जब वह गाड़ा हो गया तब राजा से बोला कि , अब आप इस में कूद पड़ें , तो मैं बाकी की क्रियाएँ भी समाप्त कर डालू । परन्तु राजा की उसके कथनानुसार जलते हुए तेल में कूदने की हिम्मत न हुई । यह देख उसने कहा कि , यदि आप इसमें कूदने से डरते है , तो मुझे आने दीजिये ताकि मैं यह सिद्धि प्राप्त कर लू । राजा ने यह बात मान ली । इस पर उस पुरुष ने औषधियों की कई पुड़ियाँ निकाल कर राजा को दी और समझा दिया कि इस इस प्रकार के चिह्न दिखाई देने पर वे अन्य पुड़िया तेल में डाल दे । इस प्रकार राजा को समझा बुझाकर वह पुरुष उस कड़ाही में कूद पड़ा और क्षण भर में ही गलकर एक गाढ़ा तरल पदार्थ बन गया । राजा भी उसकी बतलाई विधि के अनुसार एक एक पुड़िया उसमें डालने लगा । परन्तु जब बह एक पुड़िया को छोड़कर बाकी सारी की सारी पुड़ियाएँ डाल चुका तब उसके मन में विचार उत्पन्न हुआ कि , यदि वास्तव में ही यह पुरुष अमर , विजयी , और अजेय होकर जीवित हो गया , तो मेरी और मेरे राज्य की क्या दशा होगी । ऐसा विचार उत्पन्न होते ही उसने वह अन्तिम पुड़िया तेल में न डाली । इससे वह कड़ाही ठंडी हो गई और वह घुला हुआ पुरुष चांदी के उपर्यत टुकड़े के रूप में जम गया ।"राजा भोज. श्रीयुत विश्वेश्वरनाथ रेउ. पृ. 125.इलाहाबाद.हिंदुस्थानी एकेडेमी, यु. पी.1932. साम्राज्य भोज का साम्राज्य : उदयपुर की ग्वालियर प्रशस्ति में लिखा है कि सम्राट भोज का राज्य उत्तर में हिमालय से, दक्षिण में मलयाचल तक और पूर्व में उदयाचल से पश्चिम में अस्ताचल तक फैला हुआ था। इस सम्बन्ध में निम्न श्लोक इस प्रकार है - आकैलासान्मलयर्गिरतोऽ स्तोदयद्रिद्वयाद्वा। भुक्ता पृथ्वी पृथुनरपतेस्तुल्यरूपेण येन॥१७॥एपिग्राफिया इंडिका.भाग.१.पृ.२३५. श्लो.१७.राजा भोज. श्रीयुत विश्वेश्वरनाथ रेउ. पृ. 125.इलाहाबाद.हिंदुस्थानी एकेडेमी, यु. पी.1932. कुछ विद्वानों का मत है कि सम्राट भोज का राज्य लगभग संपुर्ण भारतवर्ष पर ही था। उसका अधिकार पूर्व में डाहल या चेदि, कन्नौज, काशी, बंगाल, बिहार, उड़ीसा और आसाम तक था । दक्षिण में विदर्भ, महाराष्ट्र, कर्णाट और कांची तक तथा पश्चिम में गुजरात, सौराष्ट्र और लाट तक, तथा उत्तर में चित्तौड़ साँभर और काश्मीर तक था। चम्पू रामायण में भोज को विदर्भ का राजा कहा गया है और विदर्भराज की उपाधि से विभुषित किया गया है। राजा भोज. श्रीयुत विश्वेश्वरनाथ रेउ, इलाहाबाद, हिंदुस्थानी एकेडेमी, यु. पी.1932.धारा देवी तथा भोज.मध्यप्रदेश संदेश.4 अप्रैल 1970.पृ.१३ भोज के राज्य विस्तार को दर्शाता हुआ और एक श्लोक इस प्रकार है - केदार-रामेश्वर-सोमनाथ-सुण्डीर-कालानल-रूद्रसत्कैः । सुराश्रयैर्व्याप्य च यःसमन्ताद्यथार्थसंज्ञां जगतीं चकार ॥२०॥एपिग्राफिया इंडिका. भाग.१. पृ.२३६.श्लो.२०. इसी से स्पष्ट है कि भोज ने अपने साम्राज्य के पूर्वी सीमा पर सुंदरबन स्थित सुण्डिर, दक्षिणी सीमा पर रामेश्वर, पश्चिमी सीमा पर सोमनाथ तथा उत्तरी सीमा पर केदारनाथ सरिख विख्यात मंदिरों का निर्माण तथा पुर्ननिर्माण किया था। भोज ने काश्मीर में कुण्ड भी बनवाया था। भोज के साम्राज्य विस्तार पर विद्वानों में थोडा मतभेद हो सकता है क्योंकि भोज की साम्राज्य सीमाएं विस्तिर्ण किंतु थोड़ी अस्थिर रही। राजा भोज. श्रीयुत विश्वेश्वरनाथ रेउ.इलाहाबाद.हिंदुस्थानी एकेडेमी, यु. पी.1932. भोज का काश्मीरराज्य भी इतिहास में दर्ज है। विश्वेश्वरनाथ रेउ ने राजा भोज से सम्बन्धित राज्यों की सुचि में काश्मीरराज्य के विषय में लिखा है कि राजा भोज ने सुदूर काश्मीरराज्य के कपटेश्वर ( कोटेर ) तीर्थ में पापसूदन का कुण्ड बनवाया था और वह सदा वहीं के लाए हुए जल से मुँह धोया करता था । इसके लिये वहाँ का जल मंगवाने का पूरा पूरा प्रबन्ध किया गया था । राजा भोज. श्रीयुत विश्वेश्वरनाथ रेउ. पृ.235.इलाहाबाद.हिंदुस्थानी एकेडेमी, यु. पी.1932. कृतियाँ राजा भोज बहुत बड़े वीर और प्रतापी होने के साथ-साथ प्रकाण्ड पंडित और गुणग्राही भी थे। इन्होंने कई विषयों के अनेक ग्रंथों का निर्माण किया था। ये बहुत अच्छे कवि, दार्शनिक और ज्योतिषी थे। सरस्वतीकंठाभरण, शृंगारमंजरी, चंपूरामायण, चारुचर्या, तत्वप्रकाश, व्यवहारसमुच्चय आदि अनेक ग्रंथ इनके लिखे हुए बतलाए जाते हैं। इनकी सभा सदा बड़े बड़े पंडितों से सुशोभित रहती थी। इनकी पत्नी का नाम लीलावती था जो बहुत बड़ी विदुषी थी। धर्मशास्त्र पर भोजदेव कृत ‘पूर्तमार्तण्ड' नामक ग्रंथ है। इसके अतिरिक्त उन्होंने धर्मशास्त्र सम्बन्धी और ग्रंथ भी लिखे होंगे, क्योंकि इसका उल्लेख अनेक सुप्रसिद्ध धर्मशास्त्र ग्रंथकारों ने अपने ग्रंथों में किया है। दक्षिण कल्याणपुर के चालुक्यवंशी प्रसिद्ध राजा विक्रमांकदेव के मंत्री भट्टविज्ञानेश्वर (108 ई.) ने याज्ञवल्लक्यस्मृति पर मिताक्षरी व्याख्या की है। भोजदेव ने 'चाणक्य राजनीतिशास्त्र' नामक ग्रंथ भी लिखा। स्व. रायसाहब कृष्णाजी विनायक बझे शिल्प कालनिध ने भी लिखा है कि यह ग्रंथ अत्यन्त उपयोगी है और प्राचीन शास्त्री की दृष्टि से शिल्प सम्बन्धी बातों का अच्छा वर्णन है। ग्रंथ के प्रत्येक अध्याय के अन्त में ‘‘इति श्री महाराजाधिराज भोज़देव विरचिते समरांगणसूत्र धारापरनाम्नि वस्तुशास्त्रे.... नाम....अध्याय लिखा है। छपे हुए ग्रंथ में 83 अध्याय हैं, परन्तु ज्ञात होता है कि ग्रंथ अपूर्ण है। राष्ट्रोपयोगी शास्त्रविद्या और कला-सम्बन्धी ग्रंथ राष्ट्र और समाज की उन्नति के लिए उपकारक और आवश्यक हैं, इन पर भी भोजदेवकृत ग्रंथ मिलते हैं। भोजदेव रचित युक्ति कल्पतरु नाम का एक ग्रंथ है, जो विश्व ज्ञानकोष (Enoyelopaedia) के समान है। इसमें राष्ट्रोपयोगी अनेक विषयों को संक्षेप में समावेश किया गया है। आरम्भ में मंगलाचरण के पश्चात् लिखा है नानामुनिनिबंधानां सारमाकृष्ययत्रतः। तनुते भोजनृपतिर्युक्तिकल्प मुदे॥ अनेक ग्रंथों को सार लेकर भोजदेव ने इस युक्ति कल्पतरू की रचना की है। युक्तिकल्पतरू नाम अत्यन्त व्यापक है। राज्यकर्ता के लिए आवश्यक बातें तथा राज्य को दृढ़ बनाने की अनेक युक्तियों का संचय यह कल्पतरू ही है। इसमें राज्य-व्यवस्था, मंत्री तथा दूतों के भेद और लक्षण, राजनीतिक संधि विग्रह, सेना आदि के भेद और देशानुसार उनका महत्व, युद्ध करने की युक्तियाँ, प्रकारादि का महत्व और उनके निर्माण करने की रीति, ध्वजा, पताका छत्र, चामरादि अनेक राज-चिन्हों सिंहासनों और रत्नमणि अलंकारादि की। परीक्षा, नीति और युद्धोपयोगी शास्त्रास्त्रे तथा उनकी परीक्षा, रथ, पालकी इत्यादि सवारियाँ और नौका इत्यादि राष्ट्रोपयोगी अनेक विषयों को पुराण आदि ग्रंथों से आवश्यक ज्ञान प्राप्त करके वर्णन किया गया। इसके अतिरिक्त इस ग्रंथ में एक नवीनता यह भी है कि उपर्युक्त प्रत्येक विषय का वर्णन करते समय भोजदेव ने स्वरचित अन्य ग्रंथों के उदाहरण भी दिए। हैं। इससे जान पड़ता है कि भोजदेव ने प्रत्येक विषय पर पृथक्-पृथक् ग्रंथ लिखे होंगे। राजा भोज ने ज्ञान के सभी क्षेत्रों में रचनाएँ की हैं। उन्होने कोई ८४ ग्रन्थों की रचना की है। उनमें से प्रमुख हैं-http://www.exoticindiaart.com/book/details/samarangana-sutradhara-of-bhojadeva-ancient-treatise-on-architecture-in-two-volumes-IDJ479/ Samarangana Sutradhara of Bhojadeva: An Ancient Treatise on Architecture in Two Volumes) 25 अगस्त 2015 https://web.archive.org/web/20150914201912/http://www.exoticindiaart.com/book/details/samarangana-sutradhara-of-bhojadeva-ancient-treatise-on-architecture-in-two-volumes-IDJ479/ 14 सितंबर 2015 dead राजमार्तण्ड (पतंजलि के योगसूत्र की टीका) सरस्वतीकंठाभरण (व्याकरण) सरस्वतीकण्ठाभरण (काव्यशास्त्र) शृंगारप्रकाश (काव्यशास्त्र तथा नाट्यशास्त्र) तत्त्वप्रकाश (शैवागम पर) वृहद्राजमार्तण्ड (धर्मशास्त्र) राजमृगांक (चिकित्सा) विद्याविनोद युक्तिकल्पतरु - यह ग्रन्थ राजा भोज के समस्त ग्रन्थों में अद्वितीय है। इस एक ग्रन्थ में अनेक विषयों का समाहार है। राजनीति, वास्तु, रत्नपरीक्षा, विभिन्न आयुध, अश्व, गज, वृषभ, महिष, मृग, अज-श्वान आदि पशु-परीक्षा, द्विपदयान, चतुष्पदयान, अष्टदोला, नौका-जहाज आदि के सारभूत तत्त्वों का भी इस ग्रन्थ में संक्षेप में सन्निवेश है। विभिन्न पालकियों और जहाजों का विवरण इस ग्रन्थ की अपनी विशेषता है। विभिन्न प्रकार के खड्गों का सर्वाधिक विवरण इस पुस्तक में ही प्राप्त होता है। डॉ महेश सिंह ने उनकी रचनाओं को विभिन्न विषयों के अन्तर्गत वर्गीकृत किया है- संकलन : सुभाषितप्रबन्ध शिल्प : समरांगणसूत्रधार खगोल एवं ज्योतिष : आदित्यप्रतापसिद्धान्त, राजमार्तण्ड, राजमृगांक, विद्वज्ञानवल्लभ (प्रश्नविज्ञान) धर्मशास्त्र, राजधर्म तथा राजनीति : भुजबुल (निबन्ध) , भुपालपद्धति, भुपालसमुच्चय या कृत्यसमुच्चय चाणक्यनीति या दण्डनीति : व्यवहारसमुच्चय, युक्तिकल्पतरु, पुर्तमार्तण्ड, राजमार्तण्ड, राजनीतिः व्याकरण : शब्दानुशासन कोश : नाममालिका चिकित्साविज्ञान : आयुर्वेदसर्वस्व, विद्वानों का उपनाम भोज विजयनगर का सम्राट कृष्णदेवराय स्वयं उच्चकोटि का विद्वान और प्रतिभासंपन्न कवि था । उसे आंध्र का भोज कहा गया है। Pārva madhyakālina Bhārata kā rūjannitika evani sāmskrtika itihāsa.Bhanwarlal Nathuram Luniya 1968. भोज के समय में भारतीय विज्ञान समराङ्गणसूत्रधार का ३१वां अध्याय ‘यंत्रविज्ञान’ से सम्बन्धित है। इस अध्याय में यंत्र, उसके भेद और विविध यंत्रनिर्माण-पद्धति पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। यंत्र उसे कहा गया है जो स्वेच्छा से चलते हुए (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश आदि) भूतों को नियम से बांधकर अपनी इच्छानुसार चलाया जाय ।The Concept of Yantra in the SamarangaNasutradhara of Bhoja https://web.archive.org/web/20171201093435/http://insa.nic.in/writereaddata/UpLoadedFiles/IJHS/Vol19_2_4_MRoy.pdf 1 दिसंबर 2017 (Indian Journal of history of Science, 19(2);118-124(1984) स्वयं वाहकमेकं स्यात्सकृत्प्रेर्यं तथा परम् । अन्यदन्तरितं बाह्यं बाह्यमन्यत्वदूरत: ॥ इन तत्वों से निर्मित यंत्रों के विविध भेद हैं, जैसे :- (1) स्वयं चलने वाला, (2) एक बार चला देने पर निरंतर चलता रहने वाला, (3) दूर से गुप्त शक्ति से चलाया जाने वाला तथा (4) समीपस्थ होकर चलाया जाने वाला। राजा भोज के भोजप्रबन्ध में लिखा है – घटयेकया कोशदशैकमश्व: सुकृत्रिमो गच्छति चारुगत्या । वायुं ददाति व्यजनं सुपुष्कलं विना मनुष्येण चलत्यजस्त्रम ॥ भोज ने यंत्रनिर्मित कुछ वस्तुओं का विवरण भी दिया है। यंत्रयुक्त हाथी चिंघाड़ता तथा चलता हुआ प्रतीत होता है। शुक आदि पक्षी भी ताल के अनुसार नृत्य करते हैं तथा पाठ करते है। पुतली, हाथी, घोडा, बन्दर आदि भी अंगसंचालन करते हुए ताल के अनुसार नृत्य करते मनोहर लगते है। उस समय बना एक यंत्रनिर्मित पुतला नियुक्त किया था। वह पुतला वह बात कह देता था जो राजा भोज कहना चाहते थे ।। भोज की कीर्ति सम्राट भोज जहां कुशल प्रशासक और सेनापति था वहीं विद्या प्रेमी और कवि भी था। Gurjara vīra-vīrāṅganāeṃ.Bhāratīya itihāsa kā śānadāra adhyāya.p.40.Gaṇapati Siṃha.Cau. Vīrabhāna Baṛhānā.1986 भोज की दान-कीर्ति बल्लाल सेन द्वारा रचित भोजप्रबन्ध तो भोज द्वारा विद्वानों और कवियों के सम्मान एवं उन्हे पुरस्कार स्वरूप दिये गये दान की कथाओं से भरा पड़ा है। विल्हण ने अपने विक्रमाङ्कदेवचरित् में लिखा है कि, अन्य नरेशों की तुलना राजा भोज से नहीं की जा सकती। इसके अलावा उस समय राजा भोज का यश इतना फैला हुआ था कि अन्य प्रान्तों के विद्वान् अपने यहाँ के नरेशों की विद्वत्ता और दान शीलता दिखलाने के लिये राजा भोज से ही उनकी तुलना किया करते थे। राजतरङ्गिणी में लिखा है कि उस समय विद्वान् और विद्वानों के आश्रयदाता क्षीतिराज ( क्षितपति ) और भोजराज ये दोनों ही अपने दान की अधिकता से संसार में प्रसिद्ध थे। विल्हण ने भी अपने विक्रमांकदेवचरित् में क्षितिपति की तुलना भोजराज से ही की है। उसमें लिखा है कि लोहरा का राजा वीर क्षीतपती भी भोज के ही समान गुणी था।राजा भोज. श्रीयुत विश्वेश्वरनाथ रेउ. पृ.106. इलाहाबाद. हिंदुस्थानी एकेडेमी, यु. पी.1932. सन्दर्भ इन्हें भी देखें समरांगणसूत्रधार सरस्वतीकंठाभरण भोजवृत्ति भोजप्रबन्ध भोजशाला धार (मध्य प्रदेश) भोज का सैन्य जीवन मिहिर भोज - प्रतिहार वंश का प्रसिद्ध शासक बाहरी कड़ियाँ राजा भोज महाराजा भोज – एक विश्ववंदनीय शासक एवं माँ सरस्वती के वरदपुत्र राजा भोज की सांस्कृतिक चेतना https://web.archive.org/web/20200929201008/http://www.spandanfeatures.com/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE-%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%9C-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%9A%E0%A5%87/ 29 सितंबर 2020 (स्पन्दन फीचर्स) भोजरचित युक्तिकल्पतरु राजा भोज एवं परमारकालीन नगर स्थापत्य (निर्मला राजपुरोहित) श्रीमद्भोजदेवकृतः राजमार्ताण्डः (संस्कृत विकिस्रोत) जगदीश सिंह गहलोत , विजय सिंह गहलोत राजस्थान के राजवंशों का इतिहास https://books.google.co.in/books?id=5880AQAAIAAJ&q=%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0&dq=%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwiQo-vS6qzaAhUDro8KHSl5C5gQ6AEITzAG १९८० राजस्थान साहित्य मन्दिर, 1980 harv 9 अप्रैल 2018 https://web.archive.org/web/20180409171641/https://books.google.co.in/books?id=5880AQAAIAAJ&q=%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0&dq=%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0+%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwiQo-vS6qzaAhUDro8KHSl5C5gQ6AEITzAG 9 अप्रैल 2018 live विजयेन्द्र कुमार माथुर ऐतहासिक स्थानावली https://books.google.co.in/books?id=FwceAAAAIAAJ&dq=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE+%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%9C+ १९९० राजस्थान हिंदी ग्रन्थ अकादमी harv 9 अप्रैल 2018 https://web.archive.org/web/20180409172044/https://books.google.co.in/books?id=FwceAAAAIAAJ&dq=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BE+%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%9C+ 9 अप्रैल 2018 live गंगुओं का हमारा युग और राजा भोज की वैज्ञानिक परम्परा राजा भोज (विश्वेश्वरनाथ रेउ) राजा भोज श्रेणी:मध्य प्रदेश का इतिहास श्रेणी:परमार राजवंश श्रेणी:भोपाल का इतिहास श्रेणी:मध्यकालीन भारत का इतिहास श्रेणी:११वीं शताब्दी के भारतीय शासक