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411 समाचार
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गिरनार

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गिरनार पर्वत ગિરનાર પર્વત गिरिनगर Girnar 1.jpg गिरनार गिरनार पर्वत 1031 3382 भवनाथ, जूनागढ़, गुजरात भारत India Gujarat 21 29 41 N 70 30 20 E type:mountain_scale:100000 dms inline,title यह भगवान नेमिनाथ की तप स्थली एवं निवास स्थान है। गिरनार की पाँचवी टोंक पर उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ था। भारत के गुजरात प्रदेश में सौराष्ट्र प्रांत के जूनागढ़ शहर से लगभग 2 कि.मी. की दूरी पर एक भव्य और दिव्य पर्वत “गिरनार” विद्यमान है। गिरनार पर्वत की पाँचवी टोंक पर भगवान नेमिनाथ के चरण चिन्ह है, पुराण मे भी इसे वस्त्रपथ क्षेत्र कहा हे। ओर देवी भागवत मे भी इसका महत्व मिलता है ।https://timesofindia.indiatimes.com/city/lucknow/akhilesh-yadav-exposes-attempts-to-take-over-sacred-jain-sites/articleshow/115820472.cmsPatel Justice Jayant Bandilalji Digamber Jain Karkhana vs State Of Gujarat on 17 February, 2005 https://indiankanoon.org/doc/76914582/ इन पहाड़ियों की औसत ऊँचाई 3,500 फुट है पर चोटियों की संख्या अधिक है, चोटी 3,666 फुट ऊँची है।http://archive.org/details/handbooktravelle00john A handbook for travellers in India, Burma, and Ceylon . John Murray (Firm) 1911 London : J. Murray ; Calcutta : Thacker, Spink, & Co. University of California Libraries 5 मई 2020 https://web.archive.org/web/20160409110414/https://archive.org/details/handbooktravelle00john 9 अप्रैल 2016 live यहाँ पर सम्राट अशोक का एक स्तंभ भी है। महाभारत में अनुसार रेवतक पर्वत की क्रोड़ में बसा हुआ प्राचीन तीर्थ स्थल है। इतिहास गिरिनार का प्राचीन नाम उर्ज्जयंत था। ये पहाड़ियाँ ऐतिहासिक मंदिरों, राजाओं के शिलालेखों तथा अभिलेखों (जो अब प्राय: ध्वस्तप्राय स्थिति में हैं) के लिए भी प्रसिद्ध हैं। पहाड़ी की तलहटी में एक बृहत चट्टान पर अशोक के मुख्य 14 धर्मलेख उत्कीर्ण हैं। इसी चट्टान पर क्षत्रप रुद्रदामन् का लगभग 150 ई. का प्रसिद्ध संस्कृत अभिलेख है। इसमें सम्राट् चंद्रगुप्त मौर्य तथा परवर्ती राजाओं द्वारा निर्मित तथा जीर्णोद्वारकृत जैन मंदिर का सुंदर वर्णन है। यह लेख संस्कृत काव्यशैली के विकास के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण समझा जाता है। इस बृहत अभिलेख में रुद्रदमन के नाम और वंश का उल्लेख तथा रूद्रदमन्‌ संवत्‌ 72 में, भयानक आँधी पानी के कारण प्राचीन सुदर्शन झील टूट फूट जाने का काव्यमय वर्णन है। विशेषकर सुवर्णसिकता तथा पलाशिनी नदियों के पानी को रोककर बाँध बनाए जाने तथा महावृष्टि एवं तूफान से छूट जाने का वर्णन तो बहुत ही सुंदर है। इस अभिलेख की चट्टान पर 458 ई. का एक अन्य अभिलेख गुप्तसम्राट् स्कंदगुप्त के समय का भी है जिसमें सुराष्ट्र के तत्कालीन राष्ट्रिक पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित द्वारा सुदर्शन तड़ाग के सेतु या बाँध का पुन: एक बार जीर्णोद्धार किए जाने का उल्लेख है क्योंकि पुराना बाँध, जिसे रूद्रदामन्‌ ने बनवाया था, स्कंदगुप्त के राज्याभिषेक वर्ष में जल के महावेग से नष्ट भ्रष्ट हो गया था। यहाँ के सिंहों की नस्ल भी अधिक विख्यात है जिनकी संख्या धीरे-धीरे कम होती जा रही है।http://archive.org/details/1884GazetteerByBombayPresidencyVol8Kathiawar349D BK 349 -Gazetteer By Bombay Presidency Vol 8 Kathiawar John W Watson 1884 2 मई 2020 https://web.archive.org/web/20161128062732/https://archive.org/details/1884GazetteerByBombayPresidencyVol8Kathiawar349D 28 नवंबर 2016 live जैन तीर्थस्थल के रूप मे उल्लेख पालिताना और सम्मेत शिखर के बाद यह जैनियों का प्रमुख तीर्थ हैं। पर्वत पर स्थित जैन मंदिर प्राचीन एवं सुंदर हैं। जैन धर्म में चौबीस तीर्थंकरों की आराधना का विधान किया गया है जिसमें से 22 वे तीर्थंकर श्री नेमिनाथ जी [ अरिष्ठनेमी ] का केवल ज्ञान प्राप्ति व मोक्ष [ निर्वाण ] प्राप्ति स्थल ऐतिहासिक रूप से गिरनार पर्वत, जिला-जूनागढ़, राज्य-गुजरात से बताया गया है; जिस कारण उक्त पर्वत जैन धर्मानुयायियो  हेतु पवित्र व पूजनीय है | पुराणों के अनुसार श्री नेमिनाथ जी शौर्यपुर के राजा समुद्रविजय और रानी शिवादेवी के पुत्र थे। समुद्रविजय के अनुज (छोटे भाई) का नाम वसुदेव था जिनकी दो रानियाँ थीं—रोहिणी और देवकी। रोहिणी के पुत्र का नाम बलराम बलभद्र व देवकी के पुत्र का नाम श्रीकृष्ण था । इस तरह नेमिनाथ श्रीकृष्ण के बाबा(ताऊ) के पुत्र थे। http://archive.org/details/journalasiatics35benggoog Journal of the Asiatic Society of Bengal Asiatic Society of Bengal 1838 Oxford University English 1 मई 2020 https://web.archive.org/web/20100309175059/http://www.archive.org/details/journalasiatics35benggoog 9 मार्च 2010 livehttp://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.536331 Report On The Antiquities Of Kathiawad And Kachh 1874-75 Burgess James 1876http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.325703 Uttar Puran Acharya Gunbhadra 1918http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.409872 Tiloya - Pannati (vol. - I) Acharya Yati Vrishabhhttp://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.409873 Tiloya - Pannati (vol. - Iii) Acharya Yati Vrishabhhttp://hi.encyclopediaofjainism.com/index.php/%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0_:_%E0%A4%85%E0%A4%9C%E0%A5%88%E0%A4%A8_%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%82_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%AE%E0%A4%A4 गिरनार : अजैन विद्वानों के मतअक्तूबर 2022 InternetArchiveBot Girnar g Digamber Jain kshetra darshan vedio https://www.youtube.com/watch?v=t7h1bkRfXSc hi-IN 2020-05-02http://library.jinvaani.org/4.books/GirnarGaurav.pdf गिरनार गौरव बाबू कामता प्रसाद 2 मई 2020 20 सितंबर 2020 https://web.archive.org/web/20200920000619/http://library.jinvaani.org/4.books/GirnarGaurav.pdf dead उक्त पर्वत पर जैनों हेतु ऐतिहासिक रूप से आठ स्थल पूजनीय बताए गए हैं जिनमें से प्रथम पॉच स्थल टोंक कहा जाता है; द्वितीय, तृतीय व चतुर्थ टोंक का उल्लेख उत्तर पुराण सर्ग ७२ श्लोक १८९-१९० में आचार्य गुणभद्र सुरी ( 741 ईसवी ) ने भी किया है |http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.325703 Uttar Puran Acharya Gunbhadra 1918 पाँच टोक प्रथम टोक इस स्थल पर पांचवी सदी से सोलवीं सदी के श्वेतांबर :en:Śvetāmbara/ दिगंबर :en:Digambara monk  पंथ के 100 से अधिक मंदिर बने हुए हैं |http://archive.org/details/FergussonHistoryArchitecture Fergusson History Architecture James Fergusson 1891 5 मई 2020 https://web.archive.org/web/20171003235312/https://archive.org/details/FergussonHistoryArchitecture 3 अक्तूबर 2017 live श्वेताम्बर जैन मंदिर समूह left|thumb|गिरनार के जैन मन्दिर|पाठ=पहाड़ की चोटी पर कई जैन मंदिर हैं। यहां तक पहुँचने के लिए 7,000 सीढ़ियाँ हैं। इनमें सर्वप्राचीन मंदिर गुजरात नरेश कुमारपाल के समय का बना हुआ है। दूसरा वास्तुपाल और तेजपाल नामक भाइयों ने बनवाया था। इसे तीर्थंकर मल्लिनाथ मंदिर कहते हैं। यह विक्रम संवत्‌ 1288 (1237 ई.) में बना। तीसरा मंदिर नेमिनाथ का है जो लगभग 1277 ई. में तैयार हुआ। यह सबसे अधिक विशाल एवं भव्य है। प्राचीन काल में इन पर्वतों की शोभा अपूर्व थी क्योंकि इनके सभामंडप, स्तंभ, शिखर, गर्भगृह आदि स्वच्छ संगमरमर से निर्मित होने के कारण बहुत चमकदार और सुंदर दिखते थे। अब अनेक बार मरम्मत होने से इनका स्वभाविक सौंदर्य कुछ फीका पड़ गया है। द्वितीय टोक मुनि अनिरुद्ध कुमार जी के चरण स्थित है। इन्होंने जैन दीक्षा धारण कर मोक्ष प्राप्त किया। तृतीय टोक मुनि शंभू कुमार जी के चरण स्थित है। इनका उल्लेख जैन शास्त्रों में मिलता है। मुनि ने जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर तप करके यहां से निर्वाण प्राप्त किया था। चतुर्थ टोक मुनि प्रदुम कुमार जी के चरण एवं पत्थर पर तीर्थंकर की प्रतिमा उत्कीर्ण है; जैन मान्यतानुसार ये श्री कृष्ण के पुत्र है। पंचम टोक नेमिनाथ शिखर यहां भगवान नेमिनाथ जी के चरण कमल हैं। यह जैन संप्रदाय के लिए अत्यंत पवित्र तीर्थ स्थान है। इसी शिखर से भगवान नेमिनाथ को मोक्ष प्राप्त हुआ था। इसमें चट्टान में नेमिनाथ के पदचिह्नों या पादुका के ऊपर एक छोटा सा खुला मंदिर या मंडप है। इसके बगल में एक भारी घंटा लटका हुआ था।‘’The Report on the Antiquities of Kathiawad and Kachha’’ 1874-75 -Mr. Burgess, page no-175http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.536331 Report On The Antiquities Of Kathiawad And Kachh 1874-75 Burgess James 1876 इस स्थल पर चरण के ऊपर चार खम्बों पर एक छतरी बनी हुई थी साथ ही इक शिलालेख स्थित था जिसमे उल्लेख था कि बूंदी (राजपूताना) के जैन अनुयायी द्वारा पर्वत की सीढ़ियों का निर्माण कार्य कराया गया है।http://archive.org/details/westernindiainv00postgoog Western India in 1838, Volume 2 Marianne Postans Saunders and Otley, 1839 Oxford University English (उक्त छत्री १९८१ मे आकाशीय बिजली से नष्ट हो गयी है।) सहसावन तीर्थंकर नेमिनाथ भगवान का केवल ज्ञान प्राप्ति स्थल; यहां नेमिनाथ जी के चरण स्थित है एवं एक भव्य  मंदिर निर्मित है| यहां नेमिनाथ भगवान का दीक्षा कल्याणक एवं केवल ज्ञान कल्याणक हुआ था। राजुल की गुफा यहां माता राजुल की प्राचीन प्रतिमा स्थापित हैhttp://archive.org/details/westernindiainv00postgoog Western India in 1838, Volume 2 Marianne Postans Saunders and Otley, 1839 Oxford University English; इनका विवाह भगवान नेमिनाथ से होने से पूर्व ही नेमिनाथ को वैराग्य हो गया था जिस् कारण इन्होंने भी वैराग्य धारण कर इस स्थल पर साधना की है। अंबामाता का मंदिर अंगूठाकार|Ambika Mata temple यह तीर्थंकर नेमिनाथ की यक्षिनी अंबिका देवी का मंदिर हैं।https://archive.org/details/journalasiatics35benggoog/page/n351/mode/1up Journal of the Asiatic Society of Bengal Asiatic Society of Bengal 1838 Oxford University English वह नीले वर्ण वाली, सिंह की सवारी करने वाली, आम्रछाया में रहने वाली दो भुजा वाली है। बायें हाथ में प्रियंकर नामक पुत्र के प्रेम के कारण आम की डाली को और दायें हाथ में अपने द्वितीय पुत्र शुभंकर को धारण करने वाली है। चूंकि अम्बिका जी हाथो मे आम्र वृक्ष धारण करती है जिस कारण इस मन्दिर के आस-पास आम्र वृक्ष लगाने की प्रथा पुरातन समय मे यहाँ थी। अन्य स्थल अन्य स्थलो मे चौबीस तीर्थंकरो के चरण (यह गौमुखी गंगा के परिसर मे स्थित है ) ,एवम पर्वत पर जगह-जगह पर स्थित तीर्थंकरो के चरण एवं पत्थरो पर तीर्थंकर की उत्कीर्ण प्रतिमाएं है | साहित्यिक उल्लेख उत्तर पुराण-आचार्य गुणभद्र सुरी ( 741 ईसवी ) सर्ग-71, श्लोक 179-181 तिलोयपण्ण्ती- आचार्य यतिवृषभ ( 176 ईसवी )-4/1206 नाग कुमार चरित्र- महाकवि पुष्पदंत (10 वीं शताब्दी) निर्माण कांड - कवि श्री भैया भगवती दास (1741सवंत )     हरिवंश पुराण , आचार्य जिनसेन कृत् ( ईस्वी की आठवीं शताब्दी ), सर्ग-65, श्लोक 4-17  प्रभास पाटन से प्राप्त बेबिलोन के शासक नभश्चन्द्र का प्राचीन ताम्रपत्र, नेमिनाथ पुराण- ब्रह्मचारी नेमिदत्त कृत् ( ईस्वी 1528 ), आचार्य वीरसेन कृत धवला टीका ( ईस्वी की आठवीं शताब्दी ) आचार्य मदन कीर्ति यतिपति की शासन चतुस्त्रिशतिका  (वि. स.1405 ), श्री शत्रुंजय महात्म्य ग्रंथ - श्री धनेश्वर सूरी कृत्,                                                                   बाहरी कड़ियाँ गिरनार भक्ति - श्वेताम्बर जैन महातीर्थ गिरनार के बारे में सम्पूर्ण जानकारी गिरनार महिमा - जैन धर्म का डिजिटल पोर्टल भगवा और भस्म के दिवाने गढ गिरनार वाले। https://web.archive.org/web/20241127171734/https://www.travelteacher.in/2019/12/girnar-ka-shivratri-mela-aur-lili.html?m=1 27 नवंबर 2024 फोटोग्राफ संन्दर्भ् श्रेणी:जूनागढ़ श्रेणी:गुजरात में पर्यटन श्रेणी:भूगोल श्रेणी:गुजरात के पर्वत श्रेणी:जूनागढ़ ज़िला