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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

राजेन्द्र प्रसाद

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Rajendra Prasad (Indian President), signed image for Walter Nash (NZ Prime Minister), 1958 (16017609534).jpg आधिकारिक चित्र, 1950 पहले भारत के राष्ट्रपति 26 जनवरी 1950 13 मई 1962 सर्वपल्ली राधाकृष्णन जवाहरलाल नेहरू कार्यालय स्थापित सर्वपल्ली राधाकृष्णन प्रथम कृषि मंत्री जवाहरलाल नेहरू 15 अगस्त 1947 14 जनवरी 1948 कार्यालय स्थापित जयरामदास दौलतराम भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष 11 दिसम्बर 1946 24 जनवरी 1950 हरेन्द्र कुमार मुखर्जी वंगल तिरुवेंकटाचारी कृष्णमाचारी सच्चिदानन्द सिन्हा कार्यालय समाप्त भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 1884 12 03 y जीरदेई, बंगाल प्रेसीडेंसी, ब्रितानी भारत (वर्तमान में बिहार, भारत) 1963 02 28 1884 12 03 y पटना, बिहार, भारत राजनेता अधिवक्ता पत्रकार शोधार्थी राजवंशी देवी 1896 1962 died कलकत्ता विश्वविद्यालय भारत रत्न (1962) मृत्युंजय प्रसाद (पुत्र) डॉ राजेन्द्र प्रसाद (3 दिसंबर 1884 – 28 फरवरी 1963) भारत गणराज्य के प्रथम राष्ट्रपति एवं महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे।भारत के पूर्व राष्ट्रपति https://web.archive.org/web/20171014234619/http://www.presidentofindia.nic.in/former-presidents-hi.htm 14 अक्तूबर 2017 . Presidentofindia.nic.in. अभिगमन तिथि: 14 अक्टूबर 2017. वे भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से थे; और उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में प्रमुख भूमिका निभाई। उन्होंने भारत गणराज्य का संविधान दिया थे। राष्ट्रपति होने के अतिरिक्त उन्होंने भारत के पहले मंत्रिमंडल में 1946 एवं 1947 मेें कृषि और खाद्यमंत्री का दायित्व भी निभाया था। सम्मान से उन्हें प्रायः 'राजेन्द्र बाबू' कहकर पुकारा जाता है। प्रारंभिक राजेन्द्र बाबू का जन्म 3 दिसम्बर 1884 को बिहार के तत्कालीन सारण जिले (अब सीवान) के जीरादेई नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता महादेव सहाय संस्कृत एवं फारसी के विद्वान थे एवं उनकी माता कमलेश्वरी देवी एक धर्मपरायण महिला थीं।http://books.google.co.in/books?id=r2C2InxI0xAC&pg=PA1&dq=rajendra+prasad&hl=en&ei=cPqZTY3tKpHprQf_69X9Cw&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=1&ved=0CDUQ6AEwADgK#v=onepage&q&f=false Presidents of India, 1950-2003 - Janak Raj Jai - Google Books 29 मई 2013 https://web.archive.org/web/20121104172515/http://books.google.co.in/books?id=r2C2InxI0xAC&pg=PA1&dq=rajendra+prasad&hl=en&ei=cPqZTY3tKpHprQf_69X9Cw&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=1&ved=0CDUQ6AEwADgK#v=onepage&q&f=false 4 नवंबर 2012 live राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वज मूलरूप से कुआँगाँव, अमोढ़ा (उत्तर प्रदेश) के निवासी थे। यह एक कायस्थ परिवार था। कुछ कायस्थ परिवार इस स्थान को छोड़ कर बलिया जा बसे थे। कुछ परिवारों को बलिया भी रास नहीं आया इसलिये वे वहाँ से बिहार के जिला सारण (अब सीवान) के एक गाँव जीरादेई में जा बसे। इन परिवारों में कुछ शिक्षित लोग भी थे। इन्हीं परिवारों में राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वजों का परिवार भी था। जीरादेई के पास ही एक छोटी सी रियासत थी - हथुआ। चूँकि राजेन्द्र बाबू के दादा पढ़े-लिखे थे, अतः उन्हें हथुआ रियासत की दीवानी मिल गई। पच्चीस-तीस सालों तक वे उस रियासत के दीवान रहे। उन्होंने स्वयं भी कुछ जमीन खरीद ली थी। राजेन्द्र बाबू के पिता महादेव सहाय इस जमींदारी की देखभाल करते थे। राजेन्द्र बाबू के चाचा जगदेव सहाय भी घर पर ही रहकर जमींदारी का काम देखते थे। अपने पाँच भाई-बहनों में वे सबसे छोटे थे इसलिए पूरे परिवार में सबके प्यारे थे। उनके चाचा के चूँकि कोई संतान नहीं थी इसलिए वे राजेन्द्र प्रसाद को अपने पुत्र की भाँति ही समझते थे। दादा, पिता और चाचा के लाड़-प्यार में ही राजेन्द्र बाबू का पालन-पोषण हुआ। दादीऔर माँ का भी उन पर पूर्ण प्रेम बरसता था। बचपन में राजेन्द्र बाबू जल्दी सो जाते थे और सुबह जल्दी उठ जाते थे। उठते ही माँ को भी जगा दिया करते और फिर उन्हें सोने ही नहीं देते थे। अतएव माँ भी उन्हें प्रभाती के साथ-साथ रामायण महाभारत की कहानियाँ और भजन कीर्तन आदि रोजाना सुनाती थीं।https://www.prabhatkhabar.com/state/bihar/rajendra-prasad-jayanti-first-president-of-india-lived-in-jiradei-of-siwan-bihar-gvk देश रत्न राजेंद्र प्रसाद की जयंती पर, जानिए उनसे जुड़े रोचक तथ्य प्रभात खबर २८ मई २०२४ पाँच वर्ष की उम्र में ही राजेन्द्र बाबू ने एक मौलवी साहब से फारसी में शिक्षा शुरू किया। उसके बाद वे अपनी प्रारंभिक शिक्षा के लिए छपरा के जिला स्कूल गए। राजेन्द्र बाबू का विवाह उस समय की परिपाटी के अनुसार बाल्यकाल में ही, लगभग 13 वर्ष की उम्र में, राजवंशी देवी से हो गया। विवाह के बाद भी उन्होंने पटना की टी० के० घोष अकादमी से अपनी पढाई जारी रखी। उनका वैवाहिक जीवन बहुत सुखी रहा और उससे उनके अध्ययन अथवा अन्य कार्यों में कोई रुकावट नहीं पड़ी। लेकिन वे जल्द ही जिला स्कूल छपरा चले गये और वहीं से 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा दी। उस प्रवेश परीक्षा में उन्हें प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था।.http://books.google.co.in/books?id=r2C2InxI0xAC&pg=PA1&dq=rajendra+prasad&hl=en&ei=cPqZTY3tKpHprQf_69X9Cw&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=1&ved=0CDUQ6AEwADgK#v=onepage&q&f=false Presidents of India, 1950-2003 - Janak Raj Jai - Google Books 29 मई 2013 https://web.archive.org/web/20121104172515/http://books.google.co.in/books?id=r2C2InxI0xAC&pg=PA1&dq=rajendra+prasad&hl=en&ei=cPqZTY3tKpHprQf_69X9Cw&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=1&ved=0CDUQ6AEwADgK#v=onepage&q&f=false 4 नवंबर 2012 live सन् 1902 में उन्होंने कोलकाता के प्रसिद्ध प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया। उनकी प्रतिभा ने गोपाल कृष्ण गोखले तथा बिहार-विभूति अनुग्रह नारायण सिन्हा जैसे विद्वानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। 1915 में उन्होंने स्वर्ण पद के साथ विधि परास्नातक (एलएलएम) की परीक्षा पास की और बाद में लॉ के क्षेत्र में ही उन्होंने डॉक्ट्रेट की उपाधि भी हासिल की। राजेन्द्र बाबू कानून की अपनी पढाई का अभ्यास भागलपुर, बिहार में किया करते थे।]]http://books.google.co.in/books?id=XsynRkUMJT4C&printsec=frontcover&dq=rajendra+prasad&hl=en&ei=1KKZTYa8PIL5cbrtmJIH&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=8&ved=0CFIQ6AEwBzgU#v=onepage&q&f=false राजेंद्र बाबू: पत्रों के आईने में - Rajendra Prasad, Tara Sinha - Google Books 29 मई 2013 https://web.archive.org/web/20131103135902/http://books.google.co.in/books?id=XsynRkUMJT4C&printsec=frontcover&dq=rajendra+prasad&hl=en&ei=1KKZTYa8PIL5cbrtmJIH&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=8&ved=0CFIQ6AEwBzgU#v=onepage&q&f=false 3 नवंबर 2013 live हिन्दी एवं भारतीय भाषा-प्रेम यद्यपि राजेन्द्र बाबू की पढ़ाई फारसी और उर्दू से शुरू हुई थी तथापि बी० ए० में उन्होंने हिंदी ही ली। वे अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी व बंगाली भाषा और साहित्य से पूरी तरह परिचित थे तथा इन भाषाओं में सरलता से प्रभावकारी व्याख्यान भी दे सकते थे। गुजराती का व्यावहारिक ज्ञान भी उन्हें था। एम० एल० परीक्षा के लिए हिन्दू कानून का उन्होंने संस्कृत ग्रंथों से ही अध्ययन किया था। हिन्दी के प्रति उनका अगाध प्रेम था। हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं जैसे भारत मित्र, भारतोदय, कमला आदि में उनके लेख छपते थे। उनके निबन्ध सुरुचिपूर्ण तथा प्रभावकारी होते थे। 1912 ई. में जब अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन कलकत्ते में हुआ तब स्वागतकारिणी समिति के वे प्रधान मन्त्री थे। 1920 ई. में जब अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का 10वाँ अधिवेशन पटना में हुआ तब भी वे प्रधान मन्त्री थे। 1923 ई. में जब सम्मेलन का अधिवेशन काकीनाडा में होने वाला था तब वे उसके अध्यक्ष मनोनीत हुए थे परन्तु रुग्णता (illness) के कारण वे उसमें उपस्थित न हो सके अतः उनका भाषण जमनालाल बजाज ने पढ़ा था। 1926 ई० में वे बिहार प्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के और 1927 ई० में उत्तर प्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति थे। हिन्दी में उनकी आत्मकथा बड़ी प्रसिद्ध पुस्तक है। अंग्रेजी में भी उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखीं। उन्होंने हिन्दी के 'देश' और अंग्रेजी के 'पटना लॉ वीकली' समाचार पत्र का सम्पादन भी किया था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनका पदार्पण वक़ील के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत करते ही हो गया था। चम्पारण में गान्धीजी ने एक तथ्य अन्वेषण समूह भेजे जाते समय उनसे अपने स्वयं सेवकों के साथ आने का अनुरोध किया था। राजेन्द्र बाबू महात्मा गाँधी की निष्ठा, समर्पण एवं साहस से बहुत प्रभावित हुए और 1928 में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय के सीनेटर का पदत्याग कर दिया। गाँधीजी ने जब विदेशी संस्थाओं के बहिष्कार की अपील की थी तो उन्होंने अपने पुत्र मृत्युंजय प्रसाद, जो एक अत्यंत मेधावी छात्र थे, उन्हें कोलकाता विश्वविद्यालय से हटाकर बिहार विद्यापीठ में दाखिल करवाया था। उन्होंने 'सर्चलाईट' और 'देश' जैसी पत्रिकाओं में इस विषय पर बहुत से लेख लिखे थे और इन अखबारों के लिए अक्सर वे धन जुटाने का काम भी करते थे। 1914 में बिहार और बंगाल मे आई बाढ़ में उन्होंने काफी बढ़चढ़ कर सेवा-कार्य किया था। भारत के स्वतन्त्र होने के बाद संविधान लागू होने पर उन्होंने देश के पहले राष्ट्रपति का पदभार सँभाला। राष्ट्रपति के तौर पर उन्होंने कभी भी अपने संवैधानिक अधिकारों में प्रधानमंत्री या कांTग्रेस को दखलअंदाजी का मौका नहीं दिया और हमेशा स्वतन्त्र रूप से कार्य करते रहे। हिन्दू अधिनियम पारित करते समय उन्होंने काफी कड़ा रुख अपनाया था। राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने कई ऐसे दृष्टान्त छोड़े जो बाद में उनके परवर्तियों के लिए उदाहरण बन गए। भारतीय संविधान के लागू होने से एक दिन पहले 25 जनवरी 1950 को उनकी बहन भगवती देवी का निधन हो गया, लेकिन वे भारतीय गणराज्य के स्थापना की रस्म के बाद ही दाह संस्कार में भाग लेने गये। 12 वर्षों तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने के पश्चात उन्होंने 1962 में अपने अवकाश की घोषणा की। अवकाश ले लेने के बाद ही उन्हें भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा गया। सरलता राजेन्द्र बाबू की वेशभूषा बड़ी सरल थी। उनके चेहरे मोहरे को देखकर पता ही नहीं लगता था कि वे इतने प्रतिभासम्पन्न और उच्च व्यक्तित्ववाले सज्जन हैं। देखने में वे सामान्य किसान जैसे लगते थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डाक्टर ऑफ ला की सम्मानित उपाधि प्रदान करते समय कहा गया था - "बाबू राजेंद्रप्रसाद ने अपने जीवन में सरल व नि:स्वार्थ सेवा का ज्वलन्त उदाहरण प्रस्तुत किया है। जब वकील के व्यवसाय में चरम उत्कर्ष की उपलब्धि दूर नहीं रह गई थी, इन्हें राष्ट्रीय कार्य के लिए आह्वान मिला और उन्होंने व्यक्तिगत भावी उन्नति की सभी संभावनाओं को त्यागकर गाँवों में गरीबों तथा दीन कृषकों के बीच काम करना स्वीकार किया।" सरोजिनी नायडू ने उनके बारे में लिखा था - "उनकी असाधारण प्रतिभा, उनके स्वभाव का अनोखा माधुर्य, उनके चरित्र की विशालता और अति त्याग के गुण ने शायद उन्हें हमारे सभी नेताओं से अधिक व्यापक और व्यक्तिगत रूप से प्रिय बना दिया है। गाँधी जी के निकटतम शिष्यों में उनका वही स्थान है जो ईसा मसीह के निकट सेंट जॉन का था।" विरासत सितम्बर 1962 में अवकाश ग्रहण करते ही उनकी पत्नी राजवंशी देवी का निधन हो गया। मृत्यु के एक महीने पहले अपने पति को सम्बोधित पत्र में राजवंशी देवी ने लिखा था - "मुझे लगता है मेरा अन्त निकट है, कुछ करने की शक्ति का अन्त, सम्पूर्ण अस्तित्व का अन्त।" राम! राम!! शब्दों के उच्चारण के साथ उनका अन्त 28 फरवरी 1963 को पटना के सदाक़त आश्रम में हुआ। उनकी वंशावली को जीवित रखने का कार्य उनके प्रपौत्र अशोक जाहन्वी प्रसाद कर रहे हैं। वे पेशे से एक अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त वैज्ञानिक एवं मनोचिकित्सक हैं। उन्होंने बाई-पोलर डिसऑर्डर की चिकित्सा में लीथियम के सुरक्षित विकल्प के रूप में सोडियम वैलप्रोरेट की खोज की थी। अशोक जी प्रतिष्ठित अमेरिकन अकैडमी ऑफ आर्ट ऐण्ड साइंस के सदस्य भी हैं। कृपया राजेन्द्र बाबू ने अपनी आत्मकथा (1946) के अतिरिक्त कई पुस्तकें भी लिखी जिनमें बापू के कदमों में बाबू (1954), इण्डिया डिवाइडेड (1946), सत्याग्रह ऐट चम्पारण (1922), गान्धीजी की देन, भारतीय संस्कृति व खादी का अर्थशास्त्र इत्यादि उल्लेखनीय हैं। भारत रत्न सन 1962 में अवकाश प्राप्त करने पर राष्ट्र ने उन्हें भारत रत्‍न की सर्वश्रेष्ठ उपाधि से सम्मानित किया। यह उस भूमिपुत्र के लिये कृतज्ञता का प्रतीक था जिसने अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर आधी शताब्दी तक अपनी मातृभूमि की सेवा की थी। निधन अपने जीवन के आख़िरी महीने बिताने के लिये उन्होंने पटना के निकट सदाकत आश्रम चुना। यहाँ पर 28 फ़रवरी 1963 में उनके जीवन की कहानी समाप्त हुई। https://www.huntinews.com/a-legacy-first-president-of-modern-india-bharat-ratna-dr-rajendra-prasad Death of Dr Rajendra Prasad - भारत रत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद के अंतिम क्षण 30 अक्तूबर 2019 https://web.archive.org/web/20191030163703/https://www.huntinews.com/a-legacy-first-president-of-modern-india-bharat-ratna-dr-rajendra-prasad/ 30 अक्तूबर 2019 dead यह कहानी थी श्रेष्ठ भारतीय मूल्यों और परम्परा की चट्टान सदृश्य आदर्शों की। हम सभी को इन पर गर्व है और ये सदा राष्ट्र को प्रेरणा देते रहेंगे। सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ Rajendra Prasad राजेन्द्र प्रसाद भारत के पूर्व राष्ट्रपति: राजेन्द्र प्रसाद राजेंद्र प्रसाद का जीवन परिचय राजेन्द्र प्रसाद का जीवन-चरित कांग्रेस पार्टी: राजेन्द्र प्रसाद Major Events of Dr. Rajendra Prasad (राजेन्द्र स्मृति संग्रहालय) श्रेणी:भारत के राष्ट्रपति श्रेणी:1884 में जन्मे लोग श्रेणी:१९६३ में निधन श्रेणी:भारत रत्न सम्मान प्राप्तकर्ता श्रेणी:भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष श्रेणी:भारतीय हिन्दू श्रेणी:भारतीय संविधान सभा के सदस्य