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रानी गाइदिन्ल्यू
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right|thumb|रानी गिडालू
रानी गिडालू या रानी गाइदिन्ल्यू (Gaidinliu ; 1915–1993) भारत की नागा आध्यात्मिक एवं राजनीतिक नेत्री थीं जिन्होने भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया। उनको भारत सरकार द्वारा समाज सेवा के क्षेत्र में सन १९८२ में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। http://pib.nic.in/newsite/hindifeature.aspx?relid=39579 https://web.archive.org/web/20150826102151/http://pib.nic.in/newsite/hindifeature.aspx?relid=39579 26 अगस्त 2015
भारत की स्वतंत्रता के लिए रानी गाइदिनल्यू ने नागालैण्ड में क्रांतिकारी आन्दोलन चलाया था। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के समान ही वीरतापूर्ण कार्य करने के लिए इन्हें 'नागालैण्ड की रानी लक्ष्मीबाई' कहा जाता है।
परिचय
रानी गाइदिनल्यू का जन्म नंग्कओं, ग्राम रांगमई मणिपुर में हुआ था। वह बचपन से ही बड़े स्वतंत्र और स्वाभिमानी स्वभाव की थीं। 13 वर्ष की आयु में वह नागा नेता जादोनाग के सम्पर्क में आईं। जादोनाग मणिपुर से अंग्रेज़ों को निकाल बाहर करने के प्रयत्न में लगे हुए थे। वे अपने आन्दोलन को क्रियात्मक रूप दे पाते, उससे पहले ही गिरफ्तार करके अंग्रेजों ने उन्हें 29 अगस्त, 1931 को फांसी पर लटका दिया।
अब स्वतंत्रता के लिए चल रहे आन्दोलन का नेतृत्व बालिका गाइदिनल्यू के हाथों में आ गया। उसने गांधी जी के आन्दोलन के बारे में सुनकर सरकार को किसी प्रकार का कर न देने की घोषणा की। उसने नागाओं के कबीलों में एकता स्थापित करके अंग्रेज़ों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए कदम उठाये। उसके तेजस्वी व्यक्तित्व और निर्भयता को देखकर जनजातीय लोग उसे सर्वशक्तिशाली देवी मानने लगे थे। नेता जादोनाग को फांसी देने से लोगों में असंतोष व्याप्त था, गाइदिनल्यू ने उसे सही दिशा की ओर की मोड़ा। सोलह वर्ष की इस बालिका के साथ केवल चार हज़ार सशस्त्र नागा सिपाही थे। इन्हीं को लेकर भूमिगत गाइदिनल्यू ने अंग्रेज़ों की सेना का सामना किया। वह छापामार युद्ध और शस्त्र संचालन में अत्यन्त निपुण थी। अंग्रेज उन्हें बड़ी खूंखार नेता मानते थे। दूसरी ओर जनता का हर वर्ग उसे अपना उद्धारक समझता था।
इस आन्दोलन को दबाने के लिए अंग्रेज़ों ने वहाँ के कई गांव जलाकर राख कर दिए लेकिन इससे लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ। सशस्त्र नागाओं ने एक दिन खुलेआम 'असम राइफल्स' की सरकारी चौकी पर हमला कर दिया। स्थान बदलते, अंग्रेज़ों की सेना पर छापामार प्रहार करते हुए गाइदिनल्यू ने एक इतना बड़ा किला बनाने का निश्चय किया, जिसमें उसके चार हज़ार नागा साथी रह सकें। इस पर काम चल ही रहा था कि 17 अप्रैल, 1932 को अंग्रेज़ों की सेना ने अचानक आक्रमण कर दिया। गाइदिनल्यू गिरफ्तार कर ली गईं। उन पर मुकदमा चला और कारावास की सजा हुई। उनने चौदह वर्ष अंग्रेज़ों की जेल में बिताए।
1947 में देश के स्वतंत्र होने पर ही वह जेल से बाहर आईं। नागा कबीलों की आपसी स्पर्धा के कारण रानी को अपने सहयोगियों के साथ 1960 में भूमिगत हो जाना पड़ा था।
सम्मान
स्वतंत्रता संग्राम में साहसपूर्ण योगदान के लिए प्रधानमंत्री की ओर से ताम्रपत्र देकर और राष्ट्रपति की ओर से 'पद्मभूषण' की मानद उपाधि देकर उन्हें सम्मानित किया गया।
स्वतंत्रता सेनानी ताम्रपत्र, 1972,
पद्म भूषण, 1982,
विवेकानंद सेवा सम्मान, 1983,
बिरसा मुंडा पुरस्कार, 1996
उनकी स्मृति में 1996 में डाक टिकट भी जारी किया गया।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
उक्यांग नागवा -- मेघालय के स्वतंत्रता सेनानी जिन्होने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया था।
बाहरी कड़ियाँ
रानी गाइदिनल्यू - नागालैंड की रानी लक्ष्मीबाई https://web.archive.org/web/20220103161629/https://dhyeyaias.in/current-affairs/daily-current-affairs/rani-gaidinliu-lakshmibai-of-nagaland 3 जनवरी 2022
पूर्वोत्तर भारत की स्वतंत्रता सेनानी रानी गाइदिन्ल्यू https://web.archive.org/web/20220103161629/https://dhyeyaias.in/current-affairs/daily-current-affairs/rani-gaidinliu-lakshmibai-of-nagaland 3 जनवरी 2022
श्रेणी:भारतीय क्रांतिकारी
श्रेणी:१९८२ पद्म भूषण
श्रेणी:१९९३ में निधन
श्रेणी:1915 में जन्मे लोग
श्रेणी:भारतीय स्वतंत्रता सेनानी
श्रेणी:सामाजिक कार्य में पद्म भूषण प्राप्तकर्ता