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411 समाचार
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रेने देकार्त

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पाश्चात्य दर्शन सत्तरवी शताब्दी का दर्शन Frans Hals - Portret van René Descartes.jpg 240px फ्रांस हाल्स के संकेत में चित्रRussell Shorto Russell Shorto Descartes' Bones Doubleday 2008 218 http://cartelen.louvre.fr 15 जून 2020 https://web.archive.org/web/20110826072534/http://cartelen.louvre.fr/ 26 अगस्त 2011 live see also The Louvre, Atlas Database रने देकार्त yes 1596 03 31 La Haye en Touraine, फ्रांसीसी साम्राज्य yes 1650 2 11 1596 03 31 स्टॉकहोम, स्वीडन फ्रांसीसी http://www.newadvent.org/cathen/04744b.htm René Descartes Newadvent.org 30 May 2012 ...preferred to avoid all collision with ecclesiastical authority. https://web.archive.org/web/20110424091355/http://www.newadvent.org/cathen/04744b.htm 24 अप्रैल 2011 live Firma Descartes.svg रने देकार्त (René Descartes) एक फ्रांसीसी दार्शनिक, गणितज्ञ, वैज्ञानिक और कैथोलिक थे जिन्होंने वैश्‍लेषिक ज्यामिति का आविष्कार करके ज्यामिति और बीजगणित के पहले के भिन्न क्षेत्रों को जोड़ा। उन्होंने अपने कामकाजी जीवन का एक बड़ा भाग डच गणराज्य में बिताया, शुरू में नासाउ के मौरिस की डच सेना, ऑरेंज के राजकुमार और संयुक्त प्रांत के स्टाठउडर की सेवा की। डच स्वर्ण युग के सबसे उल्लेखनीय बौद्धिक आंकड़ों में से एक, डेकार्ट को व्यापक रूप से आधुनिक दर्शन के संस्थापकों में से एक माना जाता है। परिचय उनका जन्म ३१ मार्च ई. को हेग में हुआ था। देकार्त ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लाफ्लेशे के जेस्यूट कालेज से प्राप्त की। उच्च शिक्षा के लिए वे पेरिस गये किन्तु वहाँ ज्यादा समय तक नहीं रहे और उन्होंने ज्यामिति पर मनन प्रारंभ किया। २१ वर्ष की आयु में शिक्षा समाप्त कर ये ओरेंज के राजकुमार मोरिस की सेना में भर्ती हो गए। यहाँ पर प्राप्त अवकाश को ये गणित के अध्ययन में व्यतीत किया करते थे। इन्होंने कई युद्धों में भी भाग लिया। सेवॉय के ड्यूक के साथ हुए युद्ध में प्रदर्शित वीरता के कारण इनका लेफ्टिनेंट जनरल की उपाधि प्रदान की गई, परंतु इन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया और पेरिस में तीन वर्ष तक शांतिपूर्वक दर्शनशास्त्र की साधना करते रहे। प्रकृति के भेदों की गणित के नियमों से तुलना करने पर इन्होंने आशा प्रकट की कि दोनों के रहस्यों का ज्ञान एक ही प्रकार से किया जा सकता है। इस भाँति इन्होंने तत्वज्ञान में 'कार्तेज़ियनवाद' का आविष्कार किया। गणित को इनकी सर्वोत्तम देन है वैश्लेषिक ज्यामिति। देकार्त को सुबह बिस्तर पर देर तक पड़े रहकर सोचने की आदत थी। ऐसी ही एक सुबह 10 नवंबर सन् 1619 को देकार्त ने अंतरिक्ष में किसी बिन्दु की स्थिति निर्धारित करने के संबंध में सोचा और यहीं से वैश्लेषिक ज्यामिति की शुरूआत हुयी। यद्यपि इस सोच को अंतिम रूप देने में देकार्ता को पूरे अठारह साल लग गये। १६३७ ई. में प्रकाशित इनके "दिस्कूर द ला मेतौद्' (Discours de la Methode) में ज्यामिति पर भी १०६ पृष्ठ का एक निबंध था। यह पुस्तक गणित के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है। इसी पुस्तक का एक अंग Le Geometric है जिसमें देकार्ता ने वैश्लेषिक ज्यामिति की विवेचना की है। इन्होंने समीकरण सिद्धांत के कुछ नियमों का भी अविष्कार किया, जिनमें "चिन्हों का नियम' अत्यंत प्रसिद्ध है। देकार्त ने सन् 1637 में शेषफल प्रमेय दिया। इस प्रमेय के अनुसार यदि‌ फलन f(x), x =a पर शून्य के बराबर है तो (x-a) इसका एक गुणनखंड होगा। देकार्त के इस प्रमेय ने n घात वाले एक बहुपद को n सरल गुणनखंडों के रूप में व्यक्त किये जाने की संभावनाओं को प्रबल किया और बीजगणित के मूलभूत प्रमेय का मार्ग प्रशस्त किया। देकार्त ने समीकरणों के वास्तविक धनात्मक और ऋणात्मक मूलों की संख्या ज्ञात करने संबंधी नियम भी दिया। देकार्त एक महान् दार्शनिक भी थे। वे किसी भी तथ्य को वैज्ञानिक आधार पर ही स्वीकार करते थे और इसके लिए उनका विचार था कि सत्य तक पहुँचने के लिये सभी बातों पर सन्देह करना चाहिये। ११ फ़रवरी १६५० को इनकी मृत्यु हो गई। देकार्त का दर्शन और दर्शनिक पद्धति देकार्त दर्शन को भी गणित की तरह निश्चित सिद्धांत वाला बनाना चाहते थे। इस उद्देश्य से उन्होंने दर्शन में ऐसी कई पद्धति प्रारम्भ की जो इनसे पहले के दार्शनिकों ने किसी निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए प्रयोग नहीं की थी। इन्होंने मध्य कालीन यूरोप में प्रचलित धर्म तथा ईश्वर आधारित दर्शन का परित्याग कर बुद्धिवादी दार्शनिक पद्धति को अपनाया। इसके माध्यम से उन्होंने इस बात पर जोर दिया किया की हमारे अंदर ही ज्ञान निहित होता है तथा उस ज्ञान के ऊपर संदेह करते जाने से हम किसी सत्य तक पहुंच सकते है। इन्होंने सत्य के खोज की संभावना को प्रत्येक व्यक्ति के अंदर निहित माना तथा प्रत्येक व्यक्ति को इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। इन्होंने इस बात को सिरे से नकार दिया की सत्य हमें केवल धमग्रंथो तथा धर्माधिकारियो से ही मिल सकता है। इस तरह इन्होंने व्यक्तिवाद पर बल दिया जो की आधुनिक यूरोपीय दर्शन की प्रमुख विशेषता है। इनका दर्शन को देखने तथा समझने का दृष्टिकोण विज्ञान पर आधारित था। यह दर्शन को भी उसी तरह संदेह से परे बनाना चाहते थे जैसे दो और दो को जोड़ने पर जो उत्तर आता है वह हर परिस्थिति तथा काल में संदेह से परे होता है। देकार्त दर्शन को केवल दिमागी कसरत नहीं मनाते थे,अपितु इसे वह सामान्य जीवन की एक विषय वस्तु मानते थे। इनका मनाना था की जिस राष्ट्र में जितने अधिक लोग दर्शन से प्रेरित होंगे वह राष्ट्र उतना ही अधिक सभ्य तथा सुसंस्कृत होगा। इनका मानना था की दर्शन तभी सामान्य जीवन का हिस्सा बन सकता है जब यह नीति (एथिक्स ) से जुड़ा होगा। इसलिए इन्होंने नीति शास्त्र पर बहुत अधिक बल दिया है। देकार्त की दार्शनिक पद्धति प्रत्येक दार्शनिक का ध्येय किसी वस्तु या घटना के पीछे छिपे सत्य तक पहुँचना होता है। इसके लिए वह कई प्रकार की पद्धति को अपनाता है। यथा - आगमन पद्धति , निगमन पद्धति, प्रश्नोत्तर पद्धति। इसी में देकार्त ने सत्य के खोज के लिए संदेहवादी पद्धति को अपनाया। ऐसा नहीं की यह पद्धति पहले से प्रचलन में नहीं थी। प्राचीन समय में इस पद्धति को अपनाने का श्रेय पायरो को जाता है , परन्तु इस पद्धति को सुसंगत बनाने का श्रेय देकार्त को जाता है। इस पद्धति में किसी घटना के पीछे छुपे हुए सत्य को जानने के लिए तब तक संदेह किया जाता है जब तक की दूध का दूध और पानी का पानी ना हो जाए, अर्थात ऐसा सत्य ज्ञात न हो जो सभी प्रकार के संदेहो से परे हो। देकार्त इस पद्धति के माध्यम से दर्शन को विज्ञान की तरह निश्चित बनाना चाहते थे जो हर काल तथा स्थान में संदेह से परे हो। इस पद्धति को सत्य के खोज का माध्यम बनाने के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता की देकार्त ह्यूम की तरह संदेहवादी थे। उल्लेखनीय है की संदेहवादी से अभिप्राय ऐसे दार्शनिकों से है जो किसी स्पष्ट निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाते है। इस आधार पर देकार्त संदेहवादी दार्शनिक नहीं है क्योंकि उनका लक्ष्य स्पष्ट तथा संदेह रहित लक्ष्य तक पहुँचना था। उनकी पद्धति संदेह पर आधारित थी। असंदिग्ध ज्ञान प्राप्त करने के लिए उन्होंने चार नियम दिए थे - किसी निष्कर्ष या सत्य तक पहुंचने के लिए किसी भी तरह की जल्दबाजी न करना। किसी घटना के पीछे के सत्य को जानने के लिए उस घटना से संबंधित विचारो को कई भागों में बाँट लेना। ताकि प्रत्येक भाग का ठीक तरह से परीक्षण किया जा सके। सरल विचारो से कठिन विचारो की तरफ बढ़ना। इस बात का प्रयास करना की कोई भी भाग या उस घटना से संबंधित कोई तथ्य या विचार छूट न जाए। मैं सोचता हूँ अतः मैं हूँ (I Think, Therefore I Am) देकार्त ने ईश्वर , द्रव्य आदि पर अपने विचार प्रकट करने से पुर्व आत्मतत्व पर चिंतन करना प्रारंभ किया। इसके लिए उन्होंने अपनी संदेहवादी पद्धति को अपनाया। इस पद्धति के माध्यम से जब वह सोचना प्रारम्भ करते है तब वह ज्ञान के साधन के विषय में चिंतन करते है तथा वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते है की ज्ञान या तो इन्द्रियों के द्वारा अथवा इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त होता है। परन्तु,अगले ही क्षण उनके मन में यह प्रश्न उत्पन्न होता है की क्या इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त होने वाला ज्ञान सत्य है या मेरा एक भ्रम मात्र है? इस प्रश्न के उत्तर में वह कहते है की कई बार मुझे रस्सी भी साँप की तरह नजर आता है। ऐसी स्थिति में इन्द्रियों पर पूरी तरह से विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन मैं कैसे यह कह दूँ की इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान पूरी तरह से भ्रम है क्योंकि इन्द्रियों के माध्यम से ही में किसी व्यक्ति विशेष से बात करता हूँ ,दुनिया के अद्भुत सौंदर्य को देखता हूँ। मेरे आस पास घटने वाली घटना को देखता हूँ। अतः यह भी नहीं कह सकता की इन्द्रिया पूरी तरह से भ्रम उत्पन्न करती है। किंतु यह भी सत्य है की मैं कई बार सपने में भी लोगो से बाते करता हूँ ,किसी स्थल विशेष में घूमने चला जाता हूँ। इस तरह देकार्त सभी वस्तुओं ,घटनाओं पर प्रश्न करते है तथा किसी निष्कर्ष पर पहुँचने का प्रयास करते हैं। इन प्रयासों के बीच वह इस निष्कर्ष पर पहुंचते है की मान लो कोई घटना मेरे जीवन में घट रही हो वह सत्य हो या भ्रम, लेकिन इनके सत्य या भ्रम होने पर कौन विचार कर रहा हैं? निःसंदेह वह मैं ही जो इन पर विचार कर रहा हूँ तथा इन विचारो के माध्यम से किसी निष्कर्ष पर पहुंचने का प्रयास कर रहा हूँ। "मैं सोचता हूँ अतः मैं हूँ" की आलोचना देकार्त के द्वारा दिया गया यह वाक्य कि "मैं सोचता हूँ अतः मैं हूँ" कोई मौलिक विचार नहीं है अपितु इनसे पहले ऑगस्टाइन तथा कैम्पानेला ने भी इसी तरह के विचार प्रस्तुत किये हैं। ऑगस्टाइन का वाक्य था मैं अपना निराकरण करूँ तो भी मेरी सत्ता स्वतः सिद्ध है। ह्यूम कहते हैं कि सोचने की प्रक्रिया के आधार पर यह कैसे कहा जा सकता है कि कोई स्थायी आत्मा का निवास मेरे अंदर है? क्योंकि जब में अपने अंदर झाँकने का प्रयास करता हूँ तो मुझे केवल बहुत सारे विचार नज़र आते हैं। कांट कहते है कि देकार्त के वाक्य 'मैं सोचता हूँ अतः मैं हूँ' से आत्मा के विषय में कोई जानकारी प्राप्त नहीं होती अपितु ' मैं ' के अस्तित्व की सिद्धि मात्र होती है। रसल कहते हैं कि देकार्त के सूत्र वाक्य से केवल विचारों के अस्तित्व की सिद्धि होती है, न की आत्मा की। इन्हें भी देखें चिन्तये अतोऽस्मि सन्दर्भ सन्दर्भ ग्रन्थ सी. ऐडम एवं पी. टैनरि : अय्ब्र दे देकार्त, १३ खंड, पैरिस, १८९७-१९११। बाहरी कड़ियाँ रेने देकार्त के बारे में रेने देकार्त की जीवनी, दार्शनिक प्रणाली, निगमन रेने डिस्कार्ट्स श्रेणी:1596 में जन्मे लोग श्रेणी:गणितज्ञ श्रेणी:दार्शनिक श्रेणी:फ्रांसीसी दार्शनिक श्रेणी:१६५० में निधन