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अनन्त कन्दलि
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अनन्त कन्दलि रत्न पाठक (पिता) हरिचरण अनुमानित 1520 ईस्वी हाजो, कामरूप, असम अनुमानित 1620 ईस्वी कवि, व्याकरणविद् असमिया रामायण, कुमार हरण
अनन्त कन्दलि १६वीं शताब्दी के एक असमिया वैष्णव कवि थे। वे श्रीमन्त शंकरदेव के शिष्य थे। अनंत कंदलि ने स्वयं भागवत के छठे स्कंध और दसवें स्कंध के अनुवाद के प्रसंग में अपना आत्म-परिचय दिया है। उस विवरण के अनुसार उनका घर हाजो में था। उनके पिता का नाम रत्न पाठक था। जन्म से ब्राह्मण अनंत कंदलि का वास्तविक नाम हरिचरण था।http://books.google.co.in/books?id=WjDcd0cTFxQC&pg=PA428&lpg=PA428&dq=ananta+kandali&source=bl&ots=YoFLYoJEPq&sig=KFHlKmhHC32iQJ7bneIow9Muk8g&hl=en&sa=X&ei=JU-MT8HuDYGjiAfoxbTdCQ&ved=0CDAQ6AEwAzgK#v=onepage&q=ananta%20kandali&f=false Encyclopaedia of the Hindu World Concept Publishing Company 1992 April 16, 2012 Ganga Ram Garg 428-429http://books.google.co.in/books?id=bMsGmbALl5sC&pg=PA61&lpg=PA61&dq=ananta+kandali&source=bl&ots=WaCQ_34SXu&sig=A1Z9yD0UBJl7KC740zuaaD3lG_A&hl=en&sa=X&ei=oEqMT-fzG4yfiAfj0pHZCQ&ved=0CEoQ6AEwBw#v=onepage&q=ananta%20kandali&f=false Assamese literature Otto Harrassowitz, Wiesbaden 1976 April 16, 2012 Satyendranath Sarma 61 बाद में तर्क शास्त्र में दक्षता हासिल करने के कारण उन्हें अनंत कंदलि नाम मिला। आगे चलकर वे चंद्रभारती, भागवताचार्य, भागवत भट्टाचार्य आदि उपाधियों से विभूषित हुए।असमिया साहित्य का समीक्षात्मक इतिवृत्त, लेखक - डॉ॰ सत्येंद्रनाथ शर्मा, प्रकाशक - प्रतिमा देवी। 1996, गुवाहाटी, पृष्ठ 55-56 अनंत कंदलि का जन्म संभवतः सोलहवीं शताब्दी के तीसरे और चौथे दशक के बीच यानी 1520-1530 ईस्वी के दौरान हुआ था और वे सोलहवीं शताब्दी के अंत तक जीवित थे।चंद्रप्रभा सैकियानी बनलता शिवनाथ बर्मन 2009 डिब्रूगढ़ 3
आत्म परिचय
कंदलि ने दशम स्कंध में अपना आत्म-परिचय इस प्रकार लिखा है:
रतन पाठक नामे पंडित परम।
भागवत शास्त्रे यार आछिल विक्रम॥
श्रीहरिचरण नामे ताहान संतति।
व्याकरण पढ़ि नाम श्रीचन्द्रभारती॥
तर्कत लभिला नाम अनन्त कन्दलि।
भागवते आचार्य पदवी भैला आर्यजन॥
भागवत भट्टाचार्य बोले आर्यजने।
तेहो विरचिला पद कृष्णर चरणे॥
अर्थ- रतन पाठक नाम के परम पंडित थे,
भागवत शास्त्र में जिनका पराक्रम था।
श्री हरिचरण नाम की उनकी संतान,
व्याकरण पढ़कर नाम हुआ श्री चंद्रभारती।
तर्क में नाम मिला अनंत कंदलि,
भागवत में आचार्य की पदवी आर्यजनों ने दी।
भागवत भट्टाचार्य कहते हैं आर्यजन,
उन्होंने कृष्ण के चरणों में पदों की रचना की।</poem>}}
साहित्यिक कृतियाँ
अनंत कंदलि ने महिलाओं और शूद्रों सहित समाज के सभी वर्गों में धार्मिक विश्वास जगाने के लिए शास्त्रों की रचना की थी। गुरु श्रीमंत शंकरदेव के अनुरोध पर उन्होंने भागवत-पुराण के दसवें कांड का अनुवाद किया था। इस रचना में शंकरदेव का प्रभाव देखा जा सकता है। उन्होंने माधव कंदलि की मूल पुस्तक की सहायता से रामायण के पाँच कांड लिखे थे। उन्हें माधव कंदलि की रामायण का वैष्णव संस्करण कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने भागवत के पांचवें और छठे कांड का अनुवाद किया था। अनंत कंदलि की अन्य काव्य कृतियाँ हैं:
कुमार हरण
काव्य भागवत
षष्ठ स्कन्धर वृत्रासुर-वध (छठे स्कंध का वृत्रासुर-वध)
मध्य आरु शेष दशम
महीरावण वध
सीतार पाताल प्रवेश (सीता का पाताल-प्रवेश)
हरि-हर युद्ध
सहस्र नाम वृत्तांत
सम्मान
व्याकरण शास्त्र में उनकी दक्षता के लिए उन्हें श्रीचंद्रभारती की उपाधि प्रदान की गई। तर्क और न्याय में उनकी विद्वता के लिए उन्हें अनंत कंदलि विभूषण, और भागवत-शास्त्र में उनके पांडित्य के लिए भागवताचार्य और भागवत-भट्टाचार्य सम्मान प्रदान किए गए।
संदर्भ
बाहरी कड़ियाँ
श्रेणी:असम के व्यक्ति
श्रेणी:मृत व्यक्ति
श्रेणी:असमिया कवि
श्रेणी:असम के पब्लिक डोमेन लेखक
श्रेणी:महापुरुषिया धर्म के अनुयायी