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लक्ष्मी विश्वनाथन
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लक्ष्मी विश्वनाथन (१२ जनवरी १९४४ – २० जनवरी २०२३) एक प्रसिद्ध भारतीय भरतनाट्यम नृत्यांगना, नृत्यदिग्दर्शिका, शिक्षिका और लेखिका थीं। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय नृत्य के क्षेत्र में अपनी अनूठी प्रस्तुतियों और गहन शोध के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दिया। संगीत और नृत्य का सुंदर मेल करने वाली उनकी कला ने उन्हें भरतनाट्यम की दुनिया में एक विशिष्ट पहचान दिलाई। उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया, जिनमें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और मद्रास संगीत अकादमी द्वारा दी गई नृत्य कलानिधि की उपाधि शामिल है।
== प्रारंभिक जीवन और प्रशिक्षण ==
लक्ष्मी विश्वनाथन का जन्म १२ जनवरी १९४४ को बंगलुरु, मैसूर राज्य, ब्रिटिश भारत में हुआ था। उनके माता-पिता अलमेलु और के. विश्वनाथन थे। उनका परिवार तंजावुर की शास्त्रीय कला परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ था। उन्होंने भरतनाट्यम की शिक्षा वझुवूर रामैया पिल्लई स्कूल की गुरु कौसल्या से शुरू की और बाद में कांचीपुरम एलप्पा पिल्लई से प्रशिक्षण लिया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने तंजावुर किट्टप्पा पिल्लई स्कूल के कोर्टलम गणेश पिल्लई और शंकरी कृष्णन से भी नृत्य सीखा।
लक्ष्मी ने अपनी माँ से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली और बाद में तेदियूर नारायणस्वामी, तिरुवैयारु कृष्णमूर्ति, और संगीत कला आचार्य टी. मुक्ता से कर्नाटक संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त किया। संगीत के प्रति उनकी यह समझ उनके नृत्य में स्पष्ट रूप से झलकती थी, जहाँ ताल और राग का समन्वय उनकी प्रस्तुतियों को और समृद्ध बनाता था। १९५२ में उनका अरंगेट्रम (प्रथम मंच प्रदर्शन) हुआ, जिसकी अध्यक्षता मद्रास संगीत अकादमी के संस्थापक-सचिव ई. कृष्ण अय्यर ने की थी।
== करियर ==
लक्ष्मी विश्वनाथन ने भरतनाट्यम की एक उत्कृष्ट नृत्यांगना के रूप में अपनी पहचान बनाई और भारत के साथ-साथ विदेशों में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। उनकी नृत्य प्रस्तुतियाँ अपनी शालीनता, भावपूर्ण अभिनय (भाव-भंगिमाओं के माध्यम से कहानी कहने की कला), और रचनात्मक नृत्य रचनाओं के लिए जानी जाती थीं। वे खजुराहो नृत्य महोत्सव और चेन्नई में मद्रास संगीत अकादमी के वार्षिक नृत्य उत्सव जैसे प्रमुख सांस्कृतिक आयोजनों में नियमित रूप से भाग लेती थीं। खजुराहो में प्रदर्शन को उन्होंने "सपनों का साकार होना" बताया था।
वे एक समर्पित गुरु भी थीं, जिन्होंने अनेक शिष्यों को प्रशिक्षित किया और परंपरागत भरतनाट्यम के ढांचे में व्यक्तिगत अभिव्यक्ति और नवाचार को प्रोत्साहित किया। इसके अलावा, उन्होंने नृत्य के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व पर कई लेख और पुस्तकें लिखीं, जो इस कला के प्रति उनकी गहरी समझ को दर्शाती हैं। उनके नृत्य में शोध और परंपरा का अनोखा संगम देखने को मिलता था।
=== योगदान और शैली ===
लक्ष्मी विश्वनाथन की कला में भरतनाट्यम के स्त्री-भावों का विशेष प्रभाव था, जहाँ उन्होंने अनुग्रह, शक्ति और भावनात्मक गहराई को खूबसूरती से प्रस्तुत किया। उनकी नृत्य रचनाएँ कर्नाटक संगीत से प्रेरित थीं और उन्होंने एम॰ एस॰ सुब्बुलक्ष्मी जैसे महान कलाकारों को अपनी कला के माध्यम से श्रद्धांजलि दी। प्रदर्शन, शिक्षण और लेखन के क्षेत्र में उनके बहुआयामी योगदान ने उन्हें भारतीय नृत्य की एक सांस्कृतिक दूत के रूप में स्थापित किया।
== पुरस्कार और सम्मान ==
लक्ष्मी विश्वनाथन को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। २००८ में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। २०११ में मद्रास संगीत अकादमी ने उन्हें नृत्य कला निधि की उपाधि प्रदान की, जो शास्त्रीय नृत्य के क्षेत्र में एक बड़ा सम्मान है। इन पुरस्कारों पर उन्होंने आश्चर्य और विनम्रता व्यक्त की, और कहा कि उनकी प्राथमिकता हमेशा कला की सेवा करना रही।
== व्यक्तिगत जीवन और विरासत ==
लक्ष्मी विश्वनाथन का चेन्नई से गहरा नाता था, जहाँ उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय बिताया और अपनी कला को समृद्ध किया। २० जनवरी २०२३ को उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद नृत्य जगत ने उनकी स्मृति में उन्हें श्रद्धांजलि दी, और उनकी कला को भरतनाट्यम की परंपराओं को जीवित रखने और समकालीन दृष्टिकोण से जोड़ने वाली एक अमूल्य धरोहर के रूप में याद किया।
== सन्दर्भ ==