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भारतीय तर्कशास्त्र

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'भारतीय तर्कशास्त्र' से सीमित अर्थ में महर्षि गोतम द्वारा रचित 'न्याय दर्शन' का बोध होता है। किन्तु अधिक व्यापक अर्थ में इस में बौद्ध न्याय और जैन न्याय भी समाविष्ट किये जाते हैं। सबसे व्यापक रूप में भारतीय तर्कशास्त्र से अभिप्राय सभी भारतीय विद्वानों द्वारा प्रतिपादित सभी तार्किक (न्यायिक) सिद्धान्तों के सम्मुच्चय से है। भारतीय तर्कशास्त्र, विश्व के तीन मूल तर्कशास्त्रों में से एक है; अन्य दो हैं जो कि यूनानी और चीनी तर्कशास्त्र हैं। भारतीय तर्कशास्त्र की दीर्घ परम्परा को दो भागों में विभक्त किया जाता है जो कि प्राचीन न्याय और नव्यन्याय है। नव्यन्याय के रूप में आधुनिक काल के आरम्भिक दिनों तक भारतीय तर्कशास्त्र की परंपरा जारी रही। इतिहास भारत में तर्कशास्त्र की परम्परा बहुत पुरानी है। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में विभिन्न अटकलें शामिल हैं जिन्हें बाद में चतुष्कोटि के चार मंडलों के रूप में औपचारिक रूप से पुनर्गठित किया गया था: "A", "not A", "A and 'not A'", and "not A and not not A".S. Kak (2004). The Architecture of Knowledge. CSC, Delhi. उल्लेखनीय है कि नासदीय सूक्त में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के सम्बन्ध में है। को आद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः। अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव ॥'' ( ऋग्वेद १०:१२९-६) (अर्थ - कौन इस बात को वास्तविक रूप से जानता है और कौन इस लोक में सृष्टि के उत्पन्न होने के विवरण को बता सकता है कि यह विविध प्रकार की सृष्टि किस उपादान कारण से और किस निमित्त कारण से सब ओर से उत्पन्न हुयी। देवता भी इस विविध प्रकार की सृष्टि उत्पन्न होने से बाद के हैं अतः ये देवगण भी अपने से पहले की बात के विषय में नहीं बता सकते। इसलिए कौन मनुष्य जानता है किस कारण यह सारा संसार उत्पन्न हुआ।) भारतीय तर्कशास्त्र आचार्य गोतम और आचार्य वात्स्यायन से आरम्भ होती है। आचार्य गोतम न्यायसूत्रों के रचयिता थे। इसी परम्परा में पाणिनि के संस्कृत व्याकरण के नियम (५वीं शती ईसापूर्व); ईसापूर्व दूसरी शती का वैशेषिक सम्प्रदाय; दूसरी शताब्दी ईसापूर्व में न्याय दर्शन के प्रणेता गोतम द्वारा अनुमान (inference) का विशद् विश्लेषण; तथा दूसरी शताब्दी ईसापूर्व नागार्जुन की चतुष्कोटि उल्लेखनीय हैं। भारतीय तर्कशास्त्र का इतिहास २६ से अधिक शताब्दियों में पसरा हुवा है। भारतीय न्यायिकों की प्रकाशित एवं अप्रकाशित (प्राप्य या अप्राप्य) कृतियों की संख्या भी विशाल है। पश्चिमी भाषाओं में या अच्छे हालत में प्राप्त रचनाओं की संख्या कुल रचनाओं की संख्या का एक छोटा भाग ही है। भारतीय तर्कशास्त्र के इतिहास के लिये जिसे ५ भागों में बांट सकते हैं - १) व्याकरण - पाणिनि आदि के द्वारा विकसित ; इस व्याकरण के अत्यन्त परिष्कृत तर्कपूर्ण नियमों ने बाद के अधिकांश विद्वतापूर्ण कार्यों पर अपनी छाप छोड़ी। २) मीमांसा ३) वैशेषिक एवं पुराना न्याय ४) बौद्ध न्याय ५) नव्यन्याय भारतीय तर्क का स्वरूप भारतीय तर्कशास्त्र ने तर्क की पद्धति पर विशेष ध्यान दिया और इसे दृष्टान्तों के माध्यम से सुबोध बनाया। न्यायसूत्र में और टीकाओं आदि में पञ्च अवयव वाक्य आता है। प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन -- इन पाँच अवयवों को 'पञ्चावयव' वाक्य (syllogism) कहते हैं।प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनानि अवयवाः (न्यायसूत्र, प्रथम अध्याय, प्रथम भाग, सूत्र ३२ ) नैयायिकों का मत है कि अनुमान को बोधगम्य बनाने के लिये उसे इन ५ स्पष्ट पदों में व्यक्त करना चाहिये। विशेषताएँ पञ्चावयव वाक्य की तर्कपद्धति के निम्नलिखित गुण हैं- (१) यह निगमन (deduction) तथा आगमन (induction) के अविभाज्यता को प्रदर्शित करता है। (२) निगमन को तर्क के एक अवयव के रूप में स्वीकार किया गया है, एक स्वतन्त्र चिन्तन के रूप में नहीं। यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि यूरोपीय मनोविज्ञान ने हाल में (२०वीं शताब्दी में) इसी तरह के चिन्तन करना शुरु किया। इंगॉल्स (Daniel Henry Holmes Ingalls) ने अपनी पुस्तक "Materials for the Study of Navya-nyāya Logic" में नव्यन्याय के आधारभूत सिद्धान्तों की व्याख्या करते हुए निष्कर्ष निकाला है कि नव्यन्याय ही तर्क की एकमात्र औपचारिक पद्धति है जो अपने आप में पूर्ण है तथा जो यूरोपीय संस्कृति के बाहर उत्पन्न हुई है। आधुनिक तर्कशास्त्र पर भारतीय तर्कशास्त्र का प्रभाव १८वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीय दर्शन में ब्रिटिशों की रुचि जागी और वे भारतीय दर्शन में निहित निष्कर्ष निकालने की गहरी प्रक्रिया से अवगत हुवे। इसी प्रक्रिया में हेनरी कोलब्रुक ने १८२४ में "The Philosophy of the Hindus: On the Nyaya and Vaisesika Systems" नामक पुस्तक की रचना की।Colebrooke, Henry Thomas "Essays on the Religion and Philosophy of the Hindus" London: Williams and Norgate, 1858 available online at https://archive.org/details/essaysonreligio00colegoog इस में कोलब्रुक ने भारतीय निष्कर्ष प्रक्रिया का विश्लेषण प्रस्तुत किया और साथ में उस की तुलना अरस्तु के तर्कपद्धति से की। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि अरस्तू का न्यायवाक्य (Aristotelian syllogism), भारतीय न्यायवाक्य की व्याख्या नहीं कर सकता। मैक्समूलर ने १८५३ में रचित थॉमसन के "Outline of the Laws of Thought" में एक परिशिष्ट लिखा। इस में मैक्समूलर ने भारतीय और यूनानी तर्कशास्त्र को एक ही धरातल पर रखने का प्रयत्न किया। उन्होंने लिखा - "जहाँ तक इतिहास हमें इस विषय में निर्णय लेने देता है, तर्कशास्त्र और व्याकरण के विज्ञान केवल दो देशों (हिन्दुओं और यूनानियों) द्वारा खोजे गये या परिक्ल्पित किये गये थे। "Mueller, Max "Of Indian Logic" Appendix To Thomson's Laws of Thought, London: Longmans Green and Co 1853 online at https://archive.org/details/anoutlinenecess03thomgoog जोनार्दन गानेरी का विचार है कि जॉर्ज बूल (१८१५ -१८६४) और आगस्टस डी मॉर्गन (१८०६ - १८७१) सम्भवतः भारतीय तर्कप्रणाली से अवगत थे। भारतीय तर्कशास्त्र ने अनेक पश्चिमी विद्वानों को अपनी तरफ खींचा जिस में १९वीं शताब्दी के अग्रगण्य तर्कशास्त्री जैसे चार्ल्स बाबेज, अगस्टस डी मॉर्गान, जॉर्ज बूल आदि प्रमुख हैं। जॉर्ज बूल की पत्नी मैरी एवरेस्ट बूल जो स्वयं एक गणितज्ञ थीं, ने सन १९०१ में "डॉ बोस को लिखे एक खुले पत्र" में यह स्पष्ट किया है कि भारतीय तर्कशास्त्र का जॉर्ज बूल पर गहरा प्रभाव था। इस पत्र का शीर्षक था, " उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय चिन्तन तथा पश्चिमी विज्ञान" (Indian Thought and Western Science in the Nineteenth Century)।Boole, Mary Everest. "Collected Works", eds E M Cobham and E S Dummer. London, Daniel 1931. Letter also published in the Ceylon National Review in 1909, and published as a separate pamphlet "The Psychologic Aspect of Imperialism" in 1911.Jonardon Ganeri (2013) [2001], Ganeri, Jonardon (ed.), Indian Logic: A Reader, Richmond, Surrey: Routledge, p. vii, ISBN 9781136119385, The modern study of classical Indian systems of logic began with H. T. Colebrook's "discovery" of the Hindu syllogism - a schema for correct reasoning as described in the early Indian texts. The report of his discovery to the Royal Asiatic Society in 1824 led to a flurry of interest in Indian logic in the next thirty years, attracting the attention of even the best logicians of the time, people like Boole and De Morgan."George Boole’s Laws of Thought and Indian logic (Subhash Kak) डी मार्गान ने तो स्वयं ही १८६० में भारतीय तर्कशास्त्र के महत्व के बारे में लिखा था। उन्होंने कहा, दो जातियों (रेसेस) के लोगों ने गणित की आधारशिला रखी है, संस्कृत (बोलने वाले) और यूनानी बोलने वाले। इन दोनों जाति के लोगों ने अपनी अपनी स्वतन्त्र तर्कप्रणाली का विकास किया था।De Morgan, Augustus "Syllabus of a proposed system of logic", London : Walton and Maberly 1860; online at https://archive.org/details/syllabusofpropos00demoiala गणित के विद्वान भारतीय गणित के यूरोपीय गणित पर प्रभाव से अवगत हुवे। उदाहरण के लिये, हर्मन वील (Hermann Weyl) ने लिखा था, "पिछली शताब्दियों में पूर्वी गणित, यूनानी विचार (गणित) से विलग होकर अलग रास्ते पर चला। ऐसा लगता है कि इस की उत्पत्ति भारत में हुवी थी और इस में कुछ और योगदान करते हुवे अरबों ने इसे हम तक पहुँचाया। इस में संख्या की संकल्पना, तार्किक रूप से, ज्यामिति की संकल्पना से अधिक प्राचीन प्रतीत होती है परंतु गणित का वर्तमान रुझान स्पष्टतः यूनानी गणित की ओर लौटता हुवा दिखायी देता है।Weyl, Hermann "The Theory of Groups and Quantum Mechanics", 1950, p.viii; online at https://books.google.com/books?id=jQbEcDDqGb8C सन्दर्भ इन्हें भी देखें भारतीय दर्शन बौद्ध न्याय कथावत्थु मिलिन्दपञ्ह तंत्रयुक्ति अक्षपाद चतुष्कोटि सप्तभङ्गी नय बाहरी कड़ियाँ भारतीय तर्कशास्त्र (गूगल पुस्तक ; लेखक - तिवारी) A history of Indian logic: ancient, mediaeval, and modern schools (Google book By Satis Chandra Vidyabhusana) Analogy in Indian and Western philosophical thought (Google book By David B. Zilberman, Helena Gourko, Robert Sonné Cohen) Indian Logic Forum Indian Logic and Ontology Aristotle and Gautama on Logic and Physics Asian Philosophy and Critical Thinking: Divergence or Convergence? Indian Logic for AI system Design : Presented at Vijnan Bharati Seminar at IISc- Bangalore in 2006 न्यायकोश तर्कशब्दावली INDIAN LOGIC (Nyaya Darsana) & Artificial Intelligence A Day of Indian Logic https://web.archive.org/web/20090709145128/http://www.illc.uva.nl/Publications/ResearchReports/X-2009-04.text.pdf 9 जुलाई 2009 INDIAN LOGIC AND ATOMISM (1921) Did Logic Go from India to Greece? A Vedic Touch To Logic In Indian Thought - Part One (सुभाष काक ; 2016) Indian Logic : A Reader By Dr Jonardon Ganeri (२००१) A System of Indian Logic: The Nyāya Theory of Inference By John Vattanky, Viśvanātha Nyāyapañcānana Bhaṭṭācārya (२००३) A History of Indian Logic: Ancient, Mediaeval and Modern Schools By Satis Chandra Vidyabhusana The Character of Logic in India by Bimal Krishna Matilal ; Jonardon Ganeri, Heeraman Tiwari द्वारा सम्पादित (१९९८) Non-Western Logic (चन्द्रकान्त राजू) श्रेणी:भारतीय तर्कशास्त्र